प्रयोजनमूलक हिन्दी

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Shreenivas Naik

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Feb 4, 2017, 12:36:39 PM2/4/17
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प्रयोजनमूलक हिन्दी

प्रयोजनमूलक हिन्दी के संदर्र्भ में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ उपसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है उद्देश्य अथवा प्रयुक्ति। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा। इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या शैली है जो विषयगत तथा संदर्भगत प्रयोजन के लिए विशिष्ट भाषिक संरचना द्वारा प्रयुक्त की जाती है। विकास के प्रारम्भिक चरण में भाषा सामाजिक सम्पर्क का कार्य करती है। भाषा के इस रूप को संपर्क भाषा कहते हैं। संपर्क भाषा बहते नीर के समान है। प्रौढा की अवस्था में भाषा के वैचारिक संदर्भ परिपुष्ट होते हैं औैर भावात्मक अभिव्यक्ति कलात्मक हो जाती है। भाषा के इन रूपों को दो नामों से अभिहित किया जाता है। प्रयोजनमूलक और आनन्दमूलक। आनन्द विधायक भाषा साहित्यिक भाषा है। साहित्येतर मानक भाषा को ही प्रयोजनमूलक भाषा कहते हैं, जो विशेष भाषा समुदाय के समस्त जीवन-संदर्भो को निश्चित शब्दों और वाक्य संरचना के द्वारा अभिव्यक्त करने में सक्षम हो। भाषिक उपादेयता एवं विशिष्टिता का प्रतिपादन प्रयोजनमूलक भाषा से होता है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप :

हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। इसके बोलने व समझने वालों की संख्या के अनुसार विश्व में यह तीसरे क्रम की भाषा है। यानी कि हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अत: स्वाभाविक ही है कि विश्व की चुनिंदा भाषाओं में से एक महत्वपूर्ण भाषा और भारत की अभिज्ञात राष्ट्रभाषा होने के कारण, देश के प्रशासनिक कार्यो में हिन्दी का व्यापक प्रयोग हो, राष्ट्रीयता की दृष्टि से ये आसार उपकारक ही है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के भाषिक अध्ययन का ही एक और नाम है, एक और रूप है एक समय था जबकि सरकारी-अर्द्धसरकारी या सामान्यत: कार्यालयीन पत्राचार के लिए अंग्रेजी एक मात्र सक्षम भाषा समझी जाती थी। अंग्रेजी की उक्त महानता आज, सत्य से टूटी चेतना की तरह बेकार सिद्ध हो रही है चूंकि हिन्दी में अत्यन्त बढ़िया, स्तरीय तथा प्रभावक्षम पत्राचार संभव हुआ है। अत: जो लोग हिन्दी को अविकसित भाषा कहते थे, कभी खिचड़ी तो कभी क्लिष्ट भाषा कहते थे या अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को नीचा दिखाने की मूर्खता करते थे उन्हें तक लगने लगा है कि हिन्दी वाकई संसार की एक महान भाषा है, हरेक दृष्टि से परिपूर्ण एक सम्पन्न भाषा है।
राजभाषा के अतिरिक्त अन्य नये-नये व्यवहार क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार तथा प्रसार होता है, जैसे रेलवे प्लेटफार्म, मंदिर, धार्मिक संस्थानों आदि में। जीवन के कई प्रतिष्ठित क्षेत्रों में भी अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान औैर तकनीकी शिक्षा, कानून और न्यायालय, उच्चस्तरीय वाणिज्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। व्यापारियों और व्यावसायियो के लिए भी हिन्दी का प्रयोग सुविधाजनक और आवश्यक बन गया है। भारतीय व्यापारी आज हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते, उनके कर्मचारी, ग्राहक सभी हिन्दी बोलते हैं। व्यवहार के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रयोजनों से हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। बैंक मे हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है तो सरकारी कार्यालयो में हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है। हिन्दी के इस स्वरूप को ही प्रयोजनमूलक हिन्दी कहते हैं।

प्रयोजनमूलक रूप के कारण हिन्दी भाषा जीवित रही। आज तक साहित्यिक हिन्दी का ही अध्ययन किया जाता था, लेकिन साहित्यिक भाषा किसी भी भाषा को स्थित्यात्मक बनाती है और प्रयोजनमूलक भाषा उसको गत्यात्मक बनाती है। गतिमान जीवन में गत्यात्मक भाषा ही जीवित रहती है। प्रचलित रहती है। आज साहित्य तो संस्कृत में भी है, लेकिन उसका गत्यात्मक रूप-प्रयोजनमूलक रूप समाप्त हो गया है, अत: वह मृतवत हो गयी है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप अधिक शक्तिशाली तथा गत्यात्मक है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप न केवल उसके विकास में सहयोग देगा, बल्कि उसको जीवित रखने एवं लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इस प्रकार विभिन्न प्रयोजनों के लिए गठित समाज खंडों द्वारा किसी भाषा के ये विभिन्न रूप या परिवर्तन ही उस भाषा के प्रयोजनमूलक रूप हैं। अंग्रेजी शासन में यूरोपीय संपर्क से हमारा सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचा काफी बदला, धीरे-धीरे हमारे जीवन में नई उद्भावनाएं (जैसे पत्रकारिता, इंजीनियरिंग, बैंकीय) पनपी और तदनुकूल हिन्दी के नए प्रयोजनमूलक भाषिक रूप भी उभरे। स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दी भाषा का प्रयोग क्षेत्र बहुत बढ़ा है और तदनुरूप उसके प्रयोजनमूलक रूप भी बढे हैं औैर बढ़ते जा रहे हैं। साहित्यिक विधाओं, संगीत, कपड़ा-बाजार, सट्टाबाजारों, चिकित्सा, व्यवसाय, खेतों, खलिहानों, विभिन्न शिल्पों और कलाओं, कला व खेलों के अखाड़ों, कोर्टो कचहरियों आदि में प्रयुक्त हिन्दी पूर्णत: एक नहीं है। रूप-रचना, वाक्य रचना, मुहावरों आदि की दृष्टि से उनमें कभी थोड़ा कभी अधिक अंतर स्पष्ट है और ये सभी हिन्दी के प्रयोजनमूलक परिवर्त या उपरूप है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशेषताएं :

प्रयोजनमूलक भाषा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं –
1. वैज्ञानिकता :
प्रयोजनमूलक शब्द पारिभाषिक होते हैं। किसी वस्तु के कार्य-कारण संबंध के आधार पर उनका नामकरण होता है, जो शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है। ये शब्द वैज्ञानिक तत्वों की भांति सार्वभौमिक होते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
2. अनुप्रयुक्तता :
उपसर्गो, प्रत्ययों और सामासिक शब्दों की बहुलता के कारण हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली स्वत: अर्थ स्पष्ट करने में समर्थ है। इसलिए हिन्दी की शब्दावली का अनुप्रयोग सहज है।
3. वाच्यार्थ प्रधानता :
हिन्दी के पर्याय शब्दों की संख्या अधिक है। अत: ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में उसके अर्थ को स्पष्ट करने वाले भिन्न पर्याय चुनकर नए शब्दों का निर्माण संभव है। इससे वाचिक शब्द ठीक वही अर्थ प्रस्तुत कर देता है। अत: हिन्दी का वाच्यार्थ भ्रांति नहीं उत्पन्न करता।
4. सरलता और स्पष्टता :
हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली सरल औैर एकार्थक है, जो प्रयोजनमूलक भाषा का मुख्य गुण है। प्रयोजनमूलक भाषा में अनेकार्थकता दोष है। हिन्दी शब्दावली इस दोष से मुक्त है।
इस तरह प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी एक समर्र्थ भाषा है। स्वतंत्रता के पश्चात प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में स्वीकृत होने के बाद हिन्दी में न केवल तकनीकी शब्दावली का विकास हुआ है, वरन विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुरुप ढाल लिया है। आज प्रयोजनमूलक क्षेत्र में नवीनतम उपलब्धि इंटरनेट तक की शब्दावली हिन्दी में उलब्ध है, और निरंतर नए प्रयोग हो रह हैं।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के अवरोध :

