हिंदी के विद्वान् और प्राध्यापक जर्मनी निवासी 97 वर्षीय डॉ. इन्दु प्रकाश पांडेय नहीं रहे.

40 views
Skip to first unread message

Vijay K Malhotra

unread,
Oct 29, 2021, 2:48:05 AM10/29/21
to hindi_...@googlegroups.com, Hindibhawan, hindishik...@googlegroups.com, indic...@gmail.com, Suresh Rituparna, as...@chakradhar.com, Aditya Chaudhary, purandara dass, Nandkishore Pandey Prof., athi...@gmail.com, Aditi Maheshwari, Anoop Bhargava, Arvind Kumar, Girishwar Misra, ba...@list.ru, bhawan...@gmail.com, B.L. Gaur, Mukesh Bhardwaj Editor Jsnsatta, Sandhya Bhagat, C.M. Rawal, Info, Culture & Edu Division, CHIRAG JAIN, Dr. Vaidik, dromni...@gmail.com, waruni nanayakkara, dshindi, D. A. P. Sharma, Vijay K. Malhotra, 70. Mamta Kalia, Heinz Werner Wessler Prof, Rakesh Pandey, pandey, KBL SAXENA, ushav...@hotrmail.com, Usha Raje SAXENA, Pravin Raghuvanshi, Dr Hemant Darbari, Rakesh Gupta Fiji, Gangadhar Wanode, gulshan...@gmail.com, geeta...@yahoo.com, vinaye goodary, gauta...@hotmail.com, shiv...@campus.ul.pt, WORLD HINDI SECRETARIAT, Starpub, Vishwahindi Info, lbscic indculcentre, ulfat...@mail.ru, Vimleshkanti Verma, Nirdesh Nidhi, swaraa...@gmail.com, Dr. Sneh Thakore, Kiran Shete, American Institute of Indian Studies, Jai Verma, nilu...@gmail.com, Liudmila Khokhlova, Lakshmi Prasad Yarlagadda, ln baijal, Navin Lohani, me...@rajpalpublishing.com, malhotras...@yahoo.com, meena ahuja, Narayan Kumar, Harish Naval, Anil Joshi, omth...@gmail.com, Om Vikas, omprakas...@gmail.com, prempal Sharma, Purnima Varman, Pramod Sharma, Jagannathan Ramaswami, Radha Venkataraman, ranjana....@pathways.in, Rohit Kumar, satenda...@gmail.com, tarun...@gmail.com, urj...@gmail.com, jsha...@austin.utexas.edu, bh...@linguist.umass.edu, kkgo...@gmail.com, karan chauhan, kore.s...@gmail.com, smita mishra



अकिंचनता मेरा स्वभावगत गुण है और महाप्राणता मेरे व्यक्तित्व की विशेषता नहीं है. गरीब हूँ, वही बना रहना चाहता हूँ. पाँच सितारा होटल में यदि मुझे कोई रख भी दे, तो मुझे वहाँ नींद नहीं आएगी.   

पांडेय जी की आत्मकथा आपबीती से उद्धृत.... 

डॉ. इन्दु प्रकाश पांडेय जर्मनी के फ्रैंकफुर्त नगर में स्थित जॉन वॉल्फ़गॉग गोएटे विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग से 1989 में अवकाश प्राप्त प्राध्यापक थे. 97 वर्ष की आयु में भी डॉ. पाण्डेय की सक्रियता में कोई कमी नहीं रही. वह अंत तक ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ तथा ‘भारतीय पी.ई.एन.’ के स्थाई सदस्य बने रहे. 

