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Vashini Sharma

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Dec 2, 2014, 10:46:15 PM12/2/14
to V Sharma, Surendra Gambhir, hindishikshakbandhu

Pravakta | प्रवक्‍ता.कॉम : Online Hindi News & Views Portal of India

डॉ. मधुसूदन
मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

आचार्य रघुवीर का जीवनकार्य

-डॉ. मधुसूदन-
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(एक) डॉ. रघुवीर के दो शब्दकोश।
मुझे एक हितैषी मित्रद्वारा आचार्य रघुवीर के दोनों शब्दकोश (उपहार में) भेजे गए हैं।
साथ-साथ आचार्यजी की ही, India’s National Language नामक लेख-संग्रह की, ३५१ पृष्ठोंवाली पुस्तक भी भेजी है। पुस्तकें भेजनेवाले मित्र अनाम ही रहना चाहते हैं, नहीं तो उनका नाम लेकर न्यूनतम आभार तो प्रदर्शित करता। दोनों कोशों को जब तोला, तो उनका भार, ११.८ पाउंड (साढ़े-पाँच किलो) हुआ। कुल पृष्ठ २३२७ होते हैं। तीसरी, लेखों के संग्रह की एक पुस्तक भी दो पाउंड भर होगी। कुल २६७८ बड़े पृष्ठों (कल्याण मासिक) के आकार की सामग्री है। इस मित्र का कोई पारिवारिक संबंध भी आचार्य जी के परिवार से नहीं है। ऐसे हिन्दी हितैषी को हृदयतल से धन्यवाद ही दे सकता हूं। भाषा-भारती के अनामी हितैषी भी ऐसे अनेक हैं।

(दो) ६७ विशेषज्ञों का सहकार
इस शब्दकोश की रचना में, सहकारी ६७ विशेषज्ञों (विद्वानों) के नाम भी प्रारंभ में ही दिए गए हैं। उन विद्वानों में, सभी अपने अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ ही थे। ८० % से अधिक M.A. या M.Sc. थे। अन्य कुछ पी.एच.डी. भी थे; और कुछ भाषा वैज्ञानिक भी थे। इन सभी के सहकार से आचार्यजी का यह शब्दकोश सम्पन्न हुआ था। इस जानकारी के कारण, आप जान जाएंगे कि आचार्य रघुवीरजी का कार्य किस कोटि का था? आज साधारण पाठक को कुछ जानकारी देनेका ही उद्देश्य है। साधारण बोलचाल की भाषा के शब्द नहीं है ये। सारे शब्द पारिभाषिक शब्दावलियोंके ही हैं। इस लिए इन शब्दों को बोलचाल के शब्द मानना सही नहीं है। पर, बोली भाषा में इनमें से कुछ शब्द कभी पहुंच भी जाएंगे ही।

(तीन) शब्दों के प्रचलन की समस्या?

ऐसे पारिभाषिक शब्दों के प्रचलन की समस्या जो मानी जाती है, मुझे निराधार लगती है। पारिभाषिक शब्दावली विशिष्ट व्यावसायिको में और छात्रों की पढाई में, सीमित रूप में ही प्रचलित होती है। और छात्र जैसे शाला में भरती होता है, शिक्षा के साथ नए शब्द ग्रहण करता है। तो “भाखा बहता नीर” ऐसी पारिभाषिक शब्दावली के शब्दों पर नहीं चलेगा।
जब ये सारे शब्द ही पारिभाषिक शब्दावली के हैं तो, जैसे छात्रशाला में प्रवेश कर, मानो भौतिकी पढ़ता है तो वह पहली बार ही भौतिकी के शब्द पढ़ रहा होता है। तो पढ़ते-पढ़ते ही, अनायास सारे शब्द प्रयोग सीख ही जाता है। बहते नीर की, या प्रचलन की समस्या तो अंग्रेज़ी की आदत वाले शिक्षक को हो सकती है। शिक्षक को शायद समस्या हो भी; पर हमारे अपने शब्दों की गौरवशाली परम्परा को स्थायी करने शिक्षक को भी पढ़कर सज्ज हो जाना चाहिए। वैसे बार-बार पढ़कर और पढ़ाकर उसने कुशलता प्राप्त करनी चाहिए। एक शिक्षक की समस्या सुलझाने के लिए अनेक छात्रों की हानि सही नहीं जा सकती। यह अपमान है हमारी अपनी अस्मिता का!

