हिंदी कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने वाली अमर कथाकार गौरा पंत ‘शिवानी’ को उनके जन्मदिन पर शतशः नमन !!!

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Vijay K. Malhotra

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Oct 17, 2014, 1:01:49 AM10/17/14
to Hindi Vimarsh, Hindishikshakbandu googlegroup, Hind Pocket Books, WORLD HINDI SECRETARIAT, 富夫 .溝上, Shrish Jaswal, prempa...@yahoo.co.in, me...@rajpalpublishing.com, atil...@gmail.com, Aditya Chaudhary, geeta sharma, geeta joshi

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शिवानी

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

 










शिवानी


पूरा नाम

गौरा पंत शिवानी

जन्म

17 अक्टूबर 1923

जन्म भूमि

राजकोट, गुजरात

मृत्यु

21 मार्च 2003

मृत्यु स्थान

दिल्ली

अविभावक

अश्विनीकुमार पाण्डे

कर्म-क्षेत्र

उपान्यासकार

भाषा

हिंदी, गुजराती

विद्यालय

शांतिनिकेतन

शिक्षा

बी.ए.

पुरस्कार-उपाधि

पद्मश्री

अन्य जानकारी

शिवानी की माँ गुजरात की विदुषी, पिता अंग्रेज़ी के लेखक थे।

गौरा पंत शिवानी (जन्म- 17 अक्टूबर 1923 ; मृत्यु- 21 मार्च 2003) हिन्दी की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थीं। हिंदी साहित्य जगत में शिवानी एक ऐसी शख्सियत रहीं जिनकी हिंदी, संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेज़ी पर अच्छी पकड रही और जो अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमायूँ क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखलाने और किरदारों के बेमिसाल चरित्र चित्रण करने के लिए जानी गई। महज 12 वर्ष की उम्र में पहली कहानी प्रकाशित होने से लेकर उनके निधन तक उनका लेखन निरंतर जारी रहा। उनकी अधिकतर कहानियां और उपन्यास नारी प्रधान रहे। इसमें उन्होंने नायिका के सौंदर्य और उसके चरित्र का वर्णन बडे दिलचस्प अंदाज में किया।

जीवन परिचय

शिवानी आधुनिक अग्रगामी विचारों की समर्थक थीं। शिवानी का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन गुजरात के पास राजकोट शहर में हुआ था। शिवानी के पिता श्री अश्विनीकुमार पाण्डे राजकोट में स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे। शिवानी के माता और पिता दोनों ही विद्वान संगीत प्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे। शिवानी ने पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन से बी.ए. किया। साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरा रुझान शिवानीको अपने माता और पिता से ही मिला। शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे। वह परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे। महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहरी मित्रता थी। वे प्रायः अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अतः शिवानी का बचपन अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता। शिवानी की किशोरावस्था शान्ति निकेतन में और युवावस्था अपने शिक्षाविद पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में बीती। शिवानी के पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमेरिका में बसे पुत्र के परिवार के साथ रहीं[1]

कार्यक्षेत्र

शिवानी का कार्यक्षेत्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कुमाऊँ क्षेत्र की निवासी के रूप में बीता। शिवानी की शिक्षा शांति निकेतन में और जीवन का अधिकांश समय शिवानी ने लखनऊ में बिताया। शिवानी की माँ गुजरात की विदुषी, पिता अंग्रेज़ी के लेखक थे। पहाड़ी पृष्ठभूमि और गुरुदेव की शरण में शिक्षा ने शिवानी की भाषा और लेखन को बहुयामी बनाया। बांग्ला साहित्य और संस्कृति का शिवानी पर गहरा प्रभाव पड़ा।

लेखन की शुरुआत

शिवानी के लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उसकी जड़ें, इसी विविधतापूर्ण जीवन में थीं। शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलने वाली नटखटनामक एक बाल पत्रिका में छपी थी। तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गईं, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर शिवानी को गोरापुकारते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर की सलाह को कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, शिरोधार्य कर शिवानी ने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। शिवानीकी एक लघु रचना मैं मुर्गा हूँ1951 में धर्मयुगमें छपी थी। इसके बाद आई उनकी कहानी लाल हवेलीऔर तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक चलता रहा। उनकी अन्तिम दो रचनाएँसुनहुँ तात यह अकथ कहानीतथा सोने देउनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं।

