भगवान् महावीर जनम कल्याणक महोत्सव की हार्दिक शुभकामना -
जनकल्याण में जारी -
भगवान् महावीर "को" मानने के साथ भगवान् महावीर "की" भी मानो - मतलब भगवान् की शिक्षाओं को भी मानो
जन - जन के महावीर ने प्राणी-मात्र के कल्याण के लिए अमृत सम उपदेश दिया -
भगवान् महावीर ने मुख्य ३ सिद्धांत दुनिया को दिए, जिन्हें अगर सही रूप में अपनाया जाए तो समग्र विश्व में सुख-शांति होसकती है।
१) अहिंसा -
किसी भी जीव को मारना नहीं, हिंसा करना नहीं। संसार के सभी प्राणियों को आत्म-तुल्य समझना।
किसी का भी दिल दुखाना, किसी की स्वतंत्रता बाधित करना, किसी के साथ अन्याय और शोषण करना, किसी की आजीविकाबंद करा देना, ये सब हिंसा है - इनका त्याग ही अहिंसा है।
दया, करुणा, मैत्री, प्रेम, दान, शील, क्षमा, सत्य, आदि सभी गुण अहिंसा में आ जाते हैं।
२) अनेकांत -
अनेकान्तवाद जैन दर्शन की आधार शिला है, इसी पर जैन तत्त्वज्ञान की इमारत खड़ी है।
मैं ही सही हूँ - ये है एकान्तवाद और मैं भी सही हूँ - ये है अनेकान्तवाद। अनेकांत का अर्थ है - वास्तविकता को जाने के लिएअपने दृष्टिकोण के साथ - साथ विरोधी दृष्टिकोण को भी परखना। उसका दृष्टिकोण विशाल होता है, संकीर्ण नहीं। सत्य असीमएवं अनन्त है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी बात को ही सही समझता है, और दुसरे को गलत - परिणाम स्वरुप संघर्ष, अशांति, क्लेश,लड़ाई -झगडे बढ़ते है। अनेकान्तवाद सभी समस्याओं का समाधान है।
३) अपरिग्रह -
वस्तु अथवा पदार्थ से आसक्ति, मूर्छा ही परिग्रह है। अपनी आवश्कताओं को सिमित करना, मर्यादा करना ही अपरिग्रह है।संसार में पदार्थ सिमित है, और तृष्णा- कामना असीमित - इस कारण इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाती और मनुष्य दुखी होता है।
आज जितनी भी विषमता बढ़ी है, उसका एक मात्र कारण परिग्रह है। पैसे के लिए व्यक्ति क्या नहीं करता - हिंसा करता है, छल - कपटकरता है, चोरी करता है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, सभी पाप करता है।
इसका एक ही उपाय है - अपरिग्रह व्रत, संतोष परम सुख है। अपनी जरूरत पूरी होने के बाद धन-साधन का प्रयोग जन-सेवा मेंकरिए।