Reply:[Hindi Bhasha] bonsai kavita

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Dr. Mandhata Singh

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Jun 29, 2009, 8:14:23 AM6/29/09
to hindibhasha, Arunkumar jha
   अरुणजी क्या आपका उपनाम विजय रंजन है? अगर हां तो आपको अच्छी कविता के लिए धन्यवाद। मेरे एक मित्र ने भी आपको बधाई भेजी है। मैंने आपकी कविता उन्हें फारवर्ड कर दी थी। मित्र ने मुझे मेल भेजकर अपनी प्रतिक्रिया आप तक पहुंचाने को कहा है। वह इस प्रकार है-----
 
2009/6/29 Dilip C Mandal <Dilip....@indiatimes.co.in>
नमस्ते। बहुत ही मार्मिक कविता आपने छापी है। कवि तक मेरी भावना पहुंचा सकें तो उपकार होगा। आपका नंबर खो गया है। कृपया बताएं।
दिलीप मंडल
dilipc...@gmail.com
9899128000
 
------------------
Dr. Mandhata Singh
Kolkata (INDIA)
Want to write hindi.---
 
 
------------------ Original Message ------------------
From: "Arunkumar jha"<wgm...@gmail.com>;
Date: Jun 21, 2009 01:42 AM
To: "hindibhasha"<hindi...@googlegroups.com>;
Subject: [Hindi Bhasha] bonsai kavita
 
बोनसाई 
पिता 
पिता ने 
वषों नाईट शिफ्ट करके 
बनाये थे पैसे 
और ली थी एक कट्ठा जमीन, 
पिता जाते थे - दौरे पर 
बचाते थे पैसे 
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे , 
ऑफिस से 
सवारी और घर अग्रिम के खाते में 
फिर खड़ी की थी दीवारें, 
पिता ने 
बेच दिए थे माँ के गहने 
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत 
इस प्रकार ढली थी छत, 
पिता 
बैठे हैं उसी घर के बाहर 
जिनके लिए कोई भी कमरा 
खाली नहीं है, 
पिता सोते हैं ओसारे में   
चरमराती चारपाई पर 
पिते  हैं बीडियां 
बकते हैं गालियाँ 
चिडचिडे  हो गए हैं इन दिनों 
माँ भी नहीं रही अब
खड़ी हो गई है दीवारें कमरों के बिच           
बेटे सिर झुकाए 
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते हैं
छोटी बहु सोचती है 
आज बडकी/मझली /संझली 
कोई न कोई 
दो रोटी दे ही देंगी पिता को 
कल ही तो उसने दी थी 
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो..... 
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के 
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ 
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता 
विजय रंजन 
 



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