”जीवन-मूल्य या मानव मूल्य– इस पर देश के विद्वानों में मतभिन्नता चर्चा है वस्तुत: दोनों में बहुत अंतर नहीं है। दोनों को मिलाकर मूल्य आधारित शिक्षा कहना अधिक उपयोगी होगा। धार्मिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा भी इसी में सम्मिलत है।
मूल्य का अर्थ –
o एक अर्थ का अर्थ कीमत, क्रय-विक्रय के अर्थ में उपयोग होता है
o जिसमें आदर्श और पुरूषार्थ है, जिसमे मानव जीवन का सम्पूर्ण विकास हो सके।
o मूल्य के अर्न्तगत सभी गुण समाविष्ट होने चाहिए जिनका सम्बन्ध अभ्यन्तर(आत्मनेपद) बाह्य(परस्मैपद) और एक साथ दोनों (अभयपद)
भारतीय जीवनमूल्यों को समझने की मुख्यत: तीन दृष्टियाँ हो सकती हैं।
1 दार्शनिक आधार
2 सामाजिक चेतना
3 वैयक्तिक चरित्र = आचरण
शिक्षा का अर्थ है :- विद्या ज्ञान का अर्जन और हस्तांरण, प्रशिक्षण।
o वेद के छ: अंगों मे से शिक्षा का प्रथम स्थान है (शिक्षा, कल्प, निरूक्त, व्याकरण, छन्दस् और ज्योतिष)
o एतरेय उपनिषद के मंगलाचरण मंत्र में शिक्षा का अर्थ :-
o वाड् में मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मेवाचि प्रतिष्ठितम् । आविराविर्म एधि।श्रुतं मे मा प्रहासी:। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामिं। ऋतंवदिष्यामि। सत्यंवदिष्यामी। तन्मामवतु। तद्धत्कारमवतु अवतु माम। अवतुवत्कारम। अवतुवक्तारम्। ; शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
भावार्थ :- मेरी वाणी मेरे मन में प्रतिष्ठित हो। मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। आप परमेश्वर जो सर्वत्र प्रकट है, यहाँ-शिक्षा-स्थल पर-साक्षात् प्रकट हों। मैं जो शिक्षा प्राप्त करूँ, वह नष्ट व्यर्थ न होने पाए। इस अध्ययन के द्वारा मैं अपने दिन-रात का पोषण करता हूँ। मैं अपनी वाणी से धर्मानुकूल न्यायोचित वचन कहुँगा। मैं सत्य वचन बोलूगा। वह धर्म वह सत्य मेरी रक्षा करे। वक्त की रक्षा करे। मेरी-श्रोता (शिष्य) की तथा वक्ता- शिक्षक की रक्षा करे।(और हम दोनों के बीच होनेवाला शिक्षा का विनिमय), हे ओंकार स्वरूप परमात्मन्। तीनों लोको- पृथ्वी, आकाश, पाताल में शान्ति प्रसार करने वाला हो।
o शिक्षा के अन्य अर्थ है : विनम्रता और विनयशीलता, श्रुति मधुरता-(विद्या ददाति विनमय)
शिक्षा से अभिप्रेत
ऐसी शिक्षा जिससे व्यक्तित्व के संसारिक एवं पारमार्थिक विकास को उपलब्ध किया जा सके।
– जो गुरू-शिष्य, अपने-पराये तथा विश्वभर के लिए शान्ति के सन्देश वाहिका हो।
– जिसमे वाणी और मन की अक्षतता (Intigrity of thought and Speech) विद्यमान हो।
– जो धर्मानुकूल, न्यायसम्मत तथा सत्ययुक्त जीवन व्यतीत करने की प्ररेणा देती हो।
– जिससे योग और क्षेम की तथा अर्थ और परमार्थ की सिद्धि सम्मत हो।
– जो हमे विनित, विनम्र और मृदुभाषी बना सके।
;गुरूवाणी में कहा गया है कि ”सच सबसे ऊपर है, यदि उससे ऊपर कुछ है तो वह है
सच का आचरण।”
& दान, यज्ञ, तप, होम और वेद – इन सबका आधार सत्य है।
शाश्वत, उपरिमेय सत्य की अनुभूति: जीवन का चरम मूल्य है।
हिन्दुधर्म मे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरूषार्थ माना गया है। धर्मपूर्वक अर्थ, काम का सेवन करने हेतु मूल्यों की स्थापना की है।
मनुस्मृति में धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह:, बुद्धि, विद्या, सत्य और
अक्रोध-धर्म के दस लक्षण कहे गए है
– कीरत करो, नामजपो, बंडछको अर्थात ‘ संगत, पंगत और लंगर’ के दर्शन का प्रतिपादन
करते हुए सामाजिक समरसता का प्रचार किया।
उपनिषद के तीन द ‘द-द-द’ स्वर हमे दमन, दान, दया को जीवन-मूल्यों के रूप में
अपनाने की शिक्षा देता है।
जैन दर्शन
