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Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

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Jul 18, 2012, 1:50:28 AM7/18/12
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विषय परिवर्तन के कारण आलोक जी की पोस्ट दुबारा भेजी जा रही है। 

संदेश  अनुवाद से जुड़ी समस्या पर बढ़िया लेख : जानकी पुल ब्लॉग पर तहलका पत्रिका से साभार लिया गया है.

हिंदी में अनूदित साहित्य का विस्तार हुआ है. बड़े पैमाने पर विश्व साहित्य हिंदी में लगतार उपलब्ध हो रहा है. लेकिन अनुवाद का स्तर
उसके लिए मिलने वाला मेहनताना जैसे मुद्दे लगातार विवाद के विषय रहे हैं. स्वतंत्र मिश्र की यह 'स्टोरीइन्हीं कुछ पहलुओं के विश्लेषण का प्रयास करती है. एक दिलचस्प स्टोरी- जानकी पुल.
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 ‘प्रकाशक प्रति शब्द 10 या 15 पैसे देता है. इसके बाद आप उम्मीद करें कि बढ़िया अनुवाद हो जाए. क्या यह संभव है?’

विश्व क्लासिकल साहित्य श्रृंखला (राजकमल प्रकाशन) के संपादक सत्यम के ये शब्द उस बीमारी की एक वजह बताते हैं जिसकी जकड़ में हिंदी अनुवाद की दुनिया आजकल है. अनुवाद यानी वह कला जिसकी उंगली पकड़कर एक भाषा की अभिव्यक्तियां दूसरी भाषा के संसार में जाती हैं और अपने पाठकों का दायरा फैलाती हैं. लेकिन इस कला की सेहत आजकल ठीक नहीं. जानकारों के मुताबिक हिंदी में होने वाले अनुवाद का स्तर बहुत खराब है. इसके चलते दूसरी भाषा की अच्छी रचनाओं को हिंदी में पढ़ने का आनंद काफी हद तक जाता रहता है. जैसा कि पुस्तक समीक्षक पंकज चौधरी कहते हैं, ‘कई बार अंग्रेजी से हिंदी में आई कोई किताब पढ़कर लगता है कि इससे अच्छा तो अंग्रेजी में मूल किताब ही पढ़ ली जाती.

कहानीकार प्रभात रंजन का अनुभव अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है. वे कहते हैं, ‘पेंगुइन जैसा बड़ा प्रकाशक डिमाई आकार के एक पन्ने (औसतन 300-350 शब्द) के लिए 80 रुपये मेहनताना देता है. राजकमल और वाणी प्रकाशन का रेट थोड़ा ठीक है. वे प्रति शब्द के लिए 40 पैसे देते हैं.’ पेंगुइन प्रकाशन में हिंदी संपादक की जिम्मेदारी संभाल चुके सत्यानंद निरुपम कहते हैं, ‘प्रकाशक प्रति शब्द के लिए 22 पैसे मेहनताना देते हैं जबकि गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एक रुपये प्रति शब्द या इससे ज्यादा भी दे देते हैं. जबकि साहित्य की सामग्री का अनुवाद एनजीओ की सामग्री की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन है.

लेकिन अनुवाद की बदहाली का कारण सिर्फ कम मेहनताना नहीं. विशेषज्ञता की कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है. सत्यम कहते हैं, ‘यूरोप में विशेषज्ञ अनुवादकों की लंबी परंपरा रही है. मसलन चेखव का अनुवाद करने वाले उनके साहित्य के शोधार्थी रहे हैं. उनपर लगातार लिखने या जानने वाले लोगों को ही यह जिम्मा मिलता रहा है. लेकिन भारत में आपको हजारों उदाहरण ऐसे मिल जाएंगे जिसमें अनुवादकों को अनुवाद के विषय की कोई जानकारी नहीं होती है. यही वजह है कि वे हसुआ के ब्याह में खुरपी का गीत’ गाने में कोई संकोच नहीं करते.

