आज की मेरी कविता
माँ कभी इंतकाम नहीं लेती
माता पिता के बारे में
हम चिंता कितनी करते हैं।
कभी ढंग से बात की है
सदा दूसरों पर मरते है॥
फुर्सत नहीं होती है अब
क्यों इतना उलझ गए हो।
बिसरकर माँ बाप को तुम
क्यों इतना दूर चले गए हो॥
सबसे पूछ लेते हो हालत
अपनी जननी से पूछा कभी।
कैसे जीती है कैसे मरती है
उसकी बदौलत खुश है अभी॥
प्यार के खातिर छोड दिया
उस गली में अपनी माँ को।
अरे कभी दुनिया छोड आ
गले लगा ले अपनी माँ को॥
पते की बात तू जानता है
सब जानकर तू मानता नहीं।
अब लौट आ ममता बुलाती
कभी माँ दूसरों सा होती नहीं॥
हम हजार बुरे हो सकते हैं
पर बुरी माँ कहीं नहीं होती।
ऊपरवाले से बेहतर होती है
माँ कभी इंतकाम नहीं लेती॥
माँ कभी इंतकाम नहीं लेती॥
माँ कभी इंतकाम नहीं लेती॥
डॉ. सुनील कुमार परीट, बेलगांव, कर्नाटक 08867417505