Hindi article -Kashmir After abrogation of Article 370- Reposting-Font problem- Apologies

4 views
Skip to first unread message

Dr Ram Puniyani

unread,
Nov 7, 2019, 10:36:17 AM11/7/19
to Ram Puniyani

370 के बाद का कश्मीर झूठ और दुष्प्रचार की अति

-राम पुनियानी

कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद से तीन माह बीत चुके हैं। इस प्रक्रिया में स्थापित विधि को दरकिनार करलोकसभा में अपने बहुमत का लाभ उठाते हुए भाजपा सरकार द्वारा यह कदम उठाया गया। इस संबंध में कश्मीर के लोगों की राय जानने का तनिक भी प्रयास नहीं किया गया। इस मुद्दे पर कई तरह के झूठ फैलाए जा रहे हैं। सरदार पटेल को याद करते हुए 31 अक्टूबर को इनमें से दो झूठों का जमकर प्रचार किया गया।

नरेन्द्र मोदी ने इस अनुच्छेद को हटाए जाने के निर्णय को सरदार पटेल को श्रद्धांजलि बताया। यह दिलचस्प है कि सरदार पटेलसंविधान सभा की उस समिति के सदस्य थे जिसने इस अनुच्छेद को अंतिम रूप दिया था। सरदार पटेल ने ही संविधान सभा में इस अनुच्छेद को संविधान का भाग बनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था क्योंकि उस समय विदेश मंत्री का कार्यभार संभाल रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू अमरीका की यात्रा पर थे।

मोदी और उनके साथीभारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास का विरूपण तो कर ही रहे हैं वे हालिया इतिहास को भी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रधानमंत्री और भारत सरकार के शीर्ष पदाधिकारी यह दावा भी कर रहे हैं कि इसी अनुच्छेद के कारण कश्मीर में आतंकवाद अपनी जड़ें जमा सका है। उनका तर्क यह है कि इस अनुच्छेद को समाप्त कर देने से कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण किया जा सकेगा।

आम जनता की याददाश्त बहुत लंबी नहीं होती। इसलिए यह याद दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि नोटबंदी के समय भी यह दावा बड़े जोरशोर से किया गया था कि इस निर्णय से कश्मीर में अतिवाद का अंत हो जाएगा क्योंकि राज्य में आतंकवाद को नकली नोटों के सहारे प्रायोजित किया जा रहा है। अंततः नोटबंदी के संबंध में अन्य दावों की तरहयह दावा भी पूरी तरह से झूठा और खोखला साबित हुआ।

कश्मीर में आज जो स्थितियां हैंवे सबके सामने हैं। वहां सामान्य जनजीवन थम गया हैस्थानीय नेताओं को नजरबंद कर दिया गया है और राष्ट्रीय नेताओं को कश्मीर में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है। कुछ व्यवसायियों ने एनजीओ का बाना पहनकरयूरोप के दक्षिणपंथी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर की यात्रा करने के लिए भारत सरकार का निमंत्रण दिलवाया। उनमें से एकक्रिस डेवीसने जब कहा कि वे स्थानीय रहवासियों से अकेले में मिलना चाहेंगे तब उनका निमंत्रण वापस ले लिया गया। जो सांसद भारत सरकार की मंशा के अनुरूप अपने निष्कर्ष देने के लिए तैयार थे केवल उन्हें कश्मीर जाने की इजाजत दी गई। इन सांसदों से अपेक्षा यह थी कि वे मुफ्त की इस यात्रा का आनंद उठाएं और मोदी सरकार को आल इज वेल‘ का सार्टिफिकेट जारी कर दें।

इस बीचकश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी और इस दावे के बावजूद कि अनुच्छेद 370 को हटाने से राज्य में आतंकवाद का सफाया हो जाएगाघाटी में आतंकी गतिविधियां जारी रहीं। एक त्रासद घटना में पश्चिम बंगाल के पांच प्रवासी मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके पहलेफलों के व्यवसाय से जुड़े कई व्यक्तियों पर हमले किए गए। श्रीनगर के सब्जी बाजार में हुए ग्रेनेड हमले में एक व्यक्ति मारा गया और पन्द्रह घायल हुए।

