आज की मेरी कविता
आदि का अंत
सब हैरान हैं
दुनिया ही हैरान है
अब तो ऊपरवाला भी हैरान है
सोचता होगा क्या बनाया था
पछताता होगा क्या हो गया
इंसान क्या से क्या बन गया।
बद्दुआ भरी हुई जिन्दगी
स्वार्थ में लपेटे चादर में
माँ बहन बेटी पर बुरी नजर
कुदरत पर कुल्हाडी प्रहार
धरती छोड उस ग्रह पर प्रयाण
चाँद सूरज से खेलना मजाक
आखिर क्या बाकी रखा है अभी
मान सम्मान के लिए कुछ भी
जमीर बेचता है हर कोई।
क्या सोचता है निरुत्तर
पाप का घडा कभी भरता ही नहीं
आदि का अंत भी निश्चित है
गर अब भी लगता है बख्श दे
किस किस को बख्श दे
सीमा एक निर्धारित है
कहते हैं देर है पर अंधेर नहीं
तो क्यों ना इसको भी आजमा लें
उसके शरण में जाकर विनती कर ले।
मत कहो जो होगा देखा जायेगा
देखने को हम न हो
कौन जाने कैसा दंड निश्चित है
कौन नहीं चाहता बचना...?
गर बचना ही चाहते है हम
खोजना ही है ऊपरवाले को
बगैर उसके कोई नहीं दाता
गर है तो हमे भी बताओ यारों
आखिर हम भी बचना ही चाहते हैं यारों॥
डॉ. सुनील कुमार परीट, बेलगांव, कर्नाटक 08867417505