चुनावी मौसम
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चुनावी तापमान नामांकन की तारीख घोषित होते ही गडाबडाने लगता है।कभी भरी सर्दी में भी गर्मी का अहसास होने लगता है तो कहीं गर्मी में भी माहोल में ठंडक बनी रहती है।यहाँ तो स्थिति ये है कि सूर्य देव की कृपा से जहाँ सभी को वैसे ही गर्मी का अहसास हो रहा है ,वहीं चुनावी भाषणों और रैलियों से गर्मी बढ़्ती जा रही है।
लेकिन ऐसी गर्मी में भी कुर्सी की चाहत भी ऐसी बला है कि लोगों को तपती दोपहरी भी ए.सी. की ठंडक दे रही है।बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ती हर साल कब आती है और कब चली जाती है इसका अहसास कुछ लोगों को तो शायद पहली बार ही हुआ होगा। चलो अच्छा है चुनाव के बहाने ही सही यह तो मालूम ही हो गया कि बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ति भी हमारे देश में मनाई जाती है।
तभी तो महाराजा साहब हों या इंजीनियर साहब सभी पहुँच गये लावा-लश्कर के साथ गुरुद्वारे में मथ्था टेकने।इस बहाने दरबार में हाजरी भी हो गई और साथ ही लंगर का स्वाद भी चख लिया......।अब यह भी एक संयोग ही था कि दोनों बडे दलों के उम्मीदवार एक ही साथ गुरुग्रंथ साहिब के दरबार में हाजरी लगाने पहुँचे थे जिससे इन्हें भी एक दूसरे को हाय हेलो कहने का मौका तो मिल गया
\ दोनों ने एक दूसरे से अपने लिऐ वोट माँगी या नहीं मैं नहीं कह सकता लेकिन इतना तय है कि दोनों ही मन ही मन यह जरूर सोच रहे होंगे कि ये कहाँ से आ टपके इस समय.....?अब इन लोगों से कोई पूछे ले कि अब से पहले भल कौन-कौन कितनी बार गया यहाँ पर मथ्था टेकने.....और लंगर चखनेतो सभी शायद बगलें झाकने लगें.....?वैसे भी इन्हें लंगर वंगर से भला क्या लेना देना....? इस बहाने मुफ्त में भीड मिल गई और अपना भी प्रचार हो गया बस......... और भला किसी को क्या चाहिऐ इस चुनावी मौसम में किसी भी उम्मीदवार को........?
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गरजू लाल जी पिछले विधान सभ चुनाव से पूर्वही जात- पांत के चक्कर में कमल के साथ से हाथ धो बैठे थे। उन्हें न जाने कैसे भ्रम हो गया कि वे जाति विशेष के नेता बन गये और उनकी जाति के सभी लोग उनके ही पीछे हैं।उन्हें पक्का विश्वास था कि जात और हाथ का सहयोग बना रहा तो निश्चित ही वे कुर्सी पर पुनः विराजमान हो ही जाऐगें।
इस भ्रम में ही उन्होंने अपने पुराने क्षेत्र से हाथ का साथ देते हुऐ हाथ के साथ जात के दम पर चुनाव लडा मगर चारों खाने चित...इधर भी और उधर भी....।या कह जाइ कि खुद तो डूबे ही सनम उन्हें भी ले डूबे।
अब लोकसभा में उन्हें एक बार फिर उम्मीद थी कि वे उनका साथ देते हुऐ अपनि रेलगाडी में लटका लेंगे ।मगर उन्होंने भी कह दिया कि पहले आप हमारा हाथ थाम कर मजबूती प्रदान करें तो हम भी कुछ सोचेगें.....?
मगर इन्हें तो शायद हाथ से ज्यादा जात पर विश्वास था इसीलिऐ आखिर तक लटके रहे कि मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ...?
और अन्त में ट्रेन की सारी सीटें ही फुल हो गई। अब वे अपनी किस्मत को कोस रहे है कि हाथ का साथ थाम लेता तो शायद जात का साथ अपने आप ही मिल जाता। मगर अब वे दोष दे रहे हैम उन पर कि उन्होंने हाथ झटक कर हमें तो सडक पर ला दिया.....। यह निर्णय तो उन्हें ही करना था कि उन्हें जात सम्भालनी है या हाथ..............?
