Re: [technical-hindi] .pfm तथा pfb ऍक्सटेंशन वाले फॉण्ट

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Hariraam

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Apr 10, 2011, 8:18:36 AM4/10/11
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सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।

इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।

कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।

Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।

सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।

वर्तमान जरूरत -

-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ  विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।
-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।

-- इस बारे में एक गूगल समूह  <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।

-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।

-- हरिराम


On 10-04-2011 15:06, Anuradha R. wrote:
हरिराम जी,
मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया। 

कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।

एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से। 

दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं। 

लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।

मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।
सादर,
-अनुराधा




Narendra Sisodiya

unread,
Apr 10, 2011, 8:27:37 AM4/10/11
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2011/4/10 Hariraam <hari...@gmail.com>

सन् 1991 में CDAC के तत्वावधान में भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए ISCII-1991 (Indian Script Code for information interchange) का मानकीकरण भारत सरकार के भारतीय मानक संस्थान द्वारा BIS - ISI द्वारा किया गया था।

इसी के साथ ISFOC (Indian Script Font Code) की डिजाइनिंग की गई थी, ISFOC fonts का निर्माण हुआ था। किन्तु दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया।
भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के TDIL द्वारा भी Font-codes के draft जारी किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से मानकीकरण नहीं हो पाया। कई तकनीकी-सामाजिक कारण रहे होंगे।

कालक्रम में ISFOC fonts में समय की मांग के अनुसार अनेक परिवर्तन होते रहे, - Monolingual, Bilingual, Mono.Web, Bi.-Web, ISO आदि कई समूह बन गए। विभिन्न साफ्टवेयर निर्माताओं द्वारा अपने अपने फोंट्स बना लिये गए। किन्तु Font Code निर्धारित न होने के कारण किसी में कोई एकरूपता नहीं रही।

Internet का विकास होने पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर Unicode की जरूरत महसूस हुई और इसके प्रचलन के बाद ISCII लगभग मृत हो गया। हालांकि आरम्भ में युनिकोड भी ISCII की हूबहू कॉपी ही था। किन्तु कालक्रम में अन्य वर्ण-चिह्नों को जोड़े जाते रहते रहते आज Unicode वर्सन 6.0 में देवनागरी के कूटों में अनेक वर्णों, चिह्नों, मात्राओं आदि के code number निर्धारित किए जा चुके हैं। लेकिन इसका Latin के Unicode-समूहों की तरह Basic और Extended समूहों में तार्किक रूप से सजाकर न रखे जाने, वर्णक्रमानुसार छाँटने (Sorting, indexing) की सरल व्यवस्था न होने के कारण, तथा Complex Script वर्ग में होने, आदि कई कारणों से Indic Unicode समस्याग्रस्त रहा है।

सबसे बड़ी समस्या आई है Unicode की stability policy के कारण -- जिसके कथन का आशय है "Even if completely wrong, once encoded character, can't be corrected, deleted or edited", इस कारण कई त्रुटियाँ रह गईं हैं जिनके कारण जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

और सबसे बड़ी समस्या आती है, विश्व मंच पर भारतीय विद्वानों को कम दर्जे का आँका जाने, IBM, ADOBE, Microsoft तथा विकसित राष्ट्रों के विद्वानों/तकनीकी-गुरुओं का वीटो पावर ज्यादा होने के कारण भारतीय भाषाओं की समस्याओं को सही रीति समझा नहीं जाता और सरल समाधान प्रदान करने की वजाय, (शायद जान-बूझकर) या अनजाने में जटिल प्रक्रियाओं को ठूँस-ठाँस कर भारतीय लिपियों की परम्परागत रूप में rendering की व्यवस्था की जाती है।

वर्तमान जरूरत -

-- जैसा कि Unicode भी एक प्राईवेट मानक संस्थान है, कोई सरकारी नहीं।
-- जैसा कि ISO-9000, ISO-14000, ISO-xxxx आदि मान्यताएँ प्रदान करनेवाले संस्थान भी प्राईवेट संस्थान हैं, कोई सरकारी नहीं।
-- इसी प्रकार हम कुछ  विद्वान मिलकर निजी क्षेत्र में एक मानक संस्थान गठित कर पंजीकरण करवा सकते हैं।

परन्तु यूनिकोड  में सारे अक्षर है, फिर दिक्कत  क्या है ?
हम लोग कोई बैठक कर सकते है |


-- सर्वप्रथम हिन्दी(देवनागरी) के लिए फोंट कोड (Font code) के मानक निर्धारित करें।
-- फिर बाद में भारत के संविधान में मान्यता-प्राप्त 22 भाषाओं के font-code के लिए भी मानकीकरण का कार्य करें।
-- Font code के मानकीकरण के पश्चात, Indic sorting order के मानकीकरण, संयुक्ताक्षरों, पूर्णाक्षरों के लिए मानकों का निर्धारण, ...... समय की जरूरत के मुताबिक अन्य मानकों के निर्धारण के लिए कार्य करें।
-- इस मानक संस्थान के by-law में Unicode की stability policy के विपरीत ऐसी व्यवस्था हो कि निर्धारित मानकों में यदि भविष्य में कोई त्रुटि या गलती पाई जाए तो मानक का अगला वर्सन रिलीज करने के वक्त सुधार कर लिया जाएगा।
-- जब कोई एक मानक होगा, तो लोग उसका अनुकरण करेंगे ही। क्रमशः मानकों को क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी, प्रयोग बढ़ेगा। फिर राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल सकेगी। और अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल पाएगी।
-- Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।

-- इस बारे में एक गूगल समूह  <https://groups.google.com/group/indicoms?hl=en> अलग से बनाकर कुछ प्रयास किया गया है।

-- कुछ सकारात्मक समान विचारों वाले विद्वानों/तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके एक संगठन बनाकर इस दिशा में कार्य आगे बढ़ाने हेतु सभी से मदद का अनुरोध है।

-- हरिराम


On 10-04-2011 15:06, Anuradha R. wrote:
हरिराम जी,
मैं सचमुच आभारी हूं कि आपने यह मसला उठाया। 

कुछ दिन पहले मैंने अपनी एक मेल में भी ऐसी ही राय जाहिर की थी कि क्यों नहीं मानक फॉन्ट का इस्तेमाल करके/मानक फॉन्ट विकसित करके हम हिंदी में काम को एकदम सरल बना लेते। बजाए इसके कि हर फॉन्ट के कनवर्टर्स बनाने और उनके प्रसार में ढेरों समय और संसाधन कर्च करें। फॉन्ट कनवर्टर की जरूरत सबको होती है, लेकिन कितनों के पास ये लिंक, ये सुविधा पहुंच पाती है? ये परिवर्तन तकनीक मिल जाए, उसके बाद भी कई दिक्कतें रह जाती हैं, कई फॉन्ट बिना बदले रह जाते हैं, जो लोगों को हिंदी कंप्यूटिंग से हतोत्साहित करने का काम बखूबी करते हैं।

एक मसला है कि कई प्रकाशन संस्थान अब भी अपने बनाए पुराने फॉन्टों पर ही काम करते हैं, कई कारणों से। 

दूसरा मसला है कि विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां, जिनके सॉफ्टवेयर हम आम तौर पर इस्तेमाल करते हैं, हिंदी के कंपैटिबल सॉफ्टवेयर तत्काल नहीं बनातीं। उनके बेहिसाब बिकने वाले भारतीय वर्जन्स में भी अंग्रेजी की ही ज्यादा सुविधा ही रहती है। एडोबी जैसी कंपनियों के पेजमेकर, फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड के लिए नहीं बने हैं। उनमें कृतिदेव जैसे फॉन्ट ही चलते हैं इसलिए पेजमेकर में काम करना हो तो प्रकाशक को यूनिकोड से दूर रहना ही पड़ेगा। इस जगह पर फॉन्ट कनवर्टर ही मददगार होते हैं। 

