हरिराम जी,मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया।
कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।
एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से।
दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं।
लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।
मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।सादर,-अनुराधा
सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।
इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।
कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।
Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।
सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।
वर्तमान जरूरत -
-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।
-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।
-- इस बारे में एक गूगल समूह <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।
-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।
-- हरिराम
On 10-04-2011 15:06, Anuradha R. wrote:हरिराम जी,मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया।
कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।
एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से।
दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं।
लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।
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मेरी जानकारी इस विषय पर और बढ़ी। :-)अब मसला यह भी है कि एक ग्रुप बनाकर खुद यह काम करें या लॉबीइंग (सकारात्मक अर्थ में) के जरिए मौजूदा कंपनियों से कहें। नीचे के स्तर से शुरू करके ऊपर पहुंचा जाए या पहले ही व्यापक फलक को संबोधित किया जाए। मेरा अनुभव तो कुछ नहीं है इस मामले में, लेकिन जब --
" Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।"
ऐसे में क्यों न एकजुटता के साथ उसी स्तर से इस मानकीकरण करने का प्रयास किया जाए। इसमें भारत सरकार और संसद तक मामले को पहुंचाया जाए और उनसे इस पर सहमति ली जाए। ऐसे में यूनिकोड सहज ही यह काम करेगा। (अति- आशावाद तो नहीं है न यह?!) क्या इस बारे में सी-डैक में संबंधित उच्चाधिकारियों/तकनीकी विशेषज्ञों से बात की जाए? वे कुछ कर पाएंगे?
अगर इस ग्रुप में कोई सीडैक से संबंधित हैं तो कृपया बताएं, वरना मैं वहां स्वयं संपर्क करने की कोशिश करूं।
मैं जानती हूं कि आप सब अनुभवी हैं और इस मसले पर मुझसे पहले से काम कर रहे हैं और इसलिए मेरा अति-उत्साह किसी को बचकाना भी लग सकता है। लेकिन कोई तो उपाय होना चाहिए न!!!
--
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यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
पहले मैंने भी यही सोचा था परन्तु जब मैंने अपने पास मौजूद ट्रू-टाइप के लिये कन्वर्टर बनाकर एक मित्र को भेजा जिसके पास टाइप-१ था तो उसने बताया कि कन्वर्जन में फर्क है तब मैंने जाँचा तो पाया कि उनमें दस-बारह ग्लिफ का अन्तर है।
आम तौर पर टीटीऍफ फॉण्टों में वर्जन नम्बर लिखा होता है लेकिन चाणक्य के इन दोनों फॉण्टों (टीटीऍफ और पोस्ट स्क्रिप्ट) में अंकित नहीं है, जिस कारण में उनके लिये Type-1 तथा TrueType नाम ही प्रयुक्त कर रहा हूँ।
मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
