अरविंद तुकांत कोश
विमोचन - डा. अशोक चक्रधर
इंडिया इंटरनेशल सैंटर – मुख्य हाल
शनिवार – 8 अगस्त शाम 6.30 बजे
गांव गांव गली गली फैले
विशाल हिंदी कवि समाज को समर्पित

लेखकीय
अरविंद तुकांत कोश की रचना का क़िस्सा कोई सोलह-सतरह साल का है. समांतर कोश छप चुका था. एक बार भाई अशोक चक्रधर ने हमारे डाटाबेस का विस्तार देखा तो कह उठे, ‘क्यों नहीं आप इस में से कोई तुकांत आउटपुट ले लेते.’
मैं ने इंग्लिश में कई राइमिंग कोश (तुकांत कोश) देखे थे. कई बार इस के बारे में सोचा भी था. पर बात टल रही थी. अशोक टलने वाले नहीं थे. उन की चाहत इस हद तक थी कि एक बार लखनऊ जाते समय हवाई अड्डे पर जो पत्र उन्हों ने मुझे लिखना शुरू किया, वह लखनऊ पहुंच और वहां से दिल्ली लौट कर तीन टुकड़ों में और कोई बारह पन्नों में पूरा हुआ. स्वयं कंप्यूटर विशेषज्ञ होने के कारण वह जानते थे कि याददाश्त के आधार पर बने तुकांत कोशों के मुक़ाबले डाटाबेस से बना कोश ज़्यादा बड़ा और काम का होगा. उन की दीवानगी देख कर हम ने 2001-2002 में एक आउटपुट निकाला भी. वह अशोक को पसंद नहीं आया. कारण – उस आउटपुट में सभी क्रियाएं और संज्ञा पद अपने मूल रूप में थे – आना, खाना, गाना, छाना, जाना, या फिर पक्षी आदि. अशोक की ज़िद थी कि ऐसे शब्दों से निकलने वाले सभी रूप (आया, आई, आए, आऊं, आओ, आओगे, आओगी, आऊंगा, आऊंगी, आएंगे, या पक्षियों) भी हों, तभी कोश काम का बनेगा. बात टल गई. मैं एक के बाद एक कोश बनाता रहा. साथ ही कई अनुवाद भी प्रकाशित करवाए.
जब भी समय मिलता मैं न सिर्फ़ क्रिया बल्कि संज्ञा पदों के व्युत्पन्न रूप डाटा में डालता रहा. पिछले साल दूरदर्शन पर सुबह सबेरे कार्यक्रम के लिए एक भेंटवार्ता के दौरान अशोक ने अचानक सवाल दाग दिया, ‘तुकांत कोश कब दे रहे हैं?’ बात दर्शकों तक सीधे पहुंच रही थी. मैं ने वादा कर दिया, ‘बस जल्द ही’. यह जल्दी भी एक साल बन गई.
तुकांत कोश के आउटपुट में कई नई तरह की दिक़्क़तें आ रही थीं. बेहद तकनीकी मामला है. हमारा कंप्यूटर का प्लैटफ़ार्म डौस से हट कर विंडोज़ में आ गया था और डाटाबेस फ़ौक्सप्रो से परिवर्तित हो कर ऐमऐस ऐक्सैस में आ चुका था. तुकांत आउटपुट की जो आसानी फ़ौक्सप्रो में थी ऐमऐस ऐक्सैस में नहीं है.. विलोम क्रम या अकारांत क्रम या तुकांत क्रम से सही सही आउटपुट करने के लिए फ़ौक्सप्रो में जो काम पलक झपकते संभव था, वह अब दो महीनों की ट्रायल ऐंड ऐरर मैथड के ज़रिए काफ़ी मग़ज़पच्ची के बाद संभव हुआ.

अरविंद तुकांत कोश वाचिक कविता करने वालों के काम का तो है ही, साथ ही प्रयोगवादी छंदमुक्त कविता, रेडियो जिंगल, टीवी विज्ञापनों और फ़िल्म गीतकारों के लिए भी उपयोगी होगा. जेबी आकार में है – हर समय आपकी जेब में रह सकता है. जब जहां चाहें खोलें, सत्तावन हज़ार तुकें आप के सामने होंगी. साथ ही, नई से नई अकल्पित तुकें नए भाव जगाने में भी सहायक होंगी.
1. इस की शब्दावली समावेशी है – हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, देशज, तद्भव, इंग्लिश – सभी के शब्द शाने बशाने मिलेंगे, जो हमारी दैनिक बोलचाल का हिस्सा बन गए हैं.
2. कविता को रोचक बनाने में सहायक कुछ उक्तियां और मुहावरे भी इस में मिलेंगे.
3. कम प्रचलित शब्दों के अर्थ भी ब्रैकेट में दिए गए हैं.
पेश हैं कुछ उदाहरण: कुंदन, चंदन, हरिचंदन (कल्पवृक्ष, चांदनी), गोपीचंदन (द्वारिका की सफ़ेद मिट्टी), वनचंदन (देवदारु), नंदन, उमानंदन (गणेश), कौशल्यानंदन (राम), अदितिनंदन (आदित्य), देवकीनंदन (कृष्ण), दशरथनंदन (राम), शिवनंदन (गणेश, स्कंद)… किताब आप के हाथ में है, कुछ पन्ने पलटिए… बात साफ़ हो जाएगी.
अंत में – मैं आभारी हूं इस कोश के प्रेरणादाता श्री अशोक चक्रधर का, जिन्होँ ने इस की अनुशंसा में लिखा - सच्चे अर्थों में कविमित्र.
अरविंद कुमार, 5 मई 2015
ईमेल: arv...@arvindlexicon.com