लेकिन, क्या हम सब, कंप्यूटर को हिंदी इस्तेमाल करने वाले मिलकर एक प्रेशर ग्रुप बना सकते हैं कि इन कंपनियों को अपने भारतीय एडीशंस को यूनिकोड कंपैटिबल बनाना पड़े, जैसा कि चीनी और जापानी जैसी भाषाओं के लिए होता है। वैसे भी, भारत उनके लिए बड़ा बाजार है, इसकी मांग को वो नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हम हिंदी कंप्यूटिंग के मानकीकरण के लिए संबद्ध एजेंसियों पर दबाव नहीं डाल सकते? यह तकनीक विकसित करने से ज्यादा, उस तकनीक की सुविधा को ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहज पहुंच के दायरे के भीतर लाना है।

मैं इस पर काम करने को तैयार हूं। किसी के पास कोई रास्ता/उपाय/योजना/सुझाव है, तो कृपया शेयर करें।
सादर,
-अनुराधा




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Hariraam

unread,
Apr 11, 2011, 8:13:57 AM4/11/11
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बन्धुओं,

सर्वप्रथम इस चर्चा का विषय बदल कर Indic Font Code standardisation कर रहा हूँ। ताकि to the point चर्चा ही हो सके।

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि भारतीय लिपियों के फोंट-कूटों का मानकीकरण करने के बारे में अनेक वर्षों से अनेक स्तरों पर (सरकारी और गैर-सरकारी दोनों) काफी प्रयास किया जा चुका है।
लेकिन सफलता नहीं मिल पाने के कारणों में प्रमुख है--
-- उपयोगकर्ताओं को तकनीकी जानकारी कम होना, तकनीकी समस्याओं को न समझ पाने की मजबूरी
-- सरकारी संस्थाओं के कार्य-क्षेत्र की अपनी कुछ सीमाओं में आबद्ध रहने की मजबूरी
-- गैर-सरकारी स्तर पर किसी मंच का अभाव।

अतः एक मंच/संस्था का गठन आवश्यक है।

-- हरिराम

On 10-04-2011 18:04, Anuradha R. wrote:
मेरी जानकारी इस विषय पर और बढ़ी। :-) 
अब मसला यह भी है कि एक ग्रुप बनाकर खुद यह काम करें या लॉबीइंग (सकारात्मक अर्थ में) के जरिए मौजूदा कंपनियों से कहें। नीचे के स्तर से शुरू करके ऊपर पहुंचा जाए या पहले ही व्यापक फलक को संबोधित किया जाए। मेरा अनुभव तो कुछ नहीं है इस मामले में, लेकिन जब --

" Unicode.org की नीति में भी स्पष्ट उल्लेख है कि वे संबंधित समाज या राष्ट्र, या राज्य या क्षेत्र में प्रचलित मानकों का अनुकरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारा एक मानक निर्धारत हो, प्रचलित हो, तो युनिकोड की तकनीकी समिति को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक निर्धारित करने में भारी मदद मिलती है।"

ऐसे में क्यों न एकजुटता के साथ उसी स्तर से इस मानकीकरण करने का प्रयास किया जाए। इसमें भारत सरकार और संसद तक मामले को पहुंचाया जाए और उनसे इस पर सहमति ली जाए। ऐसे में यूनिकोड सहज ही यह काम करेगा। (अति- आशावाद तो नहीं है न यह?!) क्या इस बारे में सी-डैक में संबंधित उच्चाधिकारियों/तकनीकी विशेषज्ञों से बात की जाए? वे कुछ कर पाएंगे?

अगर इस ग्रुप में कोई सीडैक से संबंधित हैं तो कृपया बताएं, वरना मैं वहां स्वयं संपर्क करने की कोशिश करूं। 

मैं जानती हूं कि आप सब अनुभवी हैं और इस मसले पर मुझसे पहले से काम कर रहे हैं और इसलिए मेरा अति-उत्साह किसी को बचकाना भी लग सकता है। लेकिन कोई तो उपाय होना चाहिए न!!!
-अनुराधा

2011/4/10 Hariraam <hari...@gmail.com>
--
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "Scientific and Technical Hindi (वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी)" समूह की सदस्यता ली है.
इस समूह में पोस्ट करने के लिए, technic...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, technical-hin...@googlegroups.com को ईमेल करें.
और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/technical-hindi?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.



--
LIFE IS BEAUTIFUL.....Live it to the fullest!!!!


Hariraam

unread,
Apr 11, 2011, 8:17:13 AM4/11/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
श्रीश जी,

चाणक्य फोंट "Summit India" के "इंडिका" नामक सबसे पहले व सबसे पुराने डीटीपी-डिजाइनिंग पैकेज के हिन्दी संस्करण का अंश है। हजारों बार सुधार के बाद इसका वर्तमान रूप प्रचलित हुआ है। हो सकता है कि इसके विकासकर्ता हरेक का वर्सन नं. रिकार्ड न कर पाए हों।

जिस वक्त माईक्रोसॉफ्ट सिर्फ MS DOS के दौर में था। उन दिनों 1985-92 में GUI (Graphical User Interface) सिर्फ Apple Machintos के पर्सनल कम्प्यूटरों के OS में ही होती थी। माईक्रोसाफ्ट सर्वप्रथम 1995 में Windows 95 के साथ GUI वाले OS को लेकर आ पाया। माईक्रोसॉफ्ट apple कम्प्यूटरों से 10 वर्ष पीछे था।

आपने कहा-- "मानकीकरण सरकारी संस्थाओं का दायित्व है।"

यह काफी हद तक सही है।

किन्तु,  सरकारी संस्थाओं की भी अपनी मजबूरियाँ हैं। कोई गैर-सरकारी संगठन  (NGO) हो तो सरकारी संस्थाओं को भी भारी मदद मिल जाती है। उनके सहयोग से काम आसान हो जाता है।

Indic Font Code का मानकीकरण बहुत ही जरूरी है। भले ही वह--
-- 8 bit TTF/PFB font हों या
-- 16 bit Open Type Unicoded Font हों

अतः इस दिशा में एक NGO का गठन हेतु सभी से सहयोग की अपील है।

-- हरिराम

On 10-04-2011 05:17, ePandit | ई-पण्डित wrote:
यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।

पहले मैंने भी यही सोचा था परन्तु जब मैंने अपने पास मौजूद ट्रू-टाइप के लिये कन्वर्टर बनाकर एक मित्र को भेजा जिसके पास टाइप-१ था तो उसने बताया कि कन्वर्जन में फर्क है तब मैंने जाँचा तो पाया कि उनमें दस-बारह ग्लिफ का अन्तर है।

आम तौर पर टीटीऍफ फॉण्टों में वर्जन नम्बर लिखा होता है लेकिन चाणक्य के इन दोनों फॉण्टों (टीटीऍफ और पोस्ट स्क्रिप्ट) में अंकित नहीं है, जिस कारण में उनके लिये Type-1 तथा TrueType नाम ही प्रयुक्त कर रहा हूँ।

मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।

पहले मैं भी यही सोचता था कि अब के जमाने में कौन पुराने लिगेसी फॉण्ट प्रयोग करता है लेकिन पहली बार मुझे इनकी उपयोगिता समझ आयी जब मेरे यमुनानगर के एक साथी चिट्ठाकार ने मुझसे अपनी कृतिदेव में लिखी तीस-चालीस कवितायें यूनिकोड में बदलने का उपाय पूछा। दूसरी बार उपयोगिता तब मालूम पड़ा जब उनके यूनिकोड में भेजे मैटर को अखबार वालों ने कचरा हुआ बताकर चाणक्य में भेजने की माँग की। कन्वर्टरों की उपयोगिता वही समझता है जिसका काम अटका पड़ा हो। आजकल हिन्दी चिट्ठाकारी पर जो किताब छापी जा रही है उसमें यूनिकोड को ८ बिट फॉण्ट में कन्वर्टरों के उपयोग से बदलकर ही छापा जा रहा है।

हकीकत ये है कि तमाम प्रकाशन एवं समाचार-पत्र उद्योग अभी भी ८ बिट फॉण्टों का ही उपयोग करता है। आप किसी समाचार-पत्र या प्रकाशन वाले को नहीं समझा सकते कि भइया यूनिकोड में काम करो (जिसके लिये उसे अपनी पूरी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा) या इस फलाने कथित मानक ८ बिट फॉण्ट में काम करो, ऊपर से जो अभी बना ही नहीं है, बना होता तो शायद कोई सोचता भी उस बारे। वैसे मुझे पता चला कि समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के प्रकाशन हेतु चाणक्य अघोषित मानक है इसीलिये मैं उसका शुद्धतम कन्वर्टर बनाने हेतु प्रयासरत हूँ। मेरा इरादा केवल कुछ सर्वाधिक प्रचलित फॉण्ट हेतु ही कन्वर्टर बनाने का है सभी सैकड़ो फॉण्टों के लिये नहीं।

मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कि प्रकाशन सम्बन्धी कार्यों के लिये एक मानक फॉण्ट बनाया जाना चाहिये जिसमें देवनागरी के सभी वर्ण-चिह्न हों, जो छपायी हेतु सुन्दर हो, इसके दो संस्करण हों एक जो संयुक्ताक्षरों को पारम्परिक रुप से दिखाये दूसरा सरल रुप से। लेकिन यह सरकार ही कर सकती थी जैसे उसने हिन्दी का मानक कीबोर्ड बनाकर किया। आप मैं कोई फॉण्ट बनाकर लोगों को कह नहीं सकते कि लो जी ये फॉण्ट लो इसे ही प्रयोग करो, .मानक बनाओ।

आप अपने सरकारी/विभागीय सम्पर्कों द्वारा ऐसा प्रस्तावित फॉण्ट बनाने एवं उसे मानक स्थापित करवाने की दिशा में कोई प्रयास करें, उसके लिये तमाम फॉण्टों से कन्वर्टर हम बना देंगे।

प्रसंगवश ये बतायें कि इस्की आधारित सभी फॉण्ट क्या समान कूटों का प्रयोग करते हैं?

९ अप्रैल २०११ ६:५९ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
मेरी जानकारी में TTF और PFB/PFM फोंट्स में किन्हीं ग्लीफ का कोई अन्तर नहीं होता। सिर्फ उनको run करने वाले engine अलग होते हैं। जैसा कि सीडैक के सारे TTF और PFB फोंट्स के ग्लीफ व ASCII Codes समान होते हैं।
 
जो कनवर्टर TTF फोंट के लिए प्रयोग होता है, वही PFB/PFM के लिए भी।
 
चाणक्य फोंट के कई प्रारूप प्रचलित हैं। जो समय की मांग के अनुसार बदलते/अपग्रेड होते रहे हैं। यदि चाणक्य फोंट का वही वर्सन version वाला TTF या PFB फोंट हो, एक कनवर्टर दोनों के लिए काम करेगा।
 
----
 
पुनश्च :
 
मेरे विचार में फोंट कनवर्टर बनाने का काम बेकार समय व श्रम की बर्बादी वाला काम है।
 
बेहतर होता कि यदि --- समस्त विभिन्न कूटों वाले 8-bit फोंट को किसी  एक निर्धारित 8-bit फोंट को मानकीकृत करके उसमें कनवर्ट तथा इसके विपरीत पुनःकनवर्ट करने का प्रोग्राम होता।
-- फिर उस मानकीकृत 8-bit फोंट से 16-bit-unicoded OT Fonts में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।
-- तथा 16-bit-unicode OT Fonts से मानकीकृत 8 bit फोंट में कनवर्ट करने का एक स्थायी universal प्रोग्राम होता।
-- इससे हरेक फोंट्स के code-maps को हरेक के साथ तुलना करके options set करके कनवर्ट करने की अनन्त काल तक चलनेवाली दुहरी-तिहरी मेहनत न करनी पड़ती।
 
क्योंकि 8-bit फोंट प्रणाली सहज सरल एक-स्तरीय है। यथा - 'कि' टाइप करने के लिए पहले छोटी-इ की मात्रा टाइप करके फिर 'क' टाइप करना पड़ता है। और वैसा ही स्क्रीन पर प्रकट होता है। और वैसा ही प्रिंट होता है।
 
किन्तु युनिकोड में 'क' पहले टाइप करके फिर छोटी-इ की मात्रा टाइप करनी पड़ती है, जो USP इंजन के द्वारा स्वतः Glyph positioning से स्थान बदलती है।
 
इसी प्रकार रेफ व अन्य कुछ संयुक्ताक्षरों का functional-positioning बदला जाता है। जो हरेक फोंट-कनवर्टर के options के प्रोग्राम में डालना पड़ता है।
 
अतः 8-bit फोंट से 16-bit OT Font में कनवर्ट करने के प्रोग्राम में काफी जटिलताएँ होतीं हैं।
 
किन्तु एक 8-bit फोंट से दूसरे 8-bit font में कनवर्ट के लिए सिर्फ एक कोड को दूसरे से बदलना पड़ेगा, अन्यान्य तकनीकी झंझट नहीं होंगे। और फिर टाइपिस्ट द्वारा input sequence गलत प्रयोग हो तो भी कोई ज्यादा गलत आउटपुट नहीं मिलेगा। कनवर्शन का काम सरल और सार्वत्रिक होगा।
 
मेरी जानकारी में सबसे अच्छा फोंट कनवर्टर APS Corporate 2000 नामक बहुभाषी सॉफ्टवेयर के निर्माताओं द्वारा निर्मित हुआ था। इसकी तकनीकी कार्यप्रणाली का आधार था--
 
Font-x1 -->ISCII -->Font-x1
Font-x2 -->ISCII -->Font-x2
......
Font-xx -->ISCII -->Font-xx
 
इसी के निर्माताओं द्वारा लगभग सभी प्रचलित फोंट के ISCII (ACII) code points वाले system फोंट्स भी बनाए गए थे। इससे कनवर्शन में त्रुटिरहित आउटपुट प्राप्त करने में मदद मिलती थी।
 
खैर, अन्दरुनी रहस्य तो इसके निर्माता ही बता सकते हैं, क्योंकि यह propritory सॉफ्टवेयर है।
 
निष्कर्ष :
 
16 बिट युनिकोडेड OT Fonts का प्रचलन हो जाने के बावजूद अभी भी 8-bit Indic फोंट्स के Font-code का मानकीकरण किए जाने की आवश्यकता है तथा भारी उपयोगिता है। क्योंकि अभी अनेक वर्षों तक आम जनता द्वारा छोटे मोटे प्रकाशन उद्योग द्वारा 8-bit फोंट के आधार पर ही कार्य होता रहेगा।
 