प्रकाशकों द्वारा अनुवादकों का नाम नहीं दिया जाना भी एक बड़ा कारण है. गीतांजलि के हिंदी अनुवाद’ पुस्तक के लेखक देवेंद्र कुमार देवेश कहते हैं, ‘प्रकाशक अनुवादकों का नाम किताब में शामिल नहीं करना चाहते.’ इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं, ‘दरअसल वे अनुवाद के काम को दोयम दर्जे का मानते हैं. खासतौर पर बांगला से हिंदी में अनूदित किताबों में नाम देने की परंपरा रही ही नहीं है. नाम दिए जाने से अनुवादकों की जिम्मेदारी तय होती है और जाहिर सी बात है कि वे काम को गंभीरता से लेते हैं.’ कमोबेश यही आलम अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में भी है. एक अनुवादक और लेखक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के काम को शुरू करने वाला प्रभात प्रकाशन अपने अनुवादकों का नाम सामान्य तौर पर किताब में शामिल नहीं करता.

यही वजह है कि अनुवादक विमल मिश्र अनुवादकों की जिम्मेदारी तय करते हुए कहते हैं, ‘मूल रचनाकार अपनी रौ में लिखता जाता हैउसपर कोई बंदिश नहीं होती. लेकिन अनुवादक को रेलगाड़ी की तरह पटरी पर चलना पड़ता है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘जैसे इंजन के ड्राइवर की जिम्मेदारी होती है मुसाफिरों को उनके गन्तव्य तक सुरक्षित पहुंचाने कीठीक वैसी ही जिम्मेदारी अनुवादक की होती है मूल रचना के भाव को अनूदित रचना में समेकित करने की. अनुवादक को जवाब देना पड़ता है प्रकाशक कोपाठकों को और मूल पुस्तक के रचनाकार को.

हालांकि जब हम मुद्दे का दूसरा पहलू यानी प्रकाशकों को टटोलते हैं तो समस्या की एक और ही वजह सामने आती दिखती है. वाणी प्रकाशन के मालिक अरूण माहेश्वरी कहते हैं, ‘काम और पैसे देने वालों की कोई कमी नहीं है. हमने मंटो की कहानी उर्दू से हिंदी में कराई. अनुवादक महोदय ने चवन्नी नामक पात्र को चन्नी कर दिया. इसमें पैसे का मामला कहां हैहम मेहनताना तय करना अनुवादकों पर छोड़ देते हैं. हकीकत तो यह है कि अनुवाद की किताबें हमारे लिए मुनाफा देने वाली नहीं होती हैं.’ ऐसा क्योंके जवाब में माहेश्वरी कहते हैं, ‘अनुवाद की किताब तैयार करने में अनुवादकप्रूफ रीडर और संपादक को अलग-अलग पैसा देना होता है.’ अनुवादकों को मुंहमांगी कीमत देने के नाम पर माहेश्वरी महात्मा गांधी के पौत्र और प. बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी का नाम गिनाते हैं. गांधी ने वाणी प्रकाशन के लिए विक्रम सेठ की किताब ए सुटेबल ब्यॉय’ का अनुवाद किया है.

लेकिन जानकारों के मुताबिक ऐसे उदाहरण इक्का-दुक्का हैं और ज्यादातर अनुवादक गोपाल कृष्ण गांधी की तरह अपना मेहनताना खुद तय करने जैसी स्थिति में नहीं होते. रही बात कम मुनाफे की तो अगर ऐसा होता तो इस समय बाजार में अनुवादित सामग्री की जो बाढ़ आई हुई है वह नहीं दिखती. अंग्रेजी के प्रकाशक पेंगुइन और हार्पर कॉलिन्स इस काम को बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. सत्यम कहते हैं, ‘ज्यादातर मामलों में अनुवाद मशहूर किताबों का होता है. अंग्रेजी के बड़े लेखकों की किताब का हिंदी में अनुवाद कराया जाता है इसलिए लाइब्रेरी से खरीद बड़े पैमाने पर हो जाती है. इन किताबों के अनुवाद के कई संस्करण प्रकाशित होते हैं और इनसे प्रकाशक लंबे समय तक मुनाफा कमाते हैं.'

