बंधुवर,
निर्देश निधि द्वारा लिखित “शेष विहार” पढ़कर मैं न केवल भयाक्रांत हो गया था, बल्कि विचलित भी हो गया था और मैं चाहता था कि इस कहानी को विश्व-भर के पाठक पढ़ें और समय रहते ऐसे उपाय करें जिससे हम अपने इस प्यारे भूमंडल को आसन्न् भयानक विभीषिका से बचा सकें.
इस संदर्भ में मुझे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की अमर कृति गीतांजलि का स्मरण हो आया. हम सब जानते हैं कि इस काव्यकृति की रचना मूलतः बंगला में की गई थी, लेकिन गुरुदेव ने स्वयं 1912 में इंग्लैंड की यात्रा से पहले इसकी कुछ कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर लिया था. अंग्रेज़ी में उपलब्ध सामग्री के कारण ही गीतांजलि पश्चिम में बेहद लोकप्रिय हो गई थी और 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले टैगोर पहले गैर-यूरोपीय लेखक बन गए.
इस बात से प्रेरणा लेकर पुणे प्रवास के दौरान मैंने अपने अनुजवत् मित्र कैप्टन रघुवंशी से चर्चा की और हिंदी की कालजयी रचनाओं को अंग्रेज़ी में अनूदित करने की योजना बनाई. नमूने के तौर पर कैप्टन साहब ने पुणे के ही हमारे मित्र संजय भारद्वाज की हिंदी में रचित कुछ श्रेष्ठ रचनाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर दिया. संजय जी और मैं दोनों ही कैप्टन साहब की अनुवाद-क्षमता के कायल हो गए. कैप्टन प्रवीण रघुवंशी न केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रवीण हैं, बल्कि उर्दू और संस्कृत में अच्छा-खासा दखल रखते हैं. कुछ समय पूर्व उन्होंने मेरे अनुरोध पर उन्होंने भारत के महान् सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता स्व. केदारनाथ साहनी की पुण्यस्मृति में प्रकाशित उनके स्मृति ग्रंथ की भूमिका का हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था. यह भूमिका लिखी थी, भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने. इस अनुवाद की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई.
यही कारण है कि जब मैंने निर्देश निधि की उक्त कहानी पढ़ी तो मैंने इसके अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए कैप्टन साहब से ही अनुरोध किया. कैप्टन साहब ने न केवल तत्परतापूर्वक इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, बल्कि इसको बार-बार परिमार्जित करके मूल कहानी की तरह ही प्रस्तुत कर दिया.
मैं इस कहानी की मूल लेखिका निर्देश निधि और कैप्टन साहब के प्रति आभार प्रकट करते हुए इस रचना के दोनों पाठ (हिंदी और अंग्रेज़ी) हिंदी विमर्श और हिंदी शिक्षण योजना के सदस्यों के साथ-साथ विश्व-भर के अपने हिंदी मित्रों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ और विशेषकर अनूप भार्गव, सुरेंद्र गंभीर जी, सुषम बेदी जी, संध्या भगत, कैलाश बुधवार जी, विजय राणा जी, महेंद्र कुमार वर्मा जी, कृष्णकुमार जी, जया वर्मा जी, उषा वर्मा जी, उषाराजे सक्सेना, केबीएल सक्सेना, दिव्या माथुर जी, अशोक ओझा जी, रंजना वार्ष्णेय जी और रोहित कुमार हैप्पी जी जैसे मित्रों से अनुरोध करूँगा कि वे इस कहानी के अंग्रेज़ी पाठ को पढ़ने के लिए अपने विदेशी मित्रों को प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से मुझे, लेखिका को और अनुवादक को अवगत कराएँ.
सादर
विजय
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