(चार) संकल्प शक्ति का अभाव
ऐसा अपमान सहा गया, कारण था संकल्पशक्ति का अभाव। संकल्पशक्ति होनी चाहिए थी, और कुछ भारत भक्ति। साथ साथ प्रादेशिक निष्ठा के स्थानपर राष्ट्र निष्ठा होनी चाहिए थीं। पर हमारी प्रादेशिक निष्ठाएं, राष्ट्र हित को भी निगल जाती है|

हम जब राष्ट्र-हित का गोवर्धन पर्वत उठाने में अपना योगदान देने बुलाए जाते हैं, तो उस गोवर्धन पर्वत को उठाने में हाथ बटाने के बदले, उस पर्वत पर चढकर उसका भार बढा देते हैं। परिणामतः समस्याएं सुलझती नहीं है। समस्या का पर्वत वहीं का वहीं रह जाता है। जैसे कोई समिति रची जाती है, हम अपने प्रादेशिक हितों की दृष्टि से ही हल को देखते हैं। हम चाहते हैं कि हल ऐसा हो, जिसमें सारे प्रदेशों के हितों का जोड़ (योग) ही समाया गया हो| ऐसा कोई हल नहीं होता। अधिकाधिक नागरिकों का हित-साधक हल हो सकता है। ऐसा हल ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। साथ-साथ, नीति निर्धारण करनेवालों में संकल्प शक्तिका भी अभाव था।

(पाँच) शब्द कोश की त्रुटियाँ?
जब ६७ विद्वानों के सहकार से शब्दकोश रचा गया था, तो त्रुटियाँ नगण्य मात्रा में ही होंगी। पर फिर भी, यदि कोई ऐसा त्रुटिपूर्ण शब्द है ही, जिसका हिंदी प्रतिशब्द उपलब्ध नहीं है; या त्रुटिपूर्ण है, तो उस पर सारे विद्वान साथ बैठकर विचार कर शब्द को सुधार सकते थे। ऐसा पराकोटि का प्रयास करने पर भी यदि शब्द रचा ना जाए, तो, अंग्रेज़ी शब्द का हिंदीकरण कर के स्वीकार भी कर सकते थे। पर ऐसा अंग्रेज़ी शब्द स्वीकारने के पहले अपनी ही प्रादेशिक भाषाओं से स्वीकारणीय शब्द ढूंढ़ कर देखना चाहिए था। सीधा कूदकर अंधाधुंध अंग्रेज़ी का शब्द ले लेना हीन ग्रंथिका द्योतक है।

अंतरराष्ट्रीय मानक माप-तौल, नाम वाले शब्द, सूत्रों वाले चिह्न, इत्यादि स्वीकारे जा सकते थे।
चावल बीनते समय कुछ कंकड आने पर हम सारे चावल तो फेंकते नहीं। कंकडों को चुन-चुनकर फेंक देते हैं।यदि ऐसा होता, तो आज हम कहीं के कहीं पहुंचे होते! हिन्दी(या जन भाषा) में शिक्षा से ,प्रत्येक छात्र के अमूल्य वर्ष बचते; उसी अनुपात में देश की मुद्रा बचती। बचे हुए वर्ष स्वैच्छिक रूपसे चाहे तो,विशेषज्ञ बनने में, लगा सकते थे। चाहे वो कोई कला सीखने में लगा सकते थे।
वास्तव में, जन भाषा के लाभ से भी अधिक हिन्दी माध्यम द्वारा लाभ होता।