  • गंगा तट पर बसे गाँव शिवपुरी, जिला राय बरेली, उत्तर प्रदेश  में 4 अगस्त 1924 को जन्मे। 
  • गाँधी जी के अनुयायी के रूप में भारत की आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और 1942 के “भारत छोडो़“ आन्दोलन में गिरफ्तार हुए और राय बरेली के सैन्ट्ल जेल में रहे। 
  • हिन्दी भाषा और साहित्य में प्रयाग विश्वविद्यालय से 1949 में एम.ए. किया और यूटरैष्ट विश्वविद्यालय, हॉलैँड से “Regionalism in Hindi Novels” विषय पर D.Litt.  की उपाधि मिली। 
  • 1949 जुलाई से बम्बई विश्वविद्यालय के एलफिऩ्स्टन कॉलेज में हिन्दी भाषा एवं साहित्य का 1963 तक अध्यापन किया तथा विभागाध्यक्ष रहे।  
  • इसके बाद दक्षिण एशिया संस्थान, हाइडेलबर्ग, जर्मनी (1963-64), कैलीफो़र्निया विश्वविद्यालय बर्कले में (1964-65), रोमानिया के बुखारेष्ट विश्वविद्यालय में (1965-67)  
  • तदुपरान्त जर्मनी के गोएटे विश्वविद्यालय, फ्रांकफुर्ट में 1967 से 1989 तक हिन्दी भाषा और साहित्य एवं भारतीय संस्कृति का अध्यापन किया।  
  • 1987 में काशी विद्यापीठ में और 1991 में चीन के बेजिंग विश्वविद्यलय में अतिथि प्रोफ़ेसर के रूप में  धर्म, लोक-साहित्य एवं हिन्दी साहित्य पर व्याख्यान प्रस्तुत किये। 
  • 1950 से 1961 तक के काल में सैंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सैंसर के सदस्य और राष्ट्रपति के पुरस्कार के लिए चयन समिति तथा आकाशवाणी के फिल्मी गीतों की चयन समिति के सदस्य रहे। 
  • 1967 से जर्मनी के श्वालबाख़ नगर में स्थायी आवास बना लिया है. 1993 से हरिद्वार में भी गंगा तट पर एक छोटा-सा घर बना लिया है, जहाँ हर साल तीन-चार महीने बिताते रहे हैं। 
  • 1985 में सपत्नीक भारतीय संस्कृति संस्थान (Indisches Kultur-Institut) की स्थापना की जो आज भी सक्रिय है। लगभग बीस सालों तक सक्रिय संचालन किया। 

पांडेय दंपति अपने बारे में कहते थे.... 

हम विभिन्न संस्कृतियों के मध्य सेतु बनाने का काम करते रहे हैं। ऐसे काम में हम अपने दो देशों पर ही ध्यान रखते थे, जहाँ हमने घर बना लिये थे। अर्थात्, जर्मनी और भारत के मध्य, सामान्य रूप से, सभी अन्तर सांस्कृतिक सम्बन्धों पर। हम विभिन्न प्रकार के साधनों का उपयोग करते रहे हैं, ज़्यादातर रचनात्मक एवं कलात्मक प्रकार के। काफ़ी समय तक यह काम विशेषतः लेखन तथा अनुवाद के माध्यम से किया। हमने अपनी एक वेबसाइट इस उद्देश्य से बनायी गयी थी, जिससे हम अपनी गतिविधियों में आपको शामिल कर सकें। यहाँ पर आपको ऐसी सूचनाएँ मिलेंगी, जिनसे आपको हमारी पुरानी और नई रचनाओं से सम्पर्क प्राप्त होगा और साथ ही भविष्य की नई योजनाओं का भी पता लगता रहेगा। इस तरह हम जिज्ञासुओं तक अपनी पुस्तकों की जानकारी पहुँचा सके हैं। साथ ही उपेक्षित विषयों की ओर भी आपका ध्यान आकृष्ट करते रहे हैं.। जर्मनी में समसामयिक भारतीय भाषाओं के सहित्य का ज्ञान बहुत कम है, उदाहरण के लिए हिंदी, जिसकी ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। और भारत में, अन्तरसांस्कृतिक अध्ययन उपेक्षित विषय बने हुए हैं, गो कि विविधता के कारण देश में सामान्य उत्सुकता होनी चाहिए थी। हमारी वेबसाइट का यही उद्देश्य था कि इससे नई दिशाओं एवं दृष्टियों की प्रेरणा प्राप्त होगी।  

