रोमन में हिंदी

454 views
Skip to first unread message

lalit sati

unread,
Jan 13, 2015, 7:20:50 AM1/13/15
to anuvaad...@googlegroups.com, ha
प्रभु जोशी का विचारोत्तेजक आलेख "सामयिकी" से साभार



रोमन में हिंदी बनाम हिंदी की हत्या


सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित एल्विन टॉफलर की पुस्तक 'तीसरी लहर' के अध्याय 'बड़े राष्ट्रों के विघटन' को पढ़ते हुए किसी को भी कोई कल्पना तक नहीं थी कि एक दिन रूस में गोर्बाचोव नामक एक करिश्माई नेता प्रकट होगा और 'पेरोस्त्रोइका' तथा 'ग्लासनोस्त' जैसी अवधारणा के नाम से 'अधिरचना' के बजाय 'आधार' में परिवर्तन की नीतियाँ लागू करेगा और सत्तर वर्षों से महाशक्ति के रूप में खड़े देश के सोलह टुकड़े हो जाएँगे अलबत्ता, राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा उस अध्याय की व्याख्या 'बौद्धिक अतिरेक' से उपजी भय की 'स्वैर-कल्पना' की तरह की गयी थी लेकिन, लगभग 'स्वैर-कल्पना' सी जान पड़ने वाली वह 'भविष्योक्ति' मात्र दस वर्षों के भीतर ही सत्य सिद्ध हो गयी बताया जाता है कि उन 'क्रांतिकारी' अवधारणाओं के जनक अब एक बहुराष्ट्रीय निगम से सम्बद्ध हैं।

हमारे यहाँ भी नब्बे के दशक में 'आधार' में परिवर्तन को 'उदारीकरण' जैसे पद के अन्तर्गत 'अर्थव्यवस्था' में एकाएक उलटफेर करते हुए, बहुराष्ट्रीय निगमों तथा उनकी अपार पूँजी के प्रवाह के लिए जगह बनाना शुरू कर दी गयी कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी निगमें और उनकी पूँजी विकसित राष्ट्रों के नव-उपनिवेशवादी मंसूबों को पूरा करने के अपराजेय और अचूक शक्ति केन्द्र हैं, जिसका सर्वाधिक कारगर हथियार है, 'कल्चरल इकोनॉमी' और जिसके अन्तर्गत वे 'सूचना', 'संचार', 'फिल्म-संगीत' और 'साहित्य' के जरिये 'अधोरचना' में सेंध लगाते हैं और फिर धीरे-धीरे उसे पूरी तरह ध्वस्त कर देते हैं नव उपनिवेश के शिल्पकार कहते हैं, 'नाऊ वी डोण्ट इण्टर अ कण्ट्री विथ गनबोट्स, रादर विथ लैंग्विज एण्ड कल्चर' पहले वे अफ्रीकी राष्ट्रों में उनको 'सभ्य' बनाने के उद्घोष के साथ गये और उनकी तमाम भाषाएँ नष्ट कर दीं 'वी आर द नेशन विथ लैंग्विज व्हेयरएज दे आर ट्राइब्स विथ डायलेक्ट्स' 

लेकिन, भारत में वे इस बार 'उदारीकरण' के बहाने उसे 'सम्पन्न' बनाने के प्रस्ताव के साथ आये हैं उनको पता था कि हजारों वर्षों के 'व्याकरण-सम्मत' आधार पर खड़ी 'भारतीय भाषाओं' को नष्ट करना थोड़ा कठिन है पिछली बार, वे अपनी 'भाषा को भाषा' की तरह प्रचारित करके तथा 'भाषा को शिक्षा-समस्या' के आवरण में रखकर भी, भारतीय भाषाओं के नष्ट नहीं कर पाये थे उल्टे उनका अनुभव रहा कि भारतीयों ने 'व्याकरण' के ज़रिये एक 'किताबी भाषा' (अंग्रेजी) सीखी ज्ञान अर्जित किया, लेकिन उसे अपने जीवन से बाहर ही रख छोड़ा उन्होंने देखा, चिकित्सा-शिक्षा का छात्र स्वर्ण-पदक से उत्तीर्ण होकर श्रेष्ठ 'शल्य-चिकित्सक' बन जाता है, लेकिन 'उनकी' भद्र-भाषा उसके जीवन के भीतर नहीं उतर पाती है तब यह तय किया गया कि 'अंग्रेजी' भारत में तभी अपना 'भाषिक साम्राज्य' खड़ा कर पायेगी, जब वह 'कल्चर' के साथ जायेगी नतीजतन, अब प्रथमत: सारा जोर केवल 'भाषा' नहीं बल्कि, सम्पूर्ण 'कल्चरल-इकोनामी' पर एकाग्र कर दिया गया इस तरह उन्होंने भाषा के प्रचार को इस बार, 'लिंग्विसिज्म' कहा, जिसका, सबसे पहला और अंतिम शिकार भारतीय 'युवा' को बनाया जाना, कूटनीतिक रूप से सुनिश्चित किया गया 