(छः) अनुवादक आवश्यक
उन बचे हुए चार वर्षों में, हमारे छात्र, अंग्रेज़ी, चीनी, जापानी, फ्रांसीसी, रूसी, या जर्मन, ऐसी विश्व की कोई महत्वपूर्ण भाषा सीखकर, हिन्दी में उन सभी भाषाओं के शोधपत्रों का, अनुवाद कर, भारत को आगे बढ़ा पाते।
जापान ऐसा ही करता आया है। प्रायः ५-६ वैश्विक भाषाओं की शोध पुस्तकों का, और आलेखों का, जापानी भाषा में अनुवाद ३ सप्ताह के अंदर छपकर, मूल कीमत से भी सस्ता बिकना आरंभ हो जाता है; ऐसा जापान जाकर अनुभव किए हुए युवा के वृतान्त को पढ़ने से पता चला। जापान के पास ऐसे अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के अनुवादक हैं। भारत ने भी इसी प्रतिमान पर सोचना चाहिए। अकेली अंग्रेज़ी के अनुवादों की अपेक्षा अनेक भाषाओं से शोधों के अनुवाद हमारे छात्रों को अनेक गुना ज्ञान प्राप्त करवाता। प्रगति की गति बहुगुणित होती, देश छलांग लगाकर आगे बढ़ता। देश हितैषी इस दिशा में सोचें। जापान बहुत परिश्रमी भी है। उसको इसका लाभ भी प्राप्त होता है।

(सात) भ्रामक प्रचार “अग्निरथ-गमन-आगमन-सूचक-लोह-पट्टिका”
आचार्य जी के विषय में, एक अन्यायी प्रचार किया जाता रहा है। उदाहरणार्थ “सिग्नल” के लिए आचार्य जी “संकेत” प्रतिशब्द देते हैं। पर कुछ कुत्सित प्रचारकों ने उनके नाम पर सिग्नल के लिए “अग्निरथ-गमन-आगमन-सूचक-लोह-पट्टिका” ऐसा शब्द प्रचारित कर दिया था। हिंदी में,भी और हास्यास्पद एक प्रतिशब्द “अग्निरथ-आवन-जावन-रोकनहारा-लोह-डण्डा” जैसा शब्द भी प्रचारित किया था,जो सर्वथा गलत है। जब Signal के लिए आचार्य जी “संकेत” प्रतिशब्द देते हैं, जो, आचार्य जी के, शब्द कोश में देखा जा सकता है। ये कुत्सित शब्द आचार्य जी का नहीं था। उनके नाम पर किसी दुष्ट ने प्रचारित कर दिया था।
शायद यही शब्द है, जो, हास्यास्पद हो चुका होगा; यह समझ में आने जैसी बात है।आचार्य जी शब्द निर्माण के काम में पूर्ण चिन्तन के पश्चात, १५ सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं।
उसी में से एक सिद्धान्त के अनुसार एक अंग्रेज़ी शब्द के लिए एक हिन्दी का प्रतिशब्द निर्माण करने का आदेश है। तब “अग्निरथ-गमन-आगमन-सूचक-लोह-पट्टिका” तो छः शब्दों का समूह है।
ये न उनका शब्द है, न उनके शब्दकोश में है। कोई हिन्दी द्वेष्टा ने ये प्रवाद चलाया प्रतीत होता है। पर हमारे हिंदी के पुरस्कर्ता भी इस भ्रामक प्रचार से भ्रमग्रस्त हो गए थे।

(आँठ) sign का मूल चिह्न?
आचार्य जी, sign के लिए “चिह्न” शब्द प्रयोग भी दिखाते हैं।
इस प्रयोग को देखकर यास्क के सिद्धान्तानुसार sign ही “चिह्न” का ही अपभ्रंशित रूप लगता है।
अंग्रेज़ी का “sign” हमारे “चिह्न” से निकला प्रतीत होता है। ध्वनिका साम्य, अर्थका साम्य, और धातु का आधार। तीनों मिलते आना, यह व्युत्पत्ति की पूर्ण अभिव्यक्ति मानी जाती है। (यास्क के ३ सिद्धान्त) तो signal के लिए चिह्नल भी संभवतः शब्द बन सकता है।
तो फिर यह “अग्निरथ-गमन-आगमन-सूचक-लोह-पट्टिका”, हमारी देव वाणी का ही नहीं, आचार्य जी का भी अपमान ही है।
चिह्न–से सिह्न से—सिग्न से —sign। अब signal के लिए चिह्नल भी प्रामाणिक लगता है।

