राष्ट्रीय महिला आयोग के कार्यकरण पर एक नजर
प्राचीन भारत में महिला के सम्मान की अवधारण को न्न यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता न्न इस श्लोक के माध्यम से समझा जा सकता है । महिलाएं भी हर युग में सम्मान का पात्र बनने से पीछे नहीं रहीं। इतिहास गवाह है कि जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है, वहीं यह भी सच है कि हर युग में महिलाओं पर अत्याचार होते रहे हैं, उन्हें अग्निपरीक्षा और चीरहरण से गुजरना पड़ा है और एक दौर ऐसा भी आया जब उसे घूंघट में रहने को विवश किया गया तथा उनका सारा अस्तित्व घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गया ।
स्वतंत्र भारत में महिला का सम्मान लौटाने का प्रयास किया गया है । ऐसे कानून बनाये गये हैं, जिनसे उसे बराबर का अधिकार मिले । लेकिन इन सबके बावजूद उसके प्रति नये-नये रूप में अपराध जन्म लेते रहे हैं। भौतिकवादी संस्कृति के प्रभाव में व्यक्ति की बजाय वस्तु के रूप में उसका उपयोग बढता गया है ।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रति 9 मिनट पर एक महिला उत्पीड़न का शिकार होती है तो प्रति 14 मिनट में एक महिला के साथ छेड़छाड़ होती है । प्रति 78 मिनट में एक महिला दहेज के कारण मारी जाती है तो प्रति 45 मिनट में एक महिला का अपहरण होता है । प्रति 29 मिनट पर एक महिला बलात्कार की शिकार होती है तो प्रति 58 मिनट पर एक महिला का यौन उत्पीड़न होता है । 10 प्रतिशत महिलाएं पतियों द्वारा पीटी जाती हैं तो 37 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं ।
राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन
महिलाओं पर बढते अत्याचार और सामान्य कानूनों की असमर्थता को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के संरक्षण के लिए एक संवैधानिक संस्था के रूप में राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन 31 जनवरी, 1992 को जयन्ती पटनायक की अध्यक्षता में किया गया। इसका गठन नेशनल कमीशन ऑफ वीमेन एक्ट 1990 के तहत किया गया, जिसका उद्देश्य था -
v महिलाओं के लिए संवैधानिक और कानूनी संरक्षण का पुनरावलोकन ।
v महिलाओं की दशा में सुधार हेतु आवश्यक वैधानिक कदमों की सिफारिश करना।
v महिलाओं की शिकायतों के निवारण में मददगार होना ।
v महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी नीतिगत मामलों में सरकार को सलाह देना।
आयोग में अध्यक्ष के अलावा पांच सदस्य होते हैं, जो भारत सरकार द्वारा नामित होते हैं । इसके अलावा एक सदस्य सचिव होता है, जो प्रशासनिक एवं संगठनात्मक अनुभव रखता है ।
कल तक जो पीड़ित महिलाएं घुटघुटकर जीने को विवश थी, निश्चय ही राष्ट्रीय महिला आयोग के गठन से उन महिलाओं में आशा के दीप जले हैं । आज वह नि:संकोच न्याय पाने के लिए आयोग का दरवाजा खटखटा रही है। देशभर से यहां शिकायतें दर्ज होती है । शिकायत किसी भी प्रकार से दर्ज करवाई जा सकती है । आयोग से सम्बध्द कोआर्डिनेटर भावना कुमार के अनुसार, न्न चाहे खुद आकर शिकायत दर्ज करायें या फिर डाक, फैक्स, ई-मेल और टेलीफोन के जरिये । आयोग में लीगल सेल है, जो कई मामलों में जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह देता है । इसके अलावा रिसर्च सेल महिलाओं के अधिकारों और महिला मुद्दों से संबंधित मामलों के लिए शोध करवाता है ।
शिकायत का निपटारा
आयोग की सदस्या यास्मीन अबरार बताती हैं, न्न शिकायत दर्ज होने के बाद थ्रू चैनल उसकी जांच होती है । जांच के बाद यहां सुनवाई करते हैं । सुनवाई के दौरान हमारी कोशिश समझौता कराने की होती है और समझौता न होने की स्थिति में दोनों पक्षों को अलग-अलग निर्देश देते हैं । न्न आयोग की एक अन्य सदस्या मंजू स्नेहलता बताती हैं, न्नआदिवासी इलाकों की सबसे बड़ी समस्या जमीन को लेकर है और इससे संबंधित उनके बहुत सारे मामले होते हैं। ऐसी स्थिति में हम लोग जन सुनवाई करते हैं। जन सुनवाई में उस जगह के एस पी, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट जज को बुलाते हैं और दोनों पक्षों को बुलाकर उस मामले को वहीं निपटा देते हैं ।न्न
जागरूकता
यास्मीन अबरार के अनुसार, न्न पंचों-सरपंचों को मिलाकर गांव-गांव, ढांणी-ढांणी ये संदेश पहुंचा रहे हैं कि महिलाएं अपने अधिकारों के बारे में जानें । वह घर की चारदीवारी से बाहर निकलें और अपने हकों की मांग करें। महिलाएं उपभोग की वस्तु नहीं हैं, जिसे कोई भी उपयोग में ले और फिर छोड़ दे । उनके लिए जागरूकता कार्यक्रम है - चलो गांव की ओर । इसके अलावा कानून के बारे में जागरूकता शिविर, सेमिनार, सम्मेलन, कार्यशालाओं के जरिए भी महिलाओं को शिक्षित किया जाता है ।न्न
