शब्दों का सफ़र पर ॥नावक और उसका तीर॥ तथा 3 अन्य |
|
|
Posted: 07 Aug 2015 06:59 AM PDT ![]() आज की हिन्दी में चाहे ‘नावक’ शब्द का प्रयोग नहीं होता, पर पाठ्यपुस्तकों वाली हिन्दी के ज़रिये इस शब्द से वास्ता ज़रूर पड़ता है। महाकवि बिहारी के सात सौ दोहों के संग्रह ‘सतसई’ का परिचय जिस “सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगै, घाव करे गंभीर।।“ दोहे में आता है दरअसल हर किसी का ‘नावक’ शब्द से पहली बार साबका तभी पड़ता है। दिक्कत यह है कि सहजता से उपलब्ध हिन्दी सन्दर्भ ‘नावक’ का अर्थ बताने में लड़खड़ाते नज़र आते हैं। यहाँ तक कि अनेक भाषाविदों की मेहनत-मशक़्क़त से तैयार ‘हिन्दी शब्दसागर’ भी जब ‘नावक’ का अर्थ “एक छोटा तीर” बताता है तब सामान्य शब्दकौतुकी की जिज्ञासा का समाधान कैसे हो? गौरतलब है कि नावक शब्द आधारोक्ति में ही “ज्यों नावक के तीर” यानी “जिस तरह नावक के तीर होते हैं”...स्पष्ट किया गया है तब भी कोशकारों ने नावक का अर्थ ‘छोटा तीर’ बता कर ही काम चला लिया जबकि फ़ारसी-उर्दू कोशों में इसका अर्थ छोटे तीर के साथ साथ नली, नाली भी दिया हुआ है। दोहे से ही स्पष्ट है कि नावक एक तरह का उपकरण है जिससे छोटे तीर चलाए जाते होंगे। अनजानेपन का आलम यह कि उच्चारण भी सही नहीं। अनेक विद्वान इसे नाविक लिखते-बोलते हैं। अब भला नाविक चप्पू चलाएगा या तीर? शब्दों के सफर में ‘नावक’ को समझने की कोशिश करते हैं। आमतौर पर बन्दूक में एक नली होती है। ‘दुनाली’ शब्द सामने आते ही हमारे सामने ऐसी बन्दूक की छवि आती है जिसके साथ दो नलियाँ जुड़ी होती हैं। इसी तरह नावक को भी समझा जा सकता है। नावक दरअसल फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आया है। इसे इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द कहा जा सकता है। फ़ारसी में ‘नावः’ शब्द का अर्थ होता है पनाला, परनाला। संस्कृत में प्रणाली या प्रणालिका जैसे शब्द हैं और इनका फ़ारसी रूप हुआ परनाला, पनाला। आमतौर पर दूषित जल निकासी की व्यवस्था के लिए ही परनाला का प्रयोग किया जाता है पर ‘नावः’ या ‘नाव’ में सामान्य नाली, नहर या प्रणाली का भाव भी है। गौर करें नली जहाँ चारों और से बन्द लम्बी मगर पोली प्रणाली है वहीं नाली अर्धवृत्ताकार, खुली प्रणाली है। नाव का प्रणाली वाला अर्थ और स्पष्ट होता है नाबदान से जिसका अर्थ भी दूषित पानी बहाने वाली नाली ही है। यह मूलरूप से ‘नावदान’ है। भारत-ईरानी परिवार की भाषाओँ में ‘व’ का रूपान्तर अक्सर ‘ब’ में होता है (जैसे वन से बन) उसी के तहत ‘नावदान’ का उच्चार ‘नाबदान’ हो गया। तो मूलतः फ़ारसी में ‘नावक’ एक ऐसे अर्धस्वचालित धनुष को कहा जाता है जिसमें सीधे कमान में