ब्रिटिश शासकों ने अपने उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण कार्य किया था, अंग्रेजी को प्रतिष्ठित करने का। उन्होंने जिस अंग्रेजी को आरोपित किया, उसका उद्देश्य अपने शासन के लिए योग्य कर्मचारियों को तैयार करना था। जनता से संपर्क के लिए वे हिन्दी सीखते थे और शासन के लिए भारतीय भाषाओं को हेय बताकर अंग्रेजी के एक व्यावहारिक रूप का प्रचार कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने जीवन-यापन से जुड़े क्षेत्रों में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। राष्ट्रीयता की प्रबल भावना के कारण स्वदेश और स्वभाषा का समर्थन सभी राष्ट्र नेताओ ने किया। संविधान निर्माताओं ने बिना किसी संशय के हिन्दी को राजभाषा घोषित कर दिया। राजभाषा के साथ ही प्रयोजनमूलक भाषा का विकास प्रारंभ होता है। शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा का संबंध समस्त सामाजिक प्रयोजनों से जुड़ जाता है। अत: 26 जनवरी 1950 से ही प्रयोजनमूलक हिन्दी की निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ हुई और समस्त सरकारी और गैर सरकारी संगठनों, शिक्षालयों, संचार माध्यमों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों का उद्देश्य अपनी भाषा के माध्यम से कार्र्य करना था।
अंग्रेजी शासकों के इन कृत्यों ने ही कालान्तर में शब्दावली का रोना रोकर 15 वर्षो तक हिन्दी के विकास को अवरूद्ध किया और अंग्रेजी को बनाए रखा। सरकारी व्याप से बने कोश जन सामान्य तक नहीं पहुंचे। उन्हें प्रतीक्षा थी राष्ट्रीयता के जोश की समाप्ति की। उसमें वे सफल रहे औैर राष्ट्रीयता की लहर का स्थान वोट-बैंक की राजनीति ने ले लिया। क्षेत्रीय भाषाओं के विरोध का नया स्वर गूंजा औैर उत्तर बनाम दक्षिण, हिन्दी बनाम अहिन्दी के नाम पर अंग्रेजी का और अंग्रेजी के बल पर देशी अंग्रेजी का शासन बना रहा।
इस प्रकार राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा का स्वप् अधूरा रहा। इसके बावजूद प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास अवरूद्ध नहीं हुआ। सरकारी तंत्र की उपेक्षा के बावजूद विश्व को उपभोक्ता बाजार मानने वाली विदेशी कंपनियों ने विज्ञान एवं सूचना के क्षेत्र में हिन्दी को महत्व दिया। भारतीय चैनलों से अधिक विदेशी कंपनियां हिन्दी प्रदेश में हिन्दी को अपनाकर आगे बढ़ रही हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि वोट बैंक पर नहीं, पूंजी बैंक पर है और इस पर नियंत्रण करने के लिए चित्रपट जगत, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और सूचनातंत्र हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी के मार्ग में अनेक अवरोध स्वतंत्रता प्राप्ति से आ रह हैं औैर उनका सामना करते हुये भारत की यह भाषा अपना अस्तित्व अधिक प्रभावशाली बनाये जा रही है।

अंतत: और निष्कर्षत:  :-

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि साहित्य भाषा को प्रतिष्ठा दे सकता है, लेकिन विस्तार नहीं देता। भाषा को विस्तार देता है, उसका प्रयोजनमूलक स्वरुप। प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी को वैश्विक प्रसार मिला है। हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप के विकास के कारण ही आज संपूर्ण भारत में हिन्दी को समझने और बोलने वाले मिल जाते हैं। यह आवश्यक है कि यदि सही अर्थो में राजभाषा का क्रियान्वयन होता तो आज हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी हो गया होता, लेकिन हिन्दी का विकास राजकीय प्रयोजनेतर माध्यमों के द्वारा हा रहा है, जिनमें चलचित्र, दूरदर्शन और उद्योग व्यापार के विदेशी प्रतिष्ठानों का योगदान अधिक है। इसलिए आज हिन्दी के प्रयोजनमूलक संदर्भो से जो क्षेत्र जुड़े हैं वे हैं -
1. राजभाषा और उससे सबंद्ध क्षेत्र (कामकाजी क्षेत्र)। 
2. पत्रकारिता। 
3. श्रव्य माध्यम। 
4. दूरदर्शन और चलचित्र। 
5. अनुवाद और उसके माध्यम के विज्ञान, तकनीक और व्यापार। इन क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का ज्ञान ही आज की उपभोक्तावादी सभ्यता में हिन्दी और हिन्दी भाषी को प्रतिष्ठित कर सकता है।

Shreenivas Naik

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Feb 4, 2017, 12:38:33 PM2/4/17
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व्यक्ति द्वारा विभिन्न रूपों में बरती जाने वाली भाषा को भाषा-विज्ञानियों ने स्थूल रूप से सामान्य और प्रयोजनमूलक इन दो भागों में विभक्त किया है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी (Functional Hindi) से तात्पर्य हिन्दी के विज्ञान, तकनीकी, विधि, संचार एवं अन्यान्य गतिविधियों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी से है। हिन्दी केवल साहित्य की भाषा न रहे बल्कि जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रभावी रूप से प्रयुक्त हो, तभी इसका विकास सुनिश्चित होगा। सुखद सूचना यह है कि हिन्दी की इस नितांत ताजा-टटकी और कई संदर्भों में बेहद नयी भाषिक-संरचना या नवजात शिशु रूप को केन्द्रीय विश्वविद्यालयों ने अपने-अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर इसे सम्मानित किया है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी आज इस देश में बहुत बड़े फलक और धरातल पर प्रयुक्त हो रही है। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच संवादों का पुल बनाने में आज इसकी महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज इसने एक ओर कम्प्यूटर, टेलेक्स, तार, इलेक्ट्रॉनिक, टेलीप्रिंटर, दूरदर्शन, रेडियो, अखबार, डाक, फिल्म और विज्ञापन आदि जनसंचार के माध्यमों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, तो वहीं दूसरी ओर शेयर बाजार, रेल, हवाई जहाज, बीमा उद्योग, बैंक आदि औद्योगिक उपक्रमों, रक्षा, सेना, इन्जीनियरिंग आदि प्रौद्योगिकी संस्थानों, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों, आयुर्विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, ए० एम० आई० के साथ विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी, अर्द्धसरकारी कार्यालयों, चिट्ठी-पत्री, लेटर पैड़, स्टॉक-रजिस्टर, लिफाफे, मुहरें, नामपट्ट, स्टेशनरी के साथ-साथ कार्यालय-ज्ञापन, परिपत्र, आदेश, राजपत्र, अधिसूचना, अनुस्मारक, प्रेस–विज्ञाप्ति, निविदा, नीलाम, अपील, केबलग्राम, मंजूरी पत्र तथा पावती आदि में प्रयुक्त होकर अपने महत्व को स्वतः सिद्ध कर दिया है। कुल मिलाकर यह कि पर्यटन बाजार, तीर्थस्थल, कल-कारखने, कचहरी आदि अब प्रयोजनमूलक हिन्दी की जद में आ गए हैं। हिन्दी के लिए यह शुभ है।

परिचय:-

भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को केन्द्रीय संघ राज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त है, परन्तु व्यवहार में अंग्रेजी भाषा का बोल-बाला ज्यादा है। अंग्रेजदाँ लालफिताशाही तथा भाषा की राजनीति करने वाले राजनयिक अंग्रेजी के पक्ष में कितने भी तर्क देते रहें, इस देश का सामान्य-जन एक सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी भाषा का भाषिक संरचना, व्याकरण तथा अनुवाद के धरातल पर अध्ययन आज की एक परम आवश्यकता है। प्रयोजनमूलक, प्रयुक्तिमूलक तथा व्यावहारिक आदि सम्बोधनों से होनेवाला यह भाषिक अध्ययन ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा के वास्तविक सिंहासन पर अधिष्ठित कराने का सही और सार्थक मार्ग बन सकता है।

