मातृभाषा में शिक्षा

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Shreenivas Naik

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Oct 5, 2017, 1:43:29 AM10/5/17
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मातृभाषा में शिक्षा

लेखक - प्रभाकर चौबे ।

प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। दुनिया के और देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है, मातृभाषा के संरक्षण, उसकी समृध्दि के लिए कहां क्या हो रहा है, यह तो दुनिया भर में घूमने वाले बेहतर बता सकते हैं। हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिया जाए, इसकी पूरजोर कोशिश की जा रही है। सरकारों से लेकर (हर पार्टी की सरकार) कार्पोरेट और कार्पोरेट-हित-साधक अखबार, उसके प्रवक्ता बनकर लिखने वाले सब इस जुगत में हैं कि मातृभाषा शब्द ही मानस से, बुध्दि से बाहर हो जाए। पूछेंगे तो रटा रटाया और हर काम की तरह यहां भी भ्रम में डालने वाला उत्तर मिल जाएगा कि मातृभाषा के विकास में हमारी सरकार भरपूर मदद कर रही है। लेकिन एकदम उल्टा हो रहा है। हम इस झूठ, फरेब पाखंडकाल में अपनी ही वस्तुएं नष्ट होते देख रहे हैं। सरकार की कथनी और करनी में इतनी चौड़ी खाई इससे पहले कभी नहीं रही।

शिक्षा में इस बात को लेकर बहस होती है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए। तमाम बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्वानों की गुहार को दरकिनार कर सरकारों ने कक्षा एक से अंग्रेजी पढ़ाना शुरु कर दिया। यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालकों में विषय को ग्रहण करने की क्षमता समान नहीं होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर और कठिनाई होती है। जिनका पूरा परिवेश ही अंग्रेजी भाषामय हो, ऐसे परिवार देश में कम ही है। मातृभाषा के माध्यम से जब पढाया जाता है तो बालकों के चेहरे उत्फुल्लित दिखाई देते हैं। एक तो अंग्रेजी सीखनी पड़ती है-वह पड़ी हुई नहीं मिल जाती। लेकिन सरकारों ने ठान लिया है कि बच्चों को अंग्रेजी के माध्यम से ही पढ़ाना है। भाषा सीखना अच्छी बात है और गुणकारी भी है। भाषा हमें एक नये संसार में प्रवेश कराती है। लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से उसे हटाकर जिस तरह के भाषा-संस्कार डाले जा रहे हैं, वह खतरनाक है। बालक न अंग्रेजी जान पा रहा है न मातृभाषा। एक खिचड़ी भाषा वह भी अधजली का संस्कार मिल रहा है।

प्राय: हर पालक की शिकायत है कि उसका बच्चा छत्तीस नहीं समझता थर्टीसिक्स बोलो तब समझता है। उनयासी कहो तो पूछता है- यह क्या होता है। सेवन्टी नाइन कहो तब कहेगा तो ऐसा बोलो न। किसी भाषा का कोई शब्द जो पूरा अर्थ दे, अपनी भाषा में लेना गलत नहीं है। दुनिया की हरभाषा इसी तरह ग्रहण कर समृध्द होती चली है। हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित लोकभाषाओं के ढेरों शब्द हैं। अपनी इस लम्बी यात्रा में हिन्दी ने बाहर से खूब ग्रहण किया है। अंग्रेजी के भी ढेरों शब्द हैं। मोटर, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। काफी समय हो गया। पिछली पीढ़ी पढ़ने के लिए अपना गांव छोड़ शहर में आई तो बाल बनवाने के लिए उसका परिचय हेयर कटिंग सेलून से हुआ और वह बाल बनवाने नहीं, कटिंग करवाने जाता। इन सबसे हिन्दी समृध्द हुई है। आज मोबाइल के साथ 'मिस कॉल' आया और गांव-गांव में रच बस गया। एक ठन मिस काल मार देबे- आम अभिव्यक्ति है। ई-मेल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी में चल निकले। इनका हिन्दी में अनुवाद करना हास्यास्प्रद होना है। यह भी विचार करना चाहिए कि किसी और भाषा से शब्द लेना एक बात है, लेकिन खिचड़ी वाक्य बनाना निरी मूर्खता है। दिक्कत यह है कि हमारे हिन्दी के कुछ समाचार पत्र ऐसी भाषा लिखने लगे हैं जो हास्य एपिसोड में तो काम आ सकती है, भाषा की गम्भीरता का मजाक बनाती है। ऐसे अखबारों ने कार्पोरेट होने का भ्रम पाल रखा है।

आज ऐसे लोग पूरा भाषा-संस्कार भ्रष्ट कर रहे हैं। शब्द लेना ठीक, लेकिन हमारी भाषा के सर्वनाम, संज्ञा, क्रिया और तो और पूरा वाक्य विन्यास का सत्यानाश करने में तुल गए हैं। स्टुडेंट्स ने फेस्टीवल इन्जाय किया यह कैसी भाषा है। लिखित और बोलने के वाक्य में फर्क होता है। दरअसल न तो इन्हें मातृभाषा आती न अंग्रेजी। बहुत पहले जब अंग्रेज आए तो उनके नौकर जो भाषा बोलते उसे बटलर भाषा कहा जाता। अगर समाज में कोई ऐसी भाषा बोलता तो उसका मजाक उड़ाया जाता कि क्या बटलर भाषा बोल रहे हो। अगर हम हिन्दी की ही बात करें तो कार्पोरेट उसके व्यावसायिक उपयोगिता समझता है। हिन्दी बाजार की, धंधे की विज्ञापन की भाषा के रूप में कार्पोरेट को स्वीकार है। केन्द्र सरकार ने अपने कार्यालयों में हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने का उपक्रम किया है। हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। लेकिन कार्पोरेट में हिन्दी का कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है। हिन्दी उनके उत्पाद के व्यापार के लिए स्वीकार्य है। अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में जिस तरह अंग्रेजी की शिक्षा दी जा रही है वह केवल सेल्समैन पैदा करने के काम आ रही है। पुराने मेट्रिक पास अच्छी अंग्रेजी लिखा करते थे। ऊंची से ऊंची नौकरी पाने के लिए, ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना, अंग्रेजी में निष्णात होना बहुत अच्छी बात है, जरूरी भी है। लेकिन मातृभाषा की कीमत पर अंग्रेजी नहीं सीखी जा सकती ऐसा करने पर आधा तीतर आधा बटेर की स्थिति होगी।

अंग्रेजी माध्यम के कुछ विद्यालयों में विद्यालय परिसर में हिन्दी या मातृभाषा में बात करते पाए जाने पर दंडित किया जाता है। कुछ विद्यालय तो एकदम आगे हैं, वे माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता को बच्चों के प्रवेश का आधार बनाते हैं। बहरहाल एक बड़ा वर्ग मातृभाषा की उपयोगिता समझता है। जालंधर की एक खबर छपी है। वहां तमाम सरकारी स्कूलों और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने सामूहिक रूप से 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाया। बच्चों ने, विद्यालय समितियों ने एक स्वर से पंजाबी बोलने पर जोर दिया। इनमें कुछ-कुछ ऐसे विद्यालय भी शामिल हुए जिनके विद्यालयों में पंजाबी बोलना प्रतिबंधित था। आज सबने मातृभाषा का महत्व समझा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर और किसी राज्य में कोई कार्यक्रम हुआ ऐसा पढ़ने में नहीं आया। दरअसल शिक्षा का अधिकार का सवाल मातृभाषा में शिक्षा के साथ जुड़ा है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार है, उस पर दूसरी भाषा लाद देना उसके स्वाभाविक विकास में बाधा डालना भी है।