https://www.pandey-pandey.de/index.php/hi/ से साभार 

भारतीय संस्कृति संस्थान, फ्रैंकफुर्ट के संस्थापक एवं पूर्व निदेशक डॉ. इन्दुप्रकाश पांडेय जी 1967 से जर्मनी में रह रहे थे. 1989 में अपने रिटायर होने तक इन्होंने जोहान वॉल्फगांग गोएटे विश्व विद्यालय, फांकफुर्ट में अध्यापन किया.  

  • अपना घर श्वालबाखः एक शहर बोलता है 

इस शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक का, श्वालबाख (जर्मनी) के सभागृह में, 10 सितम्बर 2013 को, भव्य लोकार्पण किया गया। श्वालबाख के 70 पुराने और नये नागरिकों ने इस पुस्तक में अपने निजी अनुभवों को प्रस्तुत किया है। इनमें हाइडेमरी पांडेय तथा इन्दु प्रकाश पांडेय भी शामिल हैं। इस पुस्तक में एक-एक जीवन एक ऐसी पज़ल (puzzle) की तरह प्रस्तुत हुआ है जो अलग-अलग होते हुए भी अपने में संपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह महानगर के पास एक छोटे शहर में ठोस संगढन बन जाता है। इसलिए यह पुस्तक श्वालबाख की सीमा के बाहर भी प्रेरणादायक हो सकती है। 

