चंचल पग दीप-शिखा-से / सुमित्रानंदन पंत

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Vashini Sharma

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Feb 3, 2014, 10:21:26 PM2/3/14
to hindishikshakbandhu

चंचल पग दीप-शिखा-से / सुमित्रानंदन पंत

चंचल पग दीप-शिखा-से धर
गृह,मग, वन में आया वसन्त!
सुलगा फाल्गुन का सूनापन
सौन्दर्य-शिखाओं में अनन्त!

सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसन्त, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह!

पल्लव-पल्लव में नवल रुधिर
पत्रों में मांसल-रंग खिला,
आया नीली-पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला!

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब के गाल लजा,
आया, पंखड़ियों को काले--
पीले धब्बों से सहज सजा!

कलि के पलकों में मिलन-स्वप्न,
अलि के अन्तर में प्रणय-गान
लेकर आया, प्रेमी वसन्त,--
आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण!

काली कोकिल!--सुलगा उर में
स्वरमयी वेदना का अँगार,
आया वसन्त, घोषित दिगन्त
करती भव पावक की पुकार!

आः, प्रिये! निखिल ये रूप-रंग
रिल-मिल अन्तर में स्वर अनन्त
रचते सजीव जो प्रणय-मूर्ति
उसकी छाया, आया वसन्त!
रचनाकाल: अप्रैल’१९३५

साभार : कविता कोश 

वशिनी


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अपने अनुभवों और ज्ञान को आपस में एक दूसरे से और नई पीढ़ी से भी साझा करने के लिए  हिंदी विद्वानों/अध्यापकों और छात्रों का एक वैश्विक समूह.

   A global  group of hindi scholars / teachers and students who are always ready to share their experiences and knowledge with each other and with new generation as well.

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