Shreenivas Naik

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Oct 5, 2017, 1:44:11 AM10/5/17
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मातृभाषा में शिक्षा का महत्व

लेखक: जगमोहन सिंह राजपूत ।

एक प्रबंधन संस्थान में एक युवा प्रशिक्षणार्थी आत्महत्या कर लेता है। वह इसका कारण लिख कर छोड़ जाता है कि कमजोर अंग्रेजी के कारण उसे हास्यास्पद स्थितियों से गुजरना पड़ रहा था, जो असहनीय हो गया था। ऐसी ही एक अन्य घटना में विद्यार्थी इसी कारण से तीन महीने तक विद्यालय नहीं जाता है। घर पर सब अनभिज्ञ हैं और जानकारी तब होती है जब वह गायब हो जाता है। ऐसी खबरें अगले दिन सामान्यत: भुला दी जाती हैं। इस प्रकार का चिंतन-विश्लेषण कहीं पर भी सुनाई नहीं पड़ता है कि आज भी अंग्रेजी भाषा का दबाव किस कदर भारत की नई पीढ़ी को प्रताडि़त कर रहा है। सच तो यह है कि आजादी के बाद मातृभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था अब वह सपना दस्तावेजों, कार्यक्रमों तथा संस्थाओं में दबकर रह गया है। कुछ दु:खांत घटनाएं संचार माध्यमों में जगह पा जाती हैं। समस्या का स्वरूप अनेक प्रकार से चिंताग्रस्त करने वाला है।

देश में लाखों ऐसे स्कूल हैं जहां केवल एक मानदेय प्राप्त अध्यापक कक्षा एक से पांच तक के सारे विषय पढ़ाता है। क्या ये बच्चे कभी उनके साथ प्रतिस्पर्धा में बराबरी से खड़े हो पाएंगे जो देश के प्रतिष्ठित स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं? आज उपलब्धियों के बड़े आंकड़े सामने आते हैं कि 21 करोड़ बच्चे स्कूल जा रहे हैं, 15 करोड़ मध्याह्न भोजन व्यवस्था से लाभान्वित हो रहे हैं, स्कूलों की उपलब्धता लगभग 98 प्रतिशत के लिए एक किलोमीटर के दायरे में उपलब्ध है आदि। यही नहीं, अधिकांश राज्य सरकारें अंग्रेजी पढ़ाने की व्यवस्था कक्षा एक या दो से कर चुकी हैं और इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में गिनाती भी हैं। आज अगर भारत के युवाओं से पूछें तो वे भी यही कहेंगे- अगर उनकी अंग्रेजी अच्छी होती या फिर वे किसी कान्वेंट या पब्लिक स्कूल में पढ़े होते तो जीवन सफल हो जाता। आजादी के बाद के पहले दो दशकों में पूरी आशा थी कि अंग्रेजी का वर्चस्व कम होगा। हिंदी के विरोध के कारण सरकारें सशंकित हुई जिसका खामियाजा दूसरी भारतीय भाषाओं को भुगतना पड़ रहा है। तीन-चार दशक तो इसी में बीते कि अंग्रेजी ेमें प्रति वर्ष करोड़ों बच्चे हाईस्कूल परीक्षा में फेल होते रहे।

प्रतिवर्ष जब शिक्षा का नया सत्र प्रारंभ होता है तब दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में प्लेस्कूल, नर्सरी तथा केजी में प्रवेश को लेकर राष्ट्रव्यापी चर्चा होती है, लेकिन दिल्ली के भवनविहीन, शौचालय विहीन, पानी-बिजली विहीन स्कूलों पर कभी चर्चा नहीं होती। प्रवेश के समय जिन पब्लिक स्कूलों की चर्चा उस समय सुर्खियों में रहती है उसका सबसे महत्वपूर्ण कारक एक ही होता है-वहां अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दी जाती है। और जहां अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाएगी, श्रेष्ठता तो वहींनिवास करेगी। अंग्रेज, अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत के समक्ष अपने को नीचा देखने की हमारी प्रवृत्तिसदियों पुरानी है, लेकिन व्यवस्था ने अभी भी उसे बनाए रखा है। बीसवींशताब्दी के उत्तारार्ध में अनेक देश स्वतंत्र हुए थे तथा इनमें से अनेक ने अभूतपूर्व प्रगति की है। उसके पहले के सोवियत संघ, चीन और जापान के उदाहरण हैं। जिस भी देश ने अपनी भाषा को महत्व दिया वह अंग्रेजी के कारण पीछे नहीं रहा। रूस ने जब अपना पहला अंतरिक्ष यान स्पुतनिक अंतरिक्ष में भेजा था तब अमेरिका में तहलका मच गया था। उस समय रूस में विज्ञान और तकनीक के जर्नल केवल रूसी भाषा में प्रकाशित होते थे। पश्चिमी देशों को स्वयं उनके अनुवाद तथा प्रकाशन का उत्तारदायित्व लेना पड़ा। चीन की वैज्ञानिक प्रगति अंग्रेजी भाषा पर निर्भर नहीं रही।

आज अक्सर यह उदाहरण दिया जाता है कि चीन में हर जगह लोग अंग्रेजी बोलना सीख रहे हैं और इसके लिए विशेष रूप से बजट आवंटित किया गया है, लेकिन यहां पर यह उल्लेख नहीं किया जाता है कि चीन ने समान स्कूल व्यवस्था भी लागू कर ली है। वहां कुछ विशिष्ट स्कूलों में प्रवेश के लिए उठा-पटक नहीं करनी पड़ती। चीन ने यह शैक्षिक अवधारणा भी पूरी तरह मान ली है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए और ऐसा न करना बच्चों के साथ मानसिक क्रूरता है। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चे अन्य भाषा आनंदपूर्वक सीखें तो यह संर्वथा न्यायसंगत तथा उचित होगा। साठ साल से अधिक के अनुभव के बाद भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां बनी हुई हैं, जिनका निराकरण केवल दृढ़ इच्छाशक्ति से ही संभव है। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक श्यामाचरण दुबे ने कहा था कि शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा की धरोहर को एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचाना है। इस प्रक्रिया में परंपरा का सृजनात्मक मूल्यांकन भी शामिल होता है, लेकिन क्या हमारी शिक्षा संस्थाएं भारतीय परंपरा की तलाश कर रही हैं? क्या वे भारतीय परंपरा की पोषक हैं? वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज पीढ़ी और परंपरा में अलगाव पैदा कर रही है। जनसाधारण से उसकी दूरी बढ़ती जा रही है।

आधुनिकीकरण की भ्रमपूर्ण व्याख्याओं के कारण हमारी नई पीढ़ी में धुरीहीनता आ रही है। वह न तो परंपरा से पोषण पा रही है और न ही उसमें पश्चिम की सांस्कृतिक विशेषताएं नजर आ रही हैं। मातृभाषा में शिक्षण के साथ अनेक अन्य आवश्यकताएं भी हैं जो हर भारतीय को भारत से जोड़ने और विश्व को समझने में सक्षम होने के लिए आवश्यक हैं। मातृभाषा का इसमें अप्रतिम महत्व है, इससे इनकार बेमानी होगा। ऐसे में शिक्षा में राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर बदलाव करने के स्थान पर शैक्षणिक दृष्टिकोण से आवश्यक बदलाव लाना आज की परिस्थिति में सबसे सराहनीय कदम होगा। भविष्य को ऐसे ही प्रभावशाली प्रयासों की आवश्यकता है।

Shreenivas Naik

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Oct 5, 2017, 1:45:53 AM10/5/17
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शिक्षा का माध्यम : अंग्रेजी या मातृभाषा ------------विश्वमोहन तिवारी .