तीर फँसाकर नहीं छोड़ा जाता बल्कि कमान खींचने के बाद तीर को एक नाली में से गुज़ारा जाता है। तीर को लीवर या ट्रिगर के ज़रिये कमान से मुक्त किया जता है। किन्ही धनु-उपकरणों में खुली नाली भी होती थी और किन्ही में नली यानी पाइप का प्रयोग भी किया जाता था। ध्यान रहे, नावक का तात्पर्य ज़हरबुझे तीर छोड़ने वाली फूँकनली (BLOW-PIPE) से नहीं है। नावक धनुष का ही एक प्रकार है जबकि फूँकनली एक अलग हथियार है। नावक का उच्चार नाविक करना ग़लत है। नावक उसे कहते हैं जो नाव यानी नली से चलाया जाए या खुद नली ही नावक है। जबकि नाविक वह है जो नाव अर्थात नौका, बोट, कश्ती चलाए। नाविक यानी खिवैया। नावक यानी मशीनी धनुष अथवा छोटा तीर। ‘नावक’ में जो मुख्य भाव है वह तीर नहीं बल्कि उसका आशय खाँचा, सिलवट, शिकन, दर्रा, घाट, नहर, पाइप, नाड़ी, प्रणाली, प्रवाहिका आदि से है। एक ऐसा रास्ता जिससे सहज प्रवाह और गति मिले। जिससे कोई वस्तु गुज़र सके। यह प्रणाली ही गुज़रने वाली चीज़ को दिशा प्रदान करती है, लक्ष्य की ओर ठेलती है। गौर करें नदियों को। वे पहाड़ों में बहें या मैदानों में, एक खाँचे या दरार में ही बहती है। समतल जगह पर पानी दिशाहीन होकर फैलता है, उसे बहाव नही मिलेगा। प्रवाह नहीं मिलेगा। इसी तरह नहरों के ज़रिये पानी को निर्दिष्ट स्थान की ओर ले जाया जाता है।।संस्कृत में नाव का अर्थ नौका है फ़ारसी में ‘नाव’, ‘नावः’ दोनों शब्द हैं। दरअसल नाव जहाँ नौका है वहीं ‘नावः’ का अर्थ नाली भी है। बात दरअसल यह है कि विकासक्रम में मनुष्य को नौका बनाने की तरकीब टूटे पेड़ की खोखल को पानी में तैरते देख कर मिली। धीरे धीरे वह इसके बारे में सीखता गया। मनमाफ़िक कश्ती बनाने के लिए वह पेड़ों का चुनाव करने लगा। पेड़ों के खोखले तनों से कई तरह की नौकाएँ बनाने लगा। इसी तरह पेड़ों की खोखल का प्रवाही उपयोग भी उसने सीखा। बाँस की खोखल से हवा प्रवाहित होने पर पैदा होने वाला नाद उसने समझा। उसी खोखल में पानी बहा कर उसने कामचलाऊ नहरें भी बनाईं। कुल मिलाकर ‘नाव’ में गति का भाव है और ‘नावः’ यानी नाली में प्रवाह है। नाली एक राह है, रास्ता है। राह गंतव्य की ओर ले जाती है। फ़ारसी नावः (नावह) का एक रूप नावक हुआ। भारत में नावक इस्लामी दौर में ही आया। गौरतलब है कि करीब 224 ई. से 651 ई. के दौर में फ़ारस के सासानी वंश के दौर में एक फौजी दस्ते का नाम अल-नवाकिया भी होता था। समझा जाता है कि विशेष प्रकार के नलीदार धनुष यानी नावक से लैस इस दस्ते को इसी वजह से अल-नवाकिया कहा जाता था। यह भी उल्लेख है कि नावक के ज़रिये दुश्मनों पर जलते हुए तीर भी बरसाए जाते थे।I
Pictures have been used for educational and non profit activies.