(नौ)रेलगाड़ी =”संयान” प्रति-शब्द।
रेलगाड़ी के लिए आचार्य जी, “संयान”शब्द प्रयोग दिखाते हैं।
सं का अर्थ है सामूहिकता, या एकत्र आना, या साथ साथ क्रियाएँ करना।
जैसे संचलन= साथ साथ चलना। संग्राम= गाँव का युद्ध में साथ साथ आना। संगम= नदियों के प्रवाहों का एकत्र होना। सं सामूहिकता और यान का अर्थ है गाडी, वाहन, या कोई भी ढोकर ले जाने वाला। सामूहिक रूपसे प्रवास करवानेवाला वाहन ऐसा अर्थ होता है, संयान का। ऐसे स्थूल रूपसे आचार्य जी द्वारा,२ लाख शब्द रचे गए हैं। ऐसे कर्मठ विद्वान के, शब्द रचना के भगीरथ कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी अल्प है।

कुछ त्रुटियों पर ही विचार केंद्रित कर ऐसे ६७ विद्वानों के सामूहिक कार्यपर दोषारोपण करना हमारी दृष्टिका दोष ही व्यक्त होता है। और यह हमारी कृपणता ही है। डॉ. रघुवीर ने दो-दो डॉक्टरेट प्राप्त की थी, एक लन्दन से, दूसरी हॉलण्ड से। जिस विद्वत सभा में आप बोलते थे, श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाता था। युरप के सभी प्राच्यविदों से आपका सम्पर्क रहा करता था। ऐसी अनेक उल्लेखनीय बातें हैं। मेरे अनुमान से, डॉ. रघुवीर ने शब्दकोश का भगीरथ कार्य न्यूनाधिक ८-१० वर्ष तक किया होगा। वैसे संस्कृत अध्ययन, अध्यापन तो अनेक वर्ष किया होगा।
अनेक विद्वानों के चरित्र पढें हैं। आचार्य जी मेरी अपनी मान्यता में शब्द रचना के कार्य में सर्वश्रेष्ठ कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आलेख उनकी पुस्तकों पर आधारित है। -प्रवास पर रहूँगा १० एक दिन टिप्पणियों के उत्तर देने में विलंब होगा।

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2 thoughts on “आचार्य रघुवीर का जीवनकार्य

  1. डॉ. मधुसूदनडॉ. मधुसूदनJuly 5, 2014 at 7:35 am

    निवृत्त-ह्वाइस एयर मार्शल –श्री. विश्वमोहन तिवारी जी की ओरसे निम्न टिप्पणी आयी थी। उन्हें सादर धन्यवाद। टिप्पणी।
    “अग्निरथ -गमन-आगमन-सूचक-लोह-पट्टिका” यह जो शब्द का जंजाल है या तो किसी शत्रु ने गढा है या किसी मूर्ख मसखरे ने। हमारा हास्यबोध कमजोर है यह मेँ सुनता आया था किन्तु जब कोई 60 वर्ष पूर्व जब यह सुना तब मैं ठीक से समझ गया था कि हमारा हास्यबोध भी ‘हीन भावना’ से संपृक्त है।
    डा. रघुवीर का कार्य ‘भारत रत्न’ योग्य कार्य है।
    आप अच्छा कार्य कर रहे हैँ, हमें तो कार्य करते रहना है, यद्यपि वह कठिन है।

