मेरी पहली कविता - "मेरे नवोदय के दिन"
बहुत याद आते हैं वो नवोदय के दिन
नहीं भूल पाएँगें वो नवोदय के दिन
वो पढ़ायी के, वो खेलने के, वो मस्ती के दिन ।
वो प्रेयर से बचना, वो न्यूज और जी के रटना
क्लास रूम में हुड़दंग मचाना, चीखना-चिल्लाना और चाक से खेलना,
फिर टीचर के आने पर बेंच के पीछे छिप जाना,
लेक्चर सुनते सुनते सो जाना और टीचर के बुलाने पर जवाब ना दे पाना,
लंच के लिये जल्दी भागना और छिपकर लाइन के बीच में घुस जाना,
लंच के बीच की वो शरारतें, वो खाते-खाते दूसरे की प्लेट से भी निकाल कर खा लेना ।
वो रिमीडियल से बचने के लिये बहाने करना,
छिपकर सो जाना या दीवाल फांद कर कुड़ासन जाना,
फिर गेम्स की मस्ती में फिर खो जाना,
हास्टल में लोंगो को परेशान करना, पढ़ने ना देना,
मस्ती भरी बातों का लम्बी बहसों मे बदल जाना,
बातों-बातों में रात के बारह बज जाना और लाइट आफ करके फिर सो जाना ।
वो मस्ती मस्ती भरे दिन, वो बेपरवाह दिन, वो लापरवाह दिन,
वो पढ़ने-लिखने के दिन, वो खेलने कूदने के दिन,
बाहर की दुनिया से बेखबर वो अपने ही दिन,
क्या फिर लौट आयेगें वो दिन,
क्या हम कभी भूल पाएँगें वो दिन
बहुत याद आते हैं वो नवोदय के दिन
नहीं भूल पाएँगें वो नवोदय के दिन
- राघवेंद्र प्रताप सिंह
(1994-2001)
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