प्रजानीति

5 views
Skip to first unread message

Krishna G Misra

unread,
Jan 10, 2016, 2:33:20 AM1/10/16
to KRISHNA FELLOWSHIP, Durgashanker Nagda, Madhusudan Jhaveri, Ravi Kant Pathak, Mukund Apte, Ajay pandey
प्रजानीति

देश प्रजा का संकल्प है। देश देह है। यह शरीर या देह या देश आत्मा का ही संकल्प है। प्रजा, सशरीर आत्मा का ही रूप है। आत्मा जो इस रहस्य को जानती है उसे सरलता से यह बात समझ आ जाती है कि सभी शरीर उसी एक आत्मा के विविध संकल्प हैं। जैसे, शरीर के भिन्न भिन्न अंग जो भिन्न होते हुये भी सामूहिक बन उसी आत्मा के संकल्प के भाग हैं। भारत देश, आत्मा का एक विशिष्ट संकल्प है। प्रजा उस आत्मा का देश अर्थात शरीर है। भारत के तात्कालिक संविधान के निर्माण में कापी पेस्ट किये जाने से त्रुटियों के कारण यह ग्रंथ मौलिक नहीं रहा। यही कारण है कि प्रजा के लिए यह अनुपयोगी रहा और उसका ज्ञान और आचरण केवल कानून के चौधरी बने काले कोट वाले जज या वकील या पुलिस ही करते हैं। अँग्रेजी शासकों के दंड विधान को जस का तस अपना लिया गया। संस्थाओं में भी कोई मौलिक परिवर्तन नहीं किया गया। भारत की स्वतन्त्रता केवल शासकीय शक्तियों की अदला बदली थी।
भारत की प्रजा का वास्तविक संविधान दरअसल कोई लिखित नहीं है बल्कि भारत के प्रत्येक प्राणी चाहे वे वन वासी हों, या ग्रामीण या अनपढ़ हों, उनमें स्वतः जीवित है। और यही कारण है भारत की प्रजा हजारों साल से अपने प्रकृतिक, मासूम और शुद्ध चरित्र के बल से अपने आततायी शासकों से निपट चुकी है, और निपटती रहेगी। राजनीतिक शक्तियाँ, सैनिक शक्तियों या लालची अर्थव्यवस्था चाहे कितनी भी आकर्षक क्यों न हों, भारत की प्रजा का अहित वह सिर्फ इसलिए न कर सकीं कि भारत की प्रजा अपने आत्म तत्व को पहिचान रही है। भारतीय संविधान में यदि कुछ दिखावे के वाक्यों को छोड़ दिया जाय जो उसे भारतीय होने का भ्रम कराते हैं, तब वे अर्थ व्यवस्था और शासन व्यवस्था के पाश्चात्य सिद्धान्त ही हैं। गांधी या विनोबा भावे या तिलक की अपनी स्वयं द्वारा लिखी पुस्तकों का यह सारांश भी नहीं। राजनैतिक कुटिलता के कारण भारत का यह आयातित संविधान दुर्भाग्य से उन्हीं पाश्चात्य सुविधा भोगी शासकों की परंपरा का पोशाक बना। मैंने अपने पहिले के लिखे लेख में इसकी विस्तार से चर्चा की है कि कैसे प्रजा तंत्र का अपहरण राजनीति ने किस तरह किया और स्वाधीनता संग्राम कालांतर में राजनैतिक धंधे और राजनैतिक संग्राम में किस तरह परिवर्तित हुआ।
राष्ट्र के धारक को धृत राष्ट्र कहते हैं। यह धृत राष्ट्र, अपने राजनैतिक महत्वाकांन्क्षा के कारण अंधा है। उस धृत राष्ट्र के पुत्र दुर्योधन (दूषित धन या अर्थ व्यवस्था) और दुस्शासन (दूषित शासन) हैं। भीष्म (संविधान से प्राप्त शक्ति), कृपाचार्य (कृपा या जन हित का दिखावा), और शकुनि (व्यावसायिक छल), और कर्ण (कर्ज या नौकरी पेशा सरकारी तंत्र) इसी कौरव राष्ट्र की संरचना हैं। आज के भारत में राजनैतिक लोभ और भ्रष्टाचार और दुसश्शासन की वैज्ञानिक साहित्य को महाभारत नामक ग्रंथ में पढ़ा जा सकता है।
राजनैतिक प्रक्रिया, शत्रुता से लाभ या प्रतिस्पर्धा के सिद्धान्त पर निर्भर है। प्रजा एक तमाशबीन की तरह उन राजनैतिक शक्तियों को आपस में लड़ाती है और जीतने वाला शासक बन जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रजा का राजा पर विश्वास न होना है। इलेक्टोराल पॉलिटिक्स में कोई राजनैतिक पार्टी प्रजा को अपना इसलिये नहीं मानती क्योंकि प्रजा ने उन पर कभी विश्वास नहीं किया। राजनैतिक पार्टी जो स्वयं ही असुरक्षित हो, प्रजा पर भरोसा कैसे करेगी? यही कारण है राजनैतिक आधार पर बने देश में राजा और प्रजा, दोनों में विजय नहीं होता बल्कि दोनों ही हारते (जय -पराजय, और पराजय -जय) या असुरक्षित रहते हैं। इस व्यवस्था में कभी जय-जय या जिसमें दोनों पक्ष जीतें या विजय हों, नहीं हो सकता। इस व्यवस्था में प्रजा राजा को अस्थिर बनाती है और राजा प्रजा का शोषण करता है।
