

‘अकिंचनता मेरा स्वभावगत गुण है और महाप्राणता मेरे व्यक्तित्व की विशेषता नहीं है. गरीब हूँ, वही बना रहना चाहता हूँ. पाँच सितारा होटल में यदि मुझे कोई रख भी दे, तो मुझे वहाँ नींद नहीं आएगी.’
पांडेय जी की आत्मकथा ‘आपबीती’ से उद्धृत....
डॉ. इन्दु प्रकाश पांडेय जर्मनी के फ्रैंकफुर्त नगर में स्थित जॉन वॉल्फ़गॉग गोएटे विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग से 1989 में अवकाश प्राप्त प्राध्यापक थे. 97 वर्ष की आयु में भी डॉ. पाण्डेय की सक्रियता में कोई कमी नहीं रही. वह अंत तक ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ तथा ‘भारतीय पी.ई.एन.’ के स्थाई सदस्य बने रहे.
पांडेय दंपति अपने बारे में कहते थे....
‘हम विभिन्न संस्कृतियों के मध्य सेतु बनाने का काम करते रहे हैं। ऐसे काम में हम अपने दो देशों पर ही ध्यान रखते थे, जहाँ हमने घर बना लिये थे। अर्थात्, जर्मनी और भारत के मध्य, सामान्य रूप से, सभी अन्तर सांस्कृतिक सम्बन्धों पर। हम विभिन्न प्रकार के साधनों का उपयोग करते रहे हैं, ज़्यादातर रचनात्मक एवं कलात्मक प्रकार के। काफ़ी समय तक यह काम विशेषतः लेखन तथा अनुवाद के माध्यम से किया। हमने अपनी एक वेबसाइट इस उद्देश्य से बनायी गयी थी, जिससे हम अपनी गतिविधियों में आपको शामिल कर सकें। यहाँ पर आपको ऐसी सूचनाएँ मिलेंगी, जिनसे आपको हमारी पुरानी और नई रचनाओं से सम्पर्क प्राप्त होगा और साथ ही भविष्य की नई योजनाओं का भी पता लगता रहेगा। इस तरह हम जिज्ञासुओं तक अपनी पुस्तकों की जानकारी पहुँचा सके हैं। साथ ही उपेक्षित विषयों की ओर भी आपका ध्यान आकृष्ट करते रहे हैं.। जर्मनी में समसामयिक भारतीय भाषाओं के सहित्य का ज्ञान बहुत कम है, उदाहरण के लिए हिंदी, जिसकी ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। और भारत में, अन्तरसांस्कृतिक अध्ययन उपेक्षित विषय बने हुए हैं, गो कि विविधता के कारण देश में सामान्य उत्सुकता होनी चाहिए थी। हमारी वेबसाइट का यही उद्देश्य था कि इससे नई दिशाओं एवं दृष्टियों की प्रेरणा प्राप्त होगी।
https://www.pandey-pandey.de/index.php/hi/ से साभार
भारतीय संस्कृति संस्थान, फ्रैंकफुर्ट के संस्थापक एवं पूर्व निदेशक डॉ. इन्दुप्रकाश पांडेय जी 1967 से जर्मनी में रह रहे थे. 1989 में अपने रिटायर होने तक इन्होंने जोहान वॉल्फगांग गोएटे विश्व विद्यालय, फांकफुर्ट में अध्यापन किया.
इस शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक का, श्वालबाख (जर्मनी) के सभागृह में, 10 सितम्बर 2013 को, भव्य लोकार्पण किया गया। श्वालबाख के 70 पुराने और नये नागरिकों ने इस पुस्तक में अपने निजी अनुभवों को प्रस्तुत किया है। इनमें हाइडेमरी पांडेय तथा इन्दु प्रकाश पांडेय भी शामिल हैं। इस पुस्तक में एक-एक जीवन एक ऐसी पज़ल (puzzle) की तरह प्रस्तुत हुआ है जो अलग-अलग होते हुए भी अपने में संपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह महानगर के पास एक छोटे शहर में ठोस संगढन बन जाता है। इसलिए यह पुस्तक श्वालबाख की सीमा के बाहर भी प्रेरणादायक हो सकती है।
https://www.pandey-pandey.de/index.php/hi/
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