इसी प्रसंग में पहले में नुक्ते का सही इस्तेमाल बहुतायत से करता था, लेकिन गूगल अनुवाद तो
नुक्ते का इस्तेमाल ही नहीं करता है जिस वजह से मुझे अपनी ग्लॉसरी में भी बिना नुक्ते वाले
शब्दों का ही इस्तेमाल करना पड़ा, वरना क्लाइंट को नुक्ते वाले और बिना नुक्ते वाले दो
तरह के शब्दों की प्रूफ़रीडिंग में दिक्कत होती थी, जिसे संगत शब्दों का इस्तेमाल न करने
की मेरी गलती मानकर मेरी रैंकिंग कम हो जाती थी।
यही बात ँ की है। गूगल अनुवाद ँ का इस्तेमाल बहुत कम करता है और इसकी जगह पर ं का
इस्तेमाल करता है इसलिए अब मैं भी ँ की जगह पर ज्यादातर ं का इस्तेमाल करने लगा हूँ।
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रावत
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"5. श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के शब्द
(i) श्रुतिमूलक 'य' और 'व' का प्रयोग क्रिया रूपों में होता है। क्रिया रूप इस तरह से बनेंगे -
आया आए, आई आईं
(हुवा...) हुआ हुए हुई हुईं
(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे छोड़े नहीं जा सकते। जैसे -
पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"
आपने जिस पुराने नियम का संदर्भ दिया है उसमें श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के बदले 'ई' और 'ए' जैसे स्वरात्मक रूपों के प्रयोग को केवल क्रिया रूपों तक सीमित नहीं रखा गया था। यह नियम नीचे प्रस्तुत है :
"3.13.1 जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया जाए, अर्थात् किए : किये, नई : नयी, हुआ : हुवा आदि में से पहले (स्वरात्मक) रूपों का प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय आदि सभी रूपों और स्थितियों में लागू माना जाए। जैसे :– दिखाए गए, राम के लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली आदि।"
संशोधित नियम की जानकारी बहुत कम लोगों को है क्योंकि इस नियम का उल्लेख 'देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' नामक पुस्तिका में नहीं हुआ है। मैंने यह नियम इस पुस्तिका के बाद छपी तीन-चार पेजों की बुकलेट में पढ़ा है। इस बुकलेट की जानकारी बहुत कम लोगों को है। मुझे लगता है कि संबंधित विभाग को अपने प्रकाशन के प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है।
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