अमवसा क मेला - स्व० कैलाश गौतम

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Amitabh Tripathi

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Jan 15, 2010, 5:59:50 AM1/15/10
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आदरणीय सदस्यगण
आज माघ मास की अमावस्या तिथि है। तीर्थराज प्रयाग का यह सबसे महत्त्वपूर्ण स्नानपर्व है। देश के कोने-कोने से लोग इस स्नान पर्व पर त्रिवणी में डुबकी लगाने आते हैं। कुम्भ और अर्द्ध कुम्भ केअ अवसरों पर तो बहुत से विदेशी भी यहाँ आकर्षित होते हैं। १८८९ के महाकुम्भ के समय जनकवि स्व० कैलाश गौतम जी ने इस मेले का बड़ा ही जीवन्त चित्रण किया था। इस मेले को रूपायित करती उनकी भोजपुरी में रचित कविता "अमवसा क मेला" एक कालजयी कृति हो गयी है। जिन्होने इसे उनके मुहँ से सुना है उनकी बात ही और है लेकिन जिन्होने नहीं भी सुना है उन्हे भी आनन्द आयेगा ऐसा मैं समझता हूँ। यह कविता शीघ्र ही कविताकोष में भी उपलब्ध हो जायेगी।
अगर आप ग्राम्य परिवेश से परिचित होंगे तो विशेष आनन्द आयेगा। स्व० जगदीश गुप्त जी इस कविता से इतने प्रभावित हुये कि उन्होने इस कविता के आधार पर कुम्भ मेले के कई चित्र बनाये थे जो गौतम जी के तीन चौथाई आन्हर कव्य संकलन में प्रकाशित हैं। गुप्त जी इस कविता को कविता नही शब्द चित्र कहते थे। आशा है आप सभी को भी यह कविता पसन्द आयेगी। यह कैलाश जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि है उन्ही के काव्य के द्वारा। (कविता लम्बी है लेकिन आप एक साँस में पढ़ जायेंगे)
सादर
अमित
अमवसा क मेला
ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा

धरम में करम में सनल गाँव देखा
अगल में बगल में सगल गाँव देखा
अमवसा नहाये चलल गाँव देखा॥

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा
अ कमरी में केहू, रजाई में केहू
अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू
अ आजी रंगावत हईं गोड़ देखा
हँसत ह‍उवैं बब्बा तनी जोड़ देखा
घुँघुटवै से पूँछै पतोहिया कि अ‍इया
गठरिया में अबका रखाई बत‍इहा
एहर ह‍उवै लुग्गा ओहर ह‍उवै पूड़ी
रमायन के लग्गे हौ मड़ुआ के ढूँढ़ी
ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी
अ नयका चपलवा अचारे के ओरी

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

मचल ह‍उवै हल्ला चढ़ावा उतारा
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गुर्रा ओहर लोली-लोला
अ बिच्चे में ह‍उवै सराफत से बोला
चपायल हौ केहू, दबायल हौ केहू
अ घंटन से उप्पर टंगायल हौ केहू
केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर
केहू फनफनात ह‍उवै कीरा के नीयर
अ बप्पारे बप्पा, अ द‍इया रे द‍इया
तनी हमैं आगे बढ़ै देत्या भ‍इया
मगर केहू दर से टसकले न टसकै
टसकले न टसकै, मसकले न मसकै
छिड़ल हौ हिताई नताई क चरचा
पढ़ाई लिखाई कमाई क चरचा
दरोगा क बदली करावत हौ केहू
अ लग्गी से पानी पियावत हौ केहू

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

जेहर देखा ओहरैं बढ़त ह‍उवै मेला
अ सरगे क सीढ़ी चढ़त ह‍उवै मेला
बड़ी ह‍उवै साँसत न कहले कहाला
मूड़ैमूड़ सगरों न गिनले गिनाला
एही भीड़ में संत गिरहस्त देखा
सबै अपने अपने में हौ ब्यस्त देखा
अ टाई में केहू, टोपी में केहू
अ झूँसी में केहू, अलोपी में केहू
अखाड़न क संगत अ रंगत ई देखा
बिछल हौ हजारन क पंगत ई देखा
कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ
कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ
केहू बुढ़िया माई के कोरा उठावै
अ तिरबेनी म‍इया में गोता लगावै
कलपबास में घर क चिन्ता लगल हौ
कटल धान खरिहाने व‍इसै परल हौ