वजहों पर भले ही एकराय न होंइस पर सब सहमत हैं कि अनुवाद का स्तर गिरा है. अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के मामले में ऐसे भी कई उदाहरण मिल जाते हैंजहां दो शब्दों से लेकर तीन-तीन पैराग्राफ या कई पन्ने छोड़ दिए जाते हैं. अंग्रेजी के कई मुहावरे जिनका हिंदी में अनुवाद हो सकता है और जो पाठकों की दिलचस्पी बढ़ाने में मददगार हो सकते हैंउन्हें अनुवादक हिंदी पाठकों के स्तर का हवाला देकर छोड़ देते हैं. इसे समझने के लिए यहां यथार्थवाद के प्रवर्तक और प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक स्तांधाल के सबसे चर्चित उपन्यास सुर्ख और स्याह’ से एक उदाहरण का सहारा लिया जा सकता है. सचबस सचअपने पूरे तीखेपन के साथ’ – दांतों. उपन्यास में विभिन्न अध्यायों की शुरुआत में ऐसा ही कोई पद्यांश या सूक्ति कथन दिया गया है जिसके साथ किसी विख्यात हस्ती का नाम है. ये उपन्यास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. मगर हिंदी में पहली बार प्रकाशित अनुवाद से ये नदारद थीं.

अनुवाद में लापरवाही का यह सिलसिला अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद तक ही सीमित नहीं. बांगला के कई क्लासिक उपन्यासों के अनुवादित संस्करण दशकों से हिंदी पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रहे हैं. लेकिन इनमें भी बड़ी भूलें मौजूद हैं. 20 वें पुस्तक मेले में शरतचंद्र और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यासों के नये हिंदी अनुवाद का लोकार्पण किया गया. इन किताबों का नये सिरे से अनुवाद कराने की जरूरत पर राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक माहेश्वरी का कहना हैं, ‘ये किताबें अब रॉयल्टी से बाहर हो चुकी हैं. मगर इन किताबों के जो हिंदी संस्करण बाजार में बिक रहे हैंवे आधे-अधूरे हैं. उनके अनुवाद बहुत खराब हैं. पन्ने के पन्ने गायब हैं. बांगला में कुछ कहा गया है और हिंदी अनुवाद में कुछ और.’ राजकमल से प्रकाशित पथ का दावा’ के अनुवादक विमल मिश्र किताब की भूमिका में लिखते हैं, ‘शरत् बाबू के उपन्यास पथेर दाबी’ का हिन्दी अनुवाद पथ का दावा’ होगा न कि पथ के दावेदार’. दरअसल इस उपन्यास के कथानक का मूल आधार है पथ का दावा’ नाम की समिति है. हिन्दी केदावेदार’ शब्द के लिए बंगला में दाबिदार’ शब्द है.'

खराब अनुवाद की एक बड़ी वजह अनुवादकों में नजरिये का अभाव होना भी है. मसलन किसी खास समाज में किसी शब्द का क्या मतलब हैइसे जाने-समझे बगैर अनुवाद कर देने से अर्थ का अनर्थ होना तय है. दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.ए. अंग्रेजी का ही एक हिस्सा कंपरेटिव लिटरेचर’ में कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद गोदान’ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ाया जा रहा है. किताब का नाम गोदान की व्याख्या करते हुए अनुवादक ने अ गिफ्ट ऑफ काउ’ लिखा है जबकि इसका सटीक अनुवाद ऑफरिंग ऑफ अ काऊ’ होगा. अपने किसी प्रियजन के मरने के बाद ब्राह्मण आत्मा को मुक्त करने के नाम पर यजमान पर दान-दक्षिणा के लिए दबाव बनाता है. ब्राह्मण इसे यजमान की इच्छा पर नहीं छोड़ता है. गोदान’ उपन्यास का पूरा कथानक ही वर्णवादी व्यवस्था की इस कुरीति के खिलाफ है. इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार राजेश वर्मा कहते हैं, ‘अनुवाद हमेशा भाव का होता है. शब्द का अनुवाद करने की कोशिश करेंगे तो हमेशा गड़बड़ियां पैदा होंगी.

एक और अहम बात यह है कि तीन-चार दशक पहले तक कई नामी-गिरामी साहित्यकार व्यापक स्तर पर अनुवाद किया करते थे. उनका काम बाकी लोगों के लिए मिसाल होता था. अशोक माहेश्वरी अनुवादकों की फेहरिस्त सामने रखते हुए मोहन राकेशराजेंद्र यादवनिर्मल वर्मा और द्रोणवीर कोहली जैसे नामवर साहित्यकारों का भी नाम लेना नहीं भूलते.