युनिकोड -- विशेषकर देवनागरी युनिकोड तो एक प्रकार से भानुमति का पिटारा बन गया है, जिसमें आम जनता को भ्रम ही भ्रम ही भ्रम होता रहेगा।
 
क्योंकि अनेक फोंट्स के प्रयोग और उनके कनवर्टर के प्रयोग और फिर भी पाठ को मैनुअली सुधार करने में विश्व की जनता के जितने Man-hour बर्बाद होते हैं, जितना E-Space, Server-time-use, मानसिक, शारीरिक परेशानी उठानी होती है, उसका आकलन किया जाए तो लगभग प्रतिवर्ष 2 करोड़ डालर के व्यय के बराबर हो जाएगा।
 
 -- हरिराम

2011/4/9 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
वाह हरिराम जी आपने सभी शंकाये दूर कर दी। मामला ये था कि मैंने अपने निर्माणाधीन चाणक्य कन्वर्टर में ट्रू टाइप फॉण्ट के हिसाब से बनाया था परन्तु फिर रविन्द्र जी से पता चला कि मुद्रण उद्योग में .pfm/.pfb (जिसका आपसे पता चला कि पोस्ट स्क्रिप्ट फॉण्ट है) प्रयोग होता है। इसका कारण वही गुण होंगे जो आपने बताये हैं। खैर मै दोनों ही तरह के फॉण्टों के लिये विकल्प बना दूँगा क्योंकि दोनों में दस-बारह ग्लिफ्स का ही अन्तर है।

--
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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
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Hariraam

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Apr 11, 2011, 1:14:34 PM4/11/11
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श्रीश जी, अनुनाद जी, नारायण प्रसाद जी, एवं अन्य बन्धुओ,

सर्वप्रथम इस चर्चा का विषय बदलकर Font-code-converter कर रहा हूँ, ताकि to the point चर्चा ही हो सके।

निवेदन है कि कृपया Font-converter शब्द के बदले Font-code-converter का प्रयोग करें, क्योंकि Indic scripts के ये कनवर्टर केवल फोंट को नही बदलते, बल्कि किसी फोंट में टंकित पाठ को glyph by glyph या character by character पढ़कर एक एक कर उनके code-points को बदलते हैं।

मेरे और एक सन्देश में मैंने लिखा था --


"
चाणक्य फोंट "Summit India" के "इंडिका" नामक सबसे पहले व सबसे पुराने डीटीपी-डिजाइनिंग पैकेज के हिन्दी संस्करण का अंश है। हजारों बार सुधार के बाद इसका वर्तमान रूप प्रचलित हुआ है। हो सकता है कि इसके विकासकर्ता हरेक का वर्सन नं. रिकार्ड न कर पाए हों।

जिस वक्त माईक्रोसॉफ्ट सिर्फ MS DOS के दौर में था। उन दिनों 1985-92 में GUI (Graphical User Interface) सिर्फ Apple Machintos के पर्सनल कम्प्यूटरों के OS में ही होती थी। माईक्रोसाफ्ट सर्वप्रथम 1995 में Windows 95 के साथ GUI वाले OS को लेकर आ पाया। माईक्रोसॉफ्ट apple कम्प्यूटरों से 10 वर्ष पीछे था।

"

आपलोग इतना परिश्रम करके जिस चाणक्य फोंट का कनवर्टर बनाए हैं या बना रहे हैं, वह केवल चाणक्य फोंट के उसी वर्शन, उसी कॉपी के लिए अधिकतम accuracy के साथ output देगा। अन्य किसी वर्शन के चाणक्य फोंट के लिए नहीं।
-- क्योंकि चाणक्य फोंट में कालक्रम में हजारों बार सुधार हुए हैं, कई glyphs जोड़े, काटे, सुधारे, स्थानान्तरित करते करते आज इस स्तर तक पहुँचा है।

यदि मेसर्स पद्मालय प्रिंटिंग प्रेस के पास चाणक्य फोंट है, जो उनके द्वारा जून,1992 में खरीदे गए सॉफ्टवेयर के साथ आया था,
यदि मेसर्स नेशनल प्रिंटिंग प्रेस के पास चाणक्य फोंट है, जो उनके द्वारा जनवरी,1994 में खरीदे गए सॉफ्टवेयर के साथ आया था, तो दोनों के पर्सन अलग अलग होंगे। यदि वर्सन कुछ न भी लिखा हो, तो भी उनके character-map को देखने पर उनमें कुछ न कुछ अन्तर अवश्य मिलेगा।

इसी प्रकार अलग अलग यूजर के पास चाणक्य फोंट के अलग अलग वर्सन होंगे। कोई भी परस्पर हूबहू नहीं होगा। कहीं कहीं न कहीं किसी न किसी या कुछ न कुछ ग्लीफ्स में परिवर्तन, key-sequence में कुछ परिवर्तन जरूर रहेगा।

अतः आपके पास चाणक्य फोंट की जो कापी है, उसके लिए बनाया गया कनवर्टर 100% सटीक output दे रहा है, तो...

वही कनवर्टर अन्य किसी के पास चाणक्य फोंट की जो कापी है, जो वर्सन है, उसका भी 100% सही output देगा ही, इसकी आशा करना भी नहीं करनी चाहिए।

इसी प्रकार किसी भी फोंट के लिए बने कनवर्टर उस फोंट की उसी कॉपी/वर्सन के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे पाएँगे। अन्य वर्शन/कॉपी के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम नहीं मिलेगा।

क्योंकि विभिन्न फोंट्स के निर्माताओं ने यूजर की फीडबैक के अनुसार समय समय पर अपने फोंट के अगले वर्सन में परिवर्तन/सुधार किए होते हैं।

और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा। इसलिए यदि शत-प्रतिशत सही परिणाम चाहें तो केवल हरेक फोंट के हरेक वर्सन के लिए अलग अलग वर्शन के कनवर्टर बनाने पड़ेंगे।
जैसा कि CDAC के ISM software के साथ दिए जानेवाले फोंट्स तथा Font-code-converter में किया जाता रहा है।


अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला होगा। सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही परिणाम दे रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।

अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास करें।

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Apr 11, 2011, 11:37:58 PM4/11/11
to indi...@googlegroups.com
और कई निर्माताओं ने अपने फोंट में वर्शन नं. को दर्ज करने की जरूरत को भी नहीं समझा।

इसी का फल भुगत रहा हूँ, पहले पंजाब केसरी का साइट से कभी डाउनलोड किये गये ट्रू टाइप चाणक्य के लिये बना चुका था, फिर पता चला कि अखबार वाले आम तौर पर जिस चाणक्य का प्रयोग कर रहे हैं (.pfm, .pfb) उसमें इससे अन्तर है। अब दोनों के लिये विकल्प जोड़ा है, लेकिन आप बता रहे हैं कि और भी वर्जन हैं।

११ अप्रैल २०११ १०:४४ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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ePandit | ई-पण्डित

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Apr 11, 2011, 11:53:22 PM4/11/11
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हाँ जी बिलकुल यही बात मेरे दिमाग में आयी थी कि मानक फॉण्ट की बजाय मानक फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय होने चाहिये ताकि जिसे भी फॉण्ट बनाना हो वो उन कोड प्वाइण्ट्स के आधार पर बना सके। साथ ही पुराने फॉण्टों को भी आसानी से उन मानक फॉण्ट कोडों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। एक बार यह फॉण्ट कोड प्रचलित हो जायें तो फिर उनके आधार पर बने नॉन-यूनिकोड फॉण्टों को भी उसी तरह से आपस में केवल फॉण्ट चुनकर बदला जा सकेगा जैसे यूनिकोड फॉण्टों को बदल सकते हैं।