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture. |
|
|
Posted: 07 Aug 2015 06:56 AM PDT पु राने ज़माने से लेकर आज तक कमरबन्द के लिए निहायत देसी किस्म का शब्द आज तक डटा हुआ है-नाड़ा। हालाँकि कमरबन्द और इज़ारबन्द भी चलते हैं पर उतने नहीं। नाड़ा दरअसल बेल्ट ही है जिसका चलन आज आम है। नाड़ा अब नितान्त भारतीय किस्म के अधोवस्त्रों में ही इस्तेमाल होता है। यूँ देखें तो बेल्ट की तकनीक नाड़े का आधुनिक रूप है। नाड़ा जहाँ कमर के इर्द-गिर्द वस्त्र को दोहरा कर बनाई गई नाल में डाला जाता है वहीं बेल्ट को नाल में नहीं बल्कि कमर के इर्द-गिर्द लूप से होकर गुज़ारा जाता है। नाड़ा का मूल है नाड़ी अर्थात वह नाल अथवा पोला-खोखला रास्ता जिसमें कमर कसने के लिए पतली रस्सी, सुतली या डोरी डाली जाए। इस तरह नाड़ी से नाड़े की अर्थवत्ता स्थापित होती है- जिसे नाड़ी में डाला जाए वह नाड़ा। इस शृंखला से कुछ अन्य शब्द भी जुड़ते हैं। गौर करें नड़, नद, नळ और नल पर। नड या नड़ का अर्थ है बाँस। ध्यान रहे पुराने ज़माने से ही बाँस के पोले तने के विविध उपयोग मनुष्य ने खोजे। सिंचाई के साधन के तौर पर नाड़ा, नाड़ी, नाड़िका जैसे शब्द प्रचलित हैं। मालवी-राजस्थानी में छोटी नहर को नाड़ी या नाड़ा भी कहते हैं। इसके अलावा जल-प्रवाह के साधन के तौर पर नाल, नाली या नालिका, नलिका जैसे शब्द भी हैं। नदी शब्द तो है ही। हिन्दी का नदी शब्द संस्कृत के नाद से आ रहा है जो बना है संस्कृत धातु नद् से जिसमें जिसमें मूलतः ध्वनि का भाव है। नद् से ही बना है नद जिसका अर्थ है दरिया, महाप्रवाह, विशाल जलक्षेत्र अथवा समुद्र। प्राचीनकाल में पवर्तों से गिरती जलराशि के घनघोर नाद को सुनकर जलप्रवाह के लिए नद शब्द रूढ़ हो गया अर्थात नदी वह जो शोर करे। गौर करें कि बड़ी नदियों के साथ भी नद शब्द जोड़ा जाता है जैसे ब्रह्मपुत्रनद। ग्लेशियर के लिए हिमनद शब्द इसी लिए गढ़ा गया। अब साफ है कि नद् शब्द से ही बना है नदी शब्द जो बेहद आम है। नाड़ी या नाडि का अर्थ होता है किसी पौधे का पोला तना या डंठल। कमलनाल में यह पोलापन स्पष्ट हो रहा है। नारियल का मोटा तना भीतर से पोला होता है। नाडि या नाड़ी एक ही मूल यानी नड् से जन्मे हैं। गौर करें, नद् धातु का ही एक अन्य रूप नड् है। नड् में निहित पोलापन दरअसल ध्वनि या नाद से ही आ रहा है। नड् का मतलब होता है तटीय क्षेत्र में पाई जाने वाली घास, नरकुल, सरकंडा। वनस्पतियों के इन सभी प्रकारों में तने का पोलापन जाना-पहचाना है। नाडि का अर्थ बांसुरी भी होता है जो प्रसिद्ध सुषिर वाद्य है। बांस का पोलापन ही उसे सुरीलापन देता है जिससे बांसुरी नाम सार्थक होता है। बाँस की पोल से गुज़रती हवा से नाद पैदा होता है। इस पोल का प्रवाही उपयोग भी बाद में हुआ और पानी के बहाव या धारावाही के अर्थ में नाड़ी का प्रयोग भी होने लगा। धमनियों-शिराओं के लिए भी नाडि शब्द प्रचलित है। हिन्दी का नाली शब्द बना है नल् धातु से जिसका मतलब होता है गोलाकार, पोली वाहिनियां। यह नड़ का अगला रूप है। शरीर की नसों के लिए मूलतः इनका प्रयोग होता है। बाद में जल-प्रवाह की कृत्रिम संरचनाओं के लिए भी इससे नाली शब्द बनाया गया। घरों में पानी की सप्लाई के लिए जिन पाईपों से होकर पानी आता है उसे नल इसी लिए कहते हैं। मराठी समेत द्रविड़ भाषाओं में इसका नळ रूप है। अर्थ वही है प्रवाहिका। प्रणाली में भी ‘नाली’ को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है।
Pictures have been used for educational and non profit activies.