हमें यह मैकाले की नहीं, विश्वगुरु की शिक्षा चाहिए!.आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

जब विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पश्चिम से आई हैं, और हमारी भाषाओं ने विप्रौद्योगिकी के विकास में कार्य नहीं किया तब हम अपनी भाषा में विज्ञान कैसे सीख सकते हैंॐ उसे तो अंग्रेजी के द्वारा ही सीखना पड़ेगा।इस पर थोड़ा गहराई से विचार करें।

शिक्षा के माध्यम के विषय में आम आदमी की क्या सोच है ? आम आदमी कहता है कि शिक्षा का माध्यम वह हो जिसमें अच्छी शिक्षा मिले, जो जीवन में काम आएऌ और हम देख ही रहे हैं कि अंग्रेजी माध्यम वाले कॉन्वैन्ट और पब्लिक स्कूलों में ही अच्छी पढ़ाई हो रही है।बिना अंग्रेजी के कोई भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती। इसलिये एक तरफ, हम तो मजबूर हैं।फिर दूसरी तरफ, अंग्रेजी तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, कम्प्यूटर की भाषा है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की तो हिन्दी में पुस्तकें ही नहीं हैं।और ऐसे में कुछ सिरफिरे आदर्शवादी लोग ही हैं जो जीवन मूल्यों की दुहाई देते हुए मातृभाषा को अपनाने की बात करते हैं ॐ वह आगे कहता है कि आखिर हमें स्वयं को जीवन मूल्य सिखाना ही पड़ते हैं, चाहे जिस भाषा में सीख लें।आखिर भाषा विचारों के आदान प्रदान का माध्यम ही तो है ! पाश्चात्य सभ्यता आज विकास के चरम शिखर पर है, क्यों न हम उनकी भाषा से उनके सफलता की कुंजी वाले जीवन मूल्य ले लें!!

प््रामुख बात तो यह कि जनतंत्र में जनता की यह मजबूरी कैसी ॐ क्या जनतंत्र काम नहीं कर रहा है ? जब एक विदेशी भाषा में राजकाज हो तब जनता का राज्य तो हो ही नहीं सकताÊ क्योंकि उसे तो पता ही नहीं कि संसद में या सरकारी दफ्तरों में क्या हो रहा है।अतः भाषा संबन्धी सरकारी नीति को, सरकारी स्कूलों को सुधारना अत्यावश्यक है, अपने अधिकारों के लिये आन्दोलन की आवश्यकता है।आन्दोलन करने के लिये भ्रमों का निवारण भी जरूरी है, और अंग्रेजी माध्यम से होने वाले खतरे से सावधान करना भी। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है, दूसरा, उसे उत्तम नागरिक़ तथा तीसरे, परिवार का पालन पोषण करने योग्य और साथ ही सुख की प्राप्ति कराना। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ , धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं।क्या प्रचलित शिक्षा के उद्देश्य यह हैं? एक तरफ व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रह गया है , और दूसरी तरफ शिक्षा जैसे पुण्य कार्य का घोर व्यवसायी करण या बाजारीकरण हो रहा है।

अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा से हमें पाश्चात्य जीवन मूल्य और भोगवादी सभ्यता ही मिलेगी क्योंकि भाषा अपने साथ अपनी संस्कृति लाती है।और हमारा दुर्भाग्य कि अंग्रेजी भक्त यही चाहते हैं।भोगवादियों की सफलता आप उनके भोग के संसाधनों से ही तो नाप रहे हैं सुख से तो नहीं! भोगवादी सभ्यता में परिवार तथा समाज विखंडित हो रहा हैऌ नारी स्वयं बाजारू हो रही है। दूरदर्शन इत्यादि माध्यम इस भोगवाद की अग्नि को भड़का रहे हैं।पाश्चात्य संस्कृति की गुलामी सुख नहीं, सुख का भ्रम देती है।भारतीय संस्कृति सच्चा सुख दे सकती है क्योंकि उसमें त्याग­पूर्वक भोग का मंत्र है जो हम खो रहे हैं क्योंकि अपनी संस्कृति की वाहन अपनी मातृभाषा को भूल रहे हैं। नैतिक मूल्य संस्कृति से आते हैं, इसलिये हम भारतीय जीवन मूल्यों को भूल रहे हैं, और घोर अमानवीयता भुगत रहे हैं। ‘स्टॉक होम सिन्ड्रोम’ के अनुसार गुलामियत की पराकाष्ठा वह है जब गुलाम स्वयं कहने लगे कि वह गुलाम नहीं है, जो कुछ भी वह है अपनी स्वेच्छा से है। ब्राउन साहब कहते हैं कि अंग्रेजी के बिना तो हम अंधकार युग में रहते।हमें अंग्रेजी चाहिये।यह तो ठीक है कि यदि अंग्रेजी ने फारसी को न हटाया होता तब हम भी अन्य मुस्लिम देशों की तरह आधुनिकता से वंचित रहतेÊ और साथ ही मानसिक तथा भौतिक रूप से उनसे अधिक दरिद्र रहतेÊ क्योंकि हमारे पास तो आवश्यक मात्रा में तेल भी नहीं है।अतएव 1947 तक तो अंग्रेजी ठीक ही थीÊ किन्तु उसके बाद हमें भारतीय भाषाओं को ही अपनाना था क्योंकि हमारी समृद्ध भाषाओं में विज्ञान­ संप्रेषण करने की भी आवश्यक शक्ति है।पहले तो कॉन्वैन्टी स्कूलों में ही भारतीय भाषाओं काÊ प्रच्छन्न रूप से तिरस्कार होता ही था, अब तो पब्लिक स्कूलों में भी मातृभाषाओं का तिरस्कार डंके की चोट पर होता है, भारतीय संस्कृति का तिरस्कार होता है।यह कैसा भारतवर्ष हैॐॐ

वैश्वीकरण के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ा है और प्रवासियों का बड़ी संख्या में विदेशों में निवास भी। इस के शिक्षा पर हो रहे परिणामों पर जो शोध कैनैडा में हुए हैं वे उपयोगी हैं, यद्यपि उनकी समस्या हमारी समस्या से उलट है।टौरॉन्टो शहर के किन्डरगार्टन में पढ़ रहे विद्याार्थियों में 58 त् बच्चे ऐसे देशों से आए हैं जहां की आम भाषा अंग्रेजी नहीं है।वहां .अर्थात कैनैडा के फाशिस्ट लोग प्रवासियों को देश से ही निकालना चाहते हैं।और कुछ उन्हें मुख्यधारा में समाहित करने के लिये प्रवासी विद्याथियों को मात्र अंग्रेजी में ही शिक्षा देते हैं।

इस समस्या पर डा . कमिन्सÊ बेकर तथा स्कुटनाबकंगस ने अनुसंधान कियाऌ उन्होने जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे महत्वपूर्ण हैं :