तो फिर क्या वजह है कि आज नामचीन साहित्यकार अनुवाद की कला से दूर होने लगे हैंइसके जवाब में अशोक माहेश्वरी कहते हैं, ‘आज साहित्यकारों के लिए अनुवाद करना रोजी-रोटी का विकल्प नहीं रह गया है. उनके सामने विश्वविद्यालय में पढ़ाने से लेकर फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में पटकथा लेखन के दरवाजे खुल गए हैं.

दरअसल अनुवाद या तरजुमा सिर्फ एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में बदल देने की कला भर नहीं है. अनुवाद के जरिए एक भाषा में कहीं गई बातउसमें छुपे या प्रकट भावों को बहुत ही संजीदगी से दूसरी भाषा में अनूदित करना होता है. सत्यानन्द निरूपम कहते हैं, ‘अनुवाद के जरिये आप एक संस्कृति का भी अनुवाद कर रहे होते हैं. अगर यह काम ठीक से न हो तो ऐसे में निश्चित तौर पर एक भाषा से दूसरी भाषा की समृद्धि का मामला तो पिछड़ेगा हीअनूदित किताबों के बाजार की संभावनाएं भी कमजोर होंगी.’ 

'तहलका' से साभार 


Vinod Sharma

unread,
Jul 18, 2012, 2:36:34 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
जहाँ पर प्रकाशन 15 से 25 (अधिकतम) पैसे प्ति शब्द अनुवाद की दर देते हों वहां अनुवाद की गुणवत्ता या स्तर या अनुवादक की अज्ञानता का रोना कतई अकारण और अनावश्यक है। साहित्य की सोच और समझ रखने वाले स्तरीय अनुवादकों को प्रकाशक अनुवाद सौंपना ही नहीं चाहते। उनको पता है कि किसी अच्छे अनुवादक को काम दिया गया तो अनुवाद की दर भी ऊंची देनी पड़ेगी। आज यदि कोई भी प्रकाशक 1 रुपया देना शुरू कर दे, तब देखें कि स्तरीय अनुवादक मिलते हैं या नहीं।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई और फिर इंजीनियरिंग के ही पेशे के बावजूद मैं केवल अपनी साहित्यिक अभिरुचि के कारण अनुवाद के क्षेत्र में आया था। अनेक प्रकाशकों, साहित्यिक प्रकाशन करने वाले सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, आदि सभी जगह पंजीकरण किया, लेकिन जब अनुवाद की दर सुनी 10 पैसे से 20 पैसे तक, तो सारा उत्साह ठंडा हो गया। अंततः बाजार की मांग के अनुरूप तकनीकी अनुवाद की ओर मुड़ना पड़ा। इसलिए मेरे विचार से अनुवाद के गिरते स्तर के लिए अनुवादक कतई जिम्मेदार नहीं हैं। अगर कोई जिम्मेदार है तो वह हैं प्रकाशन संस्थानों के मालिक। उनका वश चले तो वे मुफ्त में ही अनुवाद करवा लें। एक देशी कहावत है, भैया जितना गुड़ डालोगे मीठा उतना ही होगा। 15.20 पैसे दोगे तो इसी स्तर का अनुवाद मिलेगा, क्योंकि कोई भी अच्छा अनुवादक इस दर पर काम करना नहीं चाहेगा। 

2012/7/18 Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ) <translate...@gmail.com>


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सुयश सुप्रभ

unread,
Jul 18, 2012, 2:56:02 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
विनोद जी,

मैं आपकी बात से अक्षरश: सहमत हूँ।

सादर,

सुयश

बुधवार, 18 जुलाई 2012 12:06:34 pm UTC+5:30 को, Vinod Sharma ने लिखा:

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Jul 18, 2012, 3:32:03 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
हिंदी प्रकाशक शायद यह नहीं जानते हैं कि अनुवादकों को अपर्याप्त पारिश्रमिक देने के कारण पाठकों को स्तरहीन अनुवाद से संतोष करना पड़ रहा है। बहुत-से पाठक अनूदित किताब खरीदने के बजाय मूल रचना पढ़ना पसंद करते हैं। प्रकाशकों को या तो व्यापार की सही समझ नहीं है या सरकारी खरीद के कारण पाठक उनके लिए महत्वहीन हो गए हैं। 

सुयश


18 जुलाई 2012 12:26 pm को, सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com> ने लिखा:

lalit sati

unread,
Jul 18, 2012, 3:40:36 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
विनोद जी, सही कहा आपने। हालांकि लेखक का दावा है कि सभी लोग आपकी बात से सहमत नहीं हैं -  वजहों पर भले ही एकराय न होंइस पर सब सहमत हैं कि अनुवाद का स्तर गिरा है

