“ओबीसी साहित्य” को दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया ने अपने एमए (हिंदी) के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है।
साहित्यिक विमर्श और समाज में
‘बहुजन अवधारणा’ के प्रसार के लिए यह आवश्यक है कि इस देश की कृषक, पशुपालक और शिल्पकार जातियों की विशिष्ट समस्याओं पर ध्यान दिया जाए। ‘ओबीसी विमर्श’ यही करता है।
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के इस पाठ्यक्रम में जिन लेखकों को पढ़ाया जाएगा, उनमें चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, संतराम बीए, फणीश्वरनाथ रेणु, मधुकर सिंह, राजेंद्र यादव, शिवमूर्ति, रामधारी सिंह दिवाकर, सुरेंद्र स्निग्ध, रमाशंकर विद्रोही, ललई सिंह, भिखारी ठाकुर संजीव, सुभाषचंद्र कुशवाहा, दिनेश कुशवहा, रामश्रेष्ठ दीवना, हरिनारायण ठाकुर, हरेराम सिंह आदि प्रमुख हैं।
इस विषय पर "स्त्रीकाल" यूट्यूब चैनल ने इस विषय पर परिचर्चा की है। जिसमें इन सवालों पर चर्चा है कि ओबीसी साहित्य क्या है? इसके उद्देश्य क्या हैं? बहुजन साहित्य से इसका क्या रिश्ता है?
पैनल में हैं राजेंद्र प्रसाद सिंह, अनिता भारती, संतोष यादव और प्रमोद रंजन। एंकरिंग संजीव चंदन जी ने की है। उन्होंने कार्यक्रम का शीर्षक दिया है : "ओबीसी साहित्य का नया आगाज़"।
यूट्यूब पर परिचर्चा का लिंक :
https://youtu.be/X5j7cc7l5lQ