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भूल सुधार
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चुनावी मौसम में अचानक बदलाव आ गया है। कोटा के पूर्व जिला प्रमुख जिन्होंने पिछले तीस सालों से कमल का दामन थाम रखा था अचानक उन्हें कमल की गंध से एलर्जी हो गई हैऔर कमल से नाता तोड़कर हाथी पर सवारी करने का का विचार बना लिया है।भाजपा से पहले
विधान सभा और अब लोकसभा में उनकी नहीं सुनने पर उन्हें अहसास हो गया है कि भाजपा की नीतियां देश हित में नहीं है। इसलिऐ देशहित को ध्यान में रखकर वेहाथी पर सवारी करने जा रहें है और शुक्रवार को कोटा से उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करेंगे। उन्हें लगता है कि बहिन जी के सानिध्य में वे देशहित कर सकेगें । लगता हैउनके जिलाप्रमुख के कार्यकाल में जो उन्होंने देश का नुकसान किया अब वे उसे सुधारना चाहते हैं।-----------------------------------------------------------------------------------------------------------
गूर्जरों को लॉलीपाप
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गूर्जरों को पिछली राजस्थान सरकार ने आरक्षण का लॉलीपाप थमा कर बैसला को अपनी गोद में बिठा लिया
था। इसबार हाथी पर सवार बहिन जी ने राजस्थान में प्रवेश करने के लिऐ गुर्जरों की तरफ आरक्षण का नया पैतरा फैका है।लगता है आरक्षण ही एक ऐसा अचूक बाण आजकल नेताओं के पास बचा है जिसके माध्यम से भोली भाली जनता को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। किसीने सही ही कहा है कि जब तक बेवकूफ बनने वाले मिलते रहेगें बनाने वालों की कमी नहीं आने वाली......।राजस्थान विधान सभा में हालाकि बहिन जी के छः विधायक आ गये थे हाथी पर सवार होकर ,मगर क्या करें कुर्सी के लिऐ हाथी से छलांग लगाकर गहलोत सरकार का हाथ थामने से बहिन जी वापस शून्य पर जा पहुँची..।आखिर बहिन जी भी तो यह सब मात्र कुर्सी के लिऐ ही कर रही हैं....?
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गरजू लाल जी पिछले विधान सभा चुनाव से पूर्व ही जात- पांत के चक्कर में कमल के साथ से हाथ धो बैठे थे। उन्हें न जाने कैसे भ्रम हो गया कि वे जाति विशेष के नेता बन गये और उनकी जाति के सभी लोग उनके ही पीछे हैं।उन्हें पक्का विश्वास था कि जात और हाथ का सहयोग बना रहा तो निश्चित ही वे कुर्सी पर पुनः विराजमान हो ही जाऐगें।
इस भ्रम में ही उन्होंने अपने पुराने क्षेत्र से हाथ का साथ देते हुऐ हाथ के साथ जात के दम पर चुनाव लडा मगर चारों खाने चित...इधर भी और उधर भी....।या कह जाइ कि खुद तो डूबे ही सनम उन्हें भी ले डूबे।
अब लोकसभा में उन्हें एक बार फिर उम्मीद थी कि वे उनका साथ देते हुऐ अपनि रेलगाडी में लटका लेंगे ।मगर उन्होंने भी कह दिया कि पहले आप हमारा हाथ थाम कर मजबूती प्रदान करें तो हम भी कुछ सोचेगें.....?
मगर इन्हें तो शायद हाथ से ज्यादा जात पर विश्वास था इसीलिऐ आखिर तक लटके रहे कि मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ...?
और अन्त में ट्रेन की सारी सीटें ही फुल हो गई। अब वे अपनी किस्मत को कोस रहे है कि हाथ का साथ थाम लेता तो शायद जात का साथ अपने आप ही मिल जाता। मगर अब वे दोष दे रहे हैम उन पर कि उन्होंने हाथ झटक कर हमें तो सडक पर ला दिया.....। यह निर्णय तो उन्हें ही करना था कि उन्हें जात सम्भालनी है या हाथ..............?