https://www.pandey-pandey.de/index.php/hi/ 

प्रकाशित कृतियाँ 

  • Regionalism in Hindi Novels,  Franz Steiner Verlag, Wiesbaden 1974 नामक शोध ग्रन्थ है, जिस पर उन्हें डी.लिट. की उपाधि Utrecht University,  Holland से मिली थी। 
  • Hindi Literature - Trends and Traits, Firma K.L.Mukhopadhyay, Calcutta 1975। इस पुस्तक में हिन्दी साहित्य का सम्पूर्ण इतिहास 12 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनके 12 व्याख्यान हैं, जिन्हें उपसला विश्वविद्यालय के लिए तैयार किया गया था।. 
  • अवधी कहावतें , रचना प्रकाशन, इलाहाबाद 1977। इस ग्रन्थ में 650 अवधी कहावतें व्याख्या सहित प्रस्तुत की गयी हैं. 
  • हिन्दी के आँचलिक उपन्यासों में जीवनसत्य , नैशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 1979। इस में हिन्दी के आंचलिक उपन्यसों का विस्तृत एवं वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है. 
  • Romantic Feminism in Hindi Novels Written by Women,  House of Letters, New Delhi 1988। इस पुस्तक में 1970 के बाद लिखनेवाली लेखिकाओं के उपन्यासों की व्याख्या की गयी है। प्रमुख प्लौट मोटिव प्रेम और रोमांस होने के कारण इन के नारी-स्वातंत्र्य की लडा़ई को रोमांटिक कहा गया है. 
  • अवधी-हिन्दी कहावत कोश, हिन्दी बुक सैंटर, नई दिल्ली 1991 
  • उपन्यास -विधा और विधान, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली 1995। इस ग्रन्थ में उपन्यास विधा का सैद्धान्तिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है और साथ ही कतिपय नारी उपन्यासों की मीमांसा की गयी है. 
  • यादों के उजाले , कवि सभा, नई दिल्ली 2001। यह उर्दू की शेरो-शायरी का संकलन है, जिसे देवनागरी एवं फा़रसी दोनों लिपियों में छापा गया है. कुछ कठिन शब्दों के अर्थ भी दिये गये हैं. 
  • हिन्दी के अधुनातन नारी उपन्यास , हिन्दी बुक सैंटर, नई दिल्ली 2004. इसमें 1985 से 2001 तक की 19 लेखिकाओं के तेईस उपन्यासों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस अध्ययन से पता लगता है कि नारी-लेखन रोमांटिक प्रवत्ति से उठ कर अनेक अन्य प्रकार के विमर्शों एवं समस्याओं तक पहुँच गया है. नारी-लेखन में परिपक्वता के दर्शन होने लगे हैं. 
  • पानी पर बुनियाद, अनुभव प्रकाशन, नई दिल्ली 2006। यह लेखक का दूसरा कविता संग्रह है, जो लगभग 40 साल बाद प्रकाशित हुआ है।  
  • हिन्दी के प्रयोगधर्मी उपन्यास, हिन्दी बुक सैंटर, नई दिल्ली 2008। इस आलोचनात्मक पुस्तक में हिन्दी के 7 श्रेष्ठ प्रयोगधर्मी उपन्यसों की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है. 
  • अवधी लोक साहित्य ग्रंथावली, जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली 2010। तीन खण्डों में लेखक के लोक साहित्य सम्बन्धी समग्र लेखन को ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित किया गया है. इसमें कुल मिला कर, तीनों खण्डों में, लगभग 1000 पृष्ठ हैं। इस संग्रह में लोकगीत, बच्चों की कथाएँ, व्रत-कथाएँ, कहावतें तथा लेखक के लोक-साहित्य संबंधी विषयों पर अनेक आलेख हैं. प्रथम खण्ड में संस्कार गीत हैं, जिन्हें औरतें जीवन के महत्वपू्र्ण अवसरों पर गाती हैं। बच्चों की कथाएँ, जो दूसरे खण्ड में हैं, वे केवल अवधी क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि भारत के अन्य भागों में भी विविध रूपों में प्रचलित हैं। दूसरे खण्ड की ये बाल कथाएँ तथा व्रत कथाएँ आज भी अवधी क्षेत्र में औरतों द्वारा पीढी़-दर-पीढी़ कही-सुनी जाती हैं। इन व्रत-कथाओं से चुन कर 35 कथाओं का अनुवाद पांडेय जी ने अपनी पत्नी हाइडेमरी के साथ मिल कर जर्मन भाषा में किया है। इस ग्रन्थावली के तीसरे खण्ड में 563 कहावतें कोश के रूप में प्रस्तुत की गयी हैं और साथ में उनके अर्थ भी दिये गये हैं। इसी खंड में श्री पांडेय ने लोकवार्ता संबंधी अपने विद्वत्तापूर्ण अनेक आलेखों का संकलन भी प्रस्तुत किया है।  
  • पुनि जहाज पै आवै, आयास प्रकाशन, हरिद्वार 1999 . इस ग्रन्थ को लेखक की 75वीं सालगिरह पर डॉ. कमल कांत बुधकर ने सम्पादित एवं समर्पित किया। इसमें लेखक की बहुत-सी गद्य-पद्य रचनाएं हैं, साथ ही अनेक अन्य विद्वानों की जर्मन, अंग्रेजी़ रचनाएं भी हिन्दी में अनूदित हैं। लेखक पर यह एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। 

 

  • हिंदी पत्रकार श्री प्रभात ओझा ने अपनी पी.एचडी. के शोध-प्रबन्ध को "शिवपुरी से श्वालबाख तक " (2015) शीर्षक से प्रकाशित किया है. उस पर उन्हें गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय से पी.एचडी की उपाधि प्राप्त हुई है. प्रबन्ध का विषय था, इन्दुप्रकाश पांडेय – व्यक्तित्व एवं कृतित्व. 
  • आपबीती शीर्षक से पांडेय जी की आत्मकथा 2015 में स्टार पब्लिकेशंस, प्रा. लिमिटेड , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 
  • THE ROUSIING VOICE OF BABA NAGARJUN : CHARTING NEW TERRITORIES FOR THE HINDI NOVEL (2015) written by Dr. Indu Prakash Pandey and Edited by Malini  Roy                (राधा प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित) 

 


Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages