का भरपूर रसास्वादन किया, दृश्य, श्रव्य और टंकित तीनों ही रूपों में| कैलाश जी की रचनाओं का तिलिस्म ही ऐसा है कि बरबस अपने में बाँध लेता है|
के एकल काव्यपाठ का आयोजन किया था| उक्त अवसर पर कुमार विश्वास जी ने कहा कि कैलाश गौतम जी एक ऐसे कवि हैं जिनको अबतक अंडर-एस्टिमेट किया गया है| वास्तव में यह बात कुछ हद तक अधिकतर रचनाकारों पर लागू होती है| आज कैलाश जी पर तीन विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं| कैलाश जी ने बहुत अच्छे और चुटीले दोहे भी लिखे हैं|
प्रसंगवश बता दूँ कि लोकनाथ, इलाहाबाद का एक मुहल्ला है जहाँ कैलाश जी प्रायः किसी चाय की दूकान पर बैठते थे।
इसके अतिरिक्त कैलाश जी बहुत अच्छे नवगीतकार भी थे। उनके एक नवगीत की पंक्तियाँ हैं।
कैलाश जी की रचनाओं की विशेषता है कि वे मुहावरों और लोकोक्तियों का बड़ी सहजता से प्रयोग करते हैं जिससे उनकी रचनाओं की सम्प्रेषणीयता आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ जाती है। लोकभाषा और ग्राम्यजीवन का तो वे ऐसा जीवन्त चित्रण करते हैं कि व्यक्ति स्वयं को उन क्षणों से, उन अनुभूतियों से गुजरता हुआ अनुभव करता है। मुहावरे कितनी सहजता से आते हैं इसका उदाहरण देखें
कहो फलाने अबका होई
धइलस छूटल घाट धोबिनिया
अब त पटक-पटक के धोईतीनो ही वाक्य मुहावेरे हैं।
या
भइलैं सिंह सियार देखला
देहलैं दाँत चियार देखलायहाँ भी दो मुहावरे हैं।
इस भाषा के कारण श्रोता को अर्थनिष्पत्ति के लिये भटकना नहीं पड़ता। सुनते ही बिम्ब उसके मानस में स्पष्ट हो जाता है।
चर्चा लम्बी हो रही है लेकिन थोड़ी जानकारी और देना चाहूँगा कि कैलाश जी के खड़ी बोली के तीन संग्रह हैं "सीली माचिस की तीलियाँ", "सिर पर आग" एवम् "जोड़ा ताल" । भोजपुरी में उनका काव्य संग्रह है "तीन चौथाई आन्हर"। इसके अतिरिक्त संगीत नाटिका ’राम रसायन’(भोजपुरी), हिन्दी उपन्यास ’तम्बुओं का शहर’, ’जै-जै सियाराम’, हास्य-व्यंग्य निबन्ध ’चिन्ता नये जूते की’ और दोहा संकलन ’बिना कान का आदमी’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
आदरणीय कमल जी, शार्दुला जी, आनन्द जी,अचल जी, अभिनव जी, महेश जी, हिमांशु जी, श्रीप्रकाश जी, शैलजा जी, प्रतिभा जी, प्रताप जी एवं अजन्ता जी (किसी का नाम छूट गया हो तो क्षमा करियेगा) आपने सभी ने कैलाश जी की रचना की सराहना करके उनकी स्मृति को श्रद्धांजलि अर्पित की है इसके लिये आभार!
प्रताप जी, निवेदन है साहित्यानुरागी श्रद्धेय पिता जी को मेरा प्रणाम कहियेगा जिनके शुभ संस्कारों के कारण हमे अपने समूह के लिये एक सशक्त कवि प्राप्त हुआ है। कैलाश जी ईकविता पर भी उपलब्ध हैं। उनकी भोजपुरी रचनाओं को मैं धीरे-धीरे उसमें जोड़ने का यत्न कर रहा हूँ। लेकिन खेद है कि स्व० चन्द्र शेखर मिश्र जी कविता कोश में सूचीबद्ध नहीं हैं जबकि उनका ’वीर कुवँर सिंह’ खण्ड-काव्य भोजपुर विश्वविद्यालय के भोजपुरी भाषा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है। चन्द्र शेखर जी फक्कड़ किस्म के व्यक्ति थे। आपको ज्ञात होगा कि किसी समय उनके गीत " झुलनी का रंग साँचा हमार पिया" की बड़ी धूम थी। आज प्रसंगवश चर्चा चली है तो मैं चाहूँगा कि कविताकोश के प्रबन्धकगण इस बात पर ध्यान दें। चन्द्र शेखर जी पर कई शोध भी किये जा चुके हैं।
अजन्ता जी, आपकी भी भोजपुरी भाषा में इतनी रुचि है। जानकर अतीव प्रसन्नता हुई।
इतनी देर तक मेरा एकालाप सुनने के लिये आपसबका आभारी हूँ।
सादर
अमित
2010/1/15 Amitabh Tripathi
<amita...@gmail.com>