कमलेश्वर के शब्दों में शब्दाचार्य अरविंद कुमार की अरविंद वर्ड पावर

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Vijay K Malhotra

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Mar 22, 2017, 4:42:09 AM3/22/17
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हिंदी में टोटकेबाज़ , खेमेबाज़ , ड्रामेबाज़ , दुकानदार और जाने क्या-क्या बहुतेरे हैं पर अरविंद कुमार जैसा तपस्वी ऋषि आज की तारीख में हिंदी में कोई दूसरा नहीं । पचासी साल की उम्र में आज भी वह हिंदी के लिए जी-जान लड़ाए पड़े हैं । रोज छ से आठ घंटे काम करते हैं ।  कंप्यूटर पर माउस और की बोर्ड के साथ उनकी अंगुलियां नाचती रहती हैं । हिंदी और अंगरेजी  के शब्दों से जूझते हुए वह जीवन में आ रहे नित नए शब्दों को अपने कोश में गूंथते रहते हैं , ऐसे जैसे कोई मालिन हों और फूलों की माला पिरो रहे हों । ऐसे जैसे कोई कुम्हार हों और शब्दों के चाक पर नए-नए बर्तन गढ़ रहे हों । ऐसे जैसे कोई जौहरी हों और कोयले में से चुन-चुन कर हीरा चुन रहे हों । ऐसे जैसे कोई गोताखोर हों और समुद्र में गोता मार-मार कर एक-एक मोती बिन रहे हों । शब्दों का ।  जैसे कोई चिड़िया अपने  बच्चों  के लिए एक-एक दाना चुनती है अपनी चोंच में और फिर बच्चों की चोंच में अपनी चोंच डाल कर उन्हें वह चुना हुआ दाना खिलाती है और खुश हो जाती है । ठीक वैसे ही अरविंद कुमार एक-एक शब्द चुनते हैं और शब्दों को चुन-चुन कर अपने कोश में सहेजते हैं और सहेज कर खुश हो जाते हैं उस चिड़िया की तरह ही । कोई चार दशक से वह इस तपस्या में लीन हैं । काम है कि खत्म नहीं होता और वह हैं कि थकते नहीं । वह किसी बच्चे की तरह शब्दों से खेलते रहते हैं।

अरविंद कुमार जैसा इश्कबाज़ भी मैंने दूसरा नहीं देखा । अब आगे भी कहां देखूंगा भला ? अरविंद कुमार को शब्दों से इश्क है । दुनिया की जैसे सभी भाषाओं और उन के शब्दों से  उन्हें बेतरह इश्क है । और अकसर कहते ही रहते हैं कि , ' जब तक भाषाएं बढ़ती और संवरती रहेंगी, मेरा काम चलता रहेगा !'   यानी कि  जब तक दुनिया चलेगी , भाषाएं बढ़ती और संवरती ही रहेंगी और अरविंद काम करते रहेंगे । यह तो इश्क की इंतिहा है । शब्दों से उन की इस आशिकी ने कई गुल खिलाए हैं । उन का नया इश्क है - अरविंद वर्ड पावर । कई गुना शब्द शक्ति बढ़ने वाला सशक्त कोष और थिसॉरस । इस का संयोजन अरविंद कुमार ने सुपरिचित कोश कर्म से किया है । ऊपर नीचे  पैराग्राफों में शब्दों के इग्लिश और हिंदी पर्याय तो अरविंद वर्ड पावर परोसता ही है , सदृश और विपरीत  जानकारी दे कर जाने के लिए भी उत्सुक बनाता है । भारतीय पाठकों की ज़रूरत को पूरा करने वाला अरविंद वर्ड पावर इकलौता इंग्लिश-हिंदी कोश है । भारतीय रीति-रिवाजों , प्रथाओं , परंपराओं , विचारधाराओं , दर्शन , सिद्धांत , मिथकों, , मान्यताओं और संस्कृति से जुड़े शब्दों का महासागर है यह कोश ।  यह अनायास नहीं है कि हिंदी के सुपरिचित कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने अरविंद वर्ड पावर की चर्चा करते हुए अपने एक कालम में इसे नया उत्तम कोश बताते हुए लिखा है कि , ' अरविंद कुमार का यह सुशोभित-सुरचित कोश निश्चय ही हमारी भाषा के लिए एक ऐतिहासिक घटना है । हिंदी समाज को अरविंद कुमार का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने ऐसा अद्भुत कोश बनाया है.। ' वह लिखते हैं, ' इस कोश का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इस में  बोलचाल में  प्रचलित बोलियों से आए शब्दों को भी जगह दी गई है।  ऐसे शब्द भी काफ़ी हैं , जो उर्दू फ़ारसी अऱबी, अंगरेजी आदि से आ कर हिंदी में  ज़ज्ब हुए हैँ।  ऐसे किसी भी कोश को एक स्तर पर हिंदी की अद्भुत समावेशिता का संकलन होना चाहिए – यह कोश ऐसा है।  उससे यह भी बख़ूबी प्रकट होता है कि हिंदी का चौगान और हृदय कितना चौड़ा है और कहां कहां तक फैला है।  हिंदी का राजभाषा रूप उसे संकीर्ण और दुर्बोध बनाता रहा है।  यह कोश एक तरह से इस का प्रतिरोध करता है. हिंदी के अपने उदार स्वभाव को तथ्य और शब्द-पुष्ट करता है।