भारत का प्रजा तंत्र या प्रजा नीति का सिर्फ एक आधार है, प्रेम या अपनापन। भारत वह स्थान है जहां जज, जल्लाद, पुलिस, जेल, वकील और भय से शासन करने वाले शासक न हों। अधिकार जिसके लिए रण होते हैं, वे न हों। और खेल भी जो रण या प्रतिस्प्रधा की भावना या अहंकार का पोषण करते हों, न हों। न्याय जो अधिकारों के रण या लड़ाई के अखाड़े हों उनकी आवश्यकता ही हों। सम्मान का कारण कभी भी भय या लालच न हो बल्कि समानता और सार्वभौमिक उपयोगिता की योग्यता हो। जहां स्वेच्छा से दान करने वालों की कभी कोई कमी न हो किन्तु कानून के डर से टैक्स देने से लोग बचना चाहते हों। जहां शिक्षा व्यवस्था से भय, प्रतिस्प्रधा, असुरक्षा या तनाव न हो बल्कि उस ज्ञान से मन शांत और स्थिर, तथा मानवता और प्रेम से निरंतर भर जाय। जहां विकास की परिभाषा को भ्रष्ट करने वाले न हों और विकास का अर्थ, चरित्र और सद्भावना से हो न कि आर्थिक विषमता का मापदंड। यदि विकास का आधार आर्थिक होगा तब बुद्ध, गांधी, महावीर ये सरकारी नियमों से गरीबी रेखा से नीचे हैं वे विकसित नहीं कहे जा सकते। इसके विपरीत अंग्रेज़ जो आर्थिक, शासन व्यवस्था और तकनीकी रूप से निर्विवाद उत्कृष्ट कहे जाते थे उन्हें भारत छोड़ कर जाना पड़ा।
वह देश भारत नहीं कहा जा सकता जहां प्रेम न हो। प्रकृति की अद्भुत और असीमित बल का नाम ही प्रेम है। गाय दूध तभी देती है जब उसका बच्चा भूखा हो। यह इसलिये, कि गाय उस बच्चे को प्रेम करती है। वृक्ष फल भी इसलिये देते हैं क्योंकि उन्हें संसार से प्रेम है। प्रेम में कभी किसी अधिकार या योग्यता का प्रश्न ही नहीं उठता और यही कारण है कि उनमें प्रतिस्प्रधा या रण या न्याय के चौधरी नहीं होते। प्रतिस्प्रधा, तुलना या किसी को हरा कर जीतना, या रण या न्याय से कभी कोई स्थायी सृजन नहीं हो सकता। पशु सभ्यता (imperfect society, public system) जिसकी ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने व्याख्या की है मनुष्यों के लिये नहीं बनी। परंपरा साक्षी है कि कोई भी राजनैतिक व्यवस्था या नियंत्रण पर आधारित व्यवस्था केवल जानवरों को पशु या पब्लिक बनाने के लिये है। जानवर और पशु शरीर रचना के वर्गीकरण नहीं हैं। जंगली शेर जानवर है किन्तु वही शेर जब सर्कस का भाग है तब, पशु है। मानव शरीर धारी पशुओं के लिये सरकार या संवैधानिक व्यवस्था ही सर्कस है। इसी तरह जीसस क्राइष्ट के मृत्यु से 700 वर्ष पहिले, ग्रीक के तत्कालीन दार्शनिक प्लेटो ने मानव शरीर धारी जानवरों को पब्लिक अर्थात नियम कानून से बने सर्कस जिसे रिपब्लिक कहा गया बनाने की अवधारणा बनाई। उसी असभ्य समाज में जज, जल्लाद, पुलिस, वकील या दंड के नियम, कानून, या प्रतिस्प्रधा के खेल उसी सर्कस या रिपब्लिक का निर्माण किया गया। इसी प्रतिस्प्रधा पर आधारित मनोविज्ञान को पशु या पब्लिक या सिविलिजेशन या पशु पालन कहते हैं। मनुष्य कभी प्रतिस्प्रधा ही नहीं करते और उनमें तुलना करने या किसी अधिकार की इच्छा नहीं होती, और यही कारण है वे प्रेम करते हैं। बुद्ध, महावीर या अन्य महापुरुष मनुष्यों के उदाहरण हैं। माँ टेरसा या गांधी या अरबिंदो को यदि नोबल पुरस्कार के लिये चुनाव होता तब शायद ही कोई उसे लेना चाहता। यही समानता और प्रेम और अतुलनीय गुण ही मनुष्यता है। आज भी गांधी या टेरेसा या बुद्ध या महावीर जिन्हें हम पूजते हैं बनने के लिये कोई प्रतिस्प्रधा नहीं है किन्तु किसी सरकारी पद हथियाने के लिये या कोई अन्य लालच हमें अपनी ओर खीच ले जाता है। पशु यही हैं जो भय, लालच और यश के पाश से अपने को कभी छुड़ा नहीं पाते।
