सपनों को जिंदा रखने के पक्षधर थे पाश
समाज की चुभती हुई सच्चाइयों को बेहद तीखे शब्दों में पेश करने के बावजूद
मनुष्य के बेहतर भविष्य की उम्मीदों से कभी निराश न होने वाले पंजाबी के
कवि पाश दरअसल भारतीय कविता का एक प्रमुख स्वर बनकर उभरे और उन्होंने
आतंकवाद के नासूर पर करारे प्रहार किए।
साहित्य आलोचकों के अनुसार पंजाबी भाषा में प्रगतिवाद को नई दिशा देने
वाले पाश की कविता कम्युनिस्ट आंदोलन से जुडी होने के कारण आम समाज को
बेहद प्रभावित करती है। उन्होंने अपने तेवरों की वजह से न केवल
हिन्दुस्तानी बल्कि विदेशी भाषाओं में भी काफी लोकप्रियता पाई है। पंजाबी
में उन्हें जुझारू या खाडकू कवि कहा जाता है।
राजधानी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक
चमनलाल ने पाश की शैली का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी कविताओं की भाषा
बेहद सरल होने के बावजूद काफी धारदार होती है और आक्रामक शैली न केवल
आपको आकर्षित करती है बल्कि लंबे समय तक आपको सोचने को विवश कर देती है।
उन्होंने कहा कि पाश की जुझारू कविताएं समाज के कामकाजी वर्ग, विशेषकर
किसानों की समस्याओं को लेकर लिखी गई थीं। ये कविताएं जमीन से जुडी होने
के कारण काफी असर छोडती हैं। पाश की कविताओं का संकलन कर चुके प्रोफेसर
चमनलाल ने कहा कि पाश ने अपनी कविताओं में बिल्कुल नई भाषा ईजाद की। यह
भाषा बहुत सरल होने के बावजूद काफी असरदार है। इसे यदि लोकभाषा कहा जाए
तो गलत नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि पाश की सभी कविताओं का तो संकलन हो चुका है लेकिन उनका
गद्य अभी तक इधर-उधर बिखरा पडा है। उन्होंने पत्रिकाओं के लिए वैज्ञानिक
विषयों पर आलेख, निबंध, पत्र और डायरी भी लिखी। प्रो. चमनलाल ने कहा कि
क्रांतिकारी मुहावरा रचने के बावजूद पाश मनुष्य के भविष्य के प्रति बेहद
आशावान थे। इसीलिए उन्होंने सपनों के मरने को सबसे खतरनाक बताया है।
आलोचकों के अनुसार पाश की कविताओं की लोकप्रियता का आलम यह है कि वे
पंजाबी के कम और विभिन्न भारतीय भाषाओं के कवि अधिक बन गए हैं। हिन्दी के
साथ साथ गुजराती, बांग्ला, मलयालम, मराठी सहित कई भारतीय भाषाओं में उनकी
कविताओं का अनुवाद हो चुका है। पाश लोहा शीर्षक की अपनी कविता में वर्ग
भेद को बेहद तीखे अंदाज में स्पष्ट करते हैं-
आप लोहे की कार का आनंद लेते हो,
मेरे पास लोहे की बंदूक है
मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हैं।
पंजाब में जालंधर के तलवंडी सलेम गांव में नौ सितंबर 1950 को जन्मे पाश
का मूल नाम अवतार सिंह संधु था। उन्होंने महज 15 साल की उम्र से ही कविता
लिखनी शुरू कर दी और उनकी कविताओं का पहला प्रकाशन 1967 में हुआ।
उन्होंने सिआड, हेम ज्योति और हस्तलिखित हाक पत्रिका का संपादन किया। पाश
1985 में अमेरिका चले गए। उन्होंने वहां एंटी 47 पत्रिका का संपादन किया।
पाश ने इस पत्रिका के जरिए खालिस्तानी आंदोलन के खिलाफ सशक्त प्रचार
अभियान छेडा। पाश कविता के शुरूआती दौर से ही भाकपा से जुड गए। उनकी
नक्सलवादी राजनीति से भी सहानुभूति थी।
पंजाबी में उनके चार कविता संग्रह लौह कथा, उड्डदे बाजां मगर, साडे