 

 

1996 में जब नेशनल बुक ट्रस्ट ने हिंदी का अरविंद कुमार रचित पहला थिसॉरस समांतर कोश  छापा था तब खुशवंत सिंह ने लिखा था , ' इस ने हिंदी की  एक भारी कमी को पूरा किया है हिंदी को इंग्लिश भाषा के समकक्ष खड़ा कर दिया है । यहां तो हिंदी की डिक्शनरियां भी सालों-साल परिवर्द्धित नहीं की जातीं। इसी लिए आप पाएंगे कि हिंदी की तमाम डिक्शनरियों में हिंदी में आए नए शब्द पूरी तरह लापता हैं । अरविंद के यहां ऐसा नहीं  है । वह तो जैसे अपने शब्द कोश , अपने थिसॉरस के लिए अपना संपूर्ण जीवन होम किए  बैठे हैं । जल्दी ही राजकमल ने उन का सहज समांतर कोश छाप दिया । फिर भारतीय मिथक पात्रों के संसार को ले कर शब्देश्वरी भी छापी । अभी इन की धमक गई भी नहीं थी कि 2007 में द पेंग्विन इग्लिश-हिंदी थिसॉरस एंड डिक्शनरी पेंग्विन ने तीन खंड में छापा । दुनिया का यह विशालतम द्विभाषी थिसॉरस तमाम विषयों के पर्यायवाची और विपर्यायवाची शब्दों का महाभंडार है । संदर्भ क्रम से संयोजित इस कोश में पहली बार संबद्ध और विपरीत शब्दकोटियों के क्रास रेफरेंस भी शामिल किए गए । अरविंद रुके नहीं और 2013 में समांतर कोश का परिवर्द्धित संस्करण बृहत्तर समांतर कोश छ्प कर आ गया । और अब 2015 में अरविंद वर्ड पावर हमारे सामने है । लेकिन अरविंद अभी भी रुके नहीं हैं । अब उन का सपना है शब्दों का विशाल विश्व बैंक बनाने का । यानी  वर्ड बाइक आफ वर्ड्स ।

 

अरविंद का मानना है कि आज भारत की भाषा को संसार की हर भाषा से अपना संबंध बनाना चाहिए । आखिर हम कब तक संसार को अभारतीय इंग्लिश-कोशों के जरिए देखते रहेंगे ? और कब तक संसार हमें इन अभारतीय कोशों के जरिए देखता रहेगा ? क्यों नहीं हम स्वयं अपने अरबी-हिंदी और हिंदी-अरबी कोष बनाते? या हिंदी-जापानी जापानी-हिंदी कोश ? अरविंद कुमार ने यह भी संभव बनाने की ठानी है । उन का अरविंद लैक्सन इस काम में बहुत मददगार होने  वाला हैं । अरविंद लैक्सन जो नेट पर उपलब्ध है , के विशाल शब्द भंडार में एक-एक कर के दूसरी भाषाओं के शब्द डाल कर , वांछित भाषाओँ के द्विभाषी या त्रिभाषी कोश तत्काल बन सकते हैं । अरविंद कहते हैं कि समय आ गया है कि हम अपने दूरगामी राष्ट्रीय  हितों के लिए संसार की भाषाओं तक अपने भाषा सेतु बनाएं ।