आज तक एक साहित्यिक भाषा के रूप में हिन्दी ने अपनी क्षमता का परिचय दिया और हिन्दी पर अविकसित भाषा होने का लांछन लगाने वाले अंग्रेजदाँ की बोलती बंद की है। इसलिए अब यह तर्क दिया जा रहा है कि एक कामकाजी भाषा के रूप में हिन्दी की प्रकृति क्लिष्ट और दुर्बोध है।

भाषा की क्लिष्टता उसकी प्रयुक्तिगत संरचना के साथ ही प्रयुक्ति मात्रा पर निर्भर होती है। इसलिए आवश्यक है कि विविध प्रयुक्ति-रूपों में उसका व्यापक रूप में प्रयोग हो तथा प्रयोग के आधार पर ही अद्भुत समस्याओं का निराकरण हो। हमारी विडम्बना है कि तालाब के किनारे खड़े होकर तैराकी की अनिवार्यता और उसकी समस्याओं पर मात्र परिचर्चाओं में हम मशगूल हैं। इस विडम्बना से मुक्त होना अनिवार्य है। इसलिए विविध विश्वविद्यालयों के हिन्दी के पाठ्यक्रमों में ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ को स्थान दिया जा रहा है।

Shreenivas Naik

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Feb 4, 2017, 12:52:43 PM2/4/17
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प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना

भाषा, मनुष्य के पास ऐसा साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति एक दूसरे के संर्पक मे आता हैं। चूँकि भाषा का प्रयोग समाज में किया जाता है और समाज बहुमुखी होता है अत: भाषा में अनेकरूपता देखने को मिलती है। इसी अनेकरूपता के कारण भाषा में विभिन्न प्रकार के 'विकल्पन' (Variations) दिखाई देते हैं। भाषा में प्राप्त होने वाले क्षेत्रीय, सामाजिक एवं प्रयोजनमूलक रूप भाषा विकल्पनों के ही उदाहरण हैं जो विभिन्न प्रकार के प्रयोक्ताओं द्वारा विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न संदर्भों में, भाषा का प्रयोग किए जाने के फलस्वरूप विकसित होते हैं।

भाषा विकल्पनों को दो भांगो में बांटा जाता है। 'प्रयोक्ता सापेक्ष' तथा 'प्रयोग सापेक्ष'। प्रयोक्ता सापेक्ष विकल्पों का कारण भाषा का प्रयोक्ता होता है। ये विकल्पन दो प्रकार के होते हैं-क्षेत्रीय विकल्पन तथा सामाजिक विकल्पन। क्षेत्रीय विकल्पनों का संबंध प्रयोक्ता के रहने के स्थान (भौगोलिक क्षेत्र) से होता है तथा भाषा के ये रूप 'क्षेत्रीय रूप' कहलाते हैं। सामाजिक विकल्पन उन भाषा विकल्पनों को कहते है जो प्रयोक्ता के सामाजिक स्तर भेद के कारण दिखाई देते है। भाषा के ऐसे शब्दों को 'सामाजिक शैलियां' कहा जाता है। प्रयोग सापेक्ष विकल्पनों के केन्द्र मे 'भाषिकी प्रयोग' होता है। इसको भी दो भागो में विभक्त किया जाता है- प्रयुक्ति सापेक्ष विकल्पन तथा भूमिका सापेक्ष विकल्पन। प्रयुक्ति सापेक्ष विकल्पन भाषा के वे भेद हैं जो भाषा के किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होने पर सामने आते हैं। कार्यालयीन भाषा, तकनीकि क्षेत्र की भाषा, पत्रकारिता की भाषा आदि भाषा रूप प्रयक्ति रूप है। जहाँ तक बात 'भूमिका सापेक्ष विकल्पनों' की है, इनका संबंध इस बात से है कि भाषा का प्रयोग करते समय प्रयोक्ता वक्ता की भूमिका का निर्वाह कर रहा है अथवा श्रोता की। देखा जाए तो भाषा, वक्ता और श्रोता के बीच संवाद का ही परिणाम होती है।

इस तरह 'प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न रूप' हिंदी की प्रयुक्ति सापेक्ष विकल्पन हैं। ये वे रूप हैं - जो अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, अलग-अलग विषय क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होने के कारण विकसित हुए हैं। इनकी अपनी शब्दावली तथा संरचना विशिष्ट होती है तथा उसी प्रयोग क्षेत्र में प्रयुक्त हो सकती है। इसकी संरनात्मक विशेषताओं की चर्चा हम आगे करेंगे।

प्रयोजनमूलक भाषा: संरचनात्क विशेषताएँ:

प्रयोजनमूलक हिंदी, हिंदी की एक प्रयुक्ति है। इसकी आधारभूत संरचना तो वही है जो हिंदी भाषा की है, पर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए, विशिष्ट संदर्भों में प्रयुक्त होने के कारण इसकी संरचना और शब्दावली विशिष्ट हो जाती है। अत: आम बोलचाल की हिंदी जानने वाला मातृभाषाभाषी यदि किसी प्रयुक्ति को सीखना चाहता है तो उसे उसके लिए प्रयास करना पड़ता है। सामान्य हिंदी तथा साहित्यिक हिंदी से तुलना करते हुए प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रमुख संरचना विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. प्रयोजनमूलक हिंदी की आधारभूत सरंचना तो वही है जो सामान्य हिंदी की अर्थात् वाक्यों में पदों का क्रम इस प्रकार रहता है:

कर्ता-क्रिया (अकर्मक)
(i) चपरसी भाग गया।
(ii) सचिव नहीं आए।कर्त्ता-क्रि0 वि0 पदबंध-क्रिया
(iii) कर्मचारी अपने अपने घर चले गये।
(iv) मंत्री जी कार से पहुँचे।कर्त्ता-पूरक-क्रिया
(v) शीला एक क्लर्क है।
(vi) मीरा अपने घर में थी।
(vii) जॉन बहुत बीमार है।कर्त्ता-कर्म-क्रिया (सकर्मक)
(viii) लिपिक ने पत्र टंकित किया।
(ix) अधिकारी ने आदेश जारी किया।कर्त्ता-कर्म-कर्म-क्रिया(अप्रत्यक्ष) (प्रत्यक्ष) (द्विकर्मक)
(x) सहायक ने चपरासी को फाइल सौंप दी।कर्त्ता-कर्म-पूरक-क्रिया
(xi) सचिव टाइपिस्ट को मूर्ख समझते हैं।

2. प्रयोजनमूलक भाषा की संरचना के वाक्यों को देखकर ही यह अनुमान किया जा सकता है कि इनको बोलने वाला कौन होगा। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्य अवलोकनीय हैं:

(i) सुबह उठकर प्राणायाम करना चाहिए।
(ii) रोज ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए।(iii) सुबह घूमने अवश्य ही जाना चाहिए।

उपर्युक्त वाक्यों को देखकर ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वाक्य किसी स्वास्थ्य अधिकारी अथवा डॉक्टर ने कहे हैं। इसी तरह से आपको आदेश दिया जाता है कि समय से कार्य समाप्त किया करें, तत्काल टिप्पणी प्रस्तुत करें।

इन वाक्यों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि ये वाक्य कर्यालयीन हिंदी के तथा किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किसी कनिष्ट अधिकारी से कहे गये हैं। इस तरह का अनुमान आम बोलचाल की भाषा या साहित्यिक भाषा में लगाना संभव नहीं है।

3. प्रयोजनमूलक भाषा के प्रयोग-संदर्भ सुनिश्चित होते हैं। एक संदर्भ में प्रयुक्त होने वाली वाक्य संरचनाओ का प्रयोग यदि कोई व्यक्ति भिन्न संदर्भ में या बोलचाल की भाषा में करता है तो उसकी स्थिति हास्यास्पद हो सकती है। जैसे-आपको सूचित किया जाता है कि आप शीघ्र ही पूरे ऋण का भुगतान कर दें, आपको आदेश दिया जाता है कि आप समय से कार्यालय आया करें, यदि आपने आवेदन प्रस्तुत नहीं किया तो आपके विरूद्घ कार्रवाई की जाएगी। इस तरह के आदेशात्मक वाक्यों के प्रयोग 'प्रशासनिक या कार्यालयीन हिंदी' में देखने का खूब मिलते हैं। पंरतु यदि कोई व्यक्ति इसी तरह के आदेशात्मक वाक्यों का प्रयोग अपने घर में पत्नी के साथ करने लगे, जैसे-आपको सूचित किया जाता है कि रोज सुबह आठ बजे नाश्ता पेश किया करें तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस व्यक्ति की अपने घर में क्या दशा होगी।