1 . अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों के तहत बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा न देना मानवाधिकारों का हनन है।

2 . द्विभाषी बच्चों की मातृभाषा उनके समग्र विकास तथा शैक्षिक विकास के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है।

3 . जब बच्चे दोनों भाषाओं में विकास करते रहते हैं, उन्हें भाषाओं तथा उनके उपयोग की गहरी समझ हो जाती है।

4 . द्विभाषी बच्चों की विचार पद्धति अधिक नमनीय हो सकती है, तथा उनके भाषाओं के उपयोग की समझ गहरी हो जाती है।

5 . जो बच्चे अपनी मातृभाषा में ठोस आधार लेकर आते हैं, वे शाला की भाषा में बेहतर योग्यता प्राप्त करते हैं।बच्चों के माता पिता, दादा दादी, नाना नानी आदि बच्चों से संवाद करते हैं, कहानियां सुनाते हैं, तब बच्चे अधिक सफलतापूर्वक अन्य भाषा तथा शिक्षा ग्रहण करते हैं।क्योंकि जो भी बच्चों ने घर में सीखा है वह ज्ञान, वे अवधारणाएं तथा कौशल अन्य भाषा में सरलतापूर्वक आ जाते हैंैं। यदि बच्चों ने घर में घड़ी देखना सीख लिया है तब उन्होने समय बतलाना और समझना भी सीख लिया है, अतएव उसे अन्य भाषा में वह अवधारणा सीखने में बहुत कम समय लगेगा।इसी तरह बच्चे जो भीे शाला की भाषा में सीखते हैं वह मातृभाषा मैं तैर जाता है, बशत्र्ते कि मातृभाषा का तिरस्कार न किया गया हो।अर्थात मातृभाषा के उपयोग को शाला में रोकना बच्चे के विकास में सहायक नहीं होता, वरन अवरुद्ध करता है।जब शाला में उन्हें मातृभाषा में भी प्रभावी शिक्षा दी जाती है तब द्विभाषी बच्चे शाला में बेहतर शिक्षा प्राप्त करते हैं इसके विलोम स्वरूप, जब शाला में बच्चों की मातृभाषा का तिरस्कार होता है तब उनका विकास अवरुद्ध होता है, और उनकी व्यक्तिगत शिक्षा की तथा शिक्षण हेतु अत्यावश्यक अवधारणाओं की आधारशिला कमजोर होती है।

6 . शाला में किसी भी बच्चे की मातृभाषा को ठुकराना, उस बच्चे को ठुकराना है ॐ जब बच्चे को यह संदेश दिया जाता है कि वह अपनी भाषा और उसके साथ अपनी संस्कृति शाला के बाहर छोड़कर आए तब वे अपनी अस्मिता का अपने संस्कारों का कुछ हिस्सा भी बाहर छोड़ आते हैं।यह भी पर्याप्त नहीं है कि शिक्षक बच्चे की भाषा को निष्क्रिय रूप से स्वीकारें, वरन उन्हें विभिन्न विधियों द्वारा उनकी भाषा की पुष्टि ही करना चाहिये, तथा सामान्य तौर पर ऐसा शैक्षिक वातावरण तैय्यार करना चाहिये कि पूर्ण बालक का भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव स्वीकार्य है।शाला के अधिकारियों तथा शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि घर में प्राप्त बच्चे के भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव वे महत्वपूर्ण आधार हैं जिन पर भविष्य की शिक्षा के स्तम्भ का निर्माण होना है।

इसमें संदेह नहीं कि शिक्षा का पूरा लाभ लेने के लिये मातृभाषा में शिक्षा का दिया जाना तथा मातृभाषा का सम्मान करना नितांत आवश्यक है।विदेश में हमारी भाषा का सम्मान हो रहा है और हम इतने गुलाम कि अपने देश में अपनी मातृभषा का तिरस्कार कर रहे हैं, और बच्चों का और देश का भविष्य खराब कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि हमें विदेशी भाषाएं नहीं सीखना चाहिये, अवश्य सीखना चाहिये। हम अंग्रेजी को एक समुÙत उपयोगी विदेशी भाषा की तरह सीखें।भारत में जो शिक्षा प्राथमिक स्तर से, और महानगरों में तो नर्सरी से, अंग्रेजी माध्यम में दी जा रही है वह भारत के लिये धीमे जहर के समान है। नर्सरी या पहली कक्षा से ही अंग्रेजी शुरु करने पर अंग्रेजी सीखने में न केवल अधिक कठिनाई होगीÊ वरन उस भाषा का सीखना रटंत विद्या के समान होगा और वह ज्ञान उसके हृदय में प्रवेश नहीं कर सकेगा।असली भाषा अर्थात हृदय तक पहुँचने वाली भाषा जीवन जीने वाली भाषा से आती हैÊ जो उसकी मातृभाषा है या उसके क्षेत्र की भाषा है। क्योंकि बच्चा मातृभाषा में सीखे ज्ञान तथा कौशल को अन्य भाषा में सरलता से ढाल लेता है, अतएव अंग्रेजी की शिक्षा को मातृभाषा की शिक्षा से चार कदम पीछे रहना चाहिये। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिये। अंग्रेजी भाषा का शिक्षण माध्यमिक स्तर से प्रारंभ करना चाहिये। कुछ विद्यार्थियों को शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में दी जा सकती है जोकि बारहवीं कक्षा के बाद ही प्रारंभ करना चाहिये ताकि मातृभाषा की पर्याप्त निर्मिति तथा संस्कृति मस्तिष्क तथा हृदय में समुचित रूप से बैठ जाए।

भविष्य उसी का है जो विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त रहेगा, शेष देश मात्र खुले बाजार होंगे ! विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त होने के लिये उत्कृष्ट अनुसंधान तथा शोध आवश्यक हैं, जिसके लिये विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के ज्ञान पर अधिकार, तथा कल्पनाशीलता तथा सृजनशीलता आवश्यक हैं। कल्पना तथा सृजन हृदय के वे संवेदनशील तथा अंतर्प्रज्ञा ह्यएम्ेतेिनल् ान्द न्तिुतेिन्हृ गुण हैं जो बचपन के अनुभवों से मातृभाषा के साथ तथा गहरे ज्ञान अर्थात मात्र याद किया हुआ नहीं वरन आत्मसात किये ज्ञान के साथ आते हैं, और जिस भाषा में जीवन जिया जाता ह,ै उसी भाषा में वे प्रस्फुटित होते हैंऌ अतएव उसी भाषा में आविष्कार आदि हो सकते हैं। इसलिये नौकरी के लिये अंग्रेजी में विज्ञान पढ़ने वाले से विशेष आविष्कारों तथा खोजों की आशा नहीं की जा सकती, आखिर इज़राएल जो कि हमारे देश का दसवां हिस्सा भी नहीं है, विज्ञान में हमसे दस गुने नोबेल पुरस्कार ले जाता है।वह भी तब कि जब यहूदी भाषा 1948 के पहले किसी भी देश की भाषा नहीं थी !