  2. Mohan GuptaJune 25, 2014 at 8:37 am

    एक बार एक घोस्ठी में बात चल रही थी के भारत के लोग नोबल पुरस्कार कियो नहीं जीतते। तब एक फ्रांशिशी बिद्वान ने कहा था के जब तक भारत में शिक्षा अंग्रेजी में रहेंगी तब तक भारत नोबल पुरस्कार तो किया कोई अन्या पुस्कार भी नहीं जीत सकता। और बिज्ञान तकनीक के अनुसंधान में भी सफलता नहीं पा सकता । डॉ मधुसूदन जी ने यह आशय प्रकट किया हैं के भारत के लोगो ने अपने आप को केवल एक ही अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी तक सिमित किया हुआ हैं जबकि भारत को रूसी फ़्रांसिसी चीनी जापानी जर्मन जैसी भाषाए सिखिनी चाहिए किसी पुस्तक का अनुवाद भी मूल भाषा से अनुवाद होना चाहिए न के अंग्रेजी में अनुवादित पुःतक से। जिन लोगो को अंग्रेजी भाषा से स्वार्थ सिद्ध होता हैं या फिर जिनके मन में मानसिक गुलामी हैं उन्होंने डॉ रघुवीर द्वारा निर्मित शब्दों के बारे में एक भ्रम फैलया हैं. ड्र. मधुसूदन जी उन कुछ शब्दों के उदहारण दिए हैं। जैसे एक शब्द सिग्नल ऐसा शब्द हैं.
    एक नेहरू का विरोध और दूसरा प्रादेशिक निष्ठा जिसके कारन हिंदी अभी भी राष्ट्रा भाषा का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकी हैं. डॉ रघुवीर जी द्वारा निर्मित हिंदी शब्द कोष एक अमूल्या पुस्तक हैं इसका वर्तमान समय मैं प्रकाशन होना चाहिए।

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---------- अग्रेषित संदेश ----------
प्रेषक: Vashini Sharma <vashin...@gmail.com>
दिनांक: 1 दिसंबर 2014 को 9:09 pm
विषय: raghuveer
प्रति: V Sharma <vashin...@gmail.com>



रघु वीर

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

आचार्य रघुवीर (३०, दिसम्बर १९०२ - १४ मई १९६३) महान भाषाविद, प्रख्यात विद्वान्‌, राजनीतिक नेता तथा भारतीय धरोहर के मनीषी थे। आप महान्‌ कोशकार, शब्दशास्त्री तथा भारतीय संस्कृति के उन्नायक थे। एक ओर आपने कोशों की रचना कर राष्ट्रभाषा हिंदी का शब्दभांडार संपन्न किया, तो दूसरी ओर विश्व में विशेषतः एशिया में फैली हुई भारतीय संस्कृति की खोज कर उसका संग्रह एवं संरक्षण किया। राजनीतिक नेता के रूप में आपकी दूरदर्शिता, निर्भीकता और स्पष्टवादिता कभी विस्मृत नहीं की जा सकती।

वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य थे। दो बार (१९५२ व १९५८) राज्य सभा के लिये चुने गये। नेहरू की आत्मघाती चीन-नीति से खिन्न होकर जन संघ के साथ चले गये। भारतीय संस्कृति को जगत्गुरू के पद पर आसीन करने के लिये उन्होने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों का एकत्रित किया। उन्होने ४ लाख शब्दों वाला अंग्रेजी-हिन्दी तकनीकी शब्दकोश के निर्माण का महान कार्य भी किया।

भारतीय साहित्य, संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र में आपकी देन विशिष्ट एवं उल्लेख्य हैं। भारत के आर्थिक विकास के संबंध में भी आपने पुस्तकें लिखी हैं और उनमें यह मत प्रतिपादित किया है कि वस्तु को केंद्र मानकर कार्य आरंभ किया जाना चाहिए।

जीवन वृत्त[संपादित करें]

आचार्य रघुवीर का जन्म ३० दिसम्बर १९०२ को रावलपिण्डी (पश्चिमी पंजाब) में हुआ था। पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से एमए करने के उपरान्त उन्होने लन्दन से पी-एचडी किया तथा हालैण्ड से डी लिट किया। सन्‌ १९३१ में आपने डच भाषा में उपनिवेशवाद के विरुद्ध क्रांतिसमर्थक ग्रंथ लिखा, जिससे हिंदेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन को विशेष प्रेरणा एवं शक्ति मिली।