4. प्रयोजनमूलक भाषा की प्रकृति औपचारिक होती है। जबकि आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग अनौपचारिक संदर्भों में किया जाता है। औपचारिक संदर्भों में प्रयुक्त होने के कारण यहाँ वाक्य संरचनाएँ रूढ़ हो जाती हैं। बोलचाल की भाषा में जो सहजता और लचीलापन दिखाई देता है वह प्रयोजनमूलक भाषा में नहीं मिलता। उदाहरण के लिए आम बोलचाल की भाषा में वक्ता तथा श्रोता परस्पर संबोधन करते समय आम, तुम या तू सर्वनामों में से किसी भी सर्वनाम का प्रयोग करते हुए इस प्रकार के वाक्यो का पयोग कर सकते हैं। जैसे-

(i) आप मेरे घर मत आइए। (औपचारिक)
(ii) तुम मेरे घर मत आना। (अनौपचारिक)
(iii) तू मेरे घर मत आना। (अनौपचारिक)

सामान्य भाषा के वार्तालाप मे तू, तुम तथा आप सर्वनामों का चयन श्रोता की अवस्था, पद, स्टेटस, घनिष्ठता, मन:स्थिति, पारस्परिक संबंध आदि के आधार पर किया जाता है, परंतु प्रयोजनमूलक भाषा में ये मानदंड काम में नही आते। यहाँ तो प्रत्येक स्थिति में एक वचन कर्ता के रूप मे आप सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।

औपचारिक रूप होने के कारण प्रयोजनमूलक भाषा वस्तुत: भाषा का 'लिखित रूप' रूप होती है।

सामान्य भाषा की तरह प्रयोजनमूलक भाषा का प्रयोग बोलचाल के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सीखने के लिए प्रयास करने और निरतंर अभ्यास की आवश्यकता होती है।

5. प्रयोजनमूलक भाषा की प्रकृति 'सूचना प्रधान' होती है। इसके माध्यम से कोई न कोई सूचना तथा संदेशा देने का कार्य किया जाता है। जैसे-पत्रकारिता और जनसंचार की हिंदी में निम्नलिखित वाक्य वस्तुओं के मंहगे या सस्ते होने की सूचना दे रहे हैं:
(i) सोना उछला, चाँदी लुढ़की।
(ii) तिलहन गरम, दालें नरम।

अथवा इसी तरह से प्रशासनिक हिंदी के सूचना-प्रधान वाक्य विलोकिए:

(i) कल से कार्यालय प्रात: 9:30 से खुला करेगा।
(ii) अधिकारियों को समयोपरि भत्ता नहीं दिया जा सकता।

6. प्रयोजनमूलक भाषा समान्य बोलचाल की भाषा या साहित्यिक भाषा से इस मायने में भी भिन्नता रखती है कि यहाँ केवल अभिधात्मक-प्रयोग ही मान्य हैं। आम बोलचाल की भाषा तथा साहित्यिक भाषा में तो लक्षणा और व्यंजना के प्रयोग मिलते हैं, परंतु प्रयोजनमूलक भाषा इस तरह के प्रयोगों का निषेध है। इसी प्रकार साहित्यिक हिंदी में अंलकारप्रधान शैली तथा मुहावरेदार भाषा का प्रयोग भी खूव मिलता है, परंतु पयोजनमूलक भाषा के इस प्रकार के प्रयोगों की अनुमति नहीं देती। उदाहरण के लिए कार्यालीयीन हिंदी में अधिकारी दूसरे अधिकारी के लिए नाराज या प्रसन्न होते हुए भी इस तरह के वाक्यों का प्रयोग नहीं कर सकता-

(i) आपके निर्णय के कारण इस कर्यालय की तो नैया ही डूब गई।(ii) आपके क्रियाकलापों का ही परिणाम है कि हमारे कार्यालय के मुँह पर कालिख पुत गई।
(iii) आपने मेरे प्रमोशन के लिए जो टिप्पण लिखा था उससे मेरे सूने जीवन में बहार आ गई।

7. इसी तरह से जहाँ सामान्य भाषा और साहित्यिक भाषा में अनेकार्थी संरचनाओं का प्रयोग बड़े ही सहज रूप में किया जाता है, वहीं प्रयोजनमूलक भाषा में केवल ऐसे वाक्यों का प्रयोग ही संभव है जिनका केवल एक ही अर्थ निकलता हो। यहाँ यह कोशिश की जाती है कि लेखक जिस बात को कहना चाहता है पाठक उस बात को उसी अर्थ में ग्रहण करे। उदाहरण के लिए सामान्य भाषा में हम इस तरह का वाक्य बोल सकते हैं, जैसे-मोहन ने दौड़ते हूए शेर को मार डाला। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: मोहन दौड़ रहा था और उसने शेर को मार डाला तथा शेर दौड़ रहा था और मोहन ने शेर को मार डाला। पर इस तरह के अनेकार्थी वाक्य प्रयोजनमूलक हिंदी में इस्तेमाल नही किए जा सकते।

8. प्रयोजनमूलक भाषा का प्रयोग अलग-अलग प्रयोग क्षेत्रों में होता है, अत: उसके भिन्न-भिन्न प्रयुक्ति रूप विकसित हो जाते हैं तथा प्रत्येक प्रयुक्ति की अपनी पारिभाषिक शब्दावली भी विकसित हो जाती है। इन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग उसी प्रयुक्ति क्षेत्र मे ही किया जा सकता है। यदि किसी दूसरी प्रयुक्ति में भी वही शब्द किसी कारण से आता भी है तो उसकी अर्थछटा भिन्न हो जाती है। यहाँ कुछ प्रयुक्तियों के पारिभाषिकी शब्दों के उदाहरण प्रस्तुत है:

बैंकिंग हिंदी : खपत, वसीयत, रकम बैंकर, नोटिस, चेक, बिल, लेजर, खाता आदि।

परिवहन के क्षेत्र की हिंदी : सवारी, कुली, डामर, चालू, खपत, यातायात आदि।

विधि के क्षेत्र की हिंदी : करार, अनुबंध, दस्तावेज, दंड, दांडिक, कार्रवाई, अपराध आदि।

सामान्य बोलचाल की भाषा में प्राय: कर्तृवाच्य के वाक्यों का प्रयोग अधिक किया जाता है, जबकि प्रयोजनमूलक भाषा में अकर्तृवाच्य (कर्मवाच्य) के प्रयोग अधिक मिलते हैं क्योंकि 'कर्तृवाच्य के वाक्यों में वक्ता द्वारा कर्ता के कार्य को महत्व दिया जाता है तथा 'कर्मवाच्य' के वाक्यों में उसी कर्ता के कार्य को निरस्त किया जाता है।

प्रयोजनमूलक भाषा की विभिन्न प्रयुक्तियों में कर्मवाच्य के अधिक वाक्य मिलने का करण यही है कि प्रशासनिक भाषा में कार्य करने वाला या आदेश निकालने वाला कोई एक अधिकारी नहीं होता, जिसके कार्य को वक्ता द्वारा महत्व दिया जाए। यहाँ आदेश व्यक्ति नहीं बल्कि सरकार देती है और सरकार किसी एक अधिकारी का नाम नहीं है बल्कि एक व्यवस्था का नाम है। यहाँ किसी भी कार्य के लिए एक व्यक्ति उत्तरदायी नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था ही उत्तरदायी होती है। यही कारण हे कि प्रशासनिक हिंदी में कोई भी उच्च अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारी से इस तरह के वाक्य (कर्तृवाच्य) प्राय: प्रयुक्त नहीं करता:
(i) मैं आपको सूचित करता हूँ कि.................
(ii) मैं आपकों आदेश देता हूँ कि....................

