तोमर राजकुल का प्रसिध्द किला और मन्दिर, तोमरों का बेटा पहुँचा कुल मन्दिर पर
कौन हैं भगेश्वरी देवी ?
नरेन्द्र सिंह तोमर ''आनन्द''
मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं प्रदेश के जनसम्पर्क, एवं पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की धार्मिक व सांस्कृतिक आस्थायें उन्हें खींच कर तोमर राजवंश के कुल मन्दिर तक ले गयीं ! हालांकि म.प्र.शासन के जनसम्पर्क विभाग द्वारा जारी प्रेस रिलीज इस सम्बन्ध में नरेन्द्र सिंह तोमर की ऐसाह यात्रा और तोमरों के कुल मन्दिर भगेश्चरी देवी के सम्बन्ध में जारी की गयी है जिसे यहाँ साथ ही प्रकाशित भी किया जा रहा है ! किन्तु अति प्राचीन ऐतिहासिक किले और मन्दिर के बारे में कुछ त्रुटिपूर्ण तथ्य इसमें आये हैं जिन्हें संशोधित कर साथ ही प्रकाशित करना आवश्यक है अत: यहाँ ऐसाह के महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक किले के साथ ही भगेश्वरी मन्दिर व तोमरों की कुलेश्वरी अर्थात कुलदेवी पर प्रकाश डालना आवश्यक हो गया है !
ऐसाह का किला, तोमरों के पुनर्राज्य का आधार इतिहास
ऐसाह मुरैना जिला में स्थित अति प्राचीन गांव है जो कि किसी जमाने में भव्य शहर व तोमर राजपूतों की राजधानी था ! ऐसाह किले के निर्माण का इतिहास यह है, कि जब दिल्ली के महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर से उनके दौहित्र यानि धेवते पृथ्वीराज सिंह चौहान ने अपने नाना महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर को राज्य वापस करने से इंकार कर दिया और कहा कि मुझसे युध्द करो तो अनंगपाल सिंह ने अपने ही दौहित्र से युध्द करने से इंकार कर दिया तथा काफी विचारोपरान्त पृथ्वीराज सिंह चौहान ने महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर को एक हाथी देकर कहा कि यह जहाँ भी बैठ जायेगा आपका राज्य वहीं से प्रारंभ हो जायेगा !
महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर अपने विश्वस्त अनुचरों के साथ दिल्ली छोड़कर जब चले तो जहाँ जहाँ राजा ने अपना डेरा डाला वहाँ वहाँ उसी नाम के स्थानादि बनते गये जैसे राजाखेड़ा आदि !
काफी यात्रा उपरान्त अंतत: यह हाथी वर्तमान मुरैना जिला की अम्बाह तहसील के ऐसाह नामक स्थान पर आ कर बैठा ! तब ऐसाह से आगे के भारत के शेष क्षेत्र पर तोमरों का राज्याधिपत्य पुन: प्रांरम्भ हुआ ! वहाँ महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर ने किला बनवाया जिसे ऐसाह का किला कहा गया ! चम्बल नदी का एक स्थायी भंवर इस ऐसाह नामक स्थान पर पड़ता है, जहाँ गोमुख बने हुये हैं जिनसे चम्बल का पानी तेजी से प्रवेश करता है और भंवर बनाता है ! इस प्रक्षेत्र को भवेश्वरी कहते हैं ! यहाँ भवेश्वरी का मन्दिर इसी तारतम्य में महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर ने बनवाया !
तोमरों का अकूत खजाना
इस ऐसाह किले में तोमरों का अकूत खजाना दबा पड़ा है ऐसी किंवदन्ती है ! हालांकि इस खजाने के बारे में अभी तक कोई औपचारिक खोज नहीं हुयी और मुझे भी वहाँ जा कर सच टटोलने की फुरसत नहीं मिली लेकिन मुझे कई बार सुनने में आया कि कई लोगों को यूं ही अनजाने में कभी कभी बहुत कुछ हाथ लगता रहता है और कई लोग कुछ पाकर बहुत कुछ जिले में बन बैठे हैं ! यह भी सुना कि कुछ लोग लालचवश जब ट्रक या ट्रेक्टर लेकर खजाने की खोज में गये तो तथाकथित राजा की फौज ने उन्हें बहुत मारा और हाथ पांव तोड़ कर भगा दिया !
भवेश्वरी या भगेश्वरी देवी
वहाँ भवेश्वरी या भगेश्वरी देवी का मन्दिर जो भी बनाया गया हो या नाम अपभ्रंश से कुछ भी हुआ हो यह महत्वपूर्ण नहीं है ! वहाँ जो मन्दिर है वह महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर ने बनवाया यह जाहिर है और इस सम्बन्ध में तोमरों की वंशावली में पर्याप्त जिक्र उपलब्ध है !
तोमरों की कुलेश्वरी या कुलदेवी
तोमर राजवंश की कुलदेवी या कुलेश्वरी न तो भवेश्वरी हैं न भगेश्वरी जैसा कि जनसम्पर्क विभाग ने लिखा है ! असल में तोमरों की कुलेश्वरी या कुलदेवी चील्हासन देवी हैं तथा तोमरों का कुल पक्षी चील है इसी प्रकार तोमरों का कुलध्वज हरा है न कि केसरिया या अन्य जो कि कई किताबों में लिख दिया गया है ! तथा तोमरों का कुल चिह्न गौरक्षा का निशान है ! तोमर राजवंश की वंशावली में यह सभी सुस्पष्ट वर्णित है !
तोमरों का मूल उदगम स्थल
तोमरों का मूल उदगम स्थल कर्नाटक माना जाता है जिसे तोमरों की आदि गददी कहा जाता है ! कालान्तर में हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ और तत्पश्चात महाभारत के युध्द के बाद तोमरों का राज्य अफगानिस्तान और तुर्की तक जा पहुँचा ! तथा इस महासाम्राज्य को ही महाभारत कहा जाता है !
भाजपा अध्यक्ष मंत्री का ऐसाह आगमन
नरेन्द्र सिंह तोमर चाहे धार्मिक आस्थावश वहाँ गये हों चाहे राजनीतिक कारणों से, तोमर राजपूतों में घुसपैठ बनाने का पहला रास्ता ऐसाह और ग्वालियर स्थित तोमरों के किले से ही शुरू होता है, दूसरा रास्ता ककनमठ और कुतवार यानि कुन्तलपुर अर्थात महारानी कुन्ती के जन्मस्थान से शुरू होता है, फिर तीसरा रास्ता तोमरों के राजघराने के वंशजों से शुरू होता है ! यह बड़ी गजब की बात है कि चम्बल में तोमर राजपूतों को आज तक अन्य राजपूत अपना अगुआ और अन्नदाता मानते हैं तथा समूचे राजपूताने में तोमरों द्वारा निर्णीत निर्णय ही अंतिम मान्य किये जाते हैं ! राजपूताने में एक कहावत बड़ी प्रसिध्द है ''लौट के दिल्ली तोमर की, तोमर नहीं तब औरन की''