नींद की चादर चीर के बाहर निकला था मै ,
आधी रात एक फोन बजा था....
दूर किसी मोहूम सिरे से
इक अनंजान आवाज ने छूकर पूछा था
आप ही वो शायर है जिसने
अपनी कुछ नज्मे सोना के नाम लिखी है
मेरा नाम भी सोना हो तो ?
इक पतली सी झिल्ली जैसी ख़ामोशी का लम्बा वक्फा
मेरे नाम इक नज़्म लिखो ना !
मुझको एक छोटे से शेर में सी दो ,
"अंजल "लिखना
शायद मेरी आखरी शब् है
आखिरी ख्वाहिश है ,मै आप को सौप के जायूं?"
फोन बुझाकर
धज्जी धज्जी नींद में फिर जा लेटा था मै !
अंजल !
इसके बहुत दिनों बाद मालूम हुआ था
दर्द से दर्द बुझाने की इक कोशिश में तुम
केंसर की उस आग में मेरी नज्मे छिड़का करती थी .....
नींद भरी वो रात कभी याद आये तो
अब भी ऐसा होता है
एक धुआ सा आँखों में भर जाता है
"गुलज़ार "