भाषा, ज्ञान और वर्चस्व (लेखिका : स्मृति; ब्लॉग : आवाज)

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सुयश सुप्रभ

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Jan 29, 2011, 4:16:48 AM1/29/11
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इस पोस्ट में स्मृति ने करोड़ों भारतीयों के भाषाई यथार्थ को निजी अनुभव के माध्यम से अभिव्यक्‍त किया है। हमारे देश में सामाजिक विज्ञान, विधि आदि विषयों में भाषा का बोझ लादकर दशकों से प्रतिभा की भ्रूणहत्या होती आई है। - सुयश 

 
पोस्ट

स्मृति का यह अनुभव यथार्थ है जो हमारे देश के उच्च शिक्षा के परिसरों में फ़ैला है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें न जाने कितने वर्षों से उच्च शिक्षा के आकांक्षी विद्यार्थियों के स्वप्न टूट रहे हैं. इसके विरोध में उठी कोई भी आवाज़ नक्कारखाने की तुती है. ये आवाज़ भी सही...भाषा, ज्ञान और वर्चस्व


भाषा  अभिव्यक्ति और ज्ञान  की अभिव्यक्ति का एक मूलभूत माध्यम है यह एक मान्य अवधारणा हैया युं कहें कि एक स्वीकृत सत्य हैपरन्तु चार्ल्स टेलर के शब्दों मे इससे भी बड़ा सत्य है कि भाषा ज्ञान का निर्माण भी करती हैभाषा सत्य की सरंचना में भी अहम भूमिका निभाती हैज्ञान और सत्य का रिश्ता जगजाहिर है.
खैरमेरा उद्देश्य भाषा से जुड़े इन प्रश्नों पर आपका ध्यान दिलाने का नहीं है.मेरी रुचि केवल यह बताने में है कि भाषा  ज्ञान  के निर्माण से जुड़ी हैफ़ुको के शब्दों में ज्ञान  शक्ति के निर्माण में अहम भूमिका निभाता हैअतः भाषा और शक्ति का भी सीधा संबंध है.
यहां मैं भाषा और शक्ति के संबंध को इस बड़े विवादित प्रश्न से नहीं वरन अपने शैक्षणिक अनुभवों से जोड़ने का प्रयास कर रही हूंबिहार से इंटरमिडियेट की शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्याल में राजनीति विज्ञान  विषय में दाखिला लियाविषय को ठीक से समझने और उसे व्यक्त करने के कारण और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण मैंने हिन्दी को माध्यम के रूप में चुनातब तक मैं इस बात से अनजान थी कि भाषा की भूमिका अभिव्यक्त की सुविधा ही सिर्फ़ नहीं है.
प्रथम वर्ष में हिन्दी की पुस्तकों पर आश्रित रहने के बाद दूसरे वर्ष में मैंने अंग्रेजी की भी पुस्तकों का उपयोग कियातीसरे वर्ष में मैंने सिर्फ़ अंग्रेजी की पुस्तकों का सहारा लिया लेकिन परीक्षा में रीमिक्स यानी हिंग्लिश का प्रयोग कियामेरा नतिज़ा पिछले दो वर्षों से बेहतर थायह किस्सा इसलिये नहीं बताया कि अंग्रेजी के प्रयोग ने मेरे अंक को बढ़ा दियाबल्कि इसलिये कि मेरी समझ में धीरे धीरे आना शुरु हो गया था कि हिन्दी को माध्यम के रूप में उपयोग करने वाले के लिये राजनीति विज्ञान  उतना स्पेस नहीं दे सकता.स्नातकोत्तर का प्रथम वर्ष मेरे तीन सालों से भी अधिक संघर्षपूर्ण रहाविषय की सभी शाखाओं के रीडिंग पैकेज अंग्रेजी में थे और मेरे जैसे बहुत से छात्रों को यह मान कर चलना था कि हमें इसी माध्यम में चीजों को पढना होगा बेहतर अंक और समझ के लियेयहां से नयी जद्दोजहद शुरु हुईपहले रीडींग को पढनापहले पाठ में केवल अंग्रेजी के जटील शब्दों के अर्थ को जानना,दुसरे में अर्थ को संदर्भ में समझने की कोशिश करनातीसरे में यह समझना की रीडींग किन पहलुओं को उजागर कर रहा है और चौथे में निहितार्थ समझनाअब सोचिये कि जिस पाठ को अंग्रेजी माध्यम के छात्र एक बार में समझ सकते थे उसे हमें चार बार में समझना पड़ता थाऔर यह समझ भी संतोषजनक नहीं थी क्योंकि अपरिचित भाषा से प्राप्त  ज्ञान  कितना सुदृढ़ होगा?
प्रथम सेमेस्टर में हिन्दी माध्यम के अधिकांश छात्र फ़ेल हुएविवशता में अंग्रेजी को अपना माध्यम बनाये छात्रों में से एक मेरी भी स्थिति अच्छी नहीं थीदूसरे से चौथे सेमेस्टर तक हिन्दी माध्यम के अधिकांश विद्यार्थी या तो इस विषय को छोड़ चुके थे या किसी तरह संघर्षरत थेपचपन प्रतिशत बनाने के लिये क्योंकि एम.फ़िलप्रवेश की यह न्युनतम अहर्ता होती हैअब उनका संघर्ष विषय को समझने का नहीं बल्कि अध्ययन को जारी रखने का था.
 यह पूरा दोष भाषा का नहीं हैपरंतु यह प्रश्न तो है कि क्या अधिकांश हिन्दी माध्यम के छात्र कमजोर थे.वे प्रतिभाशाली नही थे या उनकी असफ़लता का कारण भाषा भी थीभाषा का यह भेद भाव नया नहीं हैमेरा क्षोभ इस बात का है कि दिल्ली विश्वविद्यालय या कुछ बड़े केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान का अध्ययन केन्द्र हर प्रकार के भेद भाव का अध्ययन करती है चाहे वह जाति का हो लिंग का हो धर्म का हो या समुदाय का हो मगर भाषा के क्षेत्र में जो यहां होता है या पुरे एकेडेमिक क्षेत्र में होता हैउनकी बात क्यों नहीं करतेशायद यह उपेक्षा इसलिये भी है क्योंकि भाषा की तानाशाही कायम रखी जा सके ताकि एक विशेष प्रकार के ग्यान का उत्पादन हो सके जो इनके वर्चस्व को कायम रखने में मदद करे.
मेरा वास्ता उन छात्रों के दर्द से है जिसमें भारत के सुदुर हिस्से से आनेवाले छात्र उच्च शिक्षा हासिल का सपना लिये हजारों मिल दूर आते हैंपरन्तु उनका स्वप्न भाषा की तानाशाही तले कुचल जाता हैइन सपनों के टूटने की जिम्मेवारी कौन लेगाक्या वे एक अजनबी भाषा के अनुकूल अपने को बनाये या उससे पराजित होकर शस्त्र रख देदुनिया की ज्ञान परम्परा गवाह है कि एक अज़नबी भाषा में मौलिक ज्ञान का निर्माण नहीं सो सकताउसमें तो नकल ही हो सकती है जिसमें हम माहिर हैंलेकिन एक प्रश्न अंग्रेजी भाषा के साम्राज्यवादियों सी भी है कि क्या वे इन अध्ययन केन्द्रों को समावेशी बनायेंगे ताकि ज्ञान का निर्बाध प्रवाह नीचे तक हो ?