इनके स्थान पर प्राय: इस तरह के वाक्य (कर्मवाच्य) देखने को मिलते हैं:

(i) आपको सूचित किया जाता है..................
(ii) आपको आदेश दिया जाता है...................

10. जहाँ तक प्रयोजनमूलक हिंदी की विभिन्न प्रयुक्तियों का संबंध है, जनसंचार एवं पत्रकारिता की हिंदी को छोड़ कर अधिकांश का विकास अंग्रेजी की संरचनाओं का हिंदी में अनुवाद करने के फलस्वरूप हुआ है। हमने अंग्रेजी के संरचनात्मक ढाँचे मे हिंदी की संरचनाओं को फिट करने की कोशिश की है, अत: लगभग सभी प्रयुक्तियों की वाक्य-संरचना अंग्रेजी के प्रभाव से ग्रसित है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रयोजनमूलक भाषा में स्वाभाविकता के स्थान पर दुरूहता एवं अटपटापन अधिक आ गया है।

इस तरह उपर्युक्त संरचनात्मक विशेषताएँ प्रयोजनमूलक हिंदी को आम बोल-चाल की हिंदी अथवा साहित्यक हिंदी से भिन्न करती हैं। प्रयोजनमूलक हिंदी के जितने भी प्रयुक्ति रूप विकसित हुए हैं जैसे-कार्यालयीन हिंदी, बैंकिंग हिंदी, जनसंचार एवं पत्रकारिता की हिंदी, वाणिज्य एवं व्यापार की हिंदी आदि इन सभी संरचनाओं पर यदि ध्यान दिया जाए तो उनमें ऊपर वर्णित सभी संरचनात्मक विशेषताओं के दर्शन होते हैं। हाँ, इनकी शब्दावली अपने-अपने संदर्भ एवं आवश्यकताओं के अनुरूप विशिष्ट हो जाती है। जनसंचार एवं पत्रकारिता की हिंदी को छोड़कर हिंदी की अधिकांश प्रयुक्तियों का विकास अनुवाद की बैशाखी के सहारे हुआ है अत: उनकी संरचना में वह सहजता और स्वभाविकता नहीं है जो एक सामान्य प्रयुक्ति में होनी चाहिए। अंग्रेजी से अनुवाद करने के प्रयास में अधिकांश प्रयुक्तियाँ असहज एवं बोझिल हो गई हैं। जो भी है, आज प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न प्रयुक्ति रूप अपने-अपने विषय क्षेत्र मे अपना स्वरूप खड़ा कर चुके हैं और उनके स्वरूप के निर्माण में उस प्रयुक्ति की शब्दावली एवं सरंचना का अक्षुण्ण प्रभाव है।

प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण

जब किसी भाषा का प्रयोग भिन्न भिन्न संदर्भों में अलग-अलग प्रयोजनों के लिए किया जाता है, जब उस विशिष्ठ संदर्भ में उस भाषा की शब्दाबली और संरचना विकसित हो जाती है। उदाहरण के लिए आज हिंदी का प्रयोग केवल बोलचाल या साहित्य की भाषा तक ही समिति नहीं है। बल्कि न जाने कितने विषय क्षेत्रों मे उसका बखूवी प्रयोग हो रहा है। चाहे सरकारी कार्यालय हो, या बैंक हों, विज्ञान और तकनीकी का क्षेत्र हो, व्यवसाय हो, पत्रकारिता या मीडिया का क्षेत्र हो सभी क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग का जा रहा है। इन सभी क्षेत्रों की हिंदी की आज अपनी–अपनी ‘पारिभाषिक शब्दावली’ और ‘विशिष्ठ सूचनाएँ विकसित हो चुकी है जो भाषा रूप को दूसरे से अलग करती है, भाषा के इन्ही रूपों को हिंदी 'बैंकिंग हिंदी' जनसंचार माध्यमों की हिंदी', ‘वाणिज्य एवं व्यापार की हिंदी’, 'पत्रकारिता की हिंदी, 'सेना में हिंदी', 'रेलवे में हिंदी' आदि न जाने कितने हिंदी के प्रयोजनमूलक रूप विकसित हो चुके हैं। प्रयोजनमूलक भाषा की प्रयोजनमूलक शैलियों को ही 'प्रयुक्ति' कहा जाता है। तकनीकी ढंग से कहें तो कह सकते हैं कि कार्यालयीन हिंदी अथवाष्पत्रकारिता की हिंदी आदि सभी रूप हिंदी की प्रयुक्तियाँ जो अपने-अपने विषय क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होने के फलस्वरूप विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए पत्रकारिता की हिंदी में सोना/चांदी महँगे/सस्ते नहीं होते बल्कि 'सोना उछलता है' और चाँदी लुढ़कती है', दाले नरम पड़ती है तो तिलहन गरम हो जाता है', जैसे- सोना उछला, चाँदी लुढ़की, दाले नरम, तिलहन गरम।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के विकास के कारण

भारत जैसे देश में प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास के कारणों पर विचार करें तो इस दशा में तीन महत्वपूर्ण कारण हमारे सामने आते हैं : भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा बनाया जाना तथा उसके विकास के लिए विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाएँ किया जाना, तरह तरह के तकनीकी उपकरण तथा कम्प्यूटर तथा आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराया जाना तथा सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा राजभाषा हिंदी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दिया जाना, ये तीनों ऐसे घटक हैं जिनके कारण प्रयोजनमूलक हिंदी का विकास विभिन्न विषय क्षेत्रों में तीव्रता के साथ हुआ।

देश की स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा हिंदी को राजभाषा का जो दर्जा दिया गया और उसके फलस्वरूप देश में जो स्थितियाँ उभरीं, उन्हें प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास का 'संवैधानिक कारण' समझना चाहिए। देश में विभिन्न तकनीकी उपकरणों और कम्प्यूटर के विकास ने जो प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न रूपों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इसके अतिरिक्त प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

1. संवैधानिक कारण

हिंदी के प्रयोजनमूलक भाषा रूपों के विकास के संवैधानिक कारणों मे सबसे महत्वपूर्ण घटना है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान मे हिंदी को राजभाषा का गौरव प्राप्त होना। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से ही गांधी जी तथा देश के अन्य बड़े-बड़े नेताओं ने हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' के रूप मे स्वीकृति प्रदान की थी। स्वतंत्रता पूर्व जो प्रयास हुए उनमें एक ही भावना काम कर रही थी कि हिंदी इस देश की ऐसी भाषा है जो सारे भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध कर आगे बढ़ा सकती है। परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के जब हमारा संविधान बना तो संविधान निर्माताओं ने पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने की शक्ति रखने वाली हिंदी को केवल प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए ही सीमित कर दिया। जो भाषा स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन मे राष्ट्रीय जनजागरण की प्रतनिधि थी, वह संविधान निर्माताओं के द्बारा संघ की राजभाषा बन कर रह गई।

आजादी प्राप्त 1947 होने के बाद 1950 में भारत 'गणतंत्र' बना और 26 जनवरी, 1950 को इसका संविधान लागू हुआ। संविधान में यह व्यवस्था की गई कि 'देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाले हिंदी ही संघ की राजभाषा होगी।’ लेकिन संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि हिंदी उस समय तक राजभाषा के कार्यों का निर्वाह कर पाने के लिए सक्षम नहीं है।

अत: संविधान में यह व्यवस्था की गई कि 1965 तक राजभाषा के रूप में अंग्रेजी का ही प्रयोग पूर्ववत् चलता रहेगा' तथा इस दौरान हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली, संरचनाएँ आदि विकसित करने का कार्य किया जायेगा। इन दोनों व्यवस्थाओं का संबंध संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड (1) तथा (2) से है। बात यहीं तक रहती तो भी कोई बात न थी। इसी अनुच्छेद के खंड (3) में संसद को यह अधिकार भी दे दिया गया कि 1965 के बाद भी संसद चाहे तो 'राजभाषा अंग्रेजी' के प्रयोग को जारी रखने के बारे में व्यवस्था दे सकती है।