एकमात्र समस्या ये है कि इस प्रकार के फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय करने के लिये पहले सभी देवनागरी संयुक्ताक्षरों के ग्लिफ्स तय करने होंगे। साथ ही उनकी संख्या भी क्योंकि 8 बिट में जितने प्वाइण्ट उपलब्ध हैं उन्हीं से काम चलाना होगा। यदि किसी फॉण्ट निर्माता को बेशक सभी ग्लिफ्स शामिल न भी करने हुये तो वो अपने ग्लिफ्स को मानक कोड प्वाइण्ट्स पर रखकर बाकियों को छोड़ देगा।

रही बात फॉण्ट बनाने की तो हम किसी बने-बनाये फ्री (मुफ्त नहीं मुक्त लाइसेंस) फॉण्ट को संशोधित कर उसे इन कोड प्वाइण्स में ढालकर एक डेमो फॉण्ट बना सकते हैं। या फिर जैसा अनुनाद जी ने स्वयं कामचलाऊ फॉण्ट बनाने सम्बन्धी कुछ लिंक दिये थे, इस तरह से एक कामचलाऊ डेमो फॉण्ट बना सकते हैं।

यानि चरण कुछ इस तरह से होंगे।
  1. सभी अधिकतम  वर्णखण्ड (ग्लिफ्स) तय करना। यह कार्य सभी उपलब्ध नॉन-यूनिकोड फॉण्टों के ग्लिफ्स का अध्ययन कर हो सकता है।
  2. सभी ग्लिफ्स हेतु कोड प्वाइण्ट्स तय करना। यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा।
  3. उपर्युक्त तय किये गये कोड प्वाइण्ट्स के अनुसार एक डेमो फॉण्ट (मानक फॉण्ट कोड वाला) बनाना।
  4. विभिन्न सर्वाधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध फॉण्ट निर्माताओं से अनुरोध करना कि वे अपने नॉन-यूनिकोड फॉण्टों का इन मानक फॉण्ट कोडों के अनुसार नया वर्जन निकालें। फॉण्ट निर्माताओं के लिये तकनीकी तौर पर यह कार्य कोई विशेष मुश्किल नहीं, बस उन्हें यह लगे कि जिस मानक हेतु अनुरोध किया जा रहा है वे वाकयी दमदार हैं।
एक बार प्रचलित फॉण्टों के इस मानक को फॉलो करने पर बाकी छोटे-मोटे फॉण्ट निर्माता स्वयं ही इसका पालन शुरु कर देंगे।

११ अप्रैल २०११ १०:४४ अपराह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
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narayan prasad

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Apr 12, 2011, 12:43:07 AM4/12/11
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<<1. सभी अधिकतम  वर्णखण्ड (ग्लिफ्स) तय करना। यह कार्य सभी उपलब्ध नॉन-यूनिकोड फॉण्टों के ग्लिफ्स का अध्ययन कर हो सकता है।>>
 
सभी उपलब्ध नॉन-यूनिकोड फॉण्टों के ग्लिफ्स का अध्ययन करना अधिक समय लेगा । इसकी अपेक्षा उलरिश श्टील द्वारा देवनागरी में प्रकाशित संस्कृत, हिन्दी आदि साहित्यों से संकलित करके एक लम्बी सूची बनाई गई है जो जालस्थल पर उपलब्ध है (आई-ट्रान्सलेटर वाले साइट पर)। 
 
वैदिक स्वर चिह्नों की सूची पं॰ युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा प्रणीत "वैदिक स्वर मीमांसा" से तैयार की जा सकती है ।
 
<<२. सभी ग्लिफ्स हेतु कोड प्वाइण्ट्स तय करना। यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा।>>
 
अभी तो देवनागरी के लिए यूनिकोड में केवल 128 (+ इने-गिने कुछ और) कोड बिन्दु हैं । परन्तु देवनागरी में सभी युक्ताक्षरों और चिह्नों को ग्रहण करना है तो कोई पाँच हजार कोड बिन्दु चाहिए । अतः इसका भी निर्धारण होना चाहिए कि इन्हें यूनिकोड में उपलब्ध कोड स्पेस में कहाँ स्थान दिया जाय ।

----नारायण प्रसाद

2011/4/12 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

sanjay kareer

unread,
Apr 12, 2011, 2:14:13 AM4/12/11
to indi...@googlegroups.com

2011/4/12 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>
..... फॉण्ट बना सकते हैं। या फिर जैसा अनुनाद जी ने स्वयं कामचलाऊ फॉण्ट बनाने सम्बन्धी कुछ लिंक दिये थे, इस तरह से एक कामचलाऊ डेमो फॉण्ट बना सकते हैं।

पंडित जी, अनुनाद जी ने कामचलाऊ फॉण्ट बनाने संबंधी कौन से लिंक दिए हैं... कृपया इसके बारे में जानकारी दें। मुझे इस बारे में कुछ याद नहीं आ रहा।  


--
Sanjay Kareer           
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Narendra Sisodiya

unread,
Apr 12, 2011, 2:18:15 AM4/12/11
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2011/4/12 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>

हाँ जी बिलकुल यही बात मेरे दिमाग में आयी थी कि मानक फॉण्ट की बजाय मानक फॉण्ट कोड प्वाइण्ट तय होने चाहिये

Hum log indicoms mailing par discuss and collaborate karke naye manak bana sakte hai ??

Hariraam

unread,
Apr 12, 2011, 10:36:59 PM4/12/11
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श्रीश जी,

संयुक्ताक्षरों को फिलहाल प्रारम्भिक चरण में छोड़ दिया जाए।
क्योंकि युनिकोड में कोई पाठ जब save होता है, तो उसमें सिर्फ Basic code ही save होते हैं। कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन के लिए संयुक्ताक्षरों के ग्लीफ्स की कोई आवश्यकता है। ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।

युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।

केवल बेसिक कोड प्वाइंट्स का पहले चरण में मानकीकरण किया जाए।
संयुक्ताक्षरों को मूल व्यंजनों में व्यक्त कर प्रकट किया जाए।

फिलहाल इतना ही होने पर ही कम से कम मूल पाठ को लोग त्रुटिरहित रूप से विश्वभर में आदान प्रदान तो कर ही पाएँगे।
संयुक्ताक्षरों के मूल व्यंजनों में बदल कर प्रकट होने पर कोई अर्थ तो बिगड़ेगा नहीं।

और फिल मूल व्यंजनों + स्वरों में saved पाठ को युनिकोड में बदलने में सरलता होगी।

बाद में अगले चरण में संयुक्ताक्षरों के कूट-निर्धारण का काम हाथ में लिया जा सकता है।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 13, 2011, 1:34:49 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com

रवि जी,

आपने बिल्कुल सही कहा है -- "कुछ वर्षों की बात है"--

किन्तु इन कुछ वर्षों में और कितने Man-hour बेकार होंगे?
इन कुछ वर्षों तक युनिकोड और पुराने 8-बिट फोंट दोनों का संगमकाल चलता रहेगा।

इन्हीं कुछ वर्षों के लिए ही फोंट कोड का उपयोग आवश्यक होगा।

जबकि फोंट कोड निर्धारित करने का कार्य लगनपूर्वक कार्य करें तो एक सप्ताह में हो सकता है।

-- हरिराम


On 12-04-2011 08:05, Ravishankar Shrivastava wrote:
"...अतः Font-code-converter बनाने का कार्य अनन्त काल तक चलते रहनेवाला
होगा।
सार्वत्रिक नहीं हो पाएगा। एक कनवर्टर जो एक यूजर के लिए शतप्रतिशत सही
परिणाम दे
रहा है, दूसरे के लिए शायद 20% गलतियों वाला परिणाम दे।

अतः बेहतर होगा कि हम मिलकर Font-code-standardisation के लिए प्रयास
करें।...."