यदि हम चाहते हैं कि इस देश का और हमारे बच्चों का इस देश में, तथा में विश्व में सम्मान बढ़े तब हमें, अपने बच्चों को विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ही देना है।यह भी एक भ्रम है कि भारतीय भाषाओं में विज्ञान की शिक्षा नहीं दी जा सकती।इस समय हिन्दी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के 5 लाख से अधिक शब्द बन चुके हैं, और बनते जा रहे हैं।संस्कृत जैसी विश्व में समृद्धतम भाषा की पुत्रियों को और तमिल को भी वैज्ञानिक शब्दाावली की कोई कठिनाई नहीं हो सकती।बस राजनैतिक तथा ‘ब्यूरोक्रैटिक’ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। अब हिन्दी में केन्द्रीय सेवाओं आदि की परीक्षाएं दी जा सकती हैं।यह भी एक भम है कि अंग्रेजी गई तो देश विखंडित हो जाएगा।भारतीय संस्कृति इस देश को एकता प्रदान करती है, सभी भारतीय भाषाओं में वही संस्कृति है।एक भारतीय भाषा के जानने वाले को अन्य भारतीय भाषा सीखने में विदेशी भाषाओं को सीखने की अपेक्षा कहीं अधिक सरलता होगी।भाषाओं के सीखने के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। प्रत्येक व्यक्ति की योग्यताएं भिन्न क्षेत्रों में भिन्न होती हैंÊ कोई गणित सरलता पूर्वक सीख लेता है तो कोई भाषाÊ और कोई विज्ञानÊ तो कोई कलाÊ बस मातृभाषा का ज्ञान ही आवश्यक होता है।अंग्रेजी को अेिनवार्य­ सा बना देने से वह बालक जो विदेशी भाषा सीखने में निपुण नहीं है किन्तु गणित या विज्ञान या कला या अर्थशास्त्र या इतिहास आदि सीखने में निपुण हो सकता हैÊ उसकी शिक्षा अंग्रेजी में कमजोर होने से अधूरी सी रह जाएगी !

वैसे भी यदि बच्चे में कल्पना शीलता तथा सृजन शक्ति है तब वह न केवल अच्छी अंग्रेजी सीख लेगा वरन जीवन में अवश्य कुछ ऐसा भी करेगा जिससे हमें गर्व महसूस होगाÊ और हमारे साथ हमारा समाज भी सुखी होगा! इस कथन की पुष्टि का सबसे अच्छा उदाहरण तो सुभाष चंद्र बोस का है।उनके पिता ने उन्हें अंग्रेजी माध्यम की शाला में भरती करवाया था।कुछ ही दिनों में सुभाष ने स्वयं ही अपना प्रवेश बांग्ला भाषा के माध्यम वाली शाला में करवा लिया। यह बांग्ला भाषा में शिक्षित सुभाष न केवल आई सी एस की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वरन एक अनोखा क्रान्तिकारी भी बना। और मानव तभी श्रेष्ठ बन सकता है जब वह अपनी संस्कृति तथा भाषा में जीवन जीता है। मातृभाषा तथा भारतीय संस्कृति ही हमें सुखी मानव बना सकती है।

On Oct 5, 2017 11:13 AM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnai...@gmail.com> wrote:

shreekrishna teeka

unread,
Oct 5, 2017, 3:31:15 AM10/5/17
to hind...@googlegroups.com
Super sir good information. 

अच्छी जानकारी दी सर। 

On 05-Oct-2017 11:15 AM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnai...@gmail.com> wrote:
शिक्षा का माध्यम : अंग्रेजी या मातृभाषा ------------विश्वमोहन तिवारी .

हमें यह मैकाले की नहीं, विश्वगुरु की शिक्षा चाहिए!.आओ मिलकर इसे बनायें- तिलक

जब विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पश्चिम से आई हैं, और हमारी भाषाओं ने विप्रौद्योगिकी के विकास में कार्य नहीं किया तब हम अपनी भाषा में विज्ञान कैसे सीख सकते हैंॐ उसे तो अंग्रेजी के द्वारा ही सीखना पड़ेगा।इस पर थोड़ा गहराई से विचार करें।

शिक्षा के माध्यम के विषय में आम आदमी की क्या सोच है ? आम आदमी कहता है कि शिक्षा का माध्यम वह हो जिसमें अच्छी शिक्षा मिले, जो जीवन में काम आएऌ और हम देख ही रहे हैं कि अंग्रेजी माध्यम वाले कॉन्वैन्ट और पब्लिक स्कूलों में ही अच्छी पढ़ाई हो रही है।बिना अंग्रेजी के कोई भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती। इसलिये एक तरफ, हम तो मजबूर हैं।फिर दूसरी तरफ, अंग्रेजी तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, कम्प्यूटर की भाषा है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की तो हिन्दी में पुस्तकें ही नहीं हैं।और ऐसे में कुछ सिरफिरे आदर्शवादी लोग ही हैं जो जीवन मूल्यों की दुहाई देते हुए मातृभाषा को अपनाने की बात करते हैं ॐ वह आगे कहता है कि आखिर हमें स्वयं को जीवन मूल्य सिखाना ही पड़ते हैं, चाहे जिस भाषा में सीख लें।आखिर भाषा विचारों के आदान प्रदान का माध्यम ही तो है ! पाश्चात्य सभ्यता आज विकास के चरम शिखर पर है, क्यों न हम उनकी भाषा से उनके सफलता की कुंजी वाले जीवन मूल्य ले लें!!

प््रामुख बात तो यह कि जनतंत्र में जनता की यह मजबूरी कैसी ॐ क्या जनतंत्र काम नहीं कर रहा है ? जब एक विदेशी भाषा में राजकाज हो तब जनता का राज्य तो हो ही नहीं सकताÊ क्योंकि उसे तो पता ही नहीं कि संसद में या सरकारी दफ्तरों में क्या हो रहा है।अतः भाषा संबन्धी सरकारी नीति को, सरकारी स्कूलों को सुधारना अत्यावश्यक है, अपने अधिकारों के लिये आन्दोलन की आवश्यकता है।आन्दोलन करने के लिये भ्रमों का निवारण भी जरूरी है, और अंग्रेजी माध्यम से होने वाले खतरे से सावधान करना भी। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है, दूसरा, उसे उत्तम नागरिक़ तथा तीसरे, परिवार का पालन पोषण करने योग्य और साथ ही सुख की प्राप्ति कराना। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ , धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं।क्या प्रचलित शिक्षा के उद्देश्य यह हैं? एक तरफ व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रह गया है , और दूसरी तरफ शिक्षा जैसे पुण्य कार्य का घोर व्यवसायी करण या बाजारीकरण हो रहा है।

अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा से हमें पाश्चात्य जीवन मूल्य और भोगवादी सभ्यता ही मिलेगी क्योंकि भाषा अपने साथ अपनी संस्कृति लाती है।और हमारा दुर्भाग्य कि अंग्रेजी भक्त यही चाहते हैं।भोगवादियों की सफलता आप उनके भोग के संसाधनों से ही तो नाप रहे हैं सुख से तो नहीं! भोगवादी सभ्यता में परिवार तथा समाज विखंडित हो रहा हैऌ नारी स्वयं बाजारू हो रही है। दूरदर्शन इत्यादि माध्यम इस भोगवाद की अग्नि को भड़का रहे हैं।पाश्चात्य संस्कृति की गुलामी सुख नहीं, सुख का भ्रम देती है।भारतीय संस्कृति सच्चा सुख दे सकती है क्योंकि उसमें त्याग­पूर्वक भोग का मंत्र है जो हम खो रहे हैं क्योंकि अपनी संस्कृति की वाहन अपनी मातृभाषा को भूल रहे हैं। नैतिक मूल्य संस्कृति से आते हैं, इसलिये हम भारतीय जीवन मूल्यों को भूल रहे हैं, और घोर अमानवीयता भुगत रहे हैं। ‘स्टॉक होम सिन्ड्रोम’ के अनुसार गुलामियत की पराकाष्ठा वह है जब गुलाम स्वयं कहने लगे कि वह गुलाम नहीं है, जो कुछ भी वह है अपनी स्वेच्छा से है। ब्राउन साहब कहते हैं कि अंग्रेजी के बिना तो हम अंधकार युग में रहते।हमें अंग्रेजी चाहिये।यह तो ठीक है कि यदि अंग्रेजी ने फारसी को न हटाया होता तब हम भी अन्य मुस्लिम देशों की तरह आधुनिकता से वंचित रहतेÊ और साथ ही मानसिक तथा भौतिक रूप से उनसे अधिक दरिद्र रहतेÊ क्योंकि हमारे पास तो आवश्यक मात्रा में तेल भी नहीं है।अतएव 1947 तक तो अंग्रेजी ठीक ही थीÊ किन्तु उसके बाद हमें भारतीय भाषाओं को ही अपनाना था क्योंकि हमारी समृद्ध भाषाओं में विज्ञान­ संप्रेषण करने की भी आवश्यक शक्ति है।पहले तो कॉन्वैन्टी स्कूलों में ही भारतीय भाषाओं काÊ प्रच्छन्न रूप से तिरस्कार होता ही था, अब तो पब्लिक स्कूलों में भी मातृभाषाओं का तिरस्कार डंके की चोट पर होता है, भारतीय संस्कृति का तिरस्कार होता है।यह कैसा भारतवर्ष हैॐॐ

वैश्वीकरण के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ा है और प्रवासियों का बड़ी संख्या में विदेशों में निवास भी। इस के शिक्षा पर हो रहे परिणामों पर जो शोध कैनैडा में हुए हैं वे उपयोगी हैं, यद्यपि उनकी समस्या हमारी समस्या से उलट है।टौरॉन्टो शहर के किन्डरगार्टन में पढ़ रहे विद्याार्थियों में 58 त् बच्चे ऐसे देशों से आए हैं जहां की आम भाषा अंग्रेजी नहीं है।वहां .अर्थात कैनैडा के फाशिस्ट लोग प्रवासियों को देश से ही निकालना चाहते हैं।और कुछ उन्हें मुख्यधारा में समाहित करने के लिये प्रवासी विद्याथियों को मात्र अंग्रेजी में ही शिक्षा देते हैं।

इस समस्या पर डा . कमिन्सÊ बेकर तथा स्कुटनाबकंगस ने अनुसंधान कियाऌ उन्होने जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे महत्वपूर्ण हैं :

1 . अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों के तहत बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा न देना मानवाधिकारों का हनन है।

2 . द्विभाषी बच्चों की मातृभाषा उनके समग्र विकास तथा शैक्षिक विकास के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है।

3 . जब बच्चे दोनों भाषाओं में विकास करते रहते हैं, उन्हें भाषाओं तथा उनके उपयोग की गहरी समझ हो जाती है।

4 . द्विभाषी बच्चों की विचार पद्धति अधिक नमनीय हो सकती है, तथा उनके भाषाओं के उपयोग की समझ गहरी हो जाती है।

5 . जो बच्चे अपनी मातृभाषा में ठोस आधार लेकर आते हैं, वे शाला की भाषा में बेहतर योग्यता प्राप्त करते हैं।बच्चों के माता पिता, दादा दादी, नाना नानी आदि बच्चों से संवाद करते हैं, कहानियां सुनाते हैं, तब बच्चे अधिक सफलतापूर्वक अन्य भाषा तथा शिक्षा ग्रहण करते हैं।क्योंकि जो भी बच्चों ने घर में सीखा है वह ज्ञान, वे अवधारणाएं तथा कौशल अन्य भाषा में सरलतापूर्वक आ जाते हैंैं। यदि बच्चों ने घर में घड़ी देखना सीख लिया है तब उन्होने समय बतलाना और समझना भी सीख लिया है, अतएव उसे अन्य भाषा में वह अवधारणा सीखने में बहुत कम समय लगेगा।इसी तरह बच्चे जो भीे शाला की भाषा में सीखते हैं वह मातृभाषा मैं तैर जाता है, बशत्र्ते कि मातृभाषा का तिरस्कार न किया गया हो।अर्थात मातृभाषा के उपयोग को शाला में रोकना बच्चे के विकास में सहायक नहीं होता, वरन अवरुद्ध करता है।जब शाला में उन्हें मातृभाषा में भी प्रभावी शिक्षा दी जाती है तब द्विभाषी बच्चे शाला में बेहतर शिक्षा प्राप्त करते हैं इसके विलोम स्वरूप, जब शाला में बच्चों की मातृभाषा का तिरस्कार होता है तब उनका विकास अवरुद्ध होता है, और उनकी व्यक्तिगत शिक्षा की तथा शिक्षण हेतु अत्यावश्यक अवधारणाओं की आधारशिला कमजोर होती है।

6 . शाला में किसी भी बच्चे की मातृभाषा को ठुकराना, उस बच्चे को ठुकराना है ॐ जब बच्चे को यह संदेश दिया जाता है कि वह अपनी भाषा और उसके साथ अपनी संस्कृति शाला के बाहर छोड़कर आए तब वे अपनी अस्मिता का अपने संस्कारों का कुछ हिस्सा भी बाहर छोड़ आते हैं।यह भी पर्याप्त नहीं है कि शिक्षक बच्चे की भाषा को निष्क्रिय रूप से स्वीकारें, वरन उन्हें विभिन्न विधियों द्वारा उनकी भाषा की पुष्टि ही करना चाहिये, तथा सामान्य तौर पर ऐसा शैक्षिक वातावरण तैय्यार करना चाहिये कि पूर्ण बालक का भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव स्वीकार्य है।शाला के अधिकारियों तथा शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि घर में प्राप्त बच्चे के भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव वे महत्वपूर्ण आधार हैं जिन पर भविष्य की शिक्षा के स्तम्भ का निर्माण होना है।

इसमें संदेह नहीं कि शिक्षा का पूरा लाभ लेने के लिये मातृभाषा में शिक्षा का दिया जाना तथा मातृभाषा का सम्मान करना नितांत आवश्यक है।विदेश में हमारी भाषा का सम्मान हो रहा है और हम इतने गुलाम कि अपने देश में अपनी मातृभषा का तिरस्कार कर रहे हैं, और बच्चों का और देश का भविष्य खराब कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि हमें विदेशी भाषाएं नहीं सीखना चाहिये, अवश्य सीखना चाहिये। हम अंग्रेजी को एक समुÙत उपयोगी विदेशी भाषा की तरह सीखें।भारत में जो शिक्षा प्राथमिक स्तर से, और महानगरों में तो नर्सरी से, अंग्रेजी माध्यम में दी जा रही है वह भारत के लिये धीमे जहर के समान है। नर्सरी या पहली कक्षा से ही अंग्रेजी शुरु करने पर अंग्रेजी सीखने में न केवल अधिक कठिनाई होगीÊ वरन उस भाषा का सीखना रटंत विद्या के समान होगा और वह ज्ञान उसके हृदय में प्रवेश नहीं कर सकेगा।असली भाषा अर्थात हृदय तक पहुँचने वाली भाषा जीवन जीने वाली भाषा से आती हैÊ जो उसकी मातृभाषा है या उसके क्षेत्र की भाषा है। क्योंकि बच्चा मातृभाषा में सीखे ज्ञान तथा कौशल को अन्य भाषा में सरलता से ढाल लेता है, अतएव अंग्रेजी की शिक्षा को मातृभाषा की शिक्षा से चार कदम पीछे रहना चाहिये। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिये। अंग्रेजी भाषा का शिक्षण माध्यमिक स्तर से प्रारंभ करना चाहिये। कुछ विद्यार्थियों को शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में दी जा सकती है जोकि बारहवीं कक्षा के बाद ही प्रारंभ करना चाहिये ताकि मातृभाषा की पर्याप्त निर्मिति तथा संस्कृति मस्तिष्क तथा हृदय में समुचित रूप से बैठ जाए।