इसके बाद उनके आरम्भिक कार्य का केन्द्र लाहौर ही रहा जहाँ वे सनातन धर्म कालेज में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष थे। वे अपने आप में एक संस्था थे। उन्होने सन १९३२ में लाहौर के निकट इछरा (Ichhra) में इन्टरनेशनल एकेडमी आफ इण्डियन कल्चर कीस्थापना कर भारतीय संस्कृति के अनुसंधान का कार्य आरंभ किया। इस कार्य के लिए आपने योरोप, सोवियत संघ, चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की अनेक बार यात्राएँ कीं। इन यात्राओं में आपने भारतीय संस्कृति विषयक अपन विशेष दृष्टि तो रखी ही, साथ ही उन देशों की राजनीतिक विचारधारा तथा भारत पर पड़नेवाले संभावित प्रभावों को भी ध्यान में रखा। अपने तीन यूरोप प्रवासों के समय व उसके बाद वे वहाँ के अधिकांश भारतविदों के सम्पर्क में रहे। १९४६ में वे इसे नागपुरले आये। फिर १९५६ में उनका यह सरस्वती विहार (International academy of Indian culture) दिल्ली आ गया।

उनके एक पुत्र (डा लोकेश चन्द्र) तथा दो पुत्रियाँ हैं। अपनी मृत्यु के पूर्व ही उन्होने अपने इस महान कार्य में अपने पुत्र, पुत्र-बधु, पुत्रियों एवं दामाद को लगा दिया था।

मंगोलिया यात्रा[संपादित करें]

अपने जीवन के अन्तिम दशक में आचार्य रघुवीर मंगोलिया देश की यात्रा पर गए। उस समय उनके अनुसंधान का विषय था- मंगोलिया की भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म। वह इतिहास जिसमें छठी शताब्दी के उन भारतीय आचार्यों का वर्णन है जो धर्म की ज्योति लिए मंगोल देश में गये और 6000 संस्कृत ग्रन्थों का मंगोल भाषा में भाषान्तर किया, जिनके द्वारा निर्मित दास लाख मूर्तियां, सात सौ पचास विहारों में सुरक्षित थीं, जिनके द्वारा लिखी अथवा लिखवायी गयीं बत्तीस लाख पाण्डुलिपियां 1940 तक विहारों में सुरक्षित थीं, लाखों प्रभापट थे। आचार्य जी इन सब का अवलोकन करना चाहते थे। मंगोल भाषा में लिखा गया विक्रमादित्य, राजा भोज और कृष्ण की कथाएं वे अपने साथ लाए।

बीसवीं शताब्दी में भारत से मंगोलिया जाने वाले वे पहले आचार्य थे। 1956 में जब वे वहां गए तो वहां की जनता के लिए मानो एक युगप्रवर्तक घटना घटी हो। प्रधानमंत्री से लेकर विद्वान, पत्रकार, जनता-जनार्दन का अपार स्नेह उन्हें मिला। जिस-जिस तम्बू में वे गए, माताओं ने अपने बच्चों को उनकी गोद में बिठा दिया, सब उनका आशीर्वाद पाने को आतुर थे।

इस यात्रा से वे अपने साथ तीन लाख पृष्ठों के अणु चित्र लाये, पाण्डुलिपियां और प्रभापट लाये। पहली बार कोई भारतीय मंगोलिया से भारत-अनुप्राणित साहित्य और कला-निधियां लेकर आया था।

आचार्य जी स्वतंत्रता का उदय होते ही सर्वप्रथम अवसर की खोज में रहे कि भारत के सांस्कृतिक सखा देशों से पुन: सम्बंध स्थापित कर सकें। आचार्य जी का मंगोलों में जाना क्या था, वे तो आनन्द-विभोर हो उठे कि कई शदियों के उपरान्त भारत के आचार्य के चरण उनकी भूमि पावन कर रहे हैं।

