मैं ..कामकाजी मुस्लिम महिला हूं और मैं बुर्का नहीं पहनती। यह मेरा अपना
चुनाव है। इस्लाम में इसके लिए बेहद साफ-साफ कहा गया है – ला
इकराफिद्दीन। धर्म में कोई बाध्यता नहीं है। इस्लाम में कोई ड्रेस कोड भी
नहीं है। यह हिदायत जरूर दी गयी है कि महिलाएं और पुरुषों को सभ्य और
शालीन कपड़े पहनने चाहिए। इस लिहाज से मैं अपने काम और ड्रेस कोड के ऊपर
किसी संस्था और सरकार की पाबंदी का विरोध करूंगी। अगर कोई मुस्लिम महिला
बुर्का पहनना चाहती है, तो उसे पहनने की आजादी होनी चाहिए। कोई नहीं
पहनना चाहती है, तो उसे नहीं पहनने की आजादी हो।
मेरे परिवार में यह मान्यता शुरू से ही रही है। 1947 में मेरी अम्मी और
उनके साथ परिवार की अन्य महिलाओं ने बुर्का पहनना बंद कर दिया था। हमलोग
पानीपत के हैं। मुस्लिम बहुल आबादी वाला यह जिला उस वक्त पंजाब का सबसे
विकसित जिला था। शिक्षित और आत्मनिर्भरता वाले इस जिले की सबसे अहम पहचान
थी, वहां के समाज में महिलाओं की प्रधानता। मसलन, हमारी रिहाइश का नाम
परिवार की मोहतरमाओं के नाम पर होता था। ऐसे समाज में जब मेरी अम्मी और
उनके साथ की कई महिलाओं ने बुर्का हटाया, तो परिवार के पुरुषों ने उनकी
इच्छा का सम्मान किया।
दरअसल, पानीपत की महिलाएं अपनी तकदीर खुद ही बनाने वाली महिलाएं थीं।
इनमें से कई महिलाएं जब बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने के लिए विवश हुईं,
तो भी उन्होंने बुर्का नहीं पहना। उनसे वहां किसी ने न तो बुर्का पहनने
को कहा और न ही हटाने को। न तो वहां की सरकार ने और न ही परिवार के
सदस्यों ने। यह 63 साल पहले की बात है।
अब फ्रांस की सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहनने पर रोक लगायी है।
जब इस मुद्दे से संबंधित विधेयक को वहां की संसद में रखा गया, तो इसके
पक्ष में 336 मत पड़े, जबकि विरोध में महज एक। फ्रांस सरकार ने अपनी ओर
से कहा है कि महिलाओं का अपने चेहरों को ढकना फ्रांसीसी गणराज्य के
समाजवादी मूल्यों और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है। सरकारी वक्तव्य
में कहा गया है कि यह महिलाओं को दबाये जाने और कट्टरता की निशानी है।
यानी फ्रांस सरकार इसे मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण का कदम बता रही है।
पानीपत और फ्रांस की तुलना बेमानी है। लेकिन फ्रांस मानवाधिकारों के लिए
लड़ने-भिड़ने वाला देश रहा है। मेरी पीढ़ी के तमाम लोग फ्रांसीसी
क्रांति, बेस्टाइल का संघर्ष, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा,
मोंटेसक्यू, रोबस्पेयरी, लुई चौदहवें, मेरी एंटोनिटेट और गुलियोटिन की
कहानियों से वाकिफ हैं। इसके उलट पानीपत ऐसा नगर था, जहां अफगानिस्तान और
ईरान से आये सूफी संत आम लोगों को जीवन से जुड़ी शिक्षाएं दे रहे थे,
जिसे वहां के लोग बखूबी सीख रहे थे। इस्लामी मान्यताओं से जुड़े कई