भविष्य उसी का है जो विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त रहेगा, शेष देश मात्र खुले बाजार होंगे ! विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त होने के लिये उत्कृष्ट अनुसंधान तथा शोध आवश्यक हैं, जिसके लिये विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के ज्ञान पर अधिकार, तथा कल्पनाशीलता तथा सृजनशीलता आवश्यक हैं। कल्पना तथा सृजन हृदय के वे संवेदनशील तथा अंतर्प्रज्ञा ह्यएम्ेतेिनल् ान्द न्तिुतेिन्हृ गुण हैं जो बचपन के अनुभवों से मातृभाषा के साथ तथा गहरे ज्ञान अर्थात मात्र याद किया हुआ नहीं वरन आत्मसात किये ज्ञान के साथ आते हैं, और जिस भाषा में जीवन जिया जाता ह,ै उसी भाषा में वे प्रस्फुटित होते हैंऌ अतएव उसी भाषा में आविष्कार आदि हो सकते हैं। इसलिये नौकरी के लिये अंग्रेजी में विज्ञान पढ़ने वाले से विशेष आविष्कारों तथा खोजों की आशा नहीं की जा सकती, आखिर इज़राएल जो कि हमारे देश का दसवां हिस्सा भी नहीं है, विज्ञान में हमसे दस गुने नोबेल पुरस्कार ले जाता है।वह भी तब कि जब यहूदी भाषा 1948 के पहले किसी भी देश की भाषा नहीं थी !

यदि हम चाहते हैं कि इस देश का और हमारे बच्चों का इस देश में, तथा में विश्व में सम्मान बढ़े तब हमें, अपने बच्चों को विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ही देना है।यह भी एक भ्रम है कि भारतीय भाषाओं में विज्ञान की शिक्षा नहीं दी जा सकती।इस समय हिन्दी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के 5 लाख से अधिक शब्द बन चुके हैं, और बनते जा रहे हैं।संस्कृत जैसी विश्व में समृद्धतम भाषा की पुत्रियों को और तमिल को भी वैज्ञानिक शब्दाावली की कोई कठिनाई नहीं हो सकती।बस राजनैतिक तथा ‘ब्यूरोक्रैटिक’ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। अब हिन्दी में केन्द्रीय सेवाओं आदि की परीक्षाएं दी जा सकती हैं।यह भी एक भम है कि अंग्रेजी गई तो देश विखंडित हो जाएगा।भारतीय संस्कृति इस देश को एकता प्रदान करती है, सभी भारतीय भाषाओं में वही संस्कृति है।एक भारतीय भाषा के जानने वाले को अन्य भारतीय भाषा सीखने में विदेशी भाषाओं को सीखने की अपेक्षा कहीं अधिक सरलता होगी।भाषाओं के सीखने के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। प्रत्येक व्यक्ति की योग्यताएं भिन्न क्षेत्रों में भिन्न होती हैंÊ कोई गणित सरलता पूर्वक सीख लेता है तो कोई भाषाÊ और कोई विज्ञानÊ तो कोई कलाÊ बस मातृभाषा का ज्ञान ही आवश्यक होता है।अंग्रेजी को अेिनवार्य­ सा बना देने से वह बालक जो विदेशी भाषा सीखने में निपुण नहीं है किन्तु गणित या विज्ञान या कला या अर्थशास्त्र या इतिहास आदि सीखने में निपुण हो सकता हैÊ उसकी शिक्षा अंग्रेजी में कमजोर होने से अधूरी सी रह जाएगी !

वैसे भी यदि बच्चे में कल्पना शीलता तथा सृजन शक्ति है तब वह न केवल अच्छी अंग्रेजी सीख लेगा वरन जीवन में अवश्य कुछ ऐसा भी करेगा जिससे हमें गर्व महसूस होगाÊ और हमारे साथ हमारा समाज भी सुखी होगा! इस कथन की पुष्टि का सबसे अच्छा उदाहरण तो सुभाष चंद्र बोस का है।उनके पिता ने उन्हें अंग्रेजी माध्यम की शाला में भरती करवाया था।कुछ ही दिनों में सुभाष ने स्वयं ही अपना प्रवेश बांग्ला भाषा के माध्यम वाली शाला में करवा लिया। यह बांग्ला भाषा में शिक्षित सुभाष न केवल आई सी एस की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वरन एक अनोखा क्रान्तिकारी भी बना। और मानव तभी श्रेष्ठ बन सकता है जब वह अपनी संस्कृति तथा भाषा में जीवन जीता है। मातृभाषा तथा भारतीय संस्कृति ही हमें सुखी मानव बना सकती है।

On Oct 5, 2017 11:13 AM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnaik.hindi.vogga@gmail.com> wrote:
मातृभाषा में शिक्षा

लेखक - प्रभाकर चौबे ।

प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। दुनिया के और देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है, मातृभाषा के संरक्षण, उसकी समृध्दि के लिए कहां क्या हो रहा है, यह तो दुनिया भर में घूमने वाले बेहतर बता सकते हैं। हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिया जाए, इसकी पूरजोर कोशिश की जा रही है। सरकारों से लेकर (हर पार्टी की सरकार) कार्पोरेट और कार्पोरेट-हित-साधक अखबार, उसके प्रवक्ता बनकर लिखने वाले सब इस जुगत में हैं कि मातृभाषा शब्द ही मानस से, बुध्दि से बाहर हो जाए। पूछेंगे तो रटा रटाया और हर काम की तरह यहां भी भ्रम में डालने वाला उत्तर मिल जाएगा कि मातृभाषा के विकास में हमारी सरकार भरपूर मदद कर रही है। लेकिन एकदम उल्टा हो रहा है। हम इस झूठ, फरेब पाखंडकाल में अपनी ही वस्तुएं नष्ट होते देख रहे हैं। सरकार की कथनी और करनी में इतनी चौड़ी खाई इससे पहले कभी नहीं रही।

शिक्षा में इस बात को लेकर बहस होती है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए। तमाम बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्वानों की गुहार को दरकिनार कर सरकारों ने कक्षा एक से अंग्रेजी पढ़ाना शुरु कर दिया। यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालकों में विषय को ग्रहण करने की क्षमता समान नहीं होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर और कठिनाई होती है। जिनका पूरा परिवेश ही अंग्रेजी भाषामय हो, ऐसे परिवार देश में कम ही है। मातृभाषा के माध्यम से जब पढाया जाता है तो बालकों के चेहरे उत्फुल्लित दिखाई देते हैं। एक तो अंग्रेजी सीखनी पड़ती है-वह पड़ी हुई नहीं मिल जाती। लेकिन सरकारों ने ठान लिया है कि बच्चों को अंग्रेजी के माध्यम से ही पढ़ाना है। भाषा सीखना अच्छी बात है और गुणकारी भी है। भाषा हमें एक नये संसार में प्रवेश कराती है। लेकिन मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से उसे हटाकर जिस तरह के भाषा-संस्कार डाले जा रहे हैं, वह खतरनाक है। बालक न अंग्रेजी जान पा रहा है न मातृभाषा। एक खिचड़ी भाषा वह भी अधजली का संस्कार मिल रहा है।