बहरहाल, भारत में अफ्रीकाउ राष्ट्रों की तर्ज पर सबसे पहले एफ.एम. रेडियो के जरिये 'यूथ-कल्चर' का एक आकर्षक राष्ट्रव्यापी 'मिथ' खड़ा किया गया, जिसका अभीष्ट युवा पीढ़ी में अंग्रेजी के प्रति अदम्य उन्माद तथा पश्चिम के 'सांस्कृतिक उद्योग' की फूहड़ता से निकली 'यूरो-ट्रैश' किस्म की रूचि के 'अमेरिकाना मिक्स' से बनने वाली 'लाइफ स्टाइल' (जीवन शैली) को 'यूथ-कल्चर' की तरह ऐसा प्रतिमानीकरण करना कि वह अपनी 'देशज भाषा' और 'सामाजिक-परम्परा' को निर्ममता से खारिज करने लगे यहाँ पुरानी 'रॉयल चार्टर' वाली सावधानी नहीं थी 'दे शुड नॉट रिजेक्ट 'ब्रिटिश कल्चर' इन फेवर ऑफ देअर ट्रेडिशनल वेल्यूज।' खात्मा जरूरी है, लेकिन, 'विथ सिम्पैथेटिक एप्रिसिएशन ऑव देयर कल्चर।' इट मस्ट बी लाइक अ डिवाइन इन्टरवेशन नतीजतन, अब सिद्धान्तिकी 'डायरेक्ट इनवेजन' की है 'देयर स्ट्रांग एडहरेंस टू मदरटंग्स' हेज टु बी रप्चर्ड थ्रू दि प्रोसेस ऑव 'क्रियोलाइजेशन' (जिसे वे रि-लिंग्विफिकेशन ऑव नेटिव लैंग्विजेसेस' कहते हैं) 

क्रियोलीकरण का अर्थ, सबसे पहले उस देशज भाषा से उसका व्याकरण छीनो फिर उसमें 'डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि' के जरिए उसके 'मूल' शब्दों का 'वर्चस्ववादी' भाषा के शब्दों से विस्थापन इस सीमा तक करो कि वाक्य में केवल 'फंक्शनल वर्डस्' (कारक) भर रह जाएँ तब भाषा का ये रूप बनेगा 'यूनिवर्सिटी द्वारा अभी तक स्टूडेण्ट्स को मार्कशीट इश्यू न किये जाने को लेकर कैम्पस में वी.सी. के अगेंस्ट जो प्रोटेस्ट हुआ, उससे ला एण्ड आर्डर की क्रिटिकल सिचुएशन बन गई (इसे वे फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ कहते हैं)।

उनका कहना है कि भाषा के इस रूप तक पहुँचा देने का अर्थ यह है कि नाऊ द लैंग्विज इज रेडी फार स्मूथ ट्रांजिशन।' बाद इसके, अंतिम पायदान है-'फायनल असाल्ट ऑन लैंग्विज।' अर्थात् इस 'क्रियोल' बन चुकी स्थानीय भाषा को रोमन में लिखने की शुरूआत कर दी जाये यह भाषा के खात्मे की अंतिम घोषणा होगी और मात्र एक ही पीढ़ी के भीतर 