प्रमुख रचनाएँ

उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलने वाले पत्र स्वतन्त्र भारतके लिए शिवानीने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ वातायनभी लिखा। उनके लखनऊ स्थित आवास-66, गुलिस्ताँ कालोनी के द्वार, लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे। शिवानी की 'आमादेर शांति निकेतन' और 'स्मृति कलश' इस पृष्ठभूमि पर लिखी गई श्रेष्ठ पुस्तकें हैं। 'कृष्णकली' उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इसके दस से भी अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलने वाले पत्र स्वतन्त्र भारतके लिए शिवानीने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ वातायनभी लिखा।

शिवानी की रचनाएँ

उपन्यास

  • कृष्णकली
  • कालिंदी
  • अतिथि
  • पूतों वाली
  • चल खुसरों घर आपने
  • श्मशान चंपा
  • मायापुरी
  • कैंजा
  • गेंदा
  • भैरवी
  • स्वयंसिद्धा
  • विषकन्या
  • रति विलाप
  • आकाश

यात्रा विवरण

  • चरैवैति
  • यात्रिक

कहानी संग्रह

  • शिवानी की श्रेष्ठ कहानियाँ
  • शिवानी की मशहूर कहानियाँ
  • झरोखा, मृण्माला की हँसी

संस्मरण

  • अमादेर शांति निकेतन
  • समृति कलश
  • वातायन
  • जालक

धारावाहिक

  • 'सुरंगमा'
  • 'रतिविलाप',
  • 'मेरा बेटा'
  • 'तीसरा बेटा'

आत्मकथ्य

  • सुनहुँ तात यह अमर कहानी

समाकालीन साहित्यकारों की राय

वरिष्ठ रचनाकार ममता कालिया के अनुसार हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में उनका योगदान कितना रहा, यह कहना मुश्किल है पर यह ज़रूर है कि कहानी के क्षेत्र में पाठकों और लेखकों की रुचि निर्मित करने तथा कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने का श्रेय शिवानी को जाता है। उन्होंने कहा कि वह कुछ इस तरह लिखती थीं कि लोगों की उसे पढ़ने को लेकर जिज्ञासा पैदा होती थी। उनकी भाषा शैली कुछ-कुछ महादेवी वर्मा जैसी रही पर उनके लेखन में एक लोकप्रिय किस्म का मसविदा था। उनकी कृतियों से यह झलकता है कि उन्होंने अपने समय के यथार्थ को बदलने की कोशिश नहीं की। ममता कालिया कहती हैं, शिवानी की कृतियों में चरित्र चित्रण में एक तरह का आवेग दिखाई देता है। वह चरित्र को शब्दों में कुछ इस तरह पिरोकर पेश करती थीं जैसे पाठकों की आंखों के सामने राजा रवि वर्मा का कोई ख़ूबसूरत चित्र तैर जाए। उन्होंने संस्कृत निष्ठ हिंदी का इस्तेमाल किया पर कहानी की विधा में ही रहने के चलते वह हिंदी के विचार जगत् में एक नया पथ प्रदर्शन नहीं कर पाई। शिवानी की क़रीबी रहीं वरिष्ठ साहित्यकार पद्मा सचदेव के अनुसार जब शिवानी का उपन्यास 'कृष्णकली' धर्मयुग में प्रकाशित हो रहा था तो हर जगह इसकी चर्चा होती थी। मैंने उनके जैसी भाषा शैली और किसी की लेखनी में नहीं देखी। उनके उपन्यास ऐसे हैं जिन्हें पढ़कर यह एहसास होता था कि वे खत्म ही न हों। उपन्यास का कोई भी अंश उसकी कहानी में पूरी तरह डुबो देता था। उन्होंने कहा, शिवानी भारतवर्ष के हिंदी साहित्य के इतिहास का बहुत प्यारा पन्ना थीं। अपने समकालीन साहित्यकारों की तुलना में वह काफ़ी सहज और सादगी से भरी थीं। उनका साहित्य के क्षेत्र में योगदान बड़ा है पर फिर भी हिंदी जगत ने उन्हें पूरा सम्मान नहीं दिया जिसकी वह हकदार रहीं। शिवानी के आखिरी दिनों में भी उनके संपर्क में रहीं पद्मा सचदेव ने कहा कि उन्हें गायन का काफ़ी शौक़ था। उन्हें आखिर तक कुमाऊं से बेहद प्यार रहा। उन्हें वहीं के नज़ारे याद आते थे।

पुरस्कार

1982 में शिवानी जी को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

मृत्यु

शिवानी का 21 मार्च, 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में निधन हुआ।



विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार

Vijay K Malhotra
Former Director (OL),
Ministry of Railways,
Govt. of India
Mobile:91-9910029919
     


URL<www.vijaykmalhotra.mywebdunia.com>
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