kartik Saini

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Jan 31, 2011, 10:06:12 AM1/31/11
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यह एक यथार्थ अनुभव है और लगभग सभी हिंदी माध्यम से स्नातक तक पढ़े विद्यार्थियों का अनुभव यही है. परन्तु हिंदी भाषी लेखक ही कुछ नया लिखने का प्रयास नहीं करते. यदि अचानक सेल्ल्य्बुस बदल जाए तो अंग्रेजी में पुस्तके भले ही मिल जाएँ परन्तु हिंदी में नहीं मिलती. वैसे भी हिंदी में एम् ए के स्तर की किताबें बहुत कम और निम्न स्तर की मिलती हैं. हिंदुस्तान के लेखक भी अंग्रेजी में पुस्तक लिखना पसंद करते हैं. केवल अनुवाद पर निर्भर तो रहना ठीक नहीं होगा. पुस्तकों की कमी तो सभी विषयों में है. अर्थशास्त्र को ही लें. अधिकतर पाठ्य पुस्तकें जो हिंदी में हैं भी तो विदेशी शोध या सोच पर आधारित हैं. इन्ही के आधार पर योजनायें बने गई. परिणाम सामने है. करोड़ों आज फिर भूखे ही सोयेंगे. जब तक हिंदी में शोध पत्र नहीं लिखे जायेंगे और भारतीय परिस्थितियों और सोच के अनुसार विषयों का निर्माण और पठन पाठन नहीं होगा, हिंदी में स्तरीय पुस्तकें मिलने की आशा बेकार है. दरअसल हमें एक कुचक्र में अंग्रेजी के अंधभक्तो ने फंसा दिया है. एक तरीका यह भी हो सकता है कि हम चाहे किसी भी विषय के विद्यार्थी हों उसे पूरे मन से, चाहे पहले अंग्रेजी में ही पारंगत क्यों न होना पड़े, शिक्षा पूर्ण करके उस विषय में पुस्तके या लेख या नोट्स त्यार करके मार्केट में इनकी बाढ़ ला दें. प्रकाशको से कम पैसो में या मुफ्त सेवा के तौरपर ये कम करें. दूसरा तरीका थोडा कठोर है पर सही है और मामला शीघ्र सुलझ सकता है, वो ये है कि इन सभी अंग्रेजो के मानसिक गुलामों को उठाकर समुन्दर में फैंक दिया जाए. मैं ये केवल भावुकता में नहीं कह रहा. मैं इस पर गंभीर हूँ. क्योंकि अंग्रेजी की इस अनिवार्यता के कारण भारत में कितनी प्रतिभायें; वैज्ञानिक, इंजिनियर, वास्तुविद, अर्थशाष्त्री, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, कुशल प्रशासक, आदि बनने से रह गई. ये सब रोड के किनारे काम करने वाले मैकेनिक बन कर रह गए और इनके दिल के अरमान, एक अंग्रेजी के कारण, आंसुओं में बह गए. जो प्रवक्ता लगने थे. स्कूल टीचर बन के रह गए. कुछ तो फटीचर और कुछ treacher बन गए. कुछ जज बनने की जगह प्रोपर्टी डीलर बन गए. अगर कोई और सुझाव है तो स्वागत है.
   

2011/1/29 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com>

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