पहले मैं भी यही सोचता था कि अब के जमाने में कौन पुराने लिगेसी फॉण्ट प्रयोग करता है लेकिन पहली बार मुझे इनकी उपयोगिता समझ आयी जब मेरे यमुनानगर के एक साथी चिट्ठाकार ने मुझसे अपनी कृतिदेव में लिखी तीस-चालीस कवितायें यूनिकोड में बदलने का उपाय पूछा। दूसरी बार उपयोगिता तब मालूम पड़ा जब उनके यूनिकोड में भेजे मैटर को अखबार वालों ने कचरा हुआ बताकर चाणक्य में भेजने की माँग की। कन्वर्टरों की उपयोगिता वही समझता है जिसका काम अटका पड़ा हो। आजकल हिन्दी चिट्ठाकारी पर जो किताब छापी जा रही है उसमें यूनिकोड को ८ बिट फॉण्ट में कन्वर्टरों के उपयोग से बदलकर ही छापा जा रहा है।
हकीकत ये है कि तमाम प्रकाशन एवं समाचार-पत्र उद्योग अभी भी ८ बिट फॉण्टों का ही उपयोग करता है। आप किसी समाचार-पत्र या प्रकाशन वाले को नहीं समझा सकते कि भइया यूनिकोड में काम करो (जिसके लिये उसे अपनी पूरी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा) या इस फलाने कथित मानक ८ बिट फॉण्ट में काम करो, ऊपर से जो अभी बना ही नहीं है, बना होता तो शायद कोई सोचता भी उस बारे। वैसे मुझे पता चला कि समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के प्रकाशन हेतु चाणक्य अघोषित मानक है इसीलिये मैं उसका शुद्धतम कन्वर्टर बनाने हेतु प्रयासरत हूँ। मेरा इरादा केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्ट हेतु ही कन्वर्टर बनाने का है सभी सैकड़ो फॉण्टों के लिये नहीं।
मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कि प्रकाशन सम्बन्धी कार्यों के लिये एक मानक फॉण्ट बनाया जाना चाहिये जिसमें देवनागरी के सभी वर्ण-चिह्न हों, जो छपायी हेतु सुन्दर हो, इसके दो संस्करण हों एक जो संयुक्ताक्षरों को पारम्परिक रुप से दिखाये दूसरा सरल रुप से। लेकिन यह सरकार ही कर सकती थी जैसे उसने हिन्दी का मानक कीबोर्ड बनाकर किया। आप मैं कोई फॉण्ट बनाकर लोगों को कह नहीं सकते कि लो जी ये फॉण्ट लो इसे ही प्रयोग करो, .मानक बनाओ।
आप अपने सरकारी/विभागीय सम्पर्कों द्वारा ऐसा प्रस्तावित फॉण्ट बनाने एवं उसे मानक स्थापित करवाने की दिशा में कोई प्रयास करें, उसके लिये तमाम फॉण्टों से कन्वर्टर हम बना देंगे।
प्रसंगवश ये बतायें कि इस्की आधारित सभी फॉण्ट क्या समान कूटों का प्रयोग करते हैं?
९ अप्रैल २०११ ६:५९ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
मेरी जानकारी में TTF और PFB/PFM फोंट्स में किन्हीं ग्लीफ का कोई अन्तर नहीं होता। सिर्फ उनको run करने वाले engine अलग होते हैं। जैसा कि सीडैक के सारे TTF और PFB फोंट्स के ग्लीफ व ASCII Codes समान होते हैं।जो कनवर्टर TTF फोंट के लिए प्रयोग होता है, वही PFB/PFM के लिए भी।चाणक्य फोंट के कई प्रारूप प्रचलित हैं। जो समय की मांग के अनुसार बदलते/अपग्रेड होते रहे हैं। यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।----पुनश्च :मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।बेहतर होता कि यदि --- समस्त विभिन्न कूटों वाले 8-bit फोंट को किसी एक निर्धारित 8-bit फोंट को मानकीकृत करके उसमें कनवर्ट तथा इसके विपरीत पुनःकनवर्ट करने का प्रोग्राम होता।-- फिर उस मानकीकृत 8-bit फोंट से 16-bit-unicoded OT Fonts में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।-- तथा 16-bit-unicode OT Fonts से मानकीकृत 8 bit फोंट में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।