इन 15 वर्षों की अवधि के दौरान हिंदी के कार्य को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रपति के दो आदेश निकले। पहला आदेश 27 मई, 1952 को निर्गत हुआ। इस आदेश के द्वारा राज्य के राज्यपालों, उच्च न्यायालय के न्यायधीशों तथा उच्चतम न्यायधीशों की नियुक्ति की अधिसूचनाओं के लिए अंग्रेजी के अतिरिक्त हिंदी और अंतराष्ट्रीय अंकों के अलावा देवनागरी के अंकों को प्राधिकृत किया गया।

राष्ट्रपति का दूसरा आदेश सन् 1959 में जारी हुआ और इसमें संघ के विभिन्न शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी के प्रयोग को प्राधिकृत किया गया। 'इन प्रयोजनों में जनता से पत्र-व्यवहार, प्रशासनिक रिपोर्ट तथा संसद मे प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट, सरकारी संकल्पों तथा विधायी अधिनियमों, हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाने वाली राज्य सरकारों के बीच परस्पर पत्र व्यवहार, संधियों और करारों, अन्य देशों की सरकारों तथा उनके दूतावासों एवं अन्तराष्ट्रीय संगठनों के साथ पत्र-व्यवहार आदि सम्मिलित किए गए।

अनुच्छेद 343 की व्यवस्थाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 15 वर्ष की अवधि में यह कोशिश तो की गई कि हिंदी को प्रयोग ज्यादा बढ़े पर संसंद को यह अधिकार देकर कि 15 वर्ष बाद भी वह चाहे तो अंग्रेजी के प्रयोग को बनाए रख सकती है, वास्तव में हिंदी को राजभाषा का जो दरजा मिलना चाहिए था, नहीं मिला। हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए सन् 1952 तथा सन् 1955 में जो प्रयास उपाय किए गए थे उनसे एक ओर हिंदी का प्रयोग बढ़ा तो अवश्य, पर दूसरी ओर सन् 1965 की समयावधि समाप्त होने को आ रही थी। सन् 1963 में राजभाषा अधिनियम' द्वारा हिंदी को देश की एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाना था, परंतु इसको लेकर कुछ प्रदेशों (विशेषकर तमिलनाडु) में हिंदी का विरोध बढ़ने लगा। देश में एक वर्ग ऐसा खड़ा हो गया जो यह चाहता था कि अंग्रेजी ही इस देश की राजभाषा बनी रहे।

हिंदी विरोधी इन आंदोलनो के चलते इस अधिनियम में संशोधन (1967) किया गया। सन् 1967 में किए गए संशोधन के द्वारा हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में अपना लिया गया।

हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी सह-राजभाषा के रूप में अपनाने के पीछे संविधान निर्माताओं के मन में संभवत: यह भावना रही होगी कि किसी तरह देश में उभरे भाषाई तनावों को पहले कम करने की कोशिश की जाए तथा धीरे-धीरे हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाय।

संविधान के अनुच्छेद 344 (1) में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया था कि वे निर्धारित अवधि के बाद सरकारी क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग की स्थिति को देखते हुए ‘राजभाषा आयोग' का गठन कर सकते हैं।

इसी व्यवस्था के तहत 7 जून, 1955 को ‘राजभाषा आयोग’ का गठन का आदेश निकाला गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1956 मे प्रस्तुत की तथा उक्त आयोग की संस्तुतियों की जाँच के लिए 3 दिसंबर को एक समिति गठित की। समिति में 20 सदस्य लोकसभा से तथा 10 सदस्य राजसभा से नामित किए गए। समिति ने फरवरी 1959 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें निम्नलिखित संस्तुतियाँ की गयी:-

राज्य शिक्षा और सरकारी कामकाज के लिए विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं को अपनाया जाए।

-संघ के सरकारी कामकाज के लिए किसी एक भाषा को अपनाया जाए।

-अंग्रेजी से हिंदी की ओर परिवर्तन घीरे-धीरे किया जाए।

1965 तक अंग्रेजी मुख्य राजभाषा रहे तथा हिंदी सह-राजभाषा तथा 1965 के बाद हिंदी को संघ की मुख्य राजभाषा बनाया जाए तथा अंग्रेजी सह राजभाषा के रूप में चलती रहे।

आगे चल कर राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 1967 तथा राजभाषा नियम 1976 के आने से हिंदी के प्रयोग की स्थितियों मे और भी वृद्धि हुई। राजभाषा अधिनियम के साथ ही सरकार की भाषा-नीति सम्बन्धी संकल्प 18 जनवरी, 1968 को जारी किया गया। इसके अंतर्गत सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए वार्षिक-कार्यक्रम बनाए जाने और इनसे संबधित मूल्यांकन-रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करने का उत्तरदायित्व केंद्र सरकार को दिया गया। इसी संकल्प में संविधान की आठवीं-अनुसूची में उल्लिखित सभी भाषाओं के विकास की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को सौंपी गई।

25 जून, 1975 को, ग्रह-मंत्रालय के अधीन 'राजभाषा विभाग' की स्थापना की गई और राजभाषा अधिनियम 1963 और 1967 में किए गए प्रावधानों को व्यवहार में लाने हेतु 'राजभाषा नियम 1976' के रूप मे भारत के राजपत्र में 17 जुलाई, 1976 को प्रकाशित किया गया। राजभाषा नियम 1976 की महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं:-जो पत्र हिंदी में प्राप्त होते हैं, उनके उत्तर हिंदी में दिए जाएँगे।हिंदी और अंग्रेजी में जारी होने वाले सभी दस्तावेज दोनों भाषाओं मे जारी किए जाएँगे।जिन अधिकारियों/कर्मचारियों ने मैट्रिक या उसके समकक्ष-स्तर का हिंदी-ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उन्हें हिंदी का कार्यसाधक-ज्ञान प्राप्त माना जाएगा।फाइल पर हिंदी में टिप्पणी या मसौदा लिखने वाले कर्मचारी से उसका अंग्रेजी अनुवाद नहीं माँगा जाएगा।प्रत्येक कार्यालय-प्रधान की यह जिम्मेदारी होगी, वह देखे कि राजभाषा-अधिनियम तथा राजभाषा नियमों का अनुपालन समुचित रूप से हो रहा है या नहीं?

इस प्रकार भारतीय भारतीय संविधान ने हिंदी को राजभाषा का दरजा तो दिया पर 1965 तक अंग्रेजी में सरकारी कामकाज चालू रखने की यथास्थिति बनाए रखी। 1965 के बाद जब अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को स्थानापन्न करने की बात सामने आयी तो कुछ हिंदीतर प्रदेशों द्वारा इसका खूब विरोध किया गया। राष्ट्रीयता पर राजनीति हावी होती गई और यह स्थिति कभी नहीं आई कि सरकारी-स्तर पर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में घोषित किया जाता। आज स्थिति यह है सरकारी कामकाज में हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कार्य किया जा रहा है फिर भी देखा जाए तो भारतीय सामाजिक मानसिकता में बदलाव नहीं आया। व्यवहार के स्तर पर अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहा। सरकारी पत्राचार, टिप्पण, प्रारूपण आदि क्षेत्रों में अंग्रेजी में कार्य अनुवाद की बैशाखी के माध्यम से विकसित हुआ।

जो भी हो, आज पूरे देश मे हिंदी का प्रयोग संपर्क-भाषा के रूप में बढ़ा है। हिंदीतर प्रदेशों में अब लोगों को यह अनुभव होने लगा है कि इस देश में रहना है, अपने बच्चों को शिक्षा, नौकरी आदि के क्षेत्र में आगे बढ़ना है तो केवल अपने क्षेत्र में सिमट कर नही बैठा जा सकता। यदि अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर देश के किसी भी क्षेत्र में जाना है तो केवल अंग्रेजी से काम नहीं चल सकता। गत दस-पंद्रह वर्षों में स्थिति में तेजी से परिवर्तन हुआ है। आज देश के किसी भी कोने में चले जाइए, संपर्क-भाषा हिंदी के माध्यम से संप्रेषण किया जा सकता है। 'मीडिया' और केबल टी.वी.' ने इस क्षेत्र में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