वस्तुतः ऐसा नहीं है. आमतौर पर सभी सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर यूनिकोड
यूटीएफ 8 तथा भविष्य में यूटीएफ 16 का परिपूर्णता से पालन करेंगे, और
पुराने सारे फ़ॉन्ट प्रचलन से स्वतः ही बाहर हो जाएंगे. यह मात्र कुछ
वर्षों की ही बात है. तब ये समस्या नहीं रहेगी. अभी ही चहुँ ओर आधे से
ज्यादा काम (सरकारी उपक्रमों को छोड़ दें तो, क्योंकि वहाँ निर्णय लेने
की प्रक्रिया बेहद उबाऊ, लंबी और लालफीता शाही युक्त होती है - मैं स्वयं
भी कभी उस तंत्र का हिस्सा रह चुका हूँ) पूरी तरह से यूनिकोड हिंदी में
होने लगे हैं. और, यूनिकोड हिंदी का विकल्प नहीं है. यह एक तरह से
स्टैण्डर्डाइज्ड हो चुका है, वैश्विक स्तर पर - ओपन सोर्स से लेकर निजी
सॉफ़्टवेयर निर्माताओं सब जगह. और न सिर्फ हिंदी, अन्य भारतीय भाषाओं -
तमिल, तेलुगु, पंजाबी इत्यादि सभी के लिए भी यूनिकोड स्टैण्डर्ड मानक बन
चुका है.

सादर,
रवि

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Apr 13, 2011, 2:49:05 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com, Hariraam, technic...@googlegroups.com
युनिकोड में भी किसी संयुक्ताक्षर का मानकीकरण नहीं हुआ है।
ओपेन टाइप फोंट्स में अन्तर्निहित अल्गोरिद्म के तहत ग्लीफ, संयुक्ताक्षर आदि स्वतः प्रकट होते हैं।

यह सही है हरिराम जी कि यूनिकोड में संयुक्ताक्षरों का मानकीकरण नहीं हुआ है। जहाँ तक मैं समझता हूँ ओऍस का CTL (कॉम्प्लैक्स स्क्रिप्ट लेआउट) रैण्डरिंग इंजन जैसे विण्डोज़ के मामले में USP (यूनिकोड स्क्रिप्ट प्रोसैसर) बेसिक कोडों को फॉण्ट में निहित संयुक्ताक्षर ग्लिफ्स में बदलकर दिखाता है। बिना CTL इंजन के यूनिकोड देवनागरी पाठ बेसिक कोड रुप में ही दिखता है (वही बिखरा हुआ दिखने वाली समस्या)।

यदि प्रस्तावित मानक फॉण्ट कूटों में केवल बेसिक कोड प्वाइण्ट्स ही रखे जायें तो वे स्क्रीन पर कुछ इस तरह दिखेंगे "हिन्‌दी कम्‌प‌यूटि‌ंग"  ऐसी स्थिति में उसे कौन प्रयोग करना चाहेगा।

पाठ को सही दिखाने के लिये या तो यूनिकोड की तरह एक रैण्डरिंग इंजन चाहिये होगा जो कि बेसिक कोड को प्रदर्शन हेतु जोड़कर सही रुप में दिखाये। मैं नहीं समझता कि फॉण्ट अपनी अल्गोरिद्म से ही संयुक्ताक्षरों को जोड़कर दिखा सकता है। रैण्डरिंग इंजन जरुरी होगा, फिर यूनिकोड में ही क्या बुरायी है और प्रकाशन उद्योग ऐसे फॉण्ट को क्यों प्रयोग करेगा, उसे तो बिना रैण्डरिंग के झंझट वाला फॉण्ट ही चाहिये जिसमें संयुक्ताक्षर एक ही कूट बिन्दु से प्रकट होता है।

या फिर लिगेसी 8 बिट फॉण्टों की तरह सभी चिह्नों हेतु अलग कोड प्वाइण्ट्स रखे जानें होगें। जैसे पूरे वर्ण "क" के लिये एक कोड प्वाइण्ट, मूल व्यञ्जन "क्‍" (क्) के लिये अलग कोड प्वाइण्ट तथा क् से बनने वाले संयुक्ताक्षरों के लिये अलग कोड प्वाइण्ट। यहाँ बात वही आ गयी पुराने 8 बिट लिगेसी फॉण्टों वाली। हाँ ये जरुर है कि अधिकतम फॉण्टों का अध्ययन कर सर्वाधिक प्रचलित संयुक्ताक्षर ग्लिफ्स जो कि अपरिहार्य हैं तय किये जायें। 8 बिट के स्थानों (032 से लेकर 255) तक सभी देवनागरी संयुक्ताक्षरों को रख भी नहीं सकते इसलिये सबसे जरुरी ही रखे जायें।

कृपया इस बारे जरा तस्वीर स्पष्ट करें कि केवल बेसिक वर्णों के लिये कोड प्वाइण्ट रखने से कैसे काम चल सकता है?

१३ अप्रैल २०११ ८:०६ पूर्वाह्न को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:

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Anunad Singh

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Apr 13, 2011, 3:35:26 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
कम्प्यूटर, टाइपराइटर से इस मामले में भिन्न है कि इसमें कुछ काम 'सॉफ्ट' तरीके से होते हैं जबकि यांत्रिक टाइपराइटर में एक 'फिक्स्ड लिंकेज' होती है  जिससे  एक कुंजी दबाने से उससे सम्बद्ध लिंकेज का प्रयोग करते हुए एक वर्ण (चिह्न) छपता है।

एक ही 'कोड' को हजारों तरह से प्रदर्शित किया जा सकता है - यह सॉफ्टवेयर की विशेषता है, उसका लाभ है। इसी को ध्यान में रखते हुए  कोडिंग और 'रेंडरिंग' (स्क्रीन पर स्वरूपण) को अलग-अलग रखा गया है। ध्यातव्य है कि यूनिकोड का काम केवल कोड निर्धारित करना है। उसका पूरा विश्वास है कि प्रदर्शित  करना (रेंडरिंग) कोई समस्या नहीं है, और अगर है तो उसे सॉफ्टवेयर में सुधार करके सुलझा लिया जायेगा।