 

 अरविंद लैक्सिकन पर 6 लाख से ज्यादा अंग्रेज़ी और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं। माउस से क्लिक कीजिए - पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा। किसी भी एक शब्द के लिए अरविंद लैक्सिकन इंग्लिश और हिंदी पर्याय, सपर्याय और विपर्याय देता है, साथ ही देता है परिभाषा, उदाहरण, संबद्ध और विपरीतार्थी कोटियों के लिंक। उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 और हिंदी में 500 से ज्यादा पर्याय हैं। किसी एकल इंग्लिश ई-कोश के पास भी इतना विशाल डाटाबेस नहीं है। लेकिन अरविंद लैक्सिकन का सॉफ्टवेयर बड़ी आसानी से शब्द कोश, थिसॉरस और मिनी ऐनसाइक्लोपीडिया बन जाता है। इसका पूरा डाटाबेस अंतर्सांस्कृतिक है, अनेक सभ्यताओं के सामान्य ज्ञान की रचना करता है। शब्दों की खोज इंग्लिश, हिंदी और रोमन हिंदी के माध्यम से की जा सकती है। रोमन लिपि उन सब को हिंदी सुलभ करा देती है जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते या टाइप नहीं कर सकते।

 

अरविंद लैक्सिकन को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के साथ-साथ ओपन ऑफ़िस में पिरोया गया है। इस का मतलब है कि आप इनमें से किसी भी एप्लीकेशन में अपने डॉक्यूमेंट पर काम कर सकते हैं। सुखद यह है कि दिल्ली सरकार के सचिवालय ने अरविंद लैक्सिकन को पूरी तरह उपयोग में ले लिया है। अरविंद कहते हैं कि शब्द मनुष्य की सब से बड़ी उपलब्धि है, प्रगति के साधन और ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं, शब्दों की शक्ति अनंत है। वह संस्कृत के महान व्याकरणिक महर्षि पतंजलि को कोट करते हैं, 'सही तरह समझे और इस्तेमाल किए गए शब्द इच्छाओं की पूर्ति का साधन हैं।' वह मार्क ट्वेन को भी कोट करते हैं, 'सही शब्द और लगभग सही शब्द में वही अंतर है जो बिजली की चकाचौंध और जुगनू की टिमटिमाहट में होता है।' वह बताते हैं, 'यह जो सही शब्द है और इस सही शब्द की ही हमें अकसर तलाश रहती है।'

 

अब ज़रा एक नज़र पीछे मुड़ कर देखते हैं । अरविंद कुमार तब दिल्ली में रहते थे । एक हिंदी कहानी का इंग्लिश अनुवाद करते करते बुरी तरह उलझे हुए थे । एक हिंदी शब्द के लिए उन्हें उपयुक्त इंग्लिश शब्द नहीं सूझ रहा था।  यह 1952 में अप्रैल महीने का एक तपता गरम दिन था ।  पास ही बैठे थे उन के एक मित्र वरिष्ठ इंग्लिश फ़्रीलांसर।  अरविंद की समस्या समझ  कर वह उन्हें  कनाट प्लेस में किताबों की एक दुकान तक ले गए और एक किताब उन्हें पकड़ा दी। यह था ठीक सौ साल पहले लंदन में छपा लंबे से नाम वाला – थिसॉरस आफ़ इंग्लिश वर्ड्स ऐंड फ़्रैजेज़ क्लासिफ़ाइड ऐंड अरेंज्ड सो ऐज़ टु फ़ैसिलिटेट द ऐक्सप्रैशन आफ़ आइडियाज़ ऐंड ऐसिस्ट इन लिटरेररी कंपोज़ीशन ।  इस का हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा – साहित्यिक रचना और विचारों की अभिव्यक्ति में सहायतार्थ सुनियोजित और संयोजित इंग्लिश शब्दों और वाक्यांशों का थिसॉरस।  रोजट्स थिसॉरस नाम से मशहूर इस किताब के पन्ने पलटते ही अरविंद पर उस का जादू चढ़ गया।  तुरंत ख़रीद लिया । ग्रीक शब्द ‘थिसॉरस’ का सरल हिंदी अनुवाद तिजोरी है। यानी अंग्रेजी शब्दों की तिजोरी अरविंद के हाथ लग गई ।

