ज़ुल्म कितना ही सबल हो तम हो कितना ही प्रबल
झूट,फरेब मक्कारिओं के चाहे संघठित कितने ही दल
जाल कितना ही महीन चाहे मिलकर बुने कुसंगातियाँ
और चाल कैसी भी चले चाहे हो एकजुट दुश्प्रव्रतियाँ
पर सत्य की जब एक किरण सिर अपना कही उठाती है
चीर कर सीना तिमिर का "दीपक" दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
कवि kuldeep.............
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ज़ुल्म कितना ही सबल हो तम हो कितना ही प्रबल
झूट,फरेब मक्कारिओं के चाहे संघठित कितने ही दल
जाल कितना ही महीन चाहे मिलकर बुने कुसंगातियाँ
और चाल कैसी भी चले चाहे हो एकजुट दुश्प्रव्रतियाँ
पर सत्य की जब एक किरण सिर अपना कही उठाती है
चीर कर सीना तिमिर का "दीपक" दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
दीप्ति मुस्कुराती हैं
कवि kuldeep.............
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priya mitronZARA GAUR DEJIYE................................
Yeh kavi deepak sharma ji ki rachna hain aur
kuldeep ji yeh kavi deepak sharma ji ki rachna hain aur koi tathakathit KAVI Kuldeep......(kkmishra10:kk.mi...@gmail.com)ese apne naam se hindi bhasha me rahe hain?aap is kavita ko Kavi Deepak sharma ji kii wesite http://www.kavideepaksharma.co.in aur blog http://shayardeepaksharma.blogspot.com tatha http://kavideepaksharma.blogspot.com me bhi padh sakte hain.yeh rachna 2 baar doordarshan par aa chuki hain tha unki kavya sanghrah "MANZAR"KI pahli hi kavita hai.
Chori karna band karen aur copy right ke tahat aap kanooni karwahi ke liye taiyaar rahen.Yeh kavita copyright ke tahat hain .aap sabhi kavya premiyon se nivedan ki kavi kuldeep (chor kavi )ka bahiskaar karen.Yeh kavya manch hain iski garima hai, koi chor bazaar nahi.Agar yeh hi chalta raha to is manch ki garima bhag ho jaayegi.....................Yeh kavita VIJYADASHMI KE DIN KAVI DEEPAK SHARMA JI NE POST KI THI AUR HAR HINDI SITE PAR POSTED HAIN...........Kavyadhara Team
महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता
कोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता ।
कविता शौक से भी लिखने का नहीं
इतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं ।
कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है,
मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविता
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहीं
नयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं ।
कभी कविता किसी अल्हड योवन का नाज़ है
कभी दुःख से भरी ह्रदय की आवाज है
कभी धड़कन तो कभी लहू की रवानी है
कभी रोटी की , कभी भूख की कहानी ही ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं ही कविता,
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं ही कविता ॥
मुफलिस ज़िस्म का उघडा बदन ही कभी
बेकफान लाश पर चदता हुआ कफ़न ही कभी ।
बेबस इन्स्सन का भीगा हुआ नयन ही कभी,
सर्दीली रत में ठिठुरता हुआ तन ही कभी ।
कविता बहती हुई आंखों में चिपका पीप ही,
कविता दूर नहीं कहीं, इंसान के समीप हैं ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं ही कविता,
कोई पेशा, कोई व्यवसाय नहीं ही कविता ॥
kavyadhara team
for KAVI DEEPAK SHARMA
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