किस-किस चीज के लिये भिन्न होने चाहिये, किसका कोड होना ही नहीं चाहिये, कोडों का मान और क्रम क्या हो - आदि प्रश्नों पर वे विचार करते हैं।  उदाहरण के लिये देवनागरी के सन्दर्भ में उन्होने तय किया है कि संयुक्त वर्णों (कांजंक्ट्स) के लिये कोई यूनिकोड नहीं निर्धारित किये जाने चाहिये बल्कि यह कार्य केवल 'हलन्त' के लिये एक अलग कोड दे देने से बेहतर ढंग से हो जाता है। मैं उनके सोच को सही मानता हूँ और मानता हूं कि यह बहुत लाभकर है-
१) कम से कम कोडों में काम चल गया है।
२) संयुक्त वर्णों की संख्या व्यावहारिक रूप से असीमित है ही, उनके रूप भी अलग-अलग हैं।  जैसे 'शुक्ल' में आने वाला 'क्ल'  कम से कम दो प्रकार से लिखा जाता है- एक आधा क के बाद ल  तथा दूसरा  क के नीचे ल।
३) यदि  उपरोक्त वर्णित दोनो 'क्ल' के लिये अलग-अलग  कोड  निर्धारित हों तो सर्च इंजनों को बहुत समस्या होगी। हो सकता है कि किसी खोज में पहले वाला 'क्ल'  तो मिले किन्तु दूसरे वाला नहीं।
४) खोजने में एक और परेशानी आती- मान लीजिये कहीं किसी टेक्स्ट में 'शुक्ल ' लिखा है और आप  'शुक्' के लिये खोज रहे हैं तो वह नहीं मिलेगा।

narayan prasad

unread,
Apr 13, 2011, 4:31:32 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
<<मैं उनके सोच को सही मानता हूँ और मानता हूं कि यह बहुत लाभकर है-
१) कम से कम कोडों में काम चल गया है।
२) संयुक्त वर्णों की संख्या व्यावहारिक रूप से असीमित है ही, उनके रूप भी अलग-अलग हैं।  जैसे 'शुक्ल' में आने वाला 'क्ल'  कम से कम दो प्रकार से लिखा जाता है- एक आधा क के बाद ल  तथा दूसरा  क के नीचे ल।
३) यदि  उपरोक्त वर्णित दोनो 'क्ल' के लिये अलग-अलग  कोड  निर्धारित हों तो सर्च इंजनों को बहुत समस्या होगी। हो सकता है कि किसी खोज में पहले वाला 'क्ल'  तो मिले किन्तु दूसरे वाला नहीं।
४) खोजने में एक और परेशानी आती- मान लीजिये कहीं किसी टेक्स्ट में 'शुक्ल ' लिखा है और आप  'शुक्' के लिये खोज रहे हैं तो वह नहीं मिलेगा।>>
 
मैं आपकी बात से सहमत हूँ । कम से कम मुझे तो क्रमांक "४)" वाली सुविधा से युक्ताक्षर-बहुल संस्कृत पाठ में खोज वाला कार्य बहुत आसान हो गया (विशेषकर व्याकरण सूत्रों में खोज हेतु)। पर यह सुविधा Excel फाइल में तो है, लेकिन MS Word में नहीं ।  जैसे - शुद्ध व्यंजन "श्" वाले शब्द की खोज करें तो MS Excel फाइल में कर्सर "रश्मि", "श्री", "श्वान", "पश्चात्" जैसे शब्दों पर जाकर रुकता है, परन्तु MS Word फाइल में ऐसा नहीं होता ।
---नारायण प्रसाद

2011/4/13 Anunad Singh <anu...@gmail.com>

Anunad Singh

unread,
Apr 13, 2011, 4:56:50 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
वैसे यह समस्या MS Word की है न कि यूनिकोड की।  मुझे विश्वास है कि न्की नजर में यह समस्या लायी जायेगी तो उसे  अगले संस्करणों में ठीक कर लेंगे।

न केवल  "रश्मि", "श्री", "श्वान", "पश्चात्" में  उसे  'श्'   के दर्शन नहीं होते, अपितु   "शीतल",  "शैल",  "शेखर", "शिखर"  में 'श'  नहीं मिलता।

-- अनुनाद

--------------


 

Hariraam

unread,
Apr 13, 2011, 6:34:00 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com

नारायण प्रसाद जी और अनुनाद जी,

यदि आप MS Word 2002 / 2003 में कार्य करते हैं तो

menu-->tools-->options-->Complex Scripts में जाकर Use Sequence Checking बटन को off करके देखिए।

MS word में भी Excel की तरह character level editing सक्षम की जा सकती है।

-- हरिराम

narayan prasad

unread,
Apr 13, 2011, 6:42:49 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
हरिराम जी,
   मैं विंडोज-7 का प्रयोग करता हूँ । यह बात अलग है कि एम-एस वर्ड फाइल को Save AS MS Word 2003 का भी प्रयोग करता हूँ ।
---नारायण प्रसाद

2011/4/13 Hariraam <hari...@gmail.com>

Hariraam

unread,
Apr 13, 2011, 6:42:42 AM4/13/11
to Anuradha R., technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
अनुराधा जी,

"सच कहा कि आधे से ज्यादा कार्य गैर-युनिकोड में हो रहा है।"

विशेषकर प्रिंट मीडिया व प्रकाशन उद्योग में।

इसका कारण सिर्फ युनिकोड फोंट का सुन्दर नहीं होना ही नहीं है। बल्कि तकनीकी कारण है कि ये पुराने सॉफ्टयेरों के लिए अनुपयुक्त होते हैं।

युनिकोडित ओपेन टाइप फोंट 16-बिट फोंट होते है। जिनमें प्रस्तुत पाठ केवल युनिकोडित मूल वर्णों में ही सेव होता है। परम्परागत रूप में "पूर्णाक्षरों" व "संयुक्ताक्षरों" के वर्ण ओपेन टाइप फोंट में निहित ग्लीफ्स में बदलकर स्क्रीन पर प्रकट होते हैं तथा मुद्रण यंत्रों में वेक्टर या रास्टर ग्राफिक्स रूप में बदलकर संप्रेषित होते हैं।

पुराने सॉफ्टवेयर यथा पेजमेकर, कोरल ड्रा, फोटोशाप आदि के पुराने वर्सन 16 बिट तकनीकी को ढो नहीं पाते। ठीक उसी प्रकार जैसे एक ट्राली रिक्शा की क्षमता 5 बोरी (5 क्विंटल) उठाने की होती है। किन्तु एक 16 चक्कों वाले ट्रक की क्षमता 500 बोरी (50 टन) माल ढोने की होती है। अगर एक ट्राली रिक्शा पर 16 चक्कों वाले ट्रक का माल लादने का प्रयास किया जाए तो क्या होगा?

और अधिकांश भारतीय मुद्रण उद्योग गरीबी की हालत से गुजर रहा है। प्रतियोगितात्मकता, कागज तथा स्याही आदि के भाव बढ़ने, मजदूरी वेतन आदि बढ़ने के बावजूद छपाई की दर उलटे कम होती जा रही है।

युनिकोडित ओपेन टाइप फोंट को सम्भालने वाले आधुनिकतम सॉफ्टवेयर (यथा- Adobe CS5 or CS6 का मिडिल इस्ट वर्सन) खरीदने की क्षमता प्रेसवालों की नहीं है। इनपर कार्य कर सकनेवाले एक्सपर्ट आपरेटरों की संख्या भी नदारद है।

और ऐसे नए आधुनिक सॉफ्टवेयरों की कॉपी भी नहीं हो सकती, खरीदकर (हजारों लाखों में) ऑनलाइन पंजीकरण करना पड़ता है। अतः इनका उपयोग इक्के, दुक्के अति आधुनिक प्रेस ही कर पाएँगे, जो भारी लाभार्जन कर पाते हों।

---

विशेषकर अखबार वालों की आर्थिक हालत बहुत ही खराब होती है। उनकी आय सिर्फ विज्ञापन पर टिकी होती है। कुछ ही बड़े अखबार आर्थिक लाभवान हो पा रहे हैं।

और ऐसी हालत में अखबार वालों को दोहरा कार्य करना पड़ रहा है।

अपने अखबार के ऑनलाइन संस्करण (इंटरनेट संस्करण) के लिए युनिकोड में संसाधित करके प्रकाशित करना।

और

अपने अखबार के मुद्रित संस्करण के लिए 8-बिट पुराने फोंट्स का प्रयोग करके प्रकाशित करना।