शिक्षण संस्थान वहां हैं। ऐसे में, वहां के लोग खुले तौर पर अपने धर्म और
उसकी मान्यताओं पर बहस किया करते रहे हैं।
आज पानीपत एक समृद्ध नगर है, जहां आपको विकास के तमाम संकेत मिल जाएंगे।
लेकिन वहां भी पिछले 63 वर्षों में बदलाव हुआ है। वहां के लोग लिंगानुपात
पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसके चलते पानीपत में लिंगानुपात देश के
मुकाबले सबसे कम है। जिस जिले में कभी महिलाओं की प्रधानता थी, उन्हें
परिवार में सबसे ज्यादा सम्मान मिलता था, वहां आज प्रति हजार पुरुषों पर
महिलाओं की संख्या सबसे कम हो गयी है।
बहरहाल, मानवाधिकार की रक्षा करने वाले मुल्क फ्रांस ने अपने यहां
महिलाओं के बुर्के पर रोक लगाकर मानवाधिकार में कटौती की है। फ्रांस में
सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहनने वाली महिलाओं पर 190 डॉलर का जुर्माना
लगाया जाएगा। इतना ही नहीं, महिलाओं को बुर्का पहनने पर मजबूर करने वाले
घर के पुरुष सदस्य पर 37,754 डॉलर का जुर्माना लगाया जाएगा, साथ में एक
साल तक की कैद भी हो सकती है। मेरे ख्याल से इस कानून से फ्रांस की
मुस्लिम महिलाएं सशक्त नहीं होंगी। उल्टे इस कानून से उनका दमन बढ़ेगा।
इसे समझने के लिए फ्रांसीसी मुस्लिम महिलाओं की स्थिति का सामाजिक और
आर्थिक नजरिये से आकलन की जरूरत है।
वर्ष 1960 में जब फ्रांस आर्थिक विकास के रास्ते पर अग्रसर था, तब उसने
अपने यहां दूसरे जगह के लोगों को बुलाने के लिए वीजा संबंधी नियमों में
नरमी बरती थी। दूसरे देशों के लोगों के आने से फ्रांस के सर्विस सेक्टर
को सस्ते मजदूर मिल गये थे। और ये अप्रवासी लोग ही मुख्य शहरों के बाहरी
इलाकों में बस गये। इनमें मुसलमान भी थे।
इन परिवारों की महिलाएं गरीब और निम्न आय वर्ग की सदस्य हैं। नये कानून
की चपेट में ज्यादातर यही महिलाएं आएंगी। उन पर दोहरा दबाव होगा। एक तरफ
तो घर में परंपरागत वेशभूषा पहनने का दबाव होगा, और यह कई कारणों से
होगा, तो दूसरी तरफ सरकार के जुर्माने का दबाव होगा। ऐसी हालात में यह
कैसे कहा जा सकता है कि फ्रांस सरकार के कदम से मुस्लिम महिलाओं के
सशक्तीकरण में मदद मिलेगी।
मोटे तौर पर लोग यही अनुमान लगाते हैं कि मुस्लिम महिलाएं हमेशा दबाव या
जबर्दस्ती में बुर्का पहनती हैं। लेकिन कई बार मुस्लिम महिलाएं अपनी
धार्मिक पहचान या पश्चिमी जगत के विरोध के तौर पर बुर्का नहीं पहनतीं,
अलबत्ता ऐसी महिलाएं चाहती हैं कि वे पवित्र दिखें। मेरे ख्याल से बुर्का
पहनना और न पहनना यह अपने अंदर की आवाज का मसला है। बावजूद इसके यह भी
मान लें कि कोई मुस्लिम महिला आंतरिक तौर पर बुर्के को अपनी धार्मिक
निष्ठा मान ले, तब भी यह महज संकेत भर नहीं होता। बुर्का उसके व्यक्तित्व
में शामिल हो जाता है। ऐसी स्थिति में क्या सरकार को उसकी धार्मिक निष्ठा
पर चोट पहुंचाना चाहिए?
इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली ने कहा था, जिसके पास खोने को कुछ नहीं
हो, उससे डरना चाहिए। अफसोस यह है कि फ्रांस सरकार इस राय से इत्तफाक
नहीं रखती। उसने उन महिलाओं के लिए सख्ती दिखायी है, जिनके पास खोने के
लिए कुछ भी नहीं है। इस कानून के लागू होने से निस्संदेह मुस्लिम महिलाओं
की धार्मिक निष्ठा और निजता, दोनों खत्म हुई है।
बेहतर होता कि सरकार बुर्का पहनने वालों और नहीं पहनने वालों को साथ लेकर
चलती और उनके लिए विकास की जमीन तैयार करती। वहां की मुस्लिम सीनेटर
बारिजा खैरी ने कहा है, हम महिलाओं के लिए शिक्षा की योजनाओं को शुरू
करने की बजाय उन पर दूसरी पाबंदियां लगा रहे हैं, जिसका मुझे दुख है।
दरअसल, बुर्के का महिलाओं के दमन से कोई लेना-देना नहीं है और बुर्का
नहीं पहनने का मतलब महिलाओं का सशक्तीकरण है, यह बेहद भोला तर्क है।
On Apr 29, 8:30 pm, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> what ever you think i agreed but think again on this statement and if
> required go through wide variety reading to broaden your thoughts
>
> 2011/4/29 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
भले ही आपका धर्म इसके बारे में इजाज़त देता हो या नहीं; आपको धर्म में
बदलाव की भी जरूरत पड़ सकती है ; जैसा कि दयानंद सरस्वती, राम मोहन राय और
विवेकानंद ने किया | पर बुराइयों को हटाने के लिए धर्म के विरोध में भी
जाना पड़ सकता है |
दरअसल जब चीज़ें बहुत लम्बे समय से चली आ रही होती हैं और परिपाटी बन जाति
हैं, तब उन्हें ही अपनी हकीकत या नियति मान लेते हैं और कभी दूर-दूर तक
भी सोच नहीं पाते कि हम एक राक्षस को पनपा रहे हैं | इसीलिए अचम्भा नहीं
कि बहुत से प्रबुद्ध लोग बुर्का पहनने को लोगों की personal choice बताकर
जायज़ ठहराएंगे |
On Apr 29, 9:05 pm, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> ya i told that i completely agreed with your views as a whole and of course
> rituals of religion ae personal and only soul of religion like
> compassion,friendship,honesty,selflessness has to be made compulsory.
>
> 2011/4/29 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
> ...
>
> read more »- Hide quoted text -
>
> - Show quoted text -
On Apr 29, 10:44 pm, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> OK, first of all sati prath was not a part of religion but a ritual.and any
> way if i am saying that you should not watch movies or all of the IT
> students should come on road to support Anna Hazare.then what is your
> reply?then you would say it is my personal choice.
>
> what about ragging,it happened to be a personal choice but now its form os
> totally diffenet.
>
> any way we are supposed to go against Dharma if it told something bad,burka
> is not compulsory in Kuran But people had made it so peole should br
> rducated,
> similarly there is no mention of sati pratha in vedic texts but it become so
> called part of religion then who was responsible--corrupt so called
> brahmanas and AAM JANTA.
>
> 2011/4/29 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
जो चीजें सामान्य विवेक से ही किसी भी स्वस्थ समाज के विरुद्ध हैं, मेरे
ख़याल से उन्हें ख़त्म करने की कोशिश की जानी चाहिए। अपनी परम्परा और समाज
का हवाला देकर ही तो हरियाणा में ऑनर किलिंग को भी जायज बताने की कोशिश
की जा रही है। हाँ, बुर्का पहनना किसी के मरने जितना वीभत्स तो नहीं है,
लेकिन यह एक धीमी मृत्यु ही है। इस लेख को लिखने वाली जो महिला
प्रोग्रेसिव दिखकर बुर्के को बचाने की कोशिश कर रही हैं और कह रही हैं कि
शिक्षा की कोशिशें करने की बजाय सरकार बुर्के पर रोक लगा रही है, क्या
उन्हें अपनी अनुभवी आँखों से यह नहीं दिखा कि किसी के जीने को इस क़ाबिल
बनाना ज़्यादा ज़रूरी है कि वह अपना चेहरा, अपना शरीर पहले सड़े हुए समाज से
आज़ाद कर सके। वर्णमाला की ज़रूरत बहुत बाद में आती है। पहले आप बंदे को
खुलकर साँस तो लेने दीजिए।
आप जिन औरतों की बात कर रहे हैं, जिन्हें बुर्का पहनना पसन्द है, उनमें
दो किस्म की औरतें आपको मिलेंगी। कुछ हो सकता है कि मासूम हों और अपने
पतियों, परिवार को ख़ुश रखने के लिए मर जाने को भी तैयार हों। लेकिन तहलका
या किसी पत्रिका के लेख में ऐसी बात कहने वाली अधिकतर उच्च वर्ग की औरतें
होंगी- सैयदा हमीद जैसी, जिनकी अपनी छिपी हुई पॉलिटिक्स होती है, अपने
प्रोपेगेंडा। ये सबसे ख़तरनाक आवाज़ें हैं। ये अपने आप अपनी मर्ज़ी से जी
रही हैं और मौलानाओं को ख़ुश रखने के लिए बाकी औरतों को नर्क में भी धकेल
सकती हैं। मोहतरमा इस पूरे लेख में इस्लाम में औरतों की बुरी स्थिति के
बारे में एक बार भी खुलकर कुछ नहीं कहतीं। और तो और, अपने पानीपत के
अनुभव से यह सिद्ध कर रही हैं कि सब मज़े में हैं। हम जो अपने आसपास
दुनिया देखते हैं, उसमें कहीं ऐसी स्वतंत्रता क्यों नहीं दिखती? ये हमें
इतना बेवकूफ़ कैसे समझ सकती हैं?