& जैन दर्शन में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य मूल्यों पर बल दिया है।
– जो अपना नही है उसे प्राप्त करने की इच्छा करना भी चोरी है।
श्रीमद्भागवत् में तो कहा है- अपने जीवन-निर्वाह की आवश्यकता से अधिक जो अपने पास
रखता है अर्थात दान नहीं करता वह – चोरी के धन का ही उपयोग करता है।
स्वामी विवेकानंद
”पत्थर की मांशपेशियाँ और फौलाद के भुजदण्ड” मन से छिछली भावुक्ता के प्रवाह को निरूद्ध करने में समर्थ और बुद्धि से विभिन्न प्रकार की शिक्षा- कला तथा वैज्ञानिक विद्याओं को आत्मसात् करने को तत्पर-विद्यार्थी -जीवन में इन गुणों के विकास के लिए ही ब्रह्मचर्य को जीवन- मूल्यों के रूप में अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया था।
श्री कृष्ण के शब्दो में
– ”धर्म विरूद्धों भूतेषु कामोडस्मि भरतर्षम” -गीता
बौद्धधर्म के सुत्तनिपात, खुदुकपाठ इत्यादि ग्रन्थों में भगवान बुद्ध की देशना के अर्न्तगत मैत्री, करूणा, उपकार, जीवदया, आदि गुणों पर बार-बार बल दिया गया है।
श्रीमद्भागवत गीता (17-14-16) में शारीरिक, वाचिक व मानसिक तीन प्रकार के तपो का
उल्लेख है:-
32।171 – क़ायिक तप: ईश्वर, विद्वान महापुरूषों तथा गुरूजनों का पूजन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा।
32।17।2 – वाचिक तप: प्रीतिकर, सत्य, प्रिय ओर हितकारी वाक्य, स्वाध्याय का अभ्यास।
32।17।3 – मानसिक तप: प्रसन्न मन एकता, सौम्यत्व, मौन (मित भाषण) आत्मसंयम, विचारो भावो की पवित्रता।
तैतरीय उपनिषद के प्रसिद्ध वचन है : मातृदेवो भव:, पितृदेवोभव:, आचार्यदेवोभव:, अतिथिदेवोभव:।”स्वाध्यायन्मा प्रमद:”
अहम् से वयम् की यात्रा मानव जीवन का लक्ष्य है और यही लक्ष्य शिक्षा का है।
– मूल्य परक शिक्षा इस यात्रा में उसका पथ प्रदर्शन करती है।
– शरीर, प्राण, मन, बुद्धि तथा आत्मा। पांच अंगों से पांच आधारभूत मूल्य नि:सृत होते है-
सक्षमता, संतुलन, संयम, सत्यान्वेषण, (विवेक) तथा सेवा।
धृति, क्षमा, दान, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य एवं आक्रोध इन दस गुणों का मिलान यहुदियों, ईसाईयों के दस आदेशों से किया जा सकता है
सत्यं, शिवम् सुन्दरम् ये तीनों गुण क्रम से ज्ञान इच्छा तथा क्रिया के प्रतीक है।
दैत्यराज प्रहलाद ने प्राथमिकता के आधार पर शील, धर्म, सत्य, सदाचार, सबलता पांच गुण गिनाये है।
पंतजलि ने अध्यात्मिक विकास के लिए अष्टांग मार्ग को प्रस्तुत किया है तथा जीवनमूल्यों का वैयक्तिक तथा सामाजिक दो भागों में विभाजन किया है।
श्री अरविन्द के अनुसार
-जबसे जीवन मूल्यों का शिक्षा से विछोह हो गया है तबसे देशवासी ”धर्मभ्रष्ट तथा लक्ष्यभ्रष्ट” हो गये है।
विभिन्न आयोगों की अनुशंसाएँ
– राधाकृष्ण आयोग के अनुसार धर्म के प्रति जो भारतीय दृष्टिकोण है उसमें और धर्मनिरपेक्षता- (सर्वधर्म समभाव) में काई अन्तर नहीं है। भारत में धर्म की शिक्षा का आधार आध्यात्मिकता है, बिना आध्यात्मिकता के नैतिक जीवन मूल्यों का विकास सम्भव नहीं। धार्मिकता से अभिप्राय आध्यात्मिकता माना जाए, अत: धार्मिक शिक्षा का अर्थ अध्यात्मिक शिक्षा होना चाहिए।
राधाकृष्ण आयोग ने धार्मिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए जो सुझाव दिये है वह इस प्रकार है:-
– सभी शिक्षण संस्थाओं में कुछ मिनटों तक छात्र मौन रहकर ध्यान करें और फिर इसके बाद शिक्षण कार्य प्रारम्भ हो। इसमें शिक्षक भी शामिल हो।
– विभिन्न धर्मो के तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों (जैसे – गीता,
बाइबिल, कुरान, गुरूग्रन्थ साहिब, धम्मपद आदि) के सारभूत अंश छात्रों को पढ़ाया जाए।