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

गुलब्बन क दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव ज‍इसे नदी तीरे-तीरे
सजल देह हौ ज‍इसे गौने क डोली
हँसी हौ बताशा शहद ह‍उवै बोली
अ देखैलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का
फुटेहरा नियर मुस्किया-मुस्किया के
ऊ देखेलीं मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलैंलीं
अ नरियर पे नरियर चढ़ावत चलैलीं
किनारे से देखैं इशारे से बोलैं
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं
बड़े मन से मन्दिर में दरसन करैलीं
अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं
चढ़ावैं चढ़ावा अ गोठैं शिवाला
छुवल चाहैं पिन्डी लटक नाहीं जाला

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

बहुत दिन पर चम्पा चमेली भेट‍इलीं
अ बचपन क दूनो सहेली भेंट‍इलीं
ई आपन सुनावैं ऊ आपन सुनावैं
दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं
असों का बनवलू असों का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो न अब तक पठवलू
न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं
हमैं अपनी सासू क पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी क पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की
चलत ह‍उवै टेम्पो चलत ह‍उवै चक्की
मनैमन जरै अ गड़ै लगलीं दूनों
भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगली दूनों
अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै
अ हलुवाई ज‍इसे कराही छोड़ावैं

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

कलौता क माई क झोरा हेरायल
अ बुद्धू क बड़का कटोरा हेरायल
टिकुलिया क माई टिकुलिया के जोहै
बिजुलिया क भाई बिजुलिया के जोहै
माचल ह‍उवै मेला में सगरों ढुंढाई
चमेला क बाबू चमेला का माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले
अ छोटकी बिटिउवा क मारत चलैले
बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले
गोबरधन क सरहज किनारे भेंट‍इलीं
गोबरधन के संगे प‍उँड़ के नह‍इलीं
घरे चलता पाहुन दही-गुड़ खियाइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं फेंक गठरी पर‍इलैं गोबरधन
न फिर-फिर देख‍इलैं धर‍इलैं गोबरधन

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै
केहू बस अटैची क ताला मोलावै
केहू चायदानी पियाला मोलावै
सोठ‍उरा क केहू मसाला मोलावै
नुमाइस में जातैं बदल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया से आगे निकल ग‍इलीं भ‍उजी
हिंडोला जब आयल मचल ग‍इलीं भ‍उजी
अ देखतै डरामा उछल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया बेचारू जोड़त ह‍उवैं खरचा
भुल‍इले न भूलै पकौड़ी क मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी क चिन्ता
बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता
फटल ह‍उवै कुरता फटल ह‍उवै जूता
खलित्ता में खाली केराया क बूता
तबौ पीछे-पीछे चलत जात ह‍उवन
गदेरी में सुरती मलत जात ह‍उवन

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

- कैलाश गौतम

Pratap Singh

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Jan 18, 2010, 4:36:44 AM1/18/10
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आदरणीय अमिताभ जी,

सबसे पहले इस कविता को पिताजी से सुना था. वास्तव में मेरे अन्दर जो काव्य बोध है वह पिताजी से ही प्राप्त हुआ है. वैसे तो वे गणित के प्रवक्ता थे (अब सेवा निवृत्त हो चुके हैं), किन्तु साहित्य में उनकी बहुत रूचि है. घर में साहित्यिक पुस्तकों का एक स्थान है. निराला से लेकर आधुनिक श्रेष्ठ कवियों की बहुत सी रचनाएँ वे हमें सुनाते थे. और जिस ढंग से वे काव्य पाठ करते हैं, उस तरह से स्वयं रचनाकार ही पाठ कर सकता है. हर भाव उनकी ओजपूर्ण वाणी से बिल्कुल वैसे ही प्रस्फुटित होती है जैसे कि लिखते समय रचनाकार के मन में लिखते समय उठी होगी.

