'भारतीय भाषा परिषद' कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका '
वागर्थ' के
दिसंबर 2012 अंक में मेरी तीन कविताएँ क्रमशः
'राख' ,
'व्रतबंध' व
'औरतें डरती हैं' प्रकाशित हुई हैं।
पत्रिका परिवार व संपादक के प्रति कृतज्ञ हूँ।
इस बीच जिन अनेकानेक लोगों ने ईमेल से व भारत से यहाँ फोन करके कविताओं पर अपनी-अपनी शुभकामनाएँ व प्रतिक्रियाएँ दी हैं, उन सब के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।
यद्यपि 'व्रतबंध' शीर्षक कविता के अंत में कुछ शब्द बदल दिए गए हैं । इस त्रुटि के चलते कविता का सांस्कृतिक अर्थ व रूपक छिन्न-भिन्न हो गया है। इस कविता की मूल पंक्तियाँ हैं -
मैं आँखें टिका
दो आँसुओं से
हस्त-प्रक्षालन करवा दूँ।
(कृपया उक्त कविता की पंक्तियों को इसी रूप में पढ़ें)
पत्रिका के ध्यान में लाने पर अब वे 'वागर्थ' के आगामी अंक (फरवरी) में इस त्रुटि पर पाठकों का ध्यान दिलाएँगे, ऐसी सूचना मिली है। अस्तु !
नीचे उक्त अंक के वे पन्ने सम्हाल सहेज रही हूँ ।