वसु धईव कुटुंबकम अर्थात समस्त विश्व एक परिवार है। परिवार किसी राजनैतिक दल का नाम नहीं है। परिवार में कभी किसी का चुनाव नहीं होता। यह प्रेम जो प्राकृतिक धर्म है, परिवार का संविधान है। यहाँ कोई प्रतिस्प्रधा नहीं है क्योंकि जो आज बच्चा है वही पिता बनेगा और वही पितामह। सभी के लिये, उनके उत्तर दायित्व उनके पद और अवस्था के अनुसार ही बदलते रहते हैं किन्तु कहीं कोई प्रतिस्प्रधा नहीं है। परिवार में कुछ भी बंटा हुआ नहीं है इसलिये अधिकार की कोई लड़ाई नहीं और किसी कानून, जज, जल्लाद, पुलिस, वकील यहाँ नहीं होते। यहाँ जो भी है प्राकृतिक है और आवश्यकता नुसार है और उसे यदि समाप्त न किया गया तो वह अपने आप सड़ जाता है। इसलिये यहाँ संग्रह और संग्रह के करण होने वाली कमी या संघर्ष नहीं होते। संघर्ष न होने से यहाँ कोई न तो जीतता है और न ही कोई हारता है इसलिये, तुलना या सफलता का अहंकार नहीं होता। नदी का जल, सूर्य का प्रकाश, प्राण वायु ये सभी संग्रह नहीं किये जा सकते जबकि इनकी कोई कमी भी नहीं होती। यही धर्म है। जबकि बिजली या बोतलबंद पानी व्यवस्था के उदाहरण है क्योंकि ये अपने-पराय, असमानता, संग्रह, संघर्ष और अधिकार और न्याय और दंड विधान के मूल करण हैं। राजनैतिक व्यवस्था एक व्यवस्था है जबकि प्रजा या प्रेम पर निर्भर परिवार, धर्म है।
भारत में परिवार की संस्था का विकास ही धर्म है। यदि यह संस्था बची रह गयी तो परिवार की भावना से समाज और समाज से देश बन सकता है। यहाँ देन लेन में कोई नाप तौल की कोई आवश्यकता न होगी। परिवार में सृजन और सद्भाव स्वतः होता है। भारत में गुरु गोविद साहिब ने एक प्रजा नीति बनाई थी। उसकी आज पुनः आवश्यकता है। हर एक परिवार से एक व्यक्ति देश और समाज की रक्षा के लिये स्वेच्छा से दान किया जाता था। इसका लाभ यह था कि देश के लिये सभी परिवार का योगदान निश्चित था। बच्चों चाहे वे किसी भी परिवार के हों समान शिक्षा व्यवस्था थी। आज भी गुरु गोविंद सिंह के अनुशासन पर निर्भर सिक्ख धर्म देश और समाज के लिये उदाहरण है। वहाँ सभी परिवार एक दूसरे के सुख दुख को बांटते हैं। व्यवसाय और अर्थ का सही लाभ उन्हें प्राप्त होता है। परिवार के सिद्धान्त से ही समाज का निर्माण संभव हो सकता है और तभी यह धर्म बन स्थायी हो सकता है। इसी तरह, भारत के लोगों की परंपरा का आकलन कर , भारत में प्रजा नीति का निर्माण होना चाहिये और भारत को इस राजनैतिक दुर्दशा से बचाने का यत्न करना चाहिये।
परिवार ही राष्ट्र। हर एक पिता, राष्ट्र पिता है। हर एक माता, राष्ट्र माता। हर एक पुत्र, राष्ट्र पुत्र। हर एक पुत्री, राष्ट्र पुत्री। यही सिद्धान्त, देश या राष्ट्र का परिवार रूप में परिवर्तित करने में सक्षम है। आत्मा का अपनापन ही इस राष्ट्र का संविधान है। प्रेम ही कर्म है। काम सभी जैसे हो रहे हैं वैसे ही होंगे या इससे बेहतर क्योंकि सोच की दिशा बदल जायेगी। अनावश्यक व्यय या व्यवस्थाएं न होंगी। आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलेगा। लोगों में परस्पर विरोध समाप्त हो जायेगा और भय और विषमताओं के बिना जीवन का समय लंबा, भारी और उबाऊ नहीं बल्कि, इतना कम लगेगा कि लोग प्रेम के लिए आतुर हो जाएंगे। जीवन का महत्व सभी को समझ आने लगेगा।


--
Krishna Gopal Misra tel: +91 93 124 01302  skype : qualitymeter   twitter: @kgmisra
www.qualitymeter.com
Happiness is the only language of Quality 
735, Sector 39, Near Unitech Cyber Park, Gurgaon 122002 India   
 
 
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages