मै हूँ एक इंसां दिल की हसरत दिल में ही रही
लेकिन मैंने किसी से कुछ कहा नहीं ।
जब भी जिस को चाहा
अपनी चाहत का इज़हार किया नहीं ।
जिसके भी साथ चला
उसने कभी मुझे समझा ही नहीं ।
मै हूँ एक इंसां
मेरे दर्द की कोई दवा नहीं ।
कभी गैरों ने कुचला तो कभी अपनों ने
वक्त ने किया मुझपे कई प्रहार।
पर मै कभी रोया नहीं।
बारिश के बुलबुले की तरह
दर्द मेरे दिल में ही रही ।
मेरा दर्द किसी को दिखा नहीं
मै हूँ एक इंसां
मेरे दर्द की कोई दवा नहीं ।
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Posted By Basant Lal "Chaman" to
गुलिस्तां-ए-ग़ज़ल at 2/17/2012 05:11:00 PM