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture. |
|
|
।।हिन्दी पत्रकारिता के ‘प्रश्न’ और ‘विस्यम’।। Posted: 07 Aug 2015 06:53 AM PDT हि न्दी पण्डितों की विभिन्न भ्रान्तियों में एक विस्मय-चिह्न और प्रश्न-चिह्न के शीर्षकों में प्रयोग पर ऐतराज भी है। ख़ासतौपर पर पत्रकारिता की हिन्दी में। किसी भी शीर्षक में विस्मयादिबोधक या चिह्न लगाइये, मसलन- “ चौहान से छिनेगी कुर्सी!” ज्ञानी महोदय तत्काल आपत्ति करेंगे- इसमें विस्मय की क्या बात है ? अब अगर आपने इसी शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न लगाया तो भी आपत्ति होती है कि जब आपको ही नहीं पता तो पाठक क्या बताएगा कि कुर्सी छिनेगा या नहीं। यही बात “चांद पर पानी!” या “मंगल पर पानी ?”जैसे शीर्षकों के साथ भी है। बीते तीस सालों में ऐसे अनेक लोगों से पाला पड़ा है जो शीर्षकों में चिह्नों का प्रयोग एक सिरे से गलत बताते रहे। मानता हूँ कि विस्मयादिबोधकचिह्न का गैरज़रूरी और असावधान प्रयोग हिन्दी में होता रहा है। इसीलिए व्यक्तिगत स्तर पर इससे बचते हुए मैं ऐसे शीर्षकों में ‘कयास’ ,‘चर्चा’ ,‘अटकल’, ‘आसार’, ‘सम्भावना’ या ‘आशंका’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने का हामी हूँ। मगर चिन्दी-बजाजों का ऐसा भी क्या डर कि बेचारा पत्रकार मनमाफ़िक़ चिह्नों का प्रयोग न कर सके। सबसे पहले तो इस ग्रन्थि से मुक्त हो जाइये कि शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न लगाने से यह ग़लतफ़हमी भी हो सकती है कि आप पाठक से प्रश्न पूछ रहे हैं। व्याकरण चिह्नों से भाषा स्पष्ट और सरल बनती है। शीर्षकों में चिह्नों के प्रयोग से स्पेस तो बचता ही है, वह प्रभावी बनता है। जहाँ तक विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रश्न है, उसके बारे में हिन्दी के तथाकथित पण्डित भी स्पष्ट नहीं है। ऊपर लिखे दोनों उदाहरण मेरी नज़र में गलत प्रयोग की मिसाल नहीं है। व्याकरण के मुताबिक जो अविकारी शब्द हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, क्रोध, तिरस्कार आदि भावों का बोध कराते हैं, उनके साथ विस्मय चिह्न का प्रयोग होता है। विस्मयादिबोधक शब्द से ही स्पष्ट है कि विस्मय + आदि अर्थात विस्मय तथा इससे मिलते जुलते भावों का बोध कराने वाली अभिव्यक्तियों में प्रयुक्त चिह्न। चांद वाले उदाहरण में आश्चर्य का भाव है। इसमें विस्मय चिह्न का प्रयोग गलत नहीं। इसी तरह चौहान वाले उदाहरण में अटकल का भाव है। ध्यान रहे अटकल भी आश्चर्य की श्रेणी में लिया जाने वाला भाव है क्योंकि व्यापम घोटाले में चौहान नज़दीकियों के शामिल होने की बातें जितनी आम हैं उतना दम और पुख्ता आधार उनकी कुर्सी छिनने वाली चर्चाओं में नहीं। खबर अनुमान की बात भी कर रही है, चर्चा पर आधारित भी है। यहाँ भी विस्मय चिह्न को गलत नहीं ठहराया जा सकता। वैसे चौहान की कुर्सी छिनने के आसार अथवा मायावती चौहान की कुर्सी छिनने की चर्चा जैसे शीर्षक भी लगाए जा सकते थे।
Pictures have been used for educational and non profit activies.