प्राय: हर पालक की शिकायत है कि उसका बच्चा छत्तीस नहीं समझता थर्टीसिक्स बोलो तब समझता है। उनयासी कहो तो पूछता है- यह क्या होता है। सेवन्टी नाइन कहो तब कहेगा तो ऐसा बोलो न। किसी भाषा का कोई शब्द जो पूरा अर्थ दे, अपनी भाषा में लेना गलत नहीं है। दुनिया की हरभाषा इसी तरह ग्रहण कर समृध्द होती चली है। हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित लोकभाषाओं के ढेरों शब्द हैं। अपनी इस लम्बी यात्रा में हिन्दी ने बाहर से खूब ग्रहण किया है। अंग्रेजी के भी ढेरों शब्द हैं। मोटर, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। काफी समय हो गया। पिछली पीढ़ी पढ़ने के लिए अपना गांव छोड़ शहर में आई तो बाल बनवाने के लिए उसका परिचय हेयर कटिंग सेलून से हुआ और वह बाल बनवाने नहीं, कटिंग करवाने जाता। इन सबसे हिन्दी समृध्द हुई है। आज मोबाइल के साथ 'मिस कॉल' आया और गांव-गांव में रच बस गया। एक ठन मिस काल मार देबे- आम अभिव्यक्ति है। ई-मेल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी में चल निकले। इनका हिन्दी में अनुवाद करना हास्यास्प्रद होना है। यह भी विचार करना चाहिए कि किसी और भाषा से शब्द लेना एक बात है, लेकिन खिचड़ी वाक्य बनाना निरी मूर्खता है। दिक्कत यह है कि हमारे हिन्दी के कुछ समाचार पत्र ऐसी भाषा लिखने लगे हैं जो हास्य एपिसोड में तो काम आ सकती है, भाषा की गम्भीरता का मजाक बनाती है। ऐसे अखबारों ने कार्पोरेट होने का भ्रम पाल रखा है।

आज ऐसे लोग पूरा भाषा-संस्कार भ्रष्ट कर रहे हैं। शब्द लेना ठीक, लेकिन हमारी भाषा के सर्वनाम, संज्ञा, क्रिया और तो और पूरा वाक्य विन्यास का सत्यानाश करने में तुल गए हैं। स्टुडेंट्स ने फेस्टीवल इन्जाय किया यह कैसी भाषा है। लिखित और बोलने के वाक्य में फर्क होता है। दरअसल न तो इन्हें मातृभाषा आती न अंग्रेजी। बहुत पहले जब अंग्रेज आए तो उनके नौकर जो भाषा बोलते उसे बटलर भाषा कहा जाता। अगर समाज में कोई ऐसी भाषा बोलता तो उसका मजाक उड़ाया जाता कि क्या बटलर भाषा बोल रहे हो। अगर हम हिन्दी की ही बात करें तो कार्पोरेट उसके व्यावसायिक उपयोगिता समझता है। हिन्दी बाजार की, धंधे की विज्ञापन की भाषा के रूप में कार्पोरेट को स्वीकार है। केन्द्र सरकार ने अपने कार्यालयों में हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने का उपक्रम किया है। हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। लेकिन कार्पोरेट में हिन्दी का कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है। हिन्दी उनके उत्पाद के व्यापार के लिए स्वीकार्य है। अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में जिस तरह अंग्रेजी की शिक्षा दी जा रही है वह केवल सेल्समैन पैदा करने के काम आ रही है। पुराने मेट्रिक पास अच्छी अंग्रेजी लिखा करते थे। ऊंची से ऊंची नौकरी पाने के लिए, ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना, अंग्रेजी में निष्णात होना बहुत अच्छी बात है, जरूरी भी है। लेकिन मातृभाषा की कीमत पर अंग्रेजी नहीं सीखी जा सकती ऐसा करने पर आधा तीतर आधा बटेर की स्थिति होगी।

अंग्रेजी माध्यम के कुछ विद्यालयों में विद्यालय परिसर में हिन्दी या मातृभाषा में बात करते पाए जाने पर दंडित किया जाता है। कुछ विद्यालय तो एकदम आगे हैं, वे माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता को बच्चों के प्रवेश का आधार बनाते हैं। बहरहाल एक बड़ा वर्ग मातृभाषा की उपयोगिता समझता है। जालंधर की एक खबर छपी है। वहां तमाम सरकारी स्कूलों और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने सामूहिक रूप से 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाया। बच्चों ने, विद्यालय समितियों ने एक स्वर से पंजाबी बोलने पर जोर दिया। इनमें कुछ-कुछ ऐसे विद्यालय भी शामिल हुए जिनके विद्यालयों में पंजाबी बोलना प्रतिबंधित था। आज सबने मातृभाषा का महत्व समझा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर और किसी राज्य में कोई कार्यक्रम हुआ ऐसा पढ़ने में नहीं आया। दरअसल शिक्षा का अधिकार का सवाल मातृभाषा में शिक्षा के साथ जुड़ा है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार है, उस पर दूसरी भाषा लाद देना उसके स्वाभाविक विकास में बाधा डालना भी है।

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Ananda Pujar

unread,
Oct 6, 2017, 8:13:34 PM10/6/17
to hind...@googlegroups.com
C SAS model question paper has  kyA ?

On Oct 5, 2017 1:01 PM, "shreekrishna teeka" <ste...@gmail.com> wrote:
Super sir good information. 

अच्छी जानकारी दी सर। 

Shreenivas Naik

unread,
Oct 7, 2017, 1:21:19 PM10/7/17
to hind...@googlegroups.com
राजू सर भी भेजे हैं , देखिए

Devalingaswamy M

unread,
Nov 15, 2017, 6:45:04 AM11/15/17
to hind...@googlegroups.com

hindistf@googlegroup.c...  सर जहाँ पहुँचा न सके का अर्थ क्या है?


On 7 Oct 2017 10:51 pm, "Shreenivas Naik" <shreenivasnai...@gmail.com> wrote:
>
> राजू सर भी भेजे हैं , देखिए
>
> On Oct 7, 2017 5:43 AM, "Ananda Pujar" <apssv...@gmail.com> wrote:
>>
>> C SAS model question paper has  kyA ?
>>
>> On Oct 5, 2017 1:01 PM, "shreekrishna teeka" <ste...@gmail.com> wrote:
>>>
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>>>
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MAHAMMAD RAFIQUE SUNKAD

unread,
Nov 21, 2017, 1:15:33 PM11/21/17
to hind...@googlegroups.com
Sir thank you so much for your help and support to the all Hindi teachers giving more information about teaching great language Hindi. Sir pls send me varshik path yojana of class 8,9,10.

On Nov 15, 2017 5:15 PM, "Devalingaswamy M" <devalin...@gmail.com> wrote:

hindistf@googlegroup.c...  सर जहाँ पहुँचा न सके का अर्थ क्या है?

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