जायसी और उनका "पद्मावत"
काफी लंबे अरसे के बाद आज फिर हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने के इस प्रयास में आइये आज बात करते हैं सुप्रसिद्ध सूफ़ी फकीर व कवि मलिक मुहम्मद जायसी और उनके द्वारा रचित प्रेमाख्यान ’पद्मावत’ की।
प्रसिद्ध सूफ़ी फकीर शेख मुहीउद्दीन (मोहिदी) के शिष्य मलिक मुहम्मद जायसी अपने समय के पहुँचे हुये फकीरों में गिने जाते थे। ’आखिरी कलाम’ में दिये अंत:साक्ष्य के आधार पर उनका जन्म ९०० हिज़री (१५०६ ई.) में हुआ माना जाता है। अमेठी राजपरिवार सहित कई राजघरानों तथा सामान्य जनता में इनका बहुत सम्मान था। अपने अंतिम समय में वे अमेठी के समीपवर्ती जंगल में अपनी कुटी बनाकर रहने लगे थे और वहीं ९४९ हिज़री (१५४२ ई.) में इनकी मृत्यु हुई।
इनकी जीवन-काल में ही इनके शिष्य इनकी बनाई भावपूर्ण चौपाइयाँ, दोहे आदि गा-गाकर लोगों को सुनाया करते थे। इनकी तीन पुस्तकें अब तक ज्ञात हुई हैं – ’पद्मावत’, ’अखरावट’ और ’आखिरी कलाम’। परंतु इनकी प्रसिद्धि का मूल आधार ’पद्मावत’ ही है जिसमें राजा रतनसेन और उनकी रानी पद्मावती की कथा है। ’अखरावट’ में वर्णमाला के एक-एक अक्षर से आरंभ कर सिद्धांत और आध्यात्म से संबंधित चौपाइयाँ कही गई हैं जबकि ’आखिरी कलाम’ में क़यामत का वर्णन है।
’पद्मावत’ की अर्धाली “सन नव सै सताइस अहा/ कथा अरंभ बैन कवि कहा” से ज्ञात होता है कि इसका आरंभ ९२७ हिज़री (१५२०ई.) में हुआ। परंतु शाहेवक़्त के रूप में शेरशाह सूरी की प्रशंसा इसे ९४७ हिज़री (१५४०ई.) के आसपास की रचना सिद्ध करती है। इससे यह माना जाता है कि इस रचना का आरंभ भले १५२० ई. में हुआ हो परंतु यह २० वर्ष बाद १५४०ई. में ही पूर्ण हुई।
सूफ़ी प्रेमगाथा काव्य की परंपरा में “पद्मावत” का स्थान सर्वोपरि है। कथानक की प्रौढ़ता और वर्णन की सहजता इसे अन्य प्रेमगाथाओं से बहुत उच्च कोटि की रचना बना देती है। चित्तौड़ के राजा रतनसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मिनी के इतिहास-प्रसिद्ध कथानक और जनमानस में इसके नायकों के भावनात्मक प्रभाव ने बहुत शीघ्र ही इसे अत्यंत लोकप्रिय रचना बना दिया। अन्य सूफ़ी काव्यों की तरह इसकी रचना भी मसनवी शैली में की गई है परंतु भारतीय कथानक होने के साथ-साथ भारतीय काव्यपरंपरा का भी स्पष्ट प्रभाव इस पर परिलक्षित होता है।