अनुवाद का स्तर गिरने का रोना सभी जगह रोया जा रहा है। चाहे भारत हो या यूरोप। यह भूमंडलीकरण के बाद पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य में आ रहे बदलाव से भी जुड़ा है। लेकिन इसकी आड़ में मेहनताना मारने का मौका मालिकान को मिल जाता है। हालांकि लेख कुल अनुवाद के बहुत छोटे हिस्से यानी साहित्यिक अनुवाद तक ही सीमित है। उसमें भी कितना ही अच्छा होता यदि लेखक ने थोड़ा शोध कार्य किया होता। जैसे कि लेख में एक जगह इस आशय की बात है कि भारत में कोई भी ऐरा गैरा अनुवाद करने लगता है और यूरोप में ऐसा नहीं है। हकीकत यह है कि यूरोप में भी यह समस्या है। हम कचड़ा, यूरोप आह-वाह वाला फार्मूला हर जगह नहीं चलाना चाहिए। फ्रांस व इटली जैसे यूरोपीय देशों की तुलना में आज की तारीख में अर्जेंटीना, उरुग्वे जैसे देशों में अनुवाद प्रशिक्षण एवं नियामक की भूमिका निभाने वाली संस्थाएं अधिक सशक्त हैं।  ................  बहरहाल, "एक से चाय पर और दो से फोन पर बात कर धांसू लेख तैयार करने वाली चलताऊ शैली" के इस दौर में लेखक को साधुवाद, चलो किसी ने कुछ तो लिखा अनुवाद के मसले पर। अगली बार भारत में  कॉमर्शियल अनुवाद वाले विशाल क्षेत्र पर भी किसी की नज़र पड़े तो अच्छा। सरकारी अनुवाद के हालात भी विचारणीय हैं। वैसे इन दिनों प्रति वर्ष अनुवाद की कुल मात्रा देखी जाएगी तो वह इसी कॉमर्शियल अनुवाद वाले क्षेत्र में होगी, ऐसा मेरा अनुमान है।

एक बात यह भी कि हिंदी के प्रकाशकों से बना कर रखनी होती है, इसलिए कोई भी उनके साथ दर वाले मामले को जलेबी की तरह ही उठाता है। जैसे कि लेख ने सबको अनुवाद के गिरे स्तर पर तो सहमत करा दिया लेकिन दर वाले मामले में सबकी राय एक नहीं है। जब राय एक नहीं है तो जो मिल रहा है उस पर संतोष करो भाई।



2012/7/18 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Jul 18, 2012, 4:59:51 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
ललितजी अगर आपको याद हो, एक प्रकाशक महोदय भी शायद इस समूह के सदस्य हैं। एक बार किसी चर्चा में उनहोंने दावा किया था कि वे भारत में प्रचलित पुस्तक-अनुवाद के क्षेत्र में सबसे ज्यादा दर देते हैं। इससे उत्साहित होकर मैंने उनको एक मेल में लिखा कि मेरी पुस्तकों का अनुवाद करने में गहरी रुचि है. यदि कोई आवश्यकता हो तो अवश्य बताएं और अनुवाद की दर भी बताएं। उनका जवाब आया कि कोई भी 20 पैसे से अधिक भुगतान नहीं करता, हम 25 पैसे प्रति शब्द देते हैं, यदि स्वीकार हो तो पुष्टि करें। अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, अतः उनको जवाब न देना ही उचित समझा।

