सच के कुछ करीब पहुँचता यह लेख अपनेआप में महत्वपूर्ण है क्योंकि लोग तो उतना कहने की भी हिम्मत नहीं करते जितना इस लेख में कहा गया है. साहित्यिक अनुवाद और प्रकाशकों को घेरे में लाने के विषय में अधिकतर इशारों से ही काम चलाया जाता है.
आप सभी लोगों के अनुभवों से इतर मेरा अनुभव साहित्यिक अनुवाद के मामले में सुखद रहा था.
लेकिन शायद अनुभव सुखद था.. इसीलिए उसकी पुनरावृत्ति नहीं हुई.
मैंने अनुवाद के क्षेत्र में शुरुआत जेन ऑस्टिन के उपन्यास 'Sense and Sensibility' के अनुवाद के साथ की थी.
यह सृजनशीलता को संतुष्ट करने वाला बेहद सुखद अनुभव था. साथ ही साथ इसके लिए मुझे उस समय जो प्रतिशब्द दर ऑफर की गई थी
वह भी बहुत अच्छी थी. अपने पहले ही अनुवाद में मुझे 1 रु. प्रतिशब्द का ऑफर मिला था.
तीन माह का समय भी मिला जो मेरे जैसे नौसिखिए के लिए भी पर्याप्त था.
यहां रेखांकित करने वाली बात यह होगी की वह कंपनी विदेशी थी.
हमारे देश में मुनाफाखोरी की बीमारी इस कदर व्याप्त है.. कि उसके सामने स्तरीय और गैरस्तरीय काम की किसी को परवाह नहीं है.
बस स्पष्ट वर्तनी दोष आदि न हों और शेष तो सब एक ही पैमाने पर मापा जाता है, जिसका नाम है 'मुनाफा'.
मेरा इस मामले की समग्रता में स्टैंड यह रहता है कि यदि मेरी रूचि का कोई उपन्यास या कोई बेहतरीन रचना हो तो दर से समझौता कर लूंगी.
लेकिन यह बात उन तमाम साथियों के लिए कतई संगत नहीं होगी... जिनके लिए अनुवाद कार्य आजीविका का साधन है.
साथ ही यदि प्रकाशक अनुवादक का नाम पुस्तक के साथ देने का वायदा करें तो भी दर से समझौता करना अपने हित में है.
लेकिन यह इक्के-दुक्के मामलों में ही होता है.
इसलिए दरों में सुधार ऐसा मुद्दा है .. जिसमें कोई तर्क दिया नहीं जा सकता.
और दरों में सुधार के लिए हमारा एकजुट होना प्राथमिक शर्त है.
बराबर सुयश और विनोद जी के संदेश पढ़ती हूँ.. कि सभी साथी प्रतिक्रिया दें, पर समय की कमी के कारण कई बार रुक जाना पड़ता है.
इतने विस्तार में सब कुछ कहने के बाद भी एक बात और जोड़ना चाहती हूँ कि हवा के रुख के साथ बहते हुए मै भी आज तकनीक अनुवाद से पूरी तरह से जुड़ गयी हूँ, साहित्यिक अनुवाद से लगभग दूरी ही है..और सच कहें तो कोई ऑफर भी नहीं आया इधर बीच. पूरी तन्मयता से Google की सेवा कर रही हूँ. लेकिन इन कामों में एक अजीब रूखापन होता है और आत्मा सदैव यही कहती है कि कुछ और सृजनात्मक कार्य करने को मिल जाए कहीं से ...
तकनीकी अनुवाद कभी-कभी बेहद बोरियत भरा हो जाता है. इसलिए आज भी अगर साहित्य के क्षेत्र में अच्छी दर का प्रचलन हो जाये, तो वापस लौटने में देर नहीं लगेगी ... :-)
स्वतंत्र मिश्र जी को आभार !!
सादर,
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Bhavna MishraFreelance Translator