इस तरह हिंदी को राजभाषा के रूप मे संविधान द्वारा प्रतिष्ठित किए जोने से धीरे-धीरे यह स्थिति उभरी कि हिंदी का प्रयोग न केवल सरकारी कामकाज में बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों मे भी होना प्रांरभ हुआ। बैंक वाणिज्य एवं व्यापार, विज्ञान, जनसंचार माध्यम, पत्रकारिता, विज्ञापन, रेल, सेना आदि क्षेत्रों में अनुवाद के सहारे ही सही हिंदी का प्रयोग आरंभ हुआ। धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के अपने-अपने कार्य क्षेत्र से संबधित शब्दावली एवं संरचनाओं का विकास हुआ। इस तरह इन सभी क्षेत्रों मे प्रयोजनमूलक हिंदी के अलग-अलग रूप विकसित हुए।

2. तकनीकी कारण:

आज का युग विज्ञान और तकनीकी का युग है। सूचनाओं का जिस प्रकार आज विस्फोट हो रहा है, वैसा आज से पहले कभी नहीं हुआ। कंम्प्यूटर के आगमन से आज ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत बड़ा बदलाव दिखाई देता है। जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ आज कम्प्यूटर ने अपनी उपयोगिता साबित न की हो। जहाँ तक भाषाओं के अध्ययन, विश्लेषण, प्रचार एवं प्रसार की बात है, उसके लिए भी यांत्रिक उपकरणों तथा कम्प्यूटर की मदद से हम अपने लक्ष्य को बहुत ही सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ तक प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास की बात है, यांत्रिक उपकरणों एवं कम्प्यूटरों की मदद से विभिन्न कार्य-कलाप सुगमता एवं तीव्रता से संपन्न किए जा सकते हैं। अनुवाद के कार्य में कंम्प्यूटर काफी उपयोगी साबित हुआ है। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने की तुलना में किसी भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करना अपेक्षाकृत आसान कार्य है, क्योंकि यहाँ एक तो समान शब्दावली काफी मात्रा में मिलती है दूसरे सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश भी समान है। अनुवाद कार्य के लिए दो चीजों का विशेष महत्व होता है: 'कोश' तथा 'भाषिक विश्लेषण'। कंम्प्यूटर के अनुवाद के लिए द्विभाषी कोश तैयार करना बहुत जरूरी है। प्रारंभ मे भाषा विश्लेषण और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग को साथ-साथ रखा गया था। लेकिन आगे चलकर यह अनुभव किया गया कि दोनों को अलग-अलग रखना ही ठीक होगा क्योंकि भाषिक विश्लेषण में यदि किसी कारण से कुछ परिवर्तन करना पड़ता है तो सारा प्रोग्राम ही बदलना पड़ सकता है। आज कम्प्यूटर से हिंदी मे काम किया जाना आंरभ हो गया है। चाहे वह पुस्तक हो या चाहे पत्र-पत्रिकाएँ हों, कम्प्यूटर की मदद से हम अनुवाद कार्य कम समय मे तीव्रता से कर सकते हैं। जब विश्व में विदेशी भाषाओं के विकास में कम्प्यूटर और यांत्रिक उपकरण इतने उपयोगी साबित हुए हैं तो प्रयोजनूलक हिंदी के विकास के लिए भी इनका उपयोग किया जाए तो हम अपने लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैं। आज हिंदी मे कार्य किए जाने के लिए, राजभाषा विभाग के प्रयत्न से, विभिन्न प्रकार की यांत्रिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं परंतु वे अभी भी पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में और भी तेजी से कार्य करने की आवश्यकता है।

3.संस्थागत कारण: प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास में गैर सरकारी तथा गैर-सरकारी दोनों ही प्रकार की संस्थाओं की विशिष्ट भूमिका रही है। जहाँ तक गैर-सरकारी संस्थाओं का सवाल है, इनमें से अधिकांश स्वतंत्रता पूर्व से ही हिंदी की सेवा कर ही हैं। दूसरी ओर सरकारी संस्थाओ ओर संगठनों की ओर से यह कार्य स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा का दरजा दिए जाने के बाद आरंभ हुआ है। सरकारी संगठनों के प्रयासों से जहाँ हिंदी के प्रयोजनमूलक रूप को विकसित होने का अवसर मिला है वहीं गैर-सरकारी संस्थाओं के द्वारा हिंदी का सर्वागीण विकास हुआ है।

ग़ैर सरकारी संस्थाएँ: भारत में स्वतंत्रता-आंदोलन के साथ ही साथ सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक आंदोलन ने भी जन-जीवन को काफी प्रभावित किया था।

इन समस्त सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों ने राष्ट्रीय आन्दोलनों के साथ सहयोग कर लोगों के मन में स्वभाषा-प्रेम को जगाने तथा जनभाषा और साहित्य को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन सभी आदोलनों के प्रवर्तकों ने अंग्रेजी की तुलना में हिंदी को राष्ट्रीय-स्तर पर महत्व दिया और हिंदी तथवा अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से प्रचार–प्रसार किया। राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार–प्रसार में जिन धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, वे इस प्रकार हैं-धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँब्रह्म समाजआर्यसामाजसनातन धर्म सभाथियोसोफिकल सोसाइटीरामकृष्ण मिशनराधा-स्वामी संप्रदायहिंदी प्रचारक संस्थाएँ 

हिंदी के प्रचार-प्रसार में सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं के अलावा अनेक स्वैच्छिक संस्थाएँ भी आगे आयीं। इनमें से अधिकांश की स्थापना स्वतंत्रता पूर्व हुई थी पर ये आज भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के कार्य मे अपना-अपना सहयोग दे रही हैं। देश के हिंदीतर प्रान्तों में रह कर इन संस्थाओ ने वहॉं हिंदी के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार किया है और लगभग सभी संस्थाएँ नि:स्वार्थ भाव से आज भी अपना काम कर रही हैं। इनमें कुछ संस्थाएँ है :-

नागरी प्रचारिणी सभाहिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागदक्षिण भारत हिंदी प्रचार-सभा, मद्रासराष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धागुजरात विद्यापीठ, अहमदाबादमहाराष्ट्र राष्ट्रभाषा, पुणेबंबई हिंदी विद्यापीठ, बंबईहिंदी विद्यापीठ, देवघरअसम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटीनागरी लिपि परिषद, दिल्ली

सारे देश में फैली हुई विविध स्वैच्छिक संस्थाओं के हिंदी प्रचार एवं प्रसार के कार्यक्रमों को कार्यान्वित किए जाने के फलस्वरूप ही आज हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभाषा तथा राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिली है। कतिपय हिंदीतर प्रदेशों में जब-जब हिंदी के विरोध के स्वर तीव्र हुए उस समय इन स्वैच्छिक संस्थाओं ने हिंदी के अनुकूल वातावरण बनाए रखने में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। डॉ. मलिक मोहम्मद के अनुसार "इन स्वैच्छिक संस्थाओं के कार्यकर्ता राष्ट्रीय-भावना और सेवा-भाव से प्रेरित होकर हिंदी की सेवा में डटे रहे हैं। हिंदी भाषा ओर साहित्य के उन्नयन में इन संस्थाओं का बहुत बड़ा हाथ रहा है। जबसे हिंदी को राजभाषा का पद मिला, तब से इन संस्थाओं का कार्यक्षेत्र भी बहुत बढ़ गया।"