वह अनोखी किताब क्या हाथ लगी अरविंद के कि हाथ से छूटती ही नहीं थी।  उन  की हमजोली बन गई, हर दम साथ रहती।  ज़रूरत पड़ने पर तो उस से वह मदद लेते  ही, बेज़रूरत भी पन्ने पलटते , शब्द पढ़ते  रहते । उन के मन में बार बार चाह उठती – हिंदी में भी कुछ ऐसा हो।  भारत में  कोशकारिता की परंपरा पुरानी है. प्रजापति कश्यप का 1800 वैदिक शब्दोँ का संकलन निघंटु था, अमर सिंह का 8,000 शब्दोँ वाला प्रसिद्ध थिसॉरस अमर कोश था।  हिंदी में ऐसा था ही कुछ नहीं ।

 

अरविंद समझाते हैं:“रोजट के मॉडल मेँ हर संकल्पना का एक सुनिश्चित स्थान है।  उस का आधार वैज्ञानिक है.लेकिन भाषा जो भी हो, वैज्ञानिक नहीँ होती।  नए नए शब्द विज्ञान के आधार पर नहीं , मानसिक संबंधों के आधार पर, कई बार बस यूं ही या सामाजिक अवधारणाओं  पर बनते हैं ।  इंग्लिश के रेनी डे  का मुख्य अर्थ है ‘ कठिन समय’, हमारे यहां  बरसाती दिन  सुहावना होता है, कविता का विषय है, रोमांस का समय है। ”

बात आगे बढ़ाते वह कहते हैं , विज्ञान मेँ ‘गेहूं ’ एक तरह की घास भर है, आम आदमी के लिए वह खाद्य अनाज है। संस्कृत से ले कर हिंदी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं  के अपने अलग सामाजिक संदर्भ हैं । सांस्कृतिक संकल्पनाएं हैं । .एक और समस्या यह है कि काव्य की भाषाएं होने के कारण हमारे यहां इंग्लिश के मुक़ाबले पर्यायों की भरमार है । ‘हल्दी’ के लिए अरविंद को 125 पर्याय मिले! ‘हेलमेट’ के लिए 32 शब्द। इंग्लिश से हिंदी कोश बनाने वाले कोशकार जब इस शब्द पर आते हैं, तो वे बस ‘शिरस्त्राण’ लिख देते हैं, क्योँ कि उन्हें  इसके लिए प्रचलित शब्दों  की जानकारी नहीं होती।  ‘शिरस्त्राण’ तो किसी भी उस चीज़ के लिए काम में लाया जा सकता है जिस से सिर की रक्षा होती है।  सवाल यह उठता है कि राणा प्रताप युद्ध में  क्या लगाते थे? हैलमेट तो क़तई नहीँ ! हमारे पास राजस्थानी का ‘झिलम’ शब्द है, और भी बहुत सारे शब्द हैं । वे हिंदी से हिंदी कोशों में हैं , पर समांतर कोश  से पहले कहीं संकलित नहीं थे।

इंग्लिश में इवनिंग इन पैरिस  पैरिस की कोई भी शाम है, हमारे यहां  शामे अवध  की रौनक़ बेमिसाल मानी जाती है, सुबहे बनारस  में  पूजापाठ और शंखनाद का पावन आभास है, तो शबे मालवा  सुहावनी ठंडक की प्रतीक है। थिसॉरसकारों  की भाषा में हर शीर्षक/उपशीर्षक विषय या संकल्पना कहलाते हैं । यानी किसी एक वस्तु या वस्तु समूह की अमूर्त या सामान्यकृत कोटि।

एक बार अरविंद का दिल्ली से लगभग तीस पैंतीस किलोमीटर दूर मुरादनगर जाना हुआ।  वहां एक कारीगर के मुंह से नया शब्द सुना:बैटरा !- बैटरी का पुल्लिंग।  मतलब था ट्रैक्टर ट्रक आदि मेँ लगने वाली बड़ी बैटरी। हिंदी इसी तरह के सैकड़ों अड़बंगे लेकिन बात को सही तरह कहने वाले नए शब्दों से भरी है। वह कहते हैं , इस का अर्थ था कि हिंदी थिसॉरस बनाना जितना मैं ने सोचा था, उस से दस गुना कठिन निकला। वह जैसे जोड़ते हैं , पीछे मुड़ कर देखता हूं  तो दस गुना ज़्यादा दिलचस्प भी।