On Apr 30, 7:57 am, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> similarly many of the muslim woman does not consider burqa a wrong thing
>
> it is not the matter of gandhian philosophy or any other philosophy ?is it
> like that who is supporter of gandhian philosophy is only affected by
> corruption?
> surely answer is no then why not everyone should be forced to come on road.
>
> by the way religion is not some machine that is created by someone,it is way
> of living and as old as human civilization may be older than that.
> tell me who created science?
>
> 2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
On Apr 30, 8:43 am, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> JO APNI WILL SE SATI HOTI THI USME KOI GALAT NAHI THA,
> han bahut si aisi thin jinke dil mein dar baitha diya jata uske liye jaroori
> hai ki unhe gyan diya jaye aur bola jaye ki tum khud apne grantho ka
> adhyayan karo tab bich ke dalaon ki asliat pata chalegi.
>
> aur han dono azadi chahte the dono prayaas karte the but aaj room mein
> baithkar movie dekne wale kaun sa prayas kar rahe hain?
>
> 2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
On Apr 30, 8:43 am, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> JO APNI WILL SE SATI HOTI THI USME KOI GALAT NAHI THA,
> han bahut si aisi thin jinke dil mein dar baitha diya jata uske liye jaroori
> hai ki unhe gyan diya jaye aur bola jaye ki tum khud apne grantho ka
> adhyayan karo tab bich ke dalaon ki asliat pata chalegi.
>
> aur han dono azadi chahte the dono prayaas karte the but aaj room mein
> baithkar movie dekne wale kaun sa prayas kar rahe hain?
>
> 2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
On Apr 30, 10:33 am, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> and it is not neutrality you are talking about but it is insensibility and
> you can not bear insensibility on name of neutrality.
>
> if it is neutrality then why not be neutral on everything wrong going
> around.very poor excuse..
>
> 2011/4/30 VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com>
>
>
>
> > पता हो तो आज इच्छा मृतु की मांग की जा रही है,सती pratha ऐसी ही थी जो औरतें
> > अपनी मर्ज़ी से अपनी इज्ज़त को बचने के लिए सती होती थी सो सही है,
> > और भ्रुर हत्या की जहाँ तक बात है तो कल ये भी परंपरा बन चुकी होगी और हम तुम
> > कहते हुए भी इसे नहीं रोक पाएंगे और खास बात ये होगी की इसे भी धर्म से जोड़
> > दिया जायेगा तो बताओ इसमें किसकी गलती है.आखिर कोई लाखों रुपये कैसे दहेज़ में
> > दे सकता है जब उसके पास खाने के लिए ही न हों तो उस समय भ्रुर हत्या न चाहते
> > हुए भी जाएज कहना पड़ेगा आज जो बिहार और कई जगह हालत हैं वो तो इसी और संकेत कर
> > रहे हैं की भ्रुर हत्या परंपरा बन्ने जा रही है और कारन है दहेज़ जिस पर कोई
> > बात नहीं करता और मैं-तुम सब इस को सुप्पोर्ट करते हैं.
>
> > ऐसे हिन् बुर्का कभी समाज की जरूरत थी और आज शायद नहीं है तो वो हट जाना चाहिए
> > लेकिन कैसे जबरदस्ती नहीं सही शिक्षा दे कर आज ये समस्या जहाँ जाएदा है जैसे
> > इराक,क़तर और दुसरे मुस्लिम देश वहां शिक्षा न होने के कारन ऐसा हो रहा है,अलीगढ
> > विश्वविदाल्या में जा कर देखो कोई बुर्का में दिखे तो,नहीं क्यूंकि वो जानती है
> > की साचा धर्म क्या होता है.उनके पास ज्ञान है.