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture. |
|
|
Posted: 07 Aug 2015 06:43 AM PDT ह मारी शिक्षा पद्धति की सबसे बड़ी मुश्किल ज्ञान को सरल और आसान न बना पाने की अक्षमता है। ऐसा अनेक मिसालों से साबित होता रहता है। ऐसा ही मामला है कहावतों, मुहावरों का अर्थ न समझना। जिसकी वजह से लोग उनका प्रयोग तीर-तुक्के की तरह करते हैं। सही बैठ जाए तो ठीक नहीं तो जब उसके मायने पूछे जाएँ तो बगलें झाँकने की नौबत आनी तय है। ऐसी कहावतों, मुहावरों की लम्बी फ़ेहरिस्त में “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” वाली कहावत भी है जिसकी दोनों पंक्तियों की आपसी रिश्तेदारी उलझन भरी है। यह जानना ज़रूरी है कि इस कहावत के दो पद हैं। पहला पद है “हाथ कंगन को आरसी क्या” दूसरा पद है “पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”। इन दोनों पदों की भाषा का गठन आधुनिक हिन्दी है। अगर आरसी शब्द को छोड़ दें तो कहावत का एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिसे समझने में मुश्किल हो। आरसी यानी आईना, मिरर, शीशा। हिन्दी में में अब आरसी शब्द का प्रचलन नहीं रहा अलबत्ता मराठी में इसका रूप आरसा होता है और यह खूब प्रचलित है। तो “हाथ कंगन को आरसी क्या” वाला पूर्वपद अपने आप में पूरी कहावत है। मूलतः यह प्राकृत-संस्कृत परम्परा की उक्ति है और फ़ारसी के उत्कर्ष काल से भी सदियों पहले यह कहावत प्रचलित थी। इसका प्राकृत रूप देखिए- “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि”। इसी बात को संस्कृत में इस तरह कहा गया है- “हस्ते कंकणं किं दर्पणेन”। यह नहीं कहा जा सकता कि संस्कृत उक्ति के आधार पर प्राकृत रूप बना या प्राकृत उक्ति के आधार पर संस्कृत उक्ति गढ़ी गई। कहावतें सार्वजनीन सत्य की अभिव्यक्ति का आसान ज़रिया होती हैं इसलिए वही कहावत जनमानस में पैठ बनाती हैं जो लोकभाषा में होती हैं। इस सन्दर्भ में आठवीं-नवीं सदी के ख्यात संस्कृत साहित्यकार राजशेखर के प्रसिद्ध प्राकृत नाट्य ‘कर्पूरमंजरी’ में “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि” का उल्लेख मिलता है। रूप-सिंगार के लिए आईना होना बेहद ज़रूरी है, किन्तु सजन-सँवरने की सभी क्रियाओं के लिए आईना हो, ये ज़रूरी नहीं। मसलन हाथों में कंगन पहनना है तो यूँ भी पहना जा सकता है, उसके लिए आईने की ज़रूरत क्या? इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि चेहरा देखना हो तो शीशा आवश्यक है किन्तु हाथ-पैर के गहने देखने के लिए आईने की क्या ज़रूरत। वो तो यूँ भी देखे जा सकते हैं। कोई स्त्री अपने हाथों के कंगन या मेहँदी की सज्जा आईने में नहीं देखती। आशय है प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्। इस कहावत के दूसरे पद को समझने के लिए इसकी बुनियाद समझना ज़रूरी है। मुस्लिम काल की राजभाषा फ़ारसी थी। जिस तरह ब्रिटिश राज में अंग्रेजी जानने वाले की मौज थी और तत्काल नौकरी मिल जाती थी उसी तरह मुस्लिम काल में फ़ारसी का बोलबाला था। हिन्दू लोग फ़ारसी नहीं सीखते थे क्योंकि यवनों, म्लेच्छों