-- इससे हरेक फोंट्स के code-maps को हरेक के साथ तुलना करके options set करके कनवर्ट करने की अनन्त काल तक चलनेवाली दुहरी-तिहरी मेहनत न करनी पड़ती।क्योंकि 8-bit फोंट प्रणाली सहज सरल एक-स्तरीय है। यथा - 'कि' टाइप करने के लिए पहले छोटी-इ की मात्रा टाइप करके फिर 'क' टाइप करना पड़ता है। और वैसा ही स्क्रीन पर प्रकट होता है। और वैसा ही प्रिंट होता है।किन्तु युनिकोड में 'क' पहले टाइप करके फिर छोटी-इ की मात्रा टाइप करनी पड़ती है, जो USP इंजन के द्वारा स्वतः Glyph positioning से स्थान बदलती है।इसी प्रकार रेफ व अन्य कुछ संयुक्ताक्षरों का functional-positioning बदला जाता है। जो हरेक फोंट-कनवर्टर के options के प्रोग्राम में डालना पड़ता है।अतः 8-bit फोंट से 16-bit OT Font में कनवर्ट करने के प्रोग्राम में काफी जटिलताएँ होतीं हैं।किन्तु एक 8-bit फोंट से दूसरे 8-bit font में कनवर्ट के लिए सिर्फ एक कोड को दूसरे से बदलना पड़ेगा, अन्यान्य तकनीकी झंझट नहीं होंगे। और फिर टाइपिस्ट द्वारा input sequence गलत प्रयोग हो तो भी कोई ज्यादा गलत आउटपुट नहीं मिलेगा। कनवर्शन का काम सरल और सार्वत्रिक होगा।मेरी जानकारी में सबसे अच्छा फोंट कनवर्टर APS Corporate 2000 नामक बहुभाषी सॉफ्टवेयर के निर्माताओं द्वारा निर्मित हुआ था। इसकी तकनीकी कार्यप्रणाली का आधार था--Font-x1 -->ISCII -->Font-x1Font-x2 -->ISCII -->Font-x2......Font-xx -->ISCII -->Font-xxइसी के निर्माताओं द्वारा लगभग सभी प्रचलित फोंट के ISCII (ACII) code points वाले system फोंट्स भी बनाए गए थे। इससे कनवर्शन में त्रुटिरहित आउटपुट प्राप्त करने में मदद मिलती थी।खैर, अन्दरुनी रहस्य तो इसके निर्माता ही बता सकते हैं, क्योंकि यह propritory सॉफ्टवेयर है।निष्कर्ष :16 बिट युनिकोडेड OT Fonts का प्रचलन हो जाने के बावजूद अभी भी 8-bit Indic फोंट्स के Font-code का मानकीकरण किए जाने की आवश्यकता है तथा भारी उपयोगिता है। क्योंकि अभी अनेक वर्षों तक आम जनता द्वारा छोटे मोटे प्रकाशन उद्योग द्वारा 8-bit फोंट के आधार पर ही कार्य होता रहेगा।युनिकोड -- विशेषकर देवनागरी युनिकोड तो एक प्रकार से भानुमति का पिटारा बन गया है, जिसमें आम जनता को भ्रम ही भ्रम ही भ्रम होता रहेगा।क्योंकि अनेक फोंट्स के प्रयोग और उनके कनवर्टर के प्रयोग और फिर भी पाठ को मैनुअली सुधार करने में विश्व की जनता के जितने Man-hour बर्बाद होते हैं, जितना E-Space, Server-time-use, मानसिक, शारीरिक परेशानी उठानी होती है, उसका आकलन किया जाए तो लगभग प्रतिवर्ष 2 करोड़ डालर के व्यय के बराबर हो जाएगा।-- हरिराम
2011/4/9 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
वाह हरिराम जी आपने सभी शंकाये दूर कर दी। मामला ये था कि मैंने अपने निर्माणाधीन चाणक्य कन्वर्टर में ट्रू टाइप फॉण्ट के हिसाब से बनाया था परन्तु फिर रविन्द्र जी से पता चला कि मुद्रण उद्योग में .pfm/.pfb (जिसका आपसे पता चला कि पोस्ट स्क्रिप्ट फॉण्ट है) प्रयोग होता है। इसका कारण वही गुण होंगे जो आपने बताये हैं। खैर मै दोनों ही तरह के फॉण्टों के लिये विकल्प बना दूँगा क्योंकि दोनों में दस-बारह ग्लिफ्स का ही अन्तर है।
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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.