जनवरी 1956 में आचार्य जी सोवियत संघ, साइबेरिया (शिबिर देश) और मंगोल गणराज्य की यात्रा पर गये तो वहां शरीर को जमा देने वाली ठण्ड थी। मास्को में चलने के लिए दो व्यक्तियों का सहारा लेना पड़ता था। गरम बनियान, ऊनी कमीज, कोट, ओवरकोट और उसके ऊपर रुई से भरा चमड़े का कोट पहन कर भी सदीÇ से शरीर की रक्षा नहीं हो पाती थी। वहां उन्होंने चंगेज खां के वंशज़ों के अति दिव्य मन्दिर देखे जो गणेशजी की मूर्तियों से सुशोभित थे। मन्दिरों में भिक्षु उपासना के साथ ढोल और अन्य वाद्य बजा रहे थे। मन्दिरों के बाहर लटकी छोटी-छोटी घÎण्टयां मधुर स्वर गुंजा रही थीं। मन्दिरों के भीतर बोधिवृक्ष को शिशु की भांति पाला-पोसा जाता था। अगुरु और चन्दन से बनी महाघण्टी थी, श्रीवत्स से अंकित वस्त्र से ढके पटल (मेज) थे, मन्दिर के बाहर पीले नेजाबुत्का फूल थे। नेजाबुत्का का अर्थ है: मुझे भूल न जाना। चारों ओर हिम का धवल साम्राज्य था।

यहां से आचार्य जी मंगोल भाषा में अनूदित अनेक ग्रन्थ लाये जिनमें कालिदास का मेघदूत, पाणिनि का व्याकरण, अमरकोश, दण्डी का काव्यादर्श आदि सम्मिलित हैं। इनमें से एक, "गिसन खां" अर्थात् राजाकृष्ण की कथाओं का उनकी सुपुत्री डॉ॰ सुषमा लोहिया ने अनुवाद किया है। वे भारतीयों को भारतीयता के गौरव की अनुभूति करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मंगोल-संस्कृत और संस्कृत-मंगोल कोश भी लिख डाले। उन्होंने मंगोल भाषा का व्याकरण भी लिखा ताकि भावी पीढ़ियां उसका अध्ययन कर सकें।

वहां "आलि-कालि-बीजहारम्" नामक, संस्कृत पढ़ाने की एक पुस्तक आचार्य जी को उपलब्ध हुई। इसमें लाञ्छा और वतुÇल दो लिपियों का प्रयोग किया गया है। भारत में ये लिपियां खो चुकी हैं। मंगोलिया में बौद्ध भिक्षु संस्कृत की धारणियों को लिखने और पढ़ने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया करते थे। इसमें संस्कृत अक्षरों का तिब्बती और मंगोल लिपियों में लिप्यन्तर कर उन्हीं भाषाओं में वर्णन प्रस्तुत किए गए हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि इसकी छपाई चीन में हुई थी। यह पुस्तक मात्र भारत के चीन, मंगोलिया और तिब्बत के साथ सांस्कृतिक सम्बंधों की गाथा ही नहीं सुनाती अपितु नेवारी, देवनागरी तथा बंगाली लिपियों का विकास जानने में भी सहायक है।

भाषाविद्, हिन्दीसेवी एवं कोशकार[संपादित करें]

आप महान्‌ कोशकार तथा भाषाविद् थे। डॉ रघुवीर जीवनपर्यन्त अंग्रेजी के एकाधिकार के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में कार्यरत रहे। वह केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन संस्कृत, फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलगु, पंजाबी पर भी उनका अधिकार था। इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है) पर भी उनका अच्छी पकड़ थी।

आपने प्रायः छह लाख शब्दों की रचना की है। आपकी शब्दनिर्माण की पद्धति वैज्ञानिक है। आपने विज्ञान की प्रत्येक शाखा के शब्दों की कोश-रचना की है। सन्‌ १९४३ ई. में आपने आंग्ल-हिंदी पारिभाषिक शब्दकोश का प्रणयन और प्रकाशन किया। सन्‌ १९४६ में मध्यप्रदेश सरकार ने आपको हिंदी औरमराठी के वैज्ञानिक ग्रंथों की रचना का कार्य सौपा, जिसे आपने पूर्ण दृढ़ता तथा योग्यता से पूरा किया।

अपने राष्ट्रभाषा हिंदी को प्रतिष्ठित करने का आंदोलन ही नहीं किया अपितु उसके आधार को भी पुष्ट और प्रशस्त किया। संविधान की शब्दावली के कारण आपका यश सारे देश में फैल गया था। आप अनेक वर्षों तक संसदीय हिंदी परिषद् के मंत्री थे।