यह कविता हिंदी की जिस शैली में है उसी में ही मैंने आँखें खोली थी. उसी में पहला शब्द सुना था. उसी में बोलना सीखा था. उसी में हमारी सोच विकसित हुई थी. श्री कैलाश गौतम जी, श्री चंद्रशेखर मिश्र जी ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी भोजपुरी में रचित कविताएँ बहुत ही उत्कृष्ट हैं. जो भाव प्रबंधन, अलंकार और उपमाएं इनकी कविताओं में मिलती हैं खड़ी हिंदी के किसी श्रेष्ठ काव्य में भी मिलना दुर्लभ होता है. चंद्रशेखर मिश्र जी की "वीर कुँवर सिंह" और  "द्रौपदी चीर हरण" आदि खण्ड काव्यों को पढ़ते सुनते समय कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अपने आँसुओं को रोक पाने में सफल नहीं हो पाता है.

इस कविता में ही भाव प्रबंधन देखिये -  
अ आजी रंगावत हईं गोड़ देखा
हँसत ह‍उवैं बब्बा तनी जोड़ देखा

किनारे से देखैं इशारे से बोलैं
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं


गोबरधन क सरहज किनारे भेंट‍इलीं
गोबरधन के संगे प‍उँड़ के नह‍इलीं


न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं
हमैं अपनी सासू क पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी क पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की
चलत ह‍उवै टेम्पो चलत ह‍उवै चक्की


नुमाइस में जातैं बदल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया से आगे निकल ग‍इलीं भ‍उजी
हिंडोला जब आयल मचल ग‍इलीं भ‍उजी
अ देखतै डरामा उछल ग‍इलीं भ‍उजी


अ भ‍इया बेचारू जोड़त ह‍उवैं खरचा

भुल‍इले न भूलै पकौड़ी क मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी क चिन्ता
बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता


और उपमाओं को देखिये-

जेहर देखा ओहरैं बढ़त ह‍उवै मेला
अ सरगे क सीढ़ी चढ़त ह‍उवै मेला

केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर
केहू फनफनात ह‍उवै कीरा के नीयर


गुलब्बन क दुलहिन चलैं धीरे-धीरे

भरल नाव ज‍इसे नदी तीरे-तीरे
सजल देह हौ ज‍इसे गौने क डोली
हँसी हौ बताशा शहद ह‍उवै बोली
अ देखैलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का
अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै
अ हलुवाई ज‍इसे कराही छोड़ावैं


चित्रण तो पूरी कविता में ही अनूठा है.


आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता को प्रेषित करने के लिए. अभिनव जी का आभार कि उनके सौजन्य से इस कविता को कैलाश जी की आवाज़ में  सुनने  का आनंद प्राप्त हो सका.

सादर
प्रताप   







2010/1/15 Amitabh Tripathi <amita...@gmail.com>
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Amitabh Tripathi

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Jan 19, 2010, 12:09:01 PM1/19/10
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आदरणीय सदस्यगण,
आपने अमावसा क मेला का भरपूर रसास्वादन किया, दृश्य, श्रव्य और टंकित तीनों ही रूपों में| कैलाश जी की रचनाओं का तिलिस्म ही ऐसा है कि बरबस अपने में बाँध लेता है|
अभी गत ९ दिसंबर को उनकी तृतीय पुण्यतिथि पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने कुमार विश्वास के एकल काव्यपाठ का आयोजन किया था| उक्त अवसर पर कुमार विश्वास जी ने कहा कि कैलाश गौतम जी एक ऐसे कवि हैं जिनको अबतक अंडर-एस्टिमेट किया गया है| वास्तव में यह बात कुछ हद तक अधिकतर रचनाकारों पर लागू होती है| आज कैलाश जी पर तीन विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं| कैलाश जी ने बहुत अच्छे  और चुटीले दोहे भी लिखे हैं|
दूध दुहे बलटा भरे, गये शहर की ओर
दिन डूबा दरू पिये लौटे, नन्द किशोर

उलटा पुलटा हो गया अब का कारोबार
थाने में जन्माष्टमी, मन्दिर में हथियार

जबसे आया बम्बई, तबसे नींद हराम
चौपाटी तुझसे भली लोकनाथ की शाम

प्रसंगवश बता दूँ कि लोकनाथ, इलाहाबाद का एक मुहल्ला है जहाँ कैलाश जी प्रायः किसी चाय की दूकान पर बैठते थे।
इसके अतिरिक्त कैलाश जी बहुत अच्छे नवगीतकार भी थे। उनके एक नवगीत की पंक्तियाँ हैं।
याद तुम्हारी साथ हमारे ऐसे रहती है
जैसे कोई नदी किले सट कर बहती है

