झोपड़ी झरनों में बहती ......

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shreya

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Aug 31, 2010, 5:41:44 AM8/31/10
to KEF_Rajgarh
yeh lo bachhon...for you:

1 . झोपड़ी झरनों में बहती
कितना मज़ा आता अगर दुनिया ऐसी वैसी होती
झोपड़ी झरनों में बहती, झोपड़ी झरनों में बहती
कितना मज़ा आता......................................

रेलगाड़ी का कुछ होता नहीं काम वहां,
घूम आते दुनिया जहाँ, बिना पैसे दाम जहां
कितना मज़ा आता......................................

घोंसलों में होटल चलते उल्लू वहाँ पेप्सी पीते
चब्बक-चब्बक बच्चे करते, ठुम्मक ठुम्मक शेर चलते
कितना मज़ा आता.....................................

हाथी जहां नाव चलाता हंस को घुमाके लाता
कोई पहाड़ी गीत गाता, कितना मजा हाय आता
कितना मज़ा आता.....................................

घोडा बिना पंख जहाँ चाँद सितारों तक भी जाता
मेरी कटी हुई पतंगें, सारी मेरे पास लाता
कितना मज़ा आता.....................................

2 . दिन के ढलते...

दिन के ढलते रात के होते
आ जाते हैं कितने तारे
रात अंधेरी जितनी होती
ज्यादा चमक दिखाते तारे
दिन के ढलते .............

छोटे-छोटे नन्हे-नन्हे
झिलमिल- झिलमिल करते तारे
लेकिन रात को राह दिखाने
चमचम-चमचम करते आते तारे
दिन के ढलते ............

आते हैं जब काले बदल
छिप जाते हैं तब ये सारे
बारिश होते ही जुगनू जैसे
चमचम चमक दिखाते तारे
दिन के ढलते ............

विष्णु कुमार पारीक

& love from
Shreya! :)

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