बहरहाल, हिन्दी का 'क्रियोलाइजेशन' (हिंग्लिशीकरण) हमारे यहाँ सर्वप्रथम एफ.एम. ब्रॉडकास्ट के जरिये शुरू हुआ और यह फार्मूला तुरन्त देश भर के तमाम हिन्दी के अखबारों में (जनसत्ता को छोड़कर) सम्पादकों नहीं, युवा मालिकों के कठोर निर्देशों पर लागू कर दिया गया सन् १९९८ में मैंने इसके विरूद्ध लिखा 'भारत में हिन्दी के विकास की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका जिस प्रेस ने निभायी थी, आज वही प्रेस उसके विनाश के अभियान में कमरकस के भिड़ गयी है जैसे उसने हिन्दी की हत्या की सुपारी ले रखी हो और, इसकी अंतिम परिणति में 'देवनागरी' से 'रोमन' करने का मुद्दा उठाया जायेगा।` क्योंकि, यह फार्मूला भाषिक उपनिवेशवाद ('लिंग्विस्टिक इम्पीयरिलिज्म') वाली ताकतें अफ्रीका राष्ट्रों की भाषाओं के खात्मे में सफलता से आजमा चुकी हैं आज 'रोमन लिपि' को बहस में लाया जा रहा है अब बारी भारतीय भाषाओं की आमतौर पर लेकिन हिन्दी की खासतौर पर है हिन्दी के क्रियोलीकरण की नि:शुल्क सलाह देने वाले लोगों की तर्कों के तीरों से लैस एक पूरी फौज भारत के भीतर अलग-अलग मुखौटे लगाये काम कर रही है, जो वर्ल्ड बैंक, आई.एम.एफ., ब्रिटिश कौंसिल, बी.बी.सी., डब्ल्यू.टी.ओ., फोर्ड फाउण्डेशन जैसी संस्थाओं के हितों के लिए निरापद राजमार्ग बना रही हैं 

नव उपनिवेशवादी ताकतें चाहती हैं, 'रोल ऑव गव्हमेण्ट आर्गेनाइजेशंस शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोटिंग डॉमिनेण्ट लैंग्विज हमारा ज्ञान आयोग पूरी निर्लज्जता के साथ उनकी इच्छापूर्ति के लिए पूरे देश के प्राथमिक विद्यालयों से ही अंग्रेजी की पढ़ाई अनिवार्य करना चाहता है यह भाषा का विखण्डन नहीं, बल्कि नहीं संभल सके तो निश्चय ही यह एक दूरगामी विराट विखण्डन की पूर्व पीठिका होगी इसे केवल 'भाषा भर का मामला' मान लेने या कहने वाला कोई निपट मूर्ख व्यक्ति हो सकता है, ऐतिहासिक-समझ वाला व्यक्ति तो कतई नहीं।

अंत में मुझे नेहरू की याद आती है, जिन्होंने जान ग्रालबे्रथ के समक्ष अपने भीतर की पीड़ा और पश्चाताप को प्रकट करते हुए गहरी ग्लानि के साथ कहा था 'आयम द लास्ट इंग्लिश प्राइममिनिस्टर ऑव इंडिया।` निश्चय ही आने वाला समय उनकी ग्लानि के विसर्जन का समय होगा क्योंकि, आने वाले समय में पूरा देश 'इंगलिश' और 'अमेरिकन' होगा पता नहीं, हर जगह सिर्फ अंग्रेजी में उद्बोधन देने वाले प्रधानमंत्री के लिए यह प्रसन्नता का कारण होगा या कि नहीं, लेकिन निश्चय ही वे दरवाजों को धड़ाधड़ खोलने के उत्साह से भरे पगड़ी में गोर्बाचोव तो नहीं ही होंगे अंग्रेजी, उनका मोह है या विवशता यह वे खुद ही बता सकते हैं 

यहाँ संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों की तुलना में देवनागरी लिपि की स्वयंसिद्ध श्रेष्ठता के बखान की जरूरत नहीं है और हिन्दी की लिपि के संदर्भ में फैसला आजादी के समय हो चुका है रोमन की तो बात करना ही देश और समाज के साथ धोखा होगा अब तो बात रोमन लिपि की वकालत के षड्यंत्र के विरूद्ध, घरों से बाहर आकर एकजुट होने की है- वर्ना, हम इस लांछन के साथ इस संसार से विदा होंगे कि हमारी भाषा का गला हमारे सामने ही निर्ममता से घोंटा जा रहा था और हम अपनी अश्लील चुप्पी के आवरण में मुंह छुपाये वह जघन्य घटना बगैर उत्तेजित हुए चुपचाप देखते रहे 