ओपेन सोर्स में तथा निःशुल्क रूप से उपलब्ध मुद्रण कार्यों के लिए योग्य, डीटीपी, डिजाइनिंग वाले आधुनिकतम सॉफ्टवेयर के आने, बाजार में प्रचलित होने, उपयोगकर्ताओं के लिए इसका अभ्यस्त होने, इसमें आनेवाली समस्याओं का समाधान करके उनका विकास करने आदि कार्य में कई वर्षों का समय लग जाएगा शायद।

अतः फिलहाल युनिकोड और गैर-युनिकोड के इस संगम या संक्रान्ति काल में 8-बिट Font-code का मानकीकरण तत्काल आवश्यकता है।

रही सरकारी तंत्र की बात। इसकी आलोचना करने का हमें कोई हक नहीं है। सरकारी तंत्र की अपनी मजबूरियाँ होती हैं।

हमें सरकारी तंत्र को सर्वदा सहयोग करते रहने के बारे में ही सोचना चाहिए। NGO से सरकारी तंत्र को काफी मदद मिल जाती है।

-- हरिराम




On 12-04-2011 01:02, Anuradha R. wrote:

हरिराम जी ने एकदम सही कहा कि फॉन्ट कोड कनवर्ट करते रहना तो लगातार पीछा करते रहने जैसा है- कोई नया फॉन्ट आया तो कनवर्ट करें, पुराने फॉन्ट में कोई मैटर है, तो भी कनवर्ट करें और तो और वही फॉन्ट(उदा.- चाणक्य) है, तो उसका अनंकित वर्जन आपके वर्जन से अलग है तो फिर कनवर्जन। यानी बालू को मुट्ठी में भींचने की कोशिश, जो लगातार फिसलती ही जाती है। यह कनवर्जन का मामला तो अनंत है और अनंत काल तक चलता रहेगा, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया। 

विंडोज (माइक्रोसॉफ्ट), गूगल जैसी विदेशी कंपनियों ने हमारे लिए इतना तक तक दिया है कि हमें एक यूनिकोड से सुसज्जित सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सुविधा दे दी है। अब हमें सिर्फ यह करना है कि किसी तरह इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल  होने वाला फॉन्ट-कोड बनाना है, ताकि परिवर्तन के झमेले से छुटकारा मिले। 

निश्चय ही, हिंदी का आधे से ज्यादा व्यावसायिक काम गैर-यूनिकोड में हो रहा है। हो सकता है, यह भी महत्वपूर्ण बात हो कि यूनिकोड के फॉन्ट उतने सुंदर नहीं होते। लेकिन, यूनिकोड की जो सार्वभौमिकता है, टाइपिंग की सहजता- सरलता है, और तकनीकी रूप से विकसित स्थिति है, उसके चलते इसे प्रमुखता देनी ही चाहिए। इसको सभी इस्तेमाल करें, ऐसा फैसला होने के बाद इसमें सुंदर फॉन्ट जोड़े भी जा सकते हैं।

NGO बनाने से बेहतर होगा, सरकार में संबंधित कार्यालयों, अधिकारियों और इस पर काम कर चुके लोगों को जोड़ें जो फिर आगे, फैसला लेने में सक्षम/महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करें, मनाएं और बताएं कि यह समस्या आसानी से सुलझ सकती है, थोड़ी सी राजनीतिक/प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया जा सकता है कि सरकार की तकनीकी टीम को सभी तरह का सपोर्ट देने के लिए तकनीकी जानकार और गैर-तकनीकी अनुभवी उपयोगकर्ता सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं। 


अगर सहमत हों तो शुरुआत की जाए और असहमति हो तो भी अपना मत साझा करें और कोई रास्ता निकालने का उपाय मिलकर सोचें।

-आर. अनुराधा



Hariraam

unread,
Apr 13, 2011, 6:52:04 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
यहाँ विण्डोज की बात नहीं है। कृपया बताएँ कि MS word के किस वर्सन का उपयोग करते हैं - 2007 या 2010 ?

character level editing सक्षम करने का तरीका Bob Eaton जी से पूछना पड़ेगा।

-- हरिराम

Hariraam

unread,
Apr 13, 2011, 7:03:35 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
MS word में syllable level editing ही हो पाती है, भारतीय लिपियों में।

इसीलिए मैं ऐसे कार्यों के लिए Open Office writer का उपयोग करता हूँ।

-- हरिराम

Anunad Singh

unread,
Apr 13, 2011, 9:00:59 AM4/13/11
to indi...@googlegroups.com
मेरे कम्प्यूटर पर एमएस वर्ड नहीं है किन्तु किसी दूसरे के कंप्यूटर पर MS Word 2010 (Trial version) पर काम किया तो  मुझे जो अनुभव हुआ वह आपके अनुभव से अलग है-

यदि आपके  डोक्युमेंट में  "रश्मि", "श्री", "श्वान", "पश्चात्"  हैं  और आप  'श'  (श् नहीं)  खोजते हैं तो  वह MS Word  को नहीं मिलता  जबकि अन्य यूनिकोडित समर्थित  प्रोग्रामों में  मिलता है।  ( यूनिकोड की दृष्टि से   श्  =  श + ्  ; अतः जहाँ भी  श्  है वहाँ  अन्य प्रोग्रामों  को  श मिल जाता है।  यही तर्कसंगत भी है।)

-- अनुनाद

Hariraam

unread,
Apr 14, 2011, 9:38:05 PM4/14/11
to technic...@googlegroups.com, indi...@googlegroups.com
आपका कहना सही है।


अधिकांश साफ्टवेयर निर्माता युनिकोडित वर्सन निकाल चुके है। शेष निकाल रहे हैं। सबके
प्रोग्राम में युनिकोड कनवर्टर उपलब्ध है।

किन्तु मुफ्त नहीं।

Indic Software producers की हालत खस्ता है। विकास कार्य में लाखों खर्च होते हैं।
किन्तु माल बिकता कम है। लाभ मिलना तो दूर, उलटे घाटा हो रहा है। सकरकारी अनुदान
भी नहीं है।
अतः वे अपने सॉफ्टवेयर/फोंट/कनवर्टर/युटिलिटिज की मोनोपोली की नीति अपनाकर ही जीने
को मजबूर रहे हैं।

हमें उनके हित के बारे में भी सोचना होगा।

किन्तु मानकों के निर्धारण की जरूरत है
और सभी निर्माताओं को मानकों अनुपालन करना अनिवार्य होना चाहिए।

-- हरिराम


On 13-04-2011 20:47, V S Rawat wrote:
> सॉफ़्टवेयर निर्माताओं को उनके पुराने सॉफ़्टवेयरों को अद्यतन करना चाहिए ताकि उन
> सॉफ़्टवेयरों में यूनीकोड फ़ॉण्ट भी चल सके।
>
> गैर यूनीकोड फ़ॉण्ट निर्माताओं को उनके फ़ॉण्टों से यूनीकोड में और यूनीकोड से उनके फ़ॉण्टों
> में परिवर्तित करने के सॉफ़्टवेयर बना कर मुफ़्त उपयोग के लिए उपलब्ध कराने चाहिए।
>
> यदि वो ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह उन निर्माताओं का गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार और
> मानसिकता है जिससे लाखों लोगों के प्रयास और समय व्यर्थ हो रहे हैं।
>
> सरकार यह नियम बना सकती है कि निर्माता उपरोक्त कामों को करें अन्यथा उनके
> सॉफ़्टवेयरों को भारत में बेंचने और उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
>
> रावत
>
>

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