की भाषा थी। हिन्दुओं के कायस्थ तबके में विद्या का वही महत्व था जैसा बनियों में धनसंग्रह का। कायस्थों का विद्याव्यवसन नवाचारी था। नई-नई भाषाओं के ज़रिये और ज्ञान का क्षेत्र और व्यापक हो सकता है यह बात उनकी व्यावहारिक सोच को ज़ाहिर करती है। उन्होंने अरबी भी सीखी और फ़ारसी भी। नवाबों के मीरमुंशी ज्यादातर कायस्थ ही होते थे। रायज़ादा, कानूनगो, मुंशी, बहादुर यहाँ तक की नवाब जैसी उपाधियाँ इन्हें मिलती थी और बड़़ी बड़ी जागीरें भी। तो इस तरह मुस्लिम दौर में फ़ारसीदाँ होना और पढ़ा-लिखा होना परस्पर पर्याय था। जब शिक्षा का माध्यम ही फ़ारसी हो, तब किसी शख़्स का यह कहना कि उसे फ़ारसी नहीं आती ग़ैरमुमकिन सी बात थी। इसे यूँ भी कह सकते हैं उस दौर के तमाम उदार हिन्दू तबके ने फ़ारसी सीखी जो बदलते दौर में अपना और अपनी क़ौम के बेहतर भविष्य का सपना देखता था। कायस्थों, ब्राह्मणों, वणिकों यहाँ तक कि क्षत्रियों में भी ऐसे तमाम लोग थे। ग्यारहवीं-बारहवीं सदी तक हिन्दू समाज से ऐसे तमाम लोग फ़ायदे में रहे जिन्होंने अरबी-फ़ारसी सीखी। इस पृष्ठभूमि में देखें कि हिन्दुस्तान में फ़ारसी का दौर बारहवी-तेरहवीं सदी से शुरू होता है। “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” इस पूरी कहावत का गढ़न आज की हिन्दी का लगता है। हिन्दी में प्रचलित अनेक प्राचीन कहावतें सीधे-सीधे फ़ारसी समेत अवधी, बृज, बुंदेली, राजस्थानी व अन्य देसी भाषाओं से आती है। लेकिन यह भी सच है कि बारहवीं सदी से ही हिन्दी ने वह रूप लेना शुरू कर दिया था जिसकी बुनियाद पर आज की हिंदी खड़ी है। चौदहवीं –पन्द्रहवीं सदी की हिन्दी के अनेक प्रमाण उपलब्ध है जो आज की हिन्दी से मेल खाते हैं। मुमकिन है कि “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि” खुसरो काल तक आते-आते इस रूप में ढल गई हो। पर यह तय है कि उस वक्त तक भी समूची कहावत का पहला पद ही प्रचलित रहा होगा। बतौर सरकारी भाषा मुस्लिमों से इतर समाज के प्रभावशाली तबके में भी फ़ारसी सीखने की वृत्ति बढ़ी दूसरा पद तभी प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् के अर्थ में “हाथ कंगन...” वाली उक्ति को और प्रभावशाली बनाते हुए इसके साथ जुड़ा होगा क्योंकि इसमें आरसी को फ़ारसी से मिलाने वाली स्वाभाविक तुक है। यह कहना मुश्किल है यह दूसरा पद किस दौर में “हाथ कंगन...” के साथ चस्पा हुआ, पर ये दोनों अलग अलग उक्तियाँ हैं। पहली उक्ति कम से कम डेढ़ हज़ार साल पुरानी है जबकि दूसरी उक्ति तो स्वतः साबित करती है कि वह फ़ारसी के राजकाज वाले उत्कर्ष की रचना है। ज़ाहिर है मुग़ल दौर में ही यह मुमकिन हुआ होगा।
Pictures have been used for educational and non profit activies.
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture. |
| You are subscribed to email updates from शब्दों का सफर
To stop receiving these emails, you may unsubscribe now. |
Email delivery powered by Google |
| Google Inc., 1600 Amphitheatre Parkway, Mountain View, CA 94043, United States | |