यहाँ भी इलाहाबाद है (यमुना जी किले सट कर ही बहती हैं इलाहाबाद में)
कैलाश जी की रचनाओं की विशेषता है कि वे मुहावरों और लोकोक्तियों का बड़ी सहजता से प्रयोग करते हैं जिससे उनकी रचनाओं की सम्प्रेषणीयता आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ जाती है। लोकभाषा और ग्राम्यजीवन का तो वे ऐसा जीवन्त चित्रण करते हैं कि व्यक्ति स्वयं को उन क्षणों से, उन अनुभूतियों से गुजरता हुआ अनुभव करता है। मुहावरे कितनी सहजता से आते हैं इसका उदाहरण देखें
कहो फलाने अबका होई
ध‍इलस छूटल घाट धोबिनिया
अब त पटक-पटक के धोई

तीनो ही वाक्य मुहावेरे हैं।
या
भ‍इलैं सिंह सियार देखला
देहलैं दाँत चियार देखला

यहाँ भी दो मुहावरे हैं।
इस भाषा के कारण श्रोता को अर्थनिष्पत्ति के लिये भटकना नहीं पड़ता। सुनते ही बिम्ब उसके मानस में स्पष्ट हो जाता है।
चर्चा लम्बी हो रही है लेकिन थोड़ी जानकारी और देना चाहूँगा कि कैलाश जी के खड़ी बोली के तीन संग्रह हैं "सीली माचिस की तीलियाँ", "सिर पर आग" एवम्‌ "जोड़ा ताल" । भोजपुरी में उनका काव्य संग्रह है "तीन चौथाई आन्हर"। इसके अतिरिक्त संगीत नाटिका ’राम रसायन’(भोजपुरी), हिन्दी उपन्यास ’तम्बुओं का शहर’, ’जै-जै सियाराम’, हास्य-व्यंग्य निबन्ध ’चिन्ता नये जूते की’ और दोहा संकलन ’बिना कान का आदमी’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
आदरणीय कमल जी, शार्दुला जी, आनन्द जी,अचल जी, अभिनव जी, महेश जी, हिमांशु जी, श्रीप्रकाश जी, शैलजा जी, प्रतिभा जी, प्रताप जी एवं अजन्ता जी (किसी का नाम छूट गया हो तो क्षमा करियेगा) आपने सभी ने कैलाश जी की रचना की सराहना करके उनकी स्मृति को श्रद्धांजलि अर्पित की है इसके लिये आभार!
प्रताप जी, निवेदन है साहित्यानुरागी श्रद्धेय पिता जी को मेरा प्रणाम कहियेगा जिनके शुभ संस्कारों के कारण हमे अपने समूह के लिये एक सशक्त कवि प्राप्त हुआ है। कैलाश जी ईकविता पर भी उपलब्ध हैं। उनकी भोजपुरी रचनाओं को मैं धीरे-धीरे उसमें जोड़ने का यत्न कर रहा हूँ। लेकिन खेद है कि स्व० चन्द्र शेखर मिश्र जी कविता कोश में सूचीबद्ध नहीं हैं जबकि उनका ’वीर कुवँर सिंह’ खण्ड-काव्य भोजपुर विश्वविद्यालय के भोजपुरी भाषा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है। चन्द्र शेखर जी फक्कड़ किस्म के व्यक्ति थे। आपको ज्ञात होगा कि किसी समय उनके गीत " झुलनी का रंग साँचा हमार पिया" की बड़ी धूम थी। आज प्रसंगवश चर्चा चली है तो मैं चाहूँगा कि कविताकोश के प्रबन्धकगण इस बात पर ध्यान दें। चन्द्र शेखर जी पर कई शोध भी किये जा चुके हैं।
अजन्ता जी, आपकी भी भोजपुरी भाषा में इतनी रुचि है। जानकर अतीव प्रसन्नता हुई।
इतनी देर तक मेरा एकालाप सुनने के लिये आपसबका आभारी हूँ।
सादर
अमित
2010/1/15 Amitabh Tripathi <amita...@gmail.com>



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