एक ओर जहां कश्मीर के लोग अपने राज्य का दर्जा घटाकर केन्द्र शासित प्रदेश कर देने से स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे हैं वहीं ये दावे किए जा रहे हैं कि कश्मीर के मामले में जो कुछ किया गया हैउससे सरदार पटेल का स्वप्न साकार हुआ है।

इस दावे में कोई दम नहीं है कि भारत सरकार ने कश्मीर में आतंकवाद के एक बड़े कारण को समाप्त कर दिया है। यह दावा न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है वरन् उसका उद्देश्य केवल यह दर्शाना है कि राज्य में भाजपा की नीतियां अत्यंत प्रभावी और सफल सिद्ध हुई हैं।

कश्मीर में अतिवाद का इतिहासपाकिस्तान की सेना के समर्थन से सन् 1947 में वहां कबाईलियों के आक्रमण के साथ शुरू हुआ। कश्मीर के लोग साम्प्रदायिक तत्वों के द्विराष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक व्यवस्था के हामी थे और इसलिए उन्होंने भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान के हमले का मुकाबला करने में कश्मीर की मदद करे। इसके बाद कश्मीर के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर हुए और अनुच्छेद 370 को संविधान का हिस्सा बनाया गया। इन सभी मुद्दों पर विद्वान अध्येता विस्तार से प्रकाश डाल चुके हैं।

कश्मीर के भारत में विलय में शेख अब्दुल्ला ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव और श्यामाप्रसाद मुखर्जी और उनके जैसे अन्य नेताओं द्वारा कश्मीर को जबरन भारत का अंग बनाए जाने के मुद्दे पर जोर देने के कारणशेख अब्दुल्ला का भारत से मोहभंग हो गया। अंततः शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया और यहीं से कश्मीर के लोगों में भारत के प्रति अलगाव का भाव जन्मा। अलगाव के इस भाव  और पाकिस्तान के समर्थन और सहयोग से कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने लगा। अनुच्छेद 370, कश्मीर को काफी हद तक स्वायत्ता देता था और इसके चलते राज्य में आतंकवाद के पैर पसारने पर रोक लगी रही। अमरीका द्वारा रूसी सेना से लड़ने के लिए अल्कायदा को बढ़ावा देने से भी यह समस्या और बढ़ी। अल्कायदा और उसके क्लोनरूसी सेना को पराजित करने के बाद कश्मीर में घुसपैठ करने लगे और उन्होंने वहां के अतिवाद को साम्प्रदायिक रंग दे दिया। आजतीस साल बादइस घटनाक्रम को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है।

ज़रूरत तो इस बात की थी कि राज्य में प्रजातंत्र को और मजबूत किया जाता और असंतुष्ट तत्वों के साथ संवाद की राहें खोजी जातीं। निःसंदेह इस संदर्भ में अमरीका के समर्थन से पाकिस्तान द्वारा राज्य में की जा रही कुत्सित हरकतों का भी ख्याल रखा जाना जरूरी होता। किसी भी समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम उसकी जड़ को पहचानें। परंतु दुर्भाग्यवश साम्प्रदायिक तत्वों की हालिया इतिहास की गलत समझभारत सरकार की नीतियों की पथ प्रदर्शक बन गई है। कश्मीर में आतंकवाद और विकास के अभाव - दोनों के लिए अनुच्छेद 370 को दोषी बताया जा रहा है।

तथ्य यह है कि कश्मीर के मानव विकास सूचकांकराष्ट्रीय औसत और कई राज्यों से बहुत बेहतर हैं। यह तो समय ही बताएगा कि पाकिस्तानकश्मीर के मामले में क्या रूख अपनाता है और राज्य में सक्रिय अल्कायदा जैसे तत्वों पर किस तरह नियंत्रण किया जाता है। परंतु यह स्पष्ट है कि कश्मीर के लोगों के साथ संवाद के बगैर यह समस्या हल नहीं हो सकती। कश्मीर में शांति की पुनर्स्थापना और हिंसा का अंत करने का एक ही तरीका है - और वह है प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूती देना। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया )

Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages