प्रौढ शिक्षा - पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य
में साधक
राकेश
शर्मा 'निशीथ'।
'प्रौढ शिक्षा जीवन के लिए शिक्षा है, केवल मनुष्य की साक्षरता के लिए नहीं है ।...मेरी राय में हमारे दुखित और लज्जित होने का कारण जितना हमारा अज्ञान है, उतना निरक्षरता नहीं है । इसलिए साक्षरता के लिए मैं चाहूंगा कि सावधानी से चुने हुए शिक्षकों द्वारा और उतनी ही सावधानी से चुने हुए पाठयक्रम के द्वारा अज्ञान को हटाने के तेज कार्यक्रम बनाये जाएं । ये चुने हुए शिक्षक इस चुने हुए पाठयक्रम के अनुसार लोगों, खासकर प्रौढ ग़्रामीणों को शिक्षित बनाएं।' यह विचार गांधीजी ने प्रौढ शिक्षा का महत्व बताते हुए व्यक्त किए थे ।
आर्थिक विकास और सामाजिक कायापलट के लिए विकास कार्यक्रमों में जनसामान्य की भागीदारी आवश्यक है । परन्तु यह तभी संभव हो सकता है जब हमारे प्रौढ शिक्षित हों । इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रौढ शिक्षा का एक व्यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है । अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस प्रत्येक वर्ष 8 सितम्बर को मनाया जाता है, ताकि साक्षरता कार्यक्रमों का मूल्यांकन किया जा सके और अशिक्षा के विरुध्द लोगों की शक्ति को सक्रिय किया जा सके ।
प्रत्येक समाज में प्रौढ शिक्षा की अनौपचारिक परम्परा रही है । प्रौढ शिक्षा का उद्भव और विकास विभिन्न देशों में विविध नामों से अलग-अलग समय पर हुआ । एडल्ट एजुकेशन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग और प्रचलन 1851 में इंग्लैंड में हुआ । शिक्षा बीच में अधूरी छोड़कर जाने वाले लोगों की शिक्षा को भारत में प्रौढ शिक्षा की संज्ञा दी गई है । एक अर्थ में प्रौढ शिक्षा से हमारा आशय प्रौढ साक्षरता है । विश्व के अन्य देशों में इसे सतत शिक्षा अथवा अनवरत शिक्षा के नामों से भी जाना जाता है। भारत में समाज शिक्षा कार्यक्रम की परिकल्पना का विकास प्रौढ शिक्षा की नई अवधारणा के रूप में हुआ । यूनेस्को के अनुसार आधारभूत शिक्षा (समाज शिक्षा या प्रौढ शिक्षा) ही मानव के भावनात्मक, बौध्दिक, नैतिक एवं भौतिक उत्थान का एकमात्र साधन है ।
आवश्यकता
संपूर्ण साक्षरता की दिशा में चलाए जा रहे कार्यक्रमों में प्रौढ शिक्षा अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रही है । इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार अब साक्षरता की दर बढक़र 64.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि 1991 में यह 52.21 प्रतिशत थी । पुरुषों की साक्षरता दर 75.85 प्रतिशत तथा स्त्रियों की 54.16 प्रतिशत है । महिलाओं की साक्षरता दर में पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक प्रगति हुई है । स्त्री-पुरुष साक्षरता दर में अंतर, जो 1991 में 24.84 था, 2001 में कम होकर 21.60 हो गया ।
विकासशील देशों में शिक्षा का संकट अर्थात व्यापक निरक्षरता, शिक्षित बेरोजगारी, रोजगारपरक शिक्षा और तकनीकी शिक्षा का अभाव आदि के पीछे मुख्य तथ्य यह है कि औपचारिक शिक्षा व्यवस्था मुट्ठी भर विद्यार्थियों की आवश्यकताएं पूरी करती हैंजबकि समाज का एक बड़ा भाग शिक्षा से अलग-थलग एवं अनुत्पादक बनकर रह जाता है । प्रौढ शिक्षा एक ओर औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की कमियों को पूरा करती है, तो दूसरी ओर प्रौढाें को विकास का अवसर प्रदान करती है । प्रौढ शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपने व्यवसाय में सुधार तथा आय में वृध्दि, बचत और पूंजी निवेश भी कर सकते हैं ।