डॉ॰ रघुवीर के कोशकार्य की एक ओर अत्यधिक प्रशंसा हुई, दूसरी ओर अत्यधिक आलोचना। वस्तुत: यह प्रशंसनीय कार्य था, जिसको अत्यधिक श्रम से वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया गया। संपूर्णत: संस्कृत पर आधारित होने के कारण इसकी व्यावहारिकता पर संदेह किया जाने लगा। उन्होंने सर्वप्रथम भाषा-निर्माण में यांत्रिकता तथा वैज्ञानिकता को स्थान दिया। उपसर्ग तथा प्रत्ययों के धातुओँ के योग से लाखों शब्द सहज ही बनाये जा सकते हैं:

उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते। प्रहार-आहार-संहार-विहार-परिहार वत्।।

इस प्रक्रिया को कोश की भूमिका में समझाया। यदि मात्र दो संभावित योग लें, मूलांश ४०० और तीन प्रत्यय लें तो ८००० रूप बन सकते हैं, जबकि अभी तक मात्र ३४० योगों का उपयोग किया गया है। यहाँ शब्द-निर्माण की अद्भुत क्षमता उद्घाटित होती है। उन्होंने विस्तार से उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार 'गम्' धातु मात्र से १८० शब्द सहज ही बन जाते हैं-

प्रगति, परागति, परिगति, प्रतिगति, अनुमति, अधिगति, अपगति, अतिगति, आगति, अवगति, उपगति,
उद्गति, सुगति, संगति, निगति, निर्गति, विगति, दुर्गति, अवगति, अभिगति, गति, गन्तव्य, गम्य, गमनीय, : गमक, जंगम, गम्यमान, गत्वर, गमनिका

आदि कुछ उदाहरण हैं। मात्र 'इ' धातु के साथ विभिन्न एक अथवा दो उपसर्ग जोड़कर १०७ शब्दों का निर्माण संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ५२० धातुओं के साथ २० उपसर्गों तथा ८० प्रत्ययों के योग से लाखों शब्दों का निर्माण किया जा सकता है। अगर धातुओं की संख्या बढ़ा ली जाए तो १७०० धातुओं से २३८०० मौलिक तथा ८४,९६,२४००० शब्दों को व्युत्पन्न किया जा सकता है।

इस प्रकार संस्कृत में शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता है, जिसका अभी नाममात्र का ही उपयोग किया जा सका है। अतिवादी दृष्टि से बचकर भी लाखों ऐसे सरल शब्दों को प्रयोग में लाया जा सकता है, जो हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुकूल हैं।

राजनीति में[संपादित करें]

असाधारण विद्वत्ता तथा बहुमुखी प्रतिभा के कारण आप सन्‌ ५२ और ५६ में राज्यसभा के सदस्य चुने गए। इसके पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के करण सन्‌ १९४१ में अपको कारावास का दंड मिला। राष्ट्र की स्वाधीनता के पश्चात्‌ उसके निर्माण में आपका सदैव सक्रिय सहयोग रहा। राजनीतिक दृष्टि से राष्ट्र के गौरव को बनाए रखने के लिए आपने समय-समय पर कांग्रेस की दलगत नीति की कटु आलोचना की। सरकर की प्रतिरक्षा, चीन, कश्मीर तथा भाषानीति आदि के संबंध में कांग्रेस से आपका मतभेद हो गया और आप कांग्रेस दल से पृथक्‌ हो गए। भारतीय कांग्रेस से अलग हो आपजनसंघ में सम्मिलित हुए और इसके अध्यक्ष चुने गए। सन १९६२ में आपने लोकसभा का चुनाव लड़ा था किंतु पराजित हो गए। भारतीय जनसंघ को आपके नेतृत्व में नवीन शक्ति, प्रेरणा तथा मान प्राप्त हुआ। प्रबल राष्ट्रप्रेम, प्रगाढ़ राष्ट्रभाषा प्रेम तथा भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धारक के रूप में डॉ॰ रघुवीर सदा सर्वदा श्रद्धापूर्वक स्मरण किए जाएँगे।

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Vashini Sharma
53 ,kailash vihar
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