2012/7/18 lalit sati <lalit...@gmail.com>

Kapil Swami

unread,
Jul 18, 2012, 5:22:03 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
मुझे याद है कि शुरुआती दौर में जब किताबों के अनुवाद में हाथ-पैर मारने शुरु किए थे तो कितनी खराब दशा थी। एक तो उस समय एकदम साफ हैंडराइटिंग में हाथ से लिखकर देना पड़ता था दूसरा पहले काम लेने के लिए प्रकाशक के दफ्तर जाओ फिर काम करके वापिस देने जाओ। उसके बाद शुरू होता था चक्‍करों का असली सिलसिला। आपके अनुवाद की समीक्षा, प्रूफरीडिंग के दौरान आपको भुगतान के लिए बार-बार दौड़ाया जाता था। कम दर से मिलने वाला भुगतान भी बहुत मुश्किल से  मिलता था और कोई गारंटी नहीं कि पूरा भुगतान मिलेगा ही। ऐसी स्थिति में कोई अनुवादक अपनी अभिरुचि के कारण स्‍तरीय साहित्यिक अनुवाद करता तो उसे ये स्थितियां झेलनी ही पड़ती थीं। आज नतीजा सामने है कि स्‍तरीय अनुवादक बड़े पैमाने पर साहित्यिक अनुवाद से दूरी बना चुके हैं। इसके लिए प्रकाशक चाहे लाख तर्क दें लेकिन उनकी बड़ी जिम्‍मेदारी बनती है। मुझे इस लेख में एक कमी यह लगी कि इसमें सीधे कोई बात कहने के बजाय बहुत घुमा-फिराकर कहा गया है।

कपिल

2012/7/18 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

swatantra mishra

unread,
Jul 18, 2012, 6:20:35 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
मित्रों आप सबों की  प्रतिक्रिया पढ़ी. अच्छा लगा. अनुवाद का क्षेत्र बहुत बड़ा है. मैंने लेख को संतुलित करने की हरसंभव कोशिश की है. रही बात साहित्‍यिक अनुवाद की तो वो इसलिए कि पाठक साहित्‍यिक अनुवाद को गंभीरता से लेते हैं. अब मुझे गगन वनस्पति वाले ने एक बार अनुवाद के लिए फोन किया था. पैसे अच्छे दे रहे थे. बाजार से बहुत ज्यादा. लेकिन मैंने मना कर दिया.सिर्फ पैसे कमाने के लिए तो काम नहीं किया जा सकता है न. पत्रकारिता और साहित्य में मेरी रुचि है इसलिए मैंने मना कर दिया. साहित्‍यिक चीजों का अनुवाद कई बार तो बिना पैसे लिए भी अगर समय रहा तो कर लिया. आपकी बात सही है कि कॉमर्शियल अनुवाद की बात होती तो थोड़ा फलक को विस्तार ही मिलता. साधूवाद आप सबों का. हौसला अफजाई के लिए. आपकी सक्रियता से अनुवाद का स्तर तो सुधरेगा ही और साथ ही अनुवाद को काम की तरह देखा जाएगा. प्राथमिकता में अनुवाद को प्रकाशक से लेकर तमाम लोग रखेंगे.

धन्यवाद

स्वतंत्र

2012/7/18 Kapil Swami <kapi...@gmail.com>



--
swatantra

lalit sati

unread,
Jul 18, 2012, 7:09:01 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
"अब मुझे गगन वनस्पति वाले ने एक बार अनुवाद के लिए फोन किया था. पैसे अच्छे दे रहे थे. बाजार से बहुत ज्यादा. लेकिन मैंने मना कर दिया.सिर्फ पैसे कमाने के लिए तो काम नहीं किया जा सकता है न. "

स्वतंत्र जी, इस बस्ती में तो ज़्यादातर "गगन" के लिए ही काम करने वाले लोग हैं। पत्रकारिता और साहित्य के उच्च मूल्यों आदर्शों के प्रति समर्पण और तत्संबंधी गहन भावों को यहां "सिर्फ़ पैसे के लिए अनुवाद करने वाले" हमारे जैसे गगन प्रेमी कदाचित समझ न पावें .....




2012/7/18 swatantra mishra <15.swa...@gmail.com>

Yashwant Gehlot

unread,
Jul 18, 2012, 7:49:00 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
स्वतंत्र जी,

आपका लेख बहुत अच्छा लगा. आपकी मेहनत और अनुभव साफ़ झलकते हैं.

मैं सोच रहा था कि क्या केवल कविता, कहानी या उपन्यास ही साहित्य हैं...
क्या किसी यंत्र के साथ आने वाला मेन्युअल या रेल्वे स्टेशन पर की जाने
वाली उद्घोषणा साहित्य नहीं है. अर्थ को सही-सही अभिव्यक्त करने की
ज़रूरत तो वहां पर भी होती है. क्या किसी क्षेत्र में पैसों की अधिकता
होना बुराई है...

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि अनुवादक को ऐसे दायरों में सीमित नहीं रहना चाहिए.