कोई समाज सचमुच शिक्षोन्मुख है तो वह प्रौढ शिक्षा को नकार नहीं सकता । साक्षरता के साथ-साथ प्रौढाें को राष्ट्रीय एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक बनाना तथा उनका जीवन-स्तर ऊंचा उठाना प्रौढ शिक्षा पाठयक्रम में शामिल है । प्रौढ शिक्षा के विकास से प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की उपस्थिति आश्चर्यजनक ढंग से बढ ज़ाती है । बाल मृत्यु दर कम हो जाती है । इससे जन्म दर में भी कमी आती है । लोगों में आत्मविश्वास पैदा होता है । प्रौढ शिक्षा द्वारा प्रौढ व्यक्ति केवल लिखने-पढने के योग्य ही नहीं बनता, बल्कि इसके माध्यम से वह अज्ञान, पूर्वाग्रह, रूढिवादिता, अंधविश्वास आदि से मुक्त होकर समाज के हित में रचनात्मक कार्य की ओर अग्रसर होता है ।
स्वरूप
प्रौढ साक्षरता कार्यक्रम बड़ी आयु के छात्रों के लिए आमतौर पर बुनियादी पठन और लेखन में शिक्षा प्रदान करता है । प्रत्येक अभियान में वयस्क छात्र शामिल होते हैं । प्रौढ शिक्षा अभियान कलाकारों, नुक्कड़ नाटयकर्मियों, लोक नर्तकों और सामुदायिक समितियों सहित पूरे समुदाय को साक्षरता के अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए प्रेरित करते हैं । 15-35 आयु वर्ग के वयस्कों को बुनियादी साक्षरता कौशल सिखाने के अतिरिक्त साक्षरता अभियानों ने ऐसे स्थानों पर बच्चों को नामांकित किया जहां गैर-औपचारिक शिक्षा कार्यक्रम उपलब्ध नहीं थे ।
इतिहास
कुछ समय पूर्व समाज शिक्षा के प्रयास किए भी गए तो वे केवल व्यक्तिगत प्रयास थे । मैसूर के इंजीनियर श्री एम. विश्वेश्वरैया और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन में प्रौढ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत अधिक कार्य किया । स्वतंत्र भारत में प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने प्रौढ शिक्षा को एक नई अवधारणा दी । वर्ष 1947 से 1950 के दौरान प्रौढ शिक्षा पर अखिल भारतीय प्रतिवेदन प्रकाशित किया गया । वर्ष 1950 के बाद कोठारी आयोग ने अनुशंसा की थी कि प्राथमिक स्तर तक सभी भारतीयों को शिक्षित किया जाए या कम से कम साक्षर तो अवश्य बनाया जाए । समाज शिक्षा के देशव्यापी कार्यक्रम को शक्तिशाली बनाया जाए तथा जो व्यक्ति अपना नियमित अध्ययन जारी नहीं रख सकता उसके लिए आगे अध्ययन की व्यवस्था के लिए विश्वविद्यालयों को पत्राचार पाठयक्रम आरंभ करना चाहिए ।
2 अक्तूबर, 1978 को व्यापक राष्ट्रीय प्रौढ शिक्षा कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया । इसका मुख्य लक्ष्य 15-35 वर्ष आयु वर्ग के निरक्षरों को साक्षर कर उन्हें राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया से जोड़ना था । प्रौढ शिक्षा कार्यक्रमों में और अधिक तेजी लाने के उद्देश्य से 5 मई, 1988 को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (एनएलएम) प्रारंभ किया गया । 30 नवम्बर, 1999 में इस मिशन के विकेन्द्रीकरण पर बल दिया गया। देश में 600 जिलों में से 596 जिलों को प्रौढ शिक्षा कार्यक्रमों के अंतर्गत शामिल कर लिया गया है । 31 मार्च, 2004 तक लगभग 11 करोड़ 82 लाख व्यक्तियों को साक्षर बनाया गया । इनमें से लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं तथा 2