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और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।
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..... फॉण्ट बना सकते हैं। या फिर जैसा अनुनाद जी ने स्वयं कामचलाऊ फॉण्ट बनाने सम्बन्धी कुछ लिंक दिये थे, इस तरह से एक कामचलाऊ डेमो फॉण्ट बना सकते हैं।
हाँ जी बिलकुल यही बात मेरे दिमाग में आयी थी कि मानक फॉण्ट की बजाय मानक फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय होने चाहिये
"...अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला होगा। सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे। अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास करें।...." वस्तुतः ऐसा नहीं है. आमतौर पर सभी सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर यूनिकोड यूटीएफ 8 तथा भविष्य में यूटीएफ 16 का परिपूर्णता से पालन करेंगे, और पुराने सारे फ़ॉन्ट प्रचलन से स्वतः ही बाहर हो जाएंगे. यह मात्र कुछ वर्षों की ही बात है. तब ये समस्या नहीं रहेगी. अभी ही चहुँ ओर आधे से ज्यादा काम (सरकारी उपक्रमों को छोड़ दें तो, क्योंकि वहाँ निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद उबाऊ, लंबी और लालफीता शाही युक्त होती है - मैं स्वयं भी कभी उस तंत्र का हिस्सा रह चुका हूँ) पूरी तरह से यूनिकोड हिंदी में होने लगे हैं. और, यूनिकोड हिंदी का विकल्प नहीं है. यह एक तरह से स्टैण्डर्डाइज्ड हो चुका है, वैश्विक स्तर पर - ओपन सोर्स से लेकर निजी सॉफ़्टवेयर निर्माताओं सब जगह. और न सिर्फ हिंदी, अन्य भारतीय भाषाओं - तमिल, तेलुगु, पंजाबी इत्यादि सभी के लिए भी यूनिकोड स्टैण्डर्ड मानक बन चुका है. सादर, रवि
युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।
ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।
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हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है, तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया।
विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉन्ट-कोड बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले।
निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते। लेकिन, यूनिकोड की जो सार्वभौमिकता है, टाइपिंग की सहजता- सरलता है, और तकनीकी रूप से विकसित स्थिति है, उसके चलते इसे प्रमुखता देनी ही चाहिए। इसको सभी इस्तेमाल करें, ऐसा फैसला होने के बाद इसमें सुंदर फॉन्ट जोड़े भी जा सकते हैं।
NGO बनाने से बेहतर होगा, सरकार में संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों और इस पर काम कर चुके लोगों को जोड़ें जो फिर आगे, फैसला लेने में सक्षम/महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करें, मनाएं और बताएं कि यह समस्या आसानी से सुलझ सकती है, थोड़ी सी राजनीतिक/प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया जा सकता है कि सरकार की तकनीकी टीम को सभी तरह का सपोर्ट देने के लिए तकनीकी जानकार और गैर-तकनीकी अनुभवी उपयोगकर्ता सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं।
अगर सहमत हों तो शुरुआत की जाए और असहमति हो तो भी अपना मत साझा करें और कोई रास्ता निकालने का उपाय मिलकर सोचें।
-आर. अनुराधा
अधिकांश साफ्टवेयर निर्माता युनिकोडित वर्सन निकाल चुके है। शेष निकाल रहे हैं। सबके
प्रोग्राम में युनिकोड कनवर्टर उपलब्ध है।
किन्तु मुफ्त नहीं।
Indic Software producers की हालत खस्ता है। विकास कार्य में लाखों खर्च होते हैं।
किन्तु माल बिकता कम है। लाभ मिलना तो दूर, उलटे घाटा हो रहा है। सकरकारी अनुदान
भी नहीं है।
अतः वे अपने सॉफ्टवेयर/फोंट/कनवर्टर/युटिलिटिज की मोनोपोली की नीति अपनाकर ही जीने
को मजबूर रहे हैं।
हमें उनके हित के बारे में भी सोचना होगा।
किन्तु मानकों के निर्धारण की जरूरत है
और सभी निर्माताओं को मानकों अनुपालन करना अनिवार्य होना चाहिए।
-- हरिराम
On 13-04-2011 20:47, V S Rawat wrote:
> सॉफ़्टवेयर निर्माताओं को उनके पुराने सॉफ़्टवेयरों को अद्यतन करना चाहिए ताकि उन
> सॉफ़्टवेयरों में यूनीकोड फ़ॉण्ट भी चल सके।
>
> गैर यूनीकोड फ़ॉण्ट निर्माताओं को उनके फ़ॉण्टों से यूनीकोड में और यूनीकोड से उनके फ़ॉण्टों
> में परिवर्तित करने के सॉफ़्टवेयर बना कर मुफ़्त उपयोग के लिए उपलब्ध कराने चाहिए।
>
> यदि वो ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह उन निर्माताओं का गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार और
> मानसिकता है जिससे लाखों लोगों के प्रयास और समय व्यर्थ हो रहे हैं।
>
> सरकार यह नियम बना सकती है कि निर्माता उपरोक्त कामों को करें अन्यथा उनके
> सॉफ़्टवेयरों को भारत में बेंचने और उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
>
> रावत
>
>