समियां विच और लडांगे साथी प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी में इनके काव्य
संग्रह बीच का रास्ता नहीं होता और समय ओ भाई समय के नाम से अनूदित हुए
हैं। पंजाबी के इस महान कवि की महज 39 साल की उम्र में 23 मार्च 1988 को
उनके ही गांव में खालिस्तानी आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
समाज में फासीवादी प्रवृतियों पर कडी चोट करती उनकी यह पंक्तियां किसी को
भी झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं-
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तडप का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।
Source:http://paash.wordpress.com/
१८-११-०९ को, anwar suhail <anwarsu...@yahoo.co.in> ने लिखा:
> चावल का दाना anwar suhailपहले मैं भीतुम्हारी तरह नहीं जानता थाबनता है कैसे
> चावल का एक दानामैं किसी करोडपति का बेटा नहींमैं महानगरों में पला-बढा
> नहींलेकिन मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के कारणहाथ पहुंच सुविधाओं के
> बीचनहा नहीं पाया किसी नदी में आउटडोर संडास में लोटा लेकर गया नहींढिबरी की
> रोशनी में पढा नहीं कभीबारिश में चूते छानी के नीचे रहा नहीं कभी शायद
> इसीलिए जाना
> नहीं कभी किसान के दुख-दर्द
> मैंने तो यही जाना था कि हर महीने की पहली तारीख को पिता होते उदारक्योंकि घर
> में आती थी पगारऔर फ़िर भर जाते घर के तमाम डब्बे-कनस्तर, राशन-पानी सेस्कूल फ़ीस
> का समय से होता भुगतानऔर हमें क्या चाहिए...कि सफ़र के दौरान ट्रेन या बस की
> खिडकी से दीखते खेत या सिनेमा में नज़र आते खेत खलिहानयही तो था खेतों से परिचय
> हमारा
> यह एक कठिन प्रक्रिया है दोस्तबडी लम्बी साधना
> इसे मैंने जानाखदान जाने के दौरानखेतों के बीच से गुज़रते हुएलगभग पांच माह
> की इबादत का फ़ल है चावल का एक दाना
> किसानों की उम्मीदों के धूप-छांव काकिसानों के पसीने के छिडकाव कामेहनतकश के
> गीतों की आरती काहोता है प्रतिफल चावल का एक दाना
> जेठ माह के बाद कितनी शिद्दत से देखता किसान आग उगलता सूना आसमानखोजता बादलों
> के निशाननिहारता खेत की मिट्टीजो उसकी एडियों की तरहदीखती कटी-फटी...
> जब आप देखते ख्वाब रियल-स्टेट में इन्वेस्टमेंट काकिसान देखता स्वप्न पानी से
> भरे झूमते बादलों काजब आप को होती चिन्ता सेंसेक्स में गिरावट कीकिसान खेत
> जुताई के लिए रहता परेशानउसे होती चिन्ताबीज और खाद का कैसे होगा जुगाडबरसे
> नहीं भगवान तो फिरबिटिया के गौने का कैसे होगा इंतेज़ामकैसे पटेगा साहूकार का
> कर्ज़ श्रीमान भारत किसानों का देश हैअच्छा है कि आप रहते हो इंडिया
> मेंजहां चंद लोगों को एकदम नहीं होती जानकारीकि बनता नहीं चावल का दाना किसी
> कारखाने मेंकि कैसे धान की बालियों में आता है दूध कैसे पकती हैं धान की
> बालियांकैसे लीप-पोत कर किया जाता तैयार खलिहानकैसे धान हो किसान के मेहमान
> तुम्हें भी मालूम होना चाहिए दोस्तकि चावल के एक दानाबनता कितनी मुश्किलों से
> है
>
>
>
>
> anwarsuhail
>
>
> The INTERNET now has a personality. YOURS! See your Yahoo! Homepage.
> http://in.yahoo.com/
> >
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Rector Kathuria