(सीमित शब्द संख्या के बंधन के कारण अंग्रेजी शब्दों और वाक्यांशों का हिन्दी रूपांतर नहीं दिया जा रहा है।)

 

१३ सितंबर २०१० 

lalit sati

unread,
Jan 13, 2015, 7:41:19 AM1/13/15
to ha
प्रभु जोशी के आलेख के बाद अब पढ़े चेतन भगत द्वारा रोमन लिपि की ताजा वकालत

दैनिक भास्कर से साभार

http://www.bhaskar.com/news/ABH-chetan-bhagat-bhaskar-hamare-columnist-4865928-NOR.html


रोमन हिंदी के बारे में क्या ख्याल है?

हमारे भारतीय समाज में हमेशा चलने वाली एक बहस हिंदी बनाम अंग्रेजी के महत्व की रही है। वृहद स्तर पर देखें तो इस बहस का विस्तार किसी भी भारतीय भाषा बनाम अंग्रेजी और किस प्रकार हमने अंग्रेजी के आगे स्थानीय भाषाओं को गंवा दिया इस तक किया जा सकता है। यह राजनीति प्रेरित मुद्‌दा भी रहा है। हर सरकार हिंदी के प्रति खुद को दूसरी सरकार से ज्यादा निष्ठावान साबित करने में लगी रहती है। नतीजा ‘हिंदी प्रोत्साहन’ कार्यक्रमों में होता है जबकि सारे सरकारी दफ्तर अनिवार्य रूप से हिंदी में सर्कुलर जारी करते हैं और सरकारी स्कूलों की पढ़ाई हिंदी माध्यम में रखी जाती है।

इस बीच देश में अंग्रेजी लगातार बढ़ती जा रही है। बिना प्रोत्साहन कार्यक्रमों और अभियानों के यह ऐसे बढ़ती जा रही है, जैसी पहले कभी नहीं बढ़ी। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि इसमें कॅरिअर के बेहतर विकल्प हैं, समाज में इसे अधिक सम्मान प्राप्त है और यह सूचनाओं व मनोरंजन की बिल्कुल नई दुनिया ही खोल देती है तथा इसके जरिये नई टक्नोलॉजी तक पहुंच बनाई जा सकती है। जाहिर है इसके फायदे हैं।

वास्तविकता तो यही है कि अंग्रेजी की सरसरी समझ के  बिना आप एक मोबाइल फोन या साधारण मैसेजिंग एप भी उपयोग में नहीं ला सकते।  हिंदी को चाहने वाले और इस राष्ट्रभाषा में शुद्धता को बनाए रखने के हिमायतियों के दुख को समझा जा सकता है, जब वे देखते हैं कि युवा अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करता है और अंग्रेजी की दुनिया में जितनी जल्दी हो सके, प्रवेश पाना चाहता है। वे हिंदी को जितना थोपते हैं, उतना यह युवा उसके खिलाफ विद्रोह करता है। ऐसे में हिंदी प्रेमी (मैं भी उनमें शामिल हूं) को क्या करना चाहिए? और हम सब हिंदी को बचाने के लिए क्या कर सकते हैं कि युवा वर्ग को यह बोझ या दायित्व भी न लगे और वे इसे स्वप्रेरणा से अपना लें?

इसका समाधान यह है कि हम रोमन लिपि को अपना लें। रोमन लिपि में लिखी हिंदी हिंग्लिश नहीं होगी। यह हिंदी भाषा ही होगी, बस देवनागरी लिपि की बजाय एंग्लो सेक्सन लिपि में लिखी होगी। उदाहरण के लिए ‘aap kaise hain?’ यानी देवनागरी में लिपि कहें तो ‘आप कैसे हैं?’ यानी यह सिर्फ रोमन लिपि में लिखा गया वाक्य है, जिसमें अंग्रेजी लिखी जाती है। 
रोमन लिपि को अपनाना महत्वपूर्ण क्यों है? इसका जवाब यह है कि यह एंग्लो सेक्सन लिपि सर्वव्यापी है। यह कम्प्यूटर की-बोर्ड और मोबाइल फोन के टच स्क्रीन पर मौजूद है। यह पहले ही काफी लोकप्रिय हो चुकी है खासतौर पर युवाओं में। मसलन, लाखों भारतीय मोबाइल एप का इस्तेमाल करते हैं, जिसे वाट्सएप कहते हैं। इस पर ज्यादातर बातचीत हिंदी में होती है, लेकिन रोमन लिपि के माध्यम से। इसके पहले एसएमएस में भी यही लिपि हावी रही थी।