यशवंत

>>>> सहमत नहीं हैं - *वजहों पर भले ही एकराय न हों, इस पर सब सहमत हैं कि
>>>> अनुवाद का स्तर गिरा है *

>>>>> *विषय परिवर्तन के कारण आलोक जी की पोस्ट दुबारा भेजी जा रही है। *


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Yashwant Gehlot

Bhavna Mishra

unread,
Jul 18, 2012, 9:05:37 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
सच के कुछ करीब पहुँचता यह लेख अपनेआप में महत्वपूर्ण है क्योंकि लोग तो उतना कहने की भी हिम्मत नहीं करते जितना इस लेख में कहा गया है. साहित्यिक अनुवाद और प्रकाशकों को घेरे में लाने के विषय में अधिकतर इशारों से ही काम चलाया जाता है. 

आप सभी लोगों के अनुभवों से इतर मेरा अनुभव साहित्यिक अनुवाद के मामले में सुखद रहा था.
लेकिन शायद अनुभव सुखद था.. इसीलिए उसकी पुनरावृत्ति नहीं हुई.

मैंने अनुवाद के क्षेत्र में शुरुआत जेन ऑस्टिन के उपन्यास 'Sense and Sensibility' के अनुवाद के साथ की थी.
यह सृजनशीलता को संतुष्ट करने वाला बेहद सुखद अनुभव था. साथ ही साथ इसके लिए मुझे उस समय जो प्रतिशब्द दर ऑफर की गई थी
वह भी बहुत अच्छी थी. अपने पहले ही अनुवाद में मुझे 1 रु. प्रतिशब्द का ऑफर मिला था.
तीन माह का समय भी मिला जो मेरे जैसे नौसिखिए के लिए भी पर्याप्त था.
यहां रेखांकित करने वाली बात यह होगी की वह कंपनी विदेशी थी.
हमारे देश में मुनाफाखोरी की बीमारी इस कदर व्याप्त है.. कि उसके सामने स्तरीय और गैरस्तरीय काम की किसी को परवाह नहीं है.
बस स्पष्ट वर्तनी दोष आदि न हों और शेष तो सब एक ही पैमाने पर मापा जाता है, जिसका नाम है 'मुनाफा'.

मेरा इस मामले की समग्रता में स्टैंड यह रहता है कि यदि मेरी रूचि का कोई उपन्यास या कोई बेहतरीन रचना हो तो दर से समझौता कर लूंगी.
लेकिन यह बात उन तमाम साथियों के लिए कतई संगत नहीं होगी... जिनके लिए अनुवाद कार्य आजीविका का साधन है.
साथ ही यदि प्रकाशक अनुवादक का नाम पुस्तक के साथ देने का वायदा करें तो भी दर से समझौता करना अपने हित में है.
लेकिन यह इक्के-दुक्के मामलों में ही होता है.
इसलिए दरों में सुधार ऐसा मुद्दा है .. जिसमें कोई तर्क दिया नहीं जा सकता.
और दरों में सुधार के लिए हमारा एकजुट होना प्राथमिक शर्त है.
बराबर सुयश और विनोद जी के संदेश पढ़ती हूँ.. कि सभी साथी प्रतिक्रिया दें, पर समय की कमी के कारण कई बार रुक जाना पड़ता है.

इतने विस्तार में सब कुछ कहने के बाद भी एक बात और जोड़ना चाहती हूँ कि हवा के रुख के साथ बहते हुए मै भी आज तकनीक अनुवाद से पूरी तरह से जुड़ गयी हूँ, साहित्यिक अनुवाद से लगभग दूरी ही है..और सच कहें तो कोई ऑफर भी नहीं आया इधर बीच. पूरी तन्मयता से Google की सेवा कर रही हूँ. लेकिन इन कामों में एक अजीब रूखापन होता है और आत्मा सदैव यही कहती है कि कुछ और सृजनात्मक कार्य करने को मिल जाए कहीं से ...
तकनीकी अनुवाद कभी-कभी बेहद बोरियत भरा हो जाता है. इसलिए आज भी अगर साहित्य के क्षेत्र में अच्छी दर का प्रचलन हो जाये, तो वापस लौटने में देर नहीं लगेगी ... :-) 

स्वतंत्र मिश्र जी को आभार !!


