POEM KAUNSA KHEL

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SUNIL PARIT

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Apr 24, 2016, 1:12:29 AM4/24/16
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आज की मेरी कविता


ये कौन सा खेल

धर्म के नाम पर आज
शिकार बनता जा रहा है।
मजहब के नाम पर आज
देखो खून बहा जा रहा है॥

मस्जिद में खुदा मिलता है
गर मंदिर में मिलता है राम।
चलिए मिलते हैं पंक्ति में
देखो कहना मेरा भी प्रणाम॥

धोखे में जी रहे हैं नादान
अंधेरे में मर रहे हैं अन्जान।
मत भागना पापियों के पीछे
किस ने भेजा है ऐसा पैगाम॥

खिलवाड है सब यारों उनका
गम नहीं कोई सियासत में।
दंगा फसाद खून खराबा सब
उन्हें मिला होगा विरासत में॥

कैसा खून दौडता होगा यारों
परिहास दिखता है शैतानियत।
परवाह नहीं ऊपरवाले की अब
ढोंग रचा है सब इंसानियत॥

बहुत हुआ बस करो ये अब
धर्म मजहब का खेल है सब।
अंत समय भी निश्चित है यारों
सोचो क्या हिसाब देना है तब॥

किसी की मन की इच्छा है
लगता नहीं ऐसा कोई दस्तूर है।
इंसान बन के जीना है बस
यही तो राम रहिम को मंजूर है॥

नीति है सबको मिटाकर
क्या धरातल बनाओगे शमशान।
सोच समझकर कदम उठाओ
आखिर कहाँ मिलेगा समाधान॥
डॉ. सुनील कुमार परीट, बेलगांव, कर्नाटक 08867417505

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