मित्रो,
चर्चा हिंदी अनुवाद की समस्याओं पर हो रही है। इस विमर्श के बीच में अनुवाद पर एक दिलचस्प लेख पढ़ना अनुवाद संबंधी सोच-विचार के नए आयामों को सामने ला सकता है।
लेख का नाम है - The Joyful Side of Translation
इसका पहला पैरा इस प्रकार है -
“The
theory of translation is very rarely — how to put this? — comical. Its mode is
elegy, and severe admonishment. In the 20th century, its great figures were
Vladimir Nabokov, in exile from Soviet Russia, attacking libertines like Robert
Lowell for their infidelities to the literal sense; or Walter Benjamin, Jewish
in a proto-Nazi Berlin, describing the Task of the Translator as an impossible
ideal of exegesis. You can never, so runs the elegiac argument, precisely
reproduce a line of poetry in another language. Poetry! You can hardly even
translate “maman.” . . . And this elegiac argument has its elegiac myth: the
Tower of Babel, where the world’s multiplicity of languages is seen as
mankind’s punishment — condemned to the howlers, the faux amis,the foreign menu apps. Whereas the ideal
linguistic state would be the lost universal language of Eden.”
सादर,
ललित
2011/10/29 Vinod Sharma
<vinodj...@gmail.com>
नरेंद्रजी मैंने एक विशेष परिप्रेक्ष्य, स्थानीकरण (लोकलाइजेशन) के संबंध में इस समस्या को उठाया है, जहाँ अक्सर इस प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ता है।
2011/10/29 Narendra Kumar Tomar
<nak...@yahoo.com>
प्रिय विनोद जी,
अनुवाद करते समय किसी दूसरी, खास तौर पर विदेशी भाषा के किसी शब्द विशेष के स्थान पर, मेरी समझ में तो यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं हैं कि उसकी जगह हिंदी के भी एक ही समानार्थी शब्द का प्रयोग किया जाए( और यह हमेशा संभव भी नहीं है)) । आखिर प्रत्येक भाषा की अपनी प्रकति होती है और हर शब्द का अपना
एक इतिहास होता है। अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा में ही नहीं अनेक भारतीय भाषाओं में भी ऐसे अनगिनत शब्द हैं जिनके पर हिंदी के एक समानार्थी का प्रयोग करना संभव नहीं है। अत: इस मामलें में कोई अनुवादक मेरे अनुसार तो कतई विवश नहीं। अर्थ को स्पष्ट करने के लिए वह कई शब्दों का ही नहीं , जरूरत पडने पर पूरे वाक्य का भी इस्तेमाल कर सकता है।
From: Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>
To: hindian...@googlegroups.com
Sent: Saturday, 29 October 2011 4:38 PM
Subject: {हिंदी अनुवादक} हिंदी अनुवाद की व्यावहारिक समस्याएँ
बंधुगण, सादर नमस्कार.
एक चर्चा आरंभ करना चाहता हूँ आशा है कि
विद्वद्जनों और संतजनों का सक्रिय सहयोग मिलेगा.
यह तो सभी स्वीकार करेंगे कि वैश्वीकरण और आधुनिक विधा ‘लोकलाइजेशन’ के कारण अनुवादक
स्वतंत्र न रह कर बंधक हो गया है। पाशचात्य भाषाओं और पूर्वी भाषाओं में कुछ भी समान नहीं है।
लोकलाइजेशन की माँग के कारण लक्ष्य भाषा को भी स्रोत भाषा के मानकों के अनुसार ढाला जाता है।
इसके लिए स्रोत भाषा के हर शब्द के लिए लक्ष्य भाषा में एक शब्द में ही पारिभाषिक शब्द खोजना
होता है। इसीलिए इस मंच पर शब्द सहायता के अनुरोध अक्सर प्राप्त होते हैं और सभी सदस्यों द्वारा
उदारता से सहायता दी भी जाती है। कई बार एक शब्द में समानार्थी पारिभाषिक शब्द नहीं मिल पाता
तो नए शब्द गढ़े भी जाते हैं.
क्या हम अनुवादकों को सीमाओं में बांधने की वर्तमान प्रवृत्ति का प्रतिकार नहीं कर सकते?
यदि हमारे दो या तीन शब्द विदेशी भाषा के एक शब्द को बखूबी व्यक्त कर सकते हैं तो फिर
एक शब्द में ही समानार्थी शब्द लिखने का दुराग्रह स्वीकार करने की विवशता से अनुवादक
को क्या मुक्ति नहीं मिल सकती? हो सकता है मैं अपनी बात को पूरी तरह अभिव्यक्त न कर
पाया हूँ, लेकिन विद्व्द्जन मेरे आशय को समझ कर इस विषय पर अनुवादक समूह के सदस्यों
को अवश्य लाभान्वित करेंगे।
सादर,
विनोद शर्मा
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