कमलेश्वर अरविन्द कुमार को शब्दाचार्य ज़रूर कह गए हैं। और लोग सुन चुके हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अमरीका सहित लगभग आधी दुनिया घूम चुके यह अरविंद कुमार जो आज शब्दाचार्य हैं, एक समय बाल श्रमिक भी रहे हैं। हैरत में डालती है उनकी यह यात्रा कि जिस दिल्ली प्रेस की पत्रिका सरिता में छपी सीता निष्कासन कविता से वह चर्चा के शिखर पर आए उसी दिल्ली प्रेस में वह बाल श्रमिक रहे।

वह जब बताते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर जांच करने आते थे तो पिछले दरवाज़े से अन्य बाल मज़दूरों के साथ उन्हें कैसे बाहर कर दिया जाता था तो उनकी यह यातना समझी जा सकती है। अरविन्द उन लोगों को कभी नहीं समझ पाते जो मानवता की रक्षा की ख़ातिर बाल श्रमिकों पर पाबन्दी लगाना चाहते हैं। वह पूछते हैं कि अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो वे और उनके घर वाले खाएंगे क्या? वह कहते हैं कि बाल श्रम की समस्या का निदान बच्चों को काम करने से रोकने में नहीं है, बल्कि उनके मां-बाप को इतना समर्थ बनाने में है कि वे उनसे काम कराने के लिए विवश न हों। तो भी वह बाल मजदूरी करते हुए पढ़ाई भी करते रहें। दिल्ली युनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एम. ए. किया। और इसी दिल्ली प्रेस में डिस्ट्रीब्यूटर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर, उप संपादक, मुख्य उप संपादक और फिर सहायक संपादक तक की यात्रा अरविन्द कुमार ने पूरी की। और 'कारवां' जैसी अंग्रेज़ी पत्रिका भी निकाली। सरिता, मुक्ता, चंपक तो वह देखते ही थे। सचमुच अरविन्द कुमार की जीवन यात्रा देख कर मन में न सिर्फ़ रोमांच उपजता है बल्कि आदर भी। तिस पर उनकी सरलता, निश्छलता और बच्चों सी अबोधता उन की विद्वत्ता में समुन्दर-सा इज़ाफा भरती है। यह एक विरल संयोग ही है कि अरविन्द उसी मेरठ में जन्मे हैं जहां खड़ी बोली यानी हिन्दी जन्मी।

अरविन्द हमेशा कुछ श्रेष्ठ करने की फिराक़ में रहते हैं। एक समय टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ग्रुप से प्रकाशित फिल्म पत्रिका माधुरी के न सिर्फ़ वह संस्थापक संपादक बने, उसे श्रेष्ठ फिल्मी पत्रिका भी बनाया। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ग्रुप से ही प्रकाशित अंग्रेज़ी फिल्म पत्रिका फिल्म फेयर से कहीं ज्यादा पूछ तब माधुरी की हुआ करती थी। माया नगरी मुम्बई में तब शैलेन्द्र और गुलज़ार जैसे गीतकार, किशोर साहू जैसे अभिनेताओं से उनकी दोस्ती थी और राज कपूर सरीखे निर्माता-निर्देशकों के दरवाजे़ उनके लिए हमेशा खुले रहते थे। कमलेश्वर खुद मानते थे कि उनका फि़ल्मी दुनिया से परिचय अरविन्द कुमार ने कराया और वह मशहूर पटकथा लेखक हुए। ढेरों फि़ल्में लिखीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन को फि़ल्म फ़ेयर पुरस्कार के लिए अरविन्द कुमार ने ही नामित किया था। आनन्द फि़ल्म जब रिलीज़ हुई तो अमिताभ बच्चन के लिए अरविन्द जी ने लिखा - एक नया सूर्योदय। जो सच साबित हुआ। तो ऐसी माया नगरी और ग्लैमर की ऊभ-चूभ में डूबे अरविन्द कुमार ने हिन्दी थिसॉरस तैयार करने के लिए 1978 में 14 साल की माधुरी की संपादकी की नौकरी छोड़ दी। मुम्बई छोड़ दी। चले आए दिल्ली। लेकिन जल्दी ही आर्थिक तंगी ने मजबूर किया और खुशवन्त सिंह की सलाह पर अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट के हिन्दी संस्करण सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक हुए। जब सर्वोत्तम निकलती थी तब अंग्रेज़ी के रीडर्स डाइजेस्ट से ज्यादा धूम उसकी थी।