सरकारी संस्थाएँ

सरकारी संस्थाओं के लिए राष्ट्रपति के निर्देश: स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा जब हिंदी को संघ की "राजभाषा" का दर्जा दिया गया तो "राजभाषा" के विकास, प्रसार एवं स्वरूप-निर्धारण का उत्तरदायित्व भी संघ-सरकार का हो गया। केंद्र सरकार द्वारा हिंदी के विकास एवं हिंदी प्रयोग की क्षमताओं को विकसित करने के उद्देश्य से शब्दावली निर्माण, अनुवाद कार्य, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था का उत्तरदायित्व प्रमुख रूप से शिक्षा-मंत्रालय (मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय), गृह-मंत्रालय, विधि-मंत्रालय तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपा गया तथा अन्य सभी मंत्रालयों को भी "राजभाषा" के विकास हेतु कार्य किए जाने के निर्देश दिए गए। सरकारी स्तर पर हिंदी के विकास के लिए सभी मंत्रालयों ने उनको सौंपे गए कार्यों को पूरा करने के उद्देश्य से अनेक विभाग और अधीनस्थ कार्यालयों, संस्थाओं और संगठनों की भी स्थापना की। हर मंत्रालय में अपनी-अपनी हिंदी सलाहकार समितियाँ बनाई गयीं, जिनके अध्यक्ष उस मंत्रालय के मंत्री बनाए गए। इन समितियों में संसद के सदस्यों, विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों के अलावा गैर–सरकारी सदस्यों को भी सदस्य बनाया गया। सभी मंत्रालयों के हिंदी के कार्यक्रमों में एक समन्वय स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में "केंद्रीय हिंदी समिति" का भी गठन किया गया। सभी मंत्रालय तथा उनके अधीनस्थ विभागों ने राजभाषा हिंदी के विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ तथा कर्याक्रम संचालित किए, जिसके फलस्वरूप हिंदी का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए अलग-अलग विषय क्षेत्रों में किया जाना आरंभ हुआ और प्रयोजनमूलक हिंदी की विभिन्न प्रयुक्तियों का विकास संभव हो सका।

विभिन्न मंत्रालय तथा उनके अधीनस्थ कार्यालय एवं संगठन:

गृह-मंत्रालय

राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग तथा राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लिए भी योजनाएँ तथा कार्यक्रम बनाए गए हैं तथा राजभाषा हिंदी के विकास हेतु अन्य मंत्रालयों को जो आदेश दिए जाते हैं, उन सब का उत्तरदायित्व केंद्रीय सरकार के "ग्रह मंत्रालय" का सौंपा गया है। राजभाषा हिंदी के विकास को ध्यान में रखकर "राजभाषा आयोग" के गठन तथा "संसदीय", राजभाषा समिति की नियुक्ति का उत्तरदायित्व भी गृह मंत्रालय के ही अधिकार क्षेत्र में आता है। राजभाषा से संबधित जितने भी कार्य है उनके संबंध में अन्य मंत्रालयों को आदेश, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था का उत्तरदायित्व प्रमुख रूप से शिक्षा मंत्रालय (मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय) गृह मंत्रालय को सौंपा गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास के पीछे भारतीय संविधान में की गई विभिन्न व्यवस्थाएँ उन व्यवस्थाओं को क्रियान्वित करने के लिए उपलब्ध कराए गए तकनीकी संसाधन तथा गैर–सरकारी संस्थाओं के प्रयास रहे हैं। इन तीनों प्रमुख कारणों के परिणामस्वरूप ही प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप जैसे– कार्यालयीन हिंदी अथवा प्रशासनिक हिंदी, बैकिंग हिंदी, वाणिज्य एवं व्यापार की हिंदी, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र की हिंदी, जनसंचार एवं पत्रकारिता की हिंदी, विज्ञापनों की हिंदी आदि अनेक प्रयुक्ति-रूप सामने आये हैं। आम बोलचाल की हिंदी के व्यतिरेक में अपना-अपना अस्तित्व बना चुके हैं। तथा जिन्होंने प्रयोजनमूलक हिंदी को नया स्वरूप प्रदान किया है।

On Feb 4, 2017 11:08 PM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnai...@gmail.com> wrote:
व्यक्ति द्वारा विभिन्न रूपों में बरती जाने वाली भाषा को भाषा-विज्ञानियों ने स्थूल रूप से सामान्य और प्रयोजनमूलक इन दो भागों में विभक्त किया है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी (Functional Hindi) से तात्पर्य हिन्दी के विज्ञान, तकनीकी, विधि, संचार एवं अन्यान्य गतिविधियों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी से है। हिन्दी केवल साहित्य की भाषा न रहे बल्कि जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रभावी रूप से प्रयुक्त हो, तभी इसका विकास सुनिश्चित होगा। सुखद सूचना यह है कि हिन्दी की इस नितांत ताजा-टटकी और कई संदर्भों में बेहद नयी भाषिक-संरचना या नवजात शिशु रूप को केन्द्रीय विश्वविद्यालयों ने अपने-अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर इसे सम्मानित किया है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी आज इस देश में बहुत बड़े फलक और धरातल पर प्रयुक्त हो रही है। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच संवादों का पुल बनाने में आज इसकी महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज इसने एक ओर कम्प्यूटर, टेलेक्स, तार, इलेक्ट्रॉनिक, टेलीप्रिंटर, दूरदर्शन, रेडियो, अखबार, डाक, फिल्म और विज्ञापन आदि जनसंचार के माध्यमों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, तो वहीं दूसरी ओर शेयर बाजार, रेल, हवाई जहाज, बीमा उद्योग, बैंक आदि औद्योगिक उपक्रमों, रक्षा, सेना, इन्जीनियरिंग आदि प्रौद्योगिकी संस्थानों, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों, आयुर्विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, ए० एम० आई० के साथ विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी, अर्द्धसरकारी कार्यालयों, चिट्ठी-पत्री, लेटर पैड़, स्टॉक-रजिस्टर, लिफाफे, मुहरें, नामपट्ट, स्टेशनरी के साथ-साथ कार्यालय-ज्ञापन, परिपत्र, आदेश, राजपत्र, अधिसूचना, अनुस्मारक, प्रेस–विज्ञाप्ति, निविदा, नीलाम, अपील, केबलग्राम, मंजूरी पत्र तथा पावती आदि में प्रयुक्त होकर अपने महत्व को स्वतः सिद्ध कर दिया है। कुल मिलाकर यह कि पर्यटन बाजार, तीर्थस्थल, कल-कारखने, कचहरी आदि अब प्रयोजनमूलक हिन्दी की जद में आ गए हैं। हिन्दी के लिए यह शुभ है।

परिचय:-

भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को केन्द्रीय संघ राज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त है, परन्तु व्यवहार में अंग्रेजी भाषा का बोल-बाला ज्यादा है। अंग्रेजदाँ लालफिताशाही तथा भाषा की राजनीति करने वाले राजनयिक अंग्रेजी के पक्ष में कितने भी तर्क देते रहें, इस देश का सामान्य-जन एक सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी भाषा का भाषिक संरचना, व्याकरण तथा अनुवाद के धरातल पर अध्ययन आज की एक परम आवश्यकता है। प्रयोजनमूलक, प्रयुक्तिमूलक तथा व्यावहारिक आदि सम्बोधनों से होनेवाला यह भाषिक अध्ययन ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा के वास्तविक सिंहासन पर अधिष्ठित कराने का सही और सार्थक मार्ग बन सकता है।

आज तक एक साहित्यिक भाषा के रूप में हिन्दी ने अपनी क्षमता का परिचय दिया और हिन्दी पर अविकसित भाषा होने का लांछन लगाने वाले अंग्रेजदाँ की बोलती बंद की है। इसलिए अब यह तर्क दिया जा रहा है कि एक कामकाजी भाषा के रूप में हिन्दी की प्रकृति क्लिष्ट और दुर्बोध है।

भाषा की क्लिष्टता उसकी प्रयुक्तिगत संरचना के साथ ही प्रयुक्ति मात्रा पर निर्भर होती है। इसलिए आवश्यक है कि विविध प्रयुक्ति-रूपों में उसका व्यापक रूप में प्रयोग हो तथा प्रयोग के आधार पर ही अद्भुत समस्याओं का निराकरण हो। हमारी विडम्बना है कि तालाब के किनारे खड़े होकर तैराकी की अनिवार्यता और उसकी समस्याओं पर मात्र परिचर्चाओं में हम मशगूल हैं। इस विडम्बना से मुक्त होना अनिवार्य है। इसलिए विविध विश्वविद्यालयों के हिन्दी के पाठ्यक्रमों में ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ को स्थान दिया जा रहा है।
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