यह सही है कि  देवनागरी में डाउनलोड उपलब्ध है, लेकिन थोड़े ही लोग उनका उपयोग करते हैं। सच तो यह है कि फोन पर देवनागरी की-बोर्ड ट्रांसलिटरेशन का उपयोग करते हैं यानी पहले आप रोमन हिंदी में टाइप करें और फिर सॉफ्टवेयर उसे देवनागरी हिंदी में बदल देता है। दूसरे शब्दों में उपयोगकर्ता अभी भी रोमन हिंदी का ही उपयोग कर रहा है। हिंदी फिल्म जगत के पोस्टरों और विज्ञापन जगत में रोमन हिंदी पहले ही से ही प्रचलन में हैं। ज्यादातर हिंदी फिल्मों की पटकथाएं आज रोमन हिंदी में ही लिखी जाती हैं। आप किसी भी बड़े शहर में चले जाइए आपको ऐसा होर्डिंग जरूर देखने को मिलेगा, जिस पर लिखा संदेश रोमन लिपि में लिखी हिंदी में होगा। विज्ञापनों में रोमन हिंदी का चलन बढ़ता जा रहा है।

किंतु लगता है कि हिंदी के विशेषज्ञ, शुद्धतावादी और हिंदी के हिमायती या तो इस सब से वाकिफ नहीं हैं या उसकी अनदेखी कर रहे हैं। उन्हें हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि में कोई फर्क नज़र नहीं आता, जबकि लिपि सिर्फ भाषा की अभिव्यक्ति का लिखित माध्यम है। लोगों को आज भी हिंदी भाषा से प्रेम है। बस बात इतनी है कि आज की आधुनिक, टेक्नोलॉजी से संचालित जिंदगी में वे देवनागरी लिपि को अपना नहीं पा रहे हैं। हम हिंदी भाषा में रोमन लिपि के इस्तेमाल को वैधता प्रदान कर हिंदी भाषा को बचा सकते हैं।
 
राष्ट्र को एकजुट करने में इसका जबर्दस्त प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि इससे अंग्रेजी और हिंदी भाषी निकट आएंगे। साझी लिपि होगी तो अन्य क्षेत्रीय भाषाएं भी एक-दूसरे से और अंग्रेजी से अधिक जुड़ सकेंगी। उदाहरण के लिए यूरोप में एक दर्जन भाषाएं प्रचलन में हैं, किंतु उनकी लिपि समान है। यूरोपीय एकीकरण में इसकी अपनी भूमिका है। इंडोनेशिया और मलेशिया में स्थानीय लिपि बहुत पहले ही विदा हो चुकी हैं। उन्होंने अपने भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपना ली है।

निश्चित ही हिंदी के शुद्धतावादी नहीं चाहेंगे कि देवनागरी की जगह रोमन लिपि का उपयोग किया जाए। वे हिंदी को जैसी वह आज है यानी देवनागरी लिपि में ही संरक्षित रखना  चाहते हैं। परंतु वे यह भूल जाते हैं कि भाषाएं समय के साथ रूपांतरण सहित विकसित होती हैं। आज हम वैश्वीकरण के जिस युग में रह रहे हैं, उसमें यदि हम वैश्विक लिपि अपनाते हैं तो हम हिंदी का बहुत भला करेंगे। यदि वैश्विक स्तर पर उपलब्ध लिपि होगी तो हम दुनिया के अन्य हिस्सों के लोगों को हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। भूतकाल में भी उर्दू के कई शायरों ने व्यापक स्वीकार्यता के लिए अपनी उर्दू शेर-ओ-शायरी परंपरागत उर्दू लिपि की बजाय देवनागरी लिपि में प्रकाशित की हैं। यह हुई तब की बात और आज की जरूरत यह है कि