 

लेकिन थिसॉरस के काम में फिर बाधा आ गई। अन्तत: सर्वोत्तम छोड़ दिया। अब आर्थिक तंगी की भी दिक्कत नहीं थी। डॉक्टर बेटा सुमीत अपने पांव पर खड़ा था और बेटी मीता लाल दिल्ली के इरविन कॉलेज में पढ़ाने लगी थी। अरविन्द कुमार कहते हैं कि थिसॉरस हमारे कंधे पर बैताल की तरह सवार था, पूरा तो इसे करना ही था। बाधाएं बहुत आईं। एक बार दिल्ली के मॉडल टॉउन में बाढ़ आई। पानी घर में घुस आया। थिसॉरस के लिए संग्रहीत शब्दों के कार्डों को टांड़ पर रख कर बचाया गया। बाद में बेटे सुमीत ने अरविन्द कुमार के लिए न सिर्फ कंप्यूटर ख़रीदा बल्कि एक कंप्यूटर ऑपरेटर भी नौकरी पर रख दिया। डाटा ऐंट्री के लिए। थिसॉरस का काम निकल पड़ा। काम फ़ाइनल होने को ही था कि ठीक छपने के पहले कंप्यूटर की हार्ड डिस्क ख़राब हो गई। लेकिन ग़नीमत कि डाटा बेस फ्लॉपी में कॉपी कर लिए गए थे। मेहनत बच गई। और अब न सिर्फ़ थिसॉरस के रूप में समान्तर कोश बल्कि शब्द कोश और थिसॉरस दोनों ही के रूप में अरविन्द सहज समान्तर कोश भी हमारे सामने आ गया। हिन्दी-अंग्रेज़ी थिसॉरस भी आ गया।

अरविन्द न सिर्फ़ श्रेष्ठ रचते हैं बल्कि विविध भी रचते हैं। विभिन्न देवी-देवताओं के नामों वाली किताब 'शब्देश्वरी' की चर्चा अगर यहां न करें तो ग़लत होगा। गीता का सहज संस्कृत पाठ और सहज अनुवाद भी 'सहज गीता' नाम से अरविन्द कुमार ने किया और छपा। शेक्सपियर के 'जूलियस सीजर' का भारतीय काव्य रूपान्तरण 'विक्रम सैंधव' नाम से किया। जिसे इब्राहिम अल्काज़ी जैसे निर्देशक ने निर्देशित किया। गरज यह कि अरविन्द कुमार निरन्तर विविध और श्रेष्ठ रचते रहे हैं। एक समय जब उन्होंने 'सीता निष्कासन' कविता लिखी थी तो पूरे देश में आग लग गई थी। 'सरिता' पत्रिका, जिसमें यह कविता छपी थी, देश भर में जलाई गई। भारी विरोध हुआ। 'सरिता' के संपादक विश्वनाथ और अरविन्द कुमार दसियों दिन तक सरिता द़फ्तर से बाहर नहीं निकले क्योंकि दंगाई बाहर तेजाब लिए खड़े थे।

'सीता निष्कासन' को लेकर मुकदमे भी हुए और आन्दोलन भी। लेकिन अरविन्द कुमार ने अपने लिखे पर माफी नहीं मांगी। न अदालत से, न समाज से। क्योंकि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं लिखा था। एक पुरुष अपनी पत्नी पर कितना सन्देह कर सकता है, 'सीता निष्कासन' में राम का सीता के प्रति वही सन्देह वर्णित था। तो इसमें ग़लत क्या था? फिर इसके सूत्र बाल्मीकि रामायण में पहले से मौजूद थे। अरविन्द कुमार जितना जटिल काम अपने हाथ में लेते हैं, निजी जीवन में वह उतने ही सरल, उतने ही सहज और उतने ही व्यावहारिक हैं। तो शायद इसलिए भी कि उनका जीवन इतना संघर्षशील रहा है कि कल्पना करना भी मुश्किल होता है कि कैसे यह आदमी इस मुकाम पर पहुंचा।



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