राष्ट्रीय महिला आयोग की उपलब्धियां और योजनाएं
देश की महिलाओं की नजरें राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर टिकी हैं । डेढ दशक हो रहा है इसको गठित हुए । इस दौरान आयोग की क्या उपलब्धियां रही हैं ? किन कानूनों पर काम हो रहा है और किन पर होने वाला है ? इस संबंध में राष्ट्रीय महिला आयोग की वर्तमान अध्यक्षता डॉ गिरिजा व्यास बताती हैं, न्न पिछले दो वर्ष में हम लोगों ने 22 नये कानून बनाये हैं और कुछ कानूनों को हमने पुनरीक्षा की है तथा कुछ कानूनों में मौजूदा कमियों के विषय में सरकार को प्रस्ताव भेजे हैं । आयोग की सबसे बड़ी उपलब्धि घरेलू हिंसा अधिनियम के संबंध में महिला को उत्तराधिकार में संपत्ति अधिकार प्राप्त होना भी है । विवाह के पंजीकरण की बात भी चल रही है । बाल विवाह पर नया अधिनियम बना कर पंजीकरण कराने भेजा गया है । बलात्कार के कानून में तब्दीली जरूरी है । इससे संबंधित विधेयक बनाकर दिया है, जिसमें पीड़ित महिलाओं का पुनर्वास भी शामिल है । प्रवासी भारतीयों द्वारा विवाहों में भी काफी संख्या में घरेलू हिंसा की शिकायतें आ रही हैं । इन शिकायतों पर काम चल रहा है । वेश्यावृत्ति बहुत बड़ी समस्या है इस समस्या से निबटने के लिए भी विधेयक बनाकर पेश किया गया है उस पर अभी बहस होनी बाकी है ।
सरकार पर दबाव बनाने से ही पिछले तीन वर्षों से जेंडर बजट आ रहा है और हमारी कोशिश है कि आने वाली ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना भी जेंडर आधारित योजना हो । कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न पर कानून बनाकर हमने सरकार को दिया है उससे महिलाओं को लाभ होगा। इसके अलावा बहुत से अछूते विषय जैसे डायन प्रथा, देवदासी प्रथा के जरिए महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं उस पर भी काम चल रहा है । इसके अलावा मानसिक विकलांग व शारीरिक रूप से चुनौतीग्रस्त महिलाओं व बुर्जुग महिलाओं आदि की समस्या भी हमारी प्राथमिकता में शामिल है। न्न
अक्सर राष्ट्रीय महिला आयोग पर दंतविहीन शेर होने का आरोप लगता रहा है पर इसके बावजूद अपने गठन से लेकर अब तक राष्ट्रीय महिला आयोग के पास ऐसे सैकड़ों उदाहरण है, जिनमें कई महिलाओं का जीवन बरबाद होने से बचाया गया है तो कभी किसी महिला को उसका अधिकार दिलाया जा सका है । आयोग की पूर्व अध्यक्षा मोहिनी गिरि ऐसा ही एक अनुभव को याद करते हुए बताती हैं, न्न 15 अगस्त का दिन था । पूरा हिन्दुस्तान अपनी आजादी की 50वीं वर्षगाठ मना रहा था हमारे पास एक महिला ने मथुरा से फोन किया कि कल आप लोग तो आजादी का जश्न मनाएंगे परन्तु इस औरत को फांसी हो रही है । इसे बचाइये । इसका दूध पीता बच्चा है । हम लोग फौरन राष्ट्रपति को लिखा । इलाहाबाद हाईकोट में अपील की । पूरी रात हम लोग बैठे रहे । आखिर उस महिला को उसी दिन बचाया जा सका । बाद में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी । न्न
अपेक्षाएं
अपने अनुभव के आधर पर मोहिनी गिरि कहती हैं, न्न आयोग को और अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए । अगर इसे सम्मन करने के अधिकार दिये गये हैं तो इसे जांच पड़ताल के अधिकार भी दिए जाने चाहिए । न्न उनके अनुसार, न्न इट शुड बी इंडीपेडेंट ऑटोनामस बॉडी एंड हाईऐस्ट ऑफ द आर्डर । न्न आयोग के सदस्यों में दो विपक्ष के सदस्य हों, दो सदस्य सत्ताधारी पार्टी के तथा दो प्रतिनिधि समाज के जाने-माने लोग में से हों, जो कि एक निकाय बनाकर एक ऐसे सदस्य का चुनाव करें जो आयोग अध्यक्षता कर सके । सामजिक कार्यकर्ता संजना कुमारी भी मानती हैं कि आयोग का स्टेटस बदला जाए और इसके बजट को दुगुना-तिगुना किया जाए ।
आज जरूरत है कि एक महिला को उपभोग की वस्तु समझने की बजाए उसे इंसान समझा जाए जो पुरुषों से किसी भी मामले में कमजोर नहीं है । अपने प्रति होने वाले किसी भी जुल्म के खिलाफ आज वो सीधे राष्ट्रीय महिला आयोग में ये शिकायत कर सकती हैं । ऐसे में सरकार से भी बहुत कुछ अपेक्षित है । डॉ. गिरिजा व्यास कहती हैं, न्नजब इस आयोग का गठन हुआ था, तब यह कल्पना भी नहीं की गई थी कि इसे गांव और ढांणी से लेकर अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी जाना जाएगा । आज के हालात में हमने कुछ रिव्यू सरकार के समक्ष पेश किए हैं । बुनियादी आवश्यकता यदि पूरी कर दी जाएं तो निश्चित तौर पर आयोग सरकार और महिलाओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करेगा । (पसूका)