श्री भूपेंद्र कौशिक"फ़िक्र" जी की उर्दू से हिंदी अनुवादित चंद कवितायेँ, some translated poetry of bhupendra nath kaushik"fikr"

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Nishantkaushik

unread,
Jul 11, 2008, 3:37:48 AM7/11/08
to Hindi Bhasha
{1}
हाथी ने एक गधे से पुछा
कि प्रजातंत्र शासन की कार्य पद्धति क्या है ?
गधे ने कहा
तुम अपनी सूंड मेरी पीठ पर रख कर...
मेरे पद चिन्हों पर चलो
तभी कुत्ते ने कहा
की
यह तस्वीर तो अधूरी है
गधे ने कहा
हाँ
क्यूँ कि
मेरे आगे तुम्हारा भोंकता हुआ चलना भी ज़रूरी है...
{2}
मैने एक सांप से पूछा...
कि तुम तो बिना पांव के ही भागे फिरते हो
उसने कहा "भय और अंधकार जहां भी हों, जिस रुप मैं भी हों...
पेट के ही सहारे चलते हैं...
पेट ही तो पापी है..
और
पाप के पांव कहां होते हैं"...
{3}
भूसे का ढेर खुल गया है...
नदी मैं बह गया है...
ईश्वर...
नदी मैं बहता हुआ एक तिनका है,
सब कि नजर बहते हुये
अपने अपने तिनके पर टिकी हुई है
मगर,
नदी की गति
और
तिनकों की समानता
सब की पहचान
सारे अनुमान
गलत साबित कर देती है
केवल रह जाती है नदी आरोपित
हम चाहते हैं कि
हमारा ईश्वर हमारे सामने
किसी तिनके सा हिलता रहे...

अजित वडनेरकर

unread,
Jul 11, 2008, 10:29:41 AM7/11/08
to hindi...@googlegroups.com
बढ़िया है जी ।

Sudhir Pareek

unread,
Jul 13, 2008, 5:19:42 AM7/13/08
to hindi...@googlegroups.com
acchi lagi visheshkar gadhe vali

--- शुक्र, 11/7/08 को, Nishantkaushik <kaushik...@gmail.com> ने लिखा:
द्वारा: Nishantkaushik <kaushik...@gmail.com>
विषय: [Hindi Bhasha] श्री भूपेंद्र कौशिक"फ़िक्र" जी की उर्दू से हिंदी अनुवादित चंद कवितायेँ, some translated poetry of bhupendra nath kaushik"fikr"
To: "Hindi Bhasha" <hindi...@googlegroups.com>
दिनांक: शुक्रवार, 11 जुलाई, 2008, 1:07 PM

{1}
हाथी ने एक गधे से पुछा
कि प्रजातंत्र शासन की कार्य
पद्धति क्या है ?
गधे ने कहा
तुम अपनी सूंड मेरी पीठ पर रख
कर...
मेरे पद चिन्हों पर चलो
तभी कुत्ते ने कहा
की
यह तस्वीर तो अधूरी है
गधे ने कहा
हाँ
क्यूँ कि
मेरे आगे तुम्हारा भोंकता हुआ
चलना भी ज़रूरी है...
{2}
मैने एक सांप से पूछा....
कि तुम तो बिना पांव के ही भागे
फिरते हो
उसने कहा "भय और अंधकार जहां
भी हों, जिस रुप मैं भी हों...
पेट के ही सहारे चलते हैं...
पेट ही तो पापी है..
और
पाप के पांव कहां होते हैं"...
{3}
भूसे का ढेर खुल गया है...
नदी मैं बह गया है...
ईश्वर...
नदी मैं बहता हुआ एक तिनका है,
सब कि नजर बहते हुये
अपने अपने तिनके पर टिकी हुई है
मगर,
नदी की गति
और
तिनकों की समानता
सब की पहचान
सारे अनुमान
गलत साबित कर देती है
केवल रह जाती है नदी आरोपित
हम चाहते हैं कि
हमारा ईश्वर हमारे सामने
किसी तिनके सा हिलता रहे...


      
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