सादर,

 
2012/7/18 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>



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Bhavna Mishra
Freelance Translator

swatantra mishra

unread,
Jul 18, 2012, 9:09:41 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
ललित जी , कपिल जी

मैं भी पैसों के लिए कभी-कभार ऐसे काम कर लेता हूं. इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा आशय यह नहीं था. लेकिन अनुवाद तो विज्ञापन क्षेत्र में करवाए जाते हैं, सरकारी स्तर पर भी. लेकिन मुझे साहित्य में गड़बड़ अनुवाद पर स्टोरी करने को कहा गया था. अगर उसमें कहीं दिक्कत लग रही हो तो आपकी आलोचना सिर-माथे पर.कपिल जी अगर ऐसा आपको लग रहा है तो मैं इसे स्वीकार लेता हूं. अपनी लेखनी में और साफगोई लाने की कोशिश करूंगा.



2012/7/18 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>



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swatantra

swatantra mishra

unread,
Jul 18, 2012, 9:16:31 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com, mishra...@gmail.com
भावना जी
मेरे लेख के आकार के अनुपात में प्रतिक्रिया थोड़ी ज्यादा लंबी और व्यापक है. लेकिन आपकी बात बहुत सही है. मेरा बहुत हौसला अफजाई हुई आपकी प्रतिक्रिया से.

2012/7/18 Bhavna Mishra <mishra...@gmail.com>



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swatantra

abhishek singhal

unread,
Jul 18, 2012, 11:01:43 AM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
मिश्रा जी की रिपोर्ट बढ़िया रही, वास्तव में हिन्दी में अनुवाद को लेकर हमें बहुत आगे जाना है, प्रकाशक आखिर लाभ पाने के लिए काम करता है इसलिए उससे यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वह कम में हो रहे काम को नैतिकता के नाम पर ज्यादा पैसे खर्च कर करवाएगा। यह तो जो लोग उस काम में जुटे हैं उन्हें ही तय करना होगा कि वे किस दर पर काम करने के लिए तैयार हैं,,,। कचरा अनुवाद अब लम्बा टिक पाएगा इसमें संदेह है। 
रही बात विज्ञापनों के लिए अनुवाद करने की तो वास्तव में अनुवाद एक ज्यादा अनुशासित विधा है, जहां जरा भी अनुशासन लांघने पर पूरी कवायद पर सवाल खड़े हो जाते हैं। हम अक्सर हिन्दी के समाचार पत्रों में अजीबोगरीब अनुवाद वाले विज्ञापन देखते हैं, कई बार उनमें महाराष्ट्रीयन हिन्दी का पुट होता है जो सही हिन्दी नहीं होता, और यहीं से स्तरहीन अनुवाद की शुरुआत भी होती है,, यदि संभव हो तो हम लोग इस तरह के अजीबोगरीब अनुवादों वाले उदाहरण भी इस मंच पर साझा करें। 
सादर
अभिषेक

2012/7/18 swatantra mishra <15.swa...@gmail.com>



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Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Jul 18, 2012, 12:13:13 PM7/18/12
to hindian...@googlegroups.com
चाहे पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले आलेख हों या अकादमिक पुस्तकों के लंबे लेख, अनुवाद की वास्तविक समस्याओं पर शायद ही कभी सार्थक बात हो पाती है। स्वतंत्र जी ने अपने आलेख में साहित्यिक अनुवाद के उन महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है जिनकी अनदेखी होती आई है। वे इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। 

कृपया आलेख की निम्नलिखित पंक्‍तियों पर ध्यान दें :

" अनुवादकों को मुंहमांगी कीमत देने के नाम पर माहेश्वरी महात्मा गांधी के पौत्र और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी का नाम गिनाते हैं. गांधी ने वाणी प्रकाशन के लिए विक्रम सेठ की किताब ‘ए सुटेबल ब्वॉय’ का अनुवाद किया है. 

लेकिन जानकारों के मुताबिक ऐसे उदाहरण इक्का-दुक्का हैं और ज्यादातर अनुवादक गोपाल कृष्ण गांधी की तरह अपना मेहनताना खुद तय करने जैसी स्थिति में नहीं होते. और रही बात कम मुनाफे की तो अगर ऐसा होता तो इस समय बाजार में अनूदित सामग्री की जो बाढ़ आई हुई है वह नहीं दिखती." 

सादर,

सुयश 











18 जुलाई 2012 4:39 pm को, lalit sati <lalit...@gmail.com> ने लिखा:
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