मृदलियार आयोग(52-53)- विद्यालयों में सामूहिक प्रार्थना और प्ररेक प्रसंगों को भी महत्व दिया जाए। परिवार समाज और विद्यालय का परिवेश बालकों के नैतिक एवं चरित्र विकास में सहायक हो।
– नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का छात्रों के चरित्र निर्माण में सहायक होना चाहिए।
कोठारी आयोग-(64-66) – के अनुसार नैतिक आध्यात्मिक विकास के लिए सर्वधर्म समभाव की शिक्षा छात्रों को दी जाये, धार्मिक शिक्षा से तात्पर्य नैतिक शिक्षा है। जिससे उनमें विभिन्न वर्गो की अच्छी बातों को ग्रहण करके अपने चरित्र का निर्माण करे, देश के उत्थान में योगदान दें तथा मानव-कल्याण के लिए अग्रसर हों।
मूल्य-शिक्षा का मूल्यांकन :-
अ छात्र द्वारा स्वमूल्यांकन
ब आचार्य द्वारा स्वमूल्यांकन
– सतत् निरीक्षण से – समुह में कार्य का अवलोकन से
– अभिभावकों से संपर्क करके – वार्तालाप से
– दायित्व प्रदान कर परिणामों को आंकने से
– विशेष परिस्थिति निर्माण कर उसके व्यवहार को देखने से
– प्रकृति-प्रकोप तथा अन्य आन्तरिक बाह्य कष्ट की घडी में उसकी सहभागिता से
– खेलकूद की रूचियों से
– पुस्तकालय से लेकर जाने वाली पुस्तकों से
– अन्य सभी आचार्यो, सहपाठियों के अभिमत से
– अन्य अभिरूचियों से, – लिखित परिक्षा से
;जीवनमूल्यों का एक महत्वपूर्ण आधार बना लोक कल्याण की चेतना।
किसी देश, काल और परिस्थिति में जन-सामान्य की उदात्त मान्याताएँ ही मानव मूल्य
होतीहै।
– जिसका ध्येय व्यापक लोक-कल्याण हो।
– जिससे व्यक्ति का उदात्तिकरण हो।
”सत्यं वद् धर्म चर”
– सच बोलो, पर धर्म पर आचरण करना उससे भी बढ़कर है।
दु:ख में साथ देने से दु:ख घटता है, और सुख में साथ देने से सुख बढ़ता है।
अनुचित साधनों से उचित साध्य की प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
– अपने यहाँ सामान्यत: युद्ध में भी उचित साधनों का आश्रय लिया जाता है, इसलिए उसे
धर्मयुद्ध की संज्ञा दी गई है।
भारतीय मूल्यों में बाह्य की अपेक्षा आन्तरिक भाव का अधिक महत्व है।
विवेकानन्द ने नव-विवाहित अमेरिकन दम्पति को बताया था की आपके देश में दर्जी किसी
भी व्यक्ति को सभ्य और सुसंस्कृत बनाता है भारत में उदात्त चरित्र ही किसी भी व्यक्ति
को सुसंस्कृत बनाता है।
संतुलन और समन्वय भारतीय जीवनमूल्यों की एक और विशेषता है।
भारतीय समाज में विद्वान से चरित्रवान का अधिक महत्व है।
अर्थ और काम की जब तक धर्म नियंत्रित करता है तब तक मोक्ष (आनन्द) रूपी
जीवन-पथ पर अग्रसर होते रहते है।
– यहाँ का अनपढ़ ग्रामीण अथक परिश्रम करके एक समय भूखा रह सकता है, लेकिन मोक्ष
की कामना को नहीं छोड़ सकता है।
भारतीय जीवनमूल्यों का मूलाधार है उस अव्यक्त शक्ति में विश्वास।
– ”यतोऽभ्युदय: नि: श्रेयस-सिद्धि: स धर्म ”
अपने यहां प्रत्येक कार्य हेतु नियम बने हुए है उन्हीं को जीवन-मूल्य कहते है।
अर्थ और काम प्रवृतिपरक मूल्य है धर्म और मोक्ष निवृतिपरक मूल्य है।
भारतीय मूल्य का मेरूदण्ड निवृतिपरक प्रवृति।
आचार प्रभावों धर्म: (धर्म आचरण प्रदान है)
मूल्य शिक्षण यह वैश्विक आवश्यकता है।
सभी जाति, पंथ, सम्प्रदाय हेतु आवश्कता है।
वर्तमान में विश्व में क्राईसिस ऑफ केरेक्टर है
If wealth is lost nothing is lost
If health is lost something is lost
But character is lost everything is lost
चरित्र मूल्य-शिक्षा के बिना संभव नहीं है।
मूल्य के लिए अलग पुस्तक की आवश्यकता नहीं, पाठयचर्या के अर्न्तगत ही समावेश होना
चाहिए।
मूल्य शिक्षा में शिक्षक की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।
आचरण से ही आचार्य शब्द आया है।
इस हेतु शिक्षक प्रशिक्षण एवं शिक्षकों के पाठयक्रम में मूल्य शिक्षा का समावेश अनिवार्य है।