>
> > 2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
On Apr 30, 10:33 am, VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com> wrote:
> and it is not neutrality you are talking about but it is insensibility and
> you can not bear insensibility on name of neutrality.
>
> if it is neutrality then why not be neutral on everything wrong going
> around.very poor excuse..
>
> 2011/4/30 VIKAS KUMAR PANDEY <vikaseee...@gmail.com>
>
>
>
> > पता हो तो आज इच्छा मृतु की मांग की जा रही है,सती pratha ऐसी ही थी जो औरतें
> > अपनी मर्ज़ी से अपनी इज्ज़त को बचने के लिए सती होती थी सो सही है,
> > और भ्रुर हत्या की जहाँ तक बात है तो कल ये भी परंपरा बन चुकी होगी और हम तुम
> > कहते हुए भी इसे नहीं रोक पाएंगे और खास बात ये होगी की इसे भी धर्म से जोड़
> > दिया जायेगा तो बताओ इसमें किसकी गलती है.आखिर कोई लाखों रुपये कैसे दहेज़ में
> > दे सकता है जब उसके पास खाने के लिए ही न हों तो उस समय भ्रुर हत्या न चाहते
> > हुए भी जाएज कहना पड़ेगा आज जो बिहार और कई जगह हालत हैं वो तो इसी और संकेत कर
> > रहे हैं की भ्रुर हत्या परंपरा बन्ने जा रही है और कारन है दहेज़ जिस पर कोई
> > बात नहीं करता और मैं-तुम सब इस को सुप्पोर्ट करते हैं.
>
> > ऐसे हिन् बुर्का कभी समाज की जरूरत थी और आज शायद नहीं है तो वो हट जाना चाहिए
> > लेकिन कैसे जबरदस्ती नहीं सही शिक्षा दे कर आज ये समस्या जहाँ जाएदा है जैसे
> > इराक,क़तर और दुसरे मुस्लिम देश वहां शिक्षा न होने के कारन ऐसा हो रहा है,अलीगढ
> > विश्वविदाल्या में जा कर देखो कोई बुर्का में दिखे तो,नहीं क्यूंकि वो जानती है
> > की साचा धर्म क्या होता है.उनके पास ज्ञान है.
>
> > 2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.sf...@gmail.com>
For the issue of burqa, I also think it should be banned, and the very
least, that France is right in banning Burqa in its country, for it
represents repression and even slavery. These are the two things which
are the essentially against French values.
The issue remains what gives us the right to go an extra step to
curtail the personal freedom of a woman who likes to wear a burqa. It
is indeed a complex problem. However, as pointed out, we have already
travesrsed this extra step in the case of suicides and sati pratha.
I oppose both burqa and sati pratha as they are borne out of "holier
than thou" mentality of men. How can you support a woman willing to be
a sati instead of giving her a will to live. If your near one dies,
you tell them that life is not over, not to go end yourself.
Similiarly, the tradition of burqa is borne out of mentality that a
woman's life should just revolve around one man. There should be
nothing else that matters to her.
So if a ritual is borne out of inequality and denial of personal
freedom, we should do everything in our capacity to eradicate it.
If in a culture that values freedom and self expression in a harmless
way, and a woman (or a man) likes to wear a dress which hides her/him
completely, I think it is a more a matter of insecurity and should be
dealt by providing psychological assistant to that person rather than
shutting our eyes to the needs of our felow beings.
2011/4/30 Dharmendra Chaturvedi <dc.s...@gmail.com>:
--
Amit jain
maine sahi shiksha ki baat ki thi remember.aur kanoon banane se to dahej pratha katam ho gayi na.jab tak log nahi jagenge tab tak nahi hogi aur uske liye koi kanoon nahi balki sachi education hi chahiye aur ye dummy neutrality bhi nahi chalegi
And parda and johar (not sati pratha) was introduced in our culture
because of insecurities due to invaders. It is not the case with sati
pratha. Some of the traditions are due to our narrow mindedness and
they shoud not be defended.
2011/4/30 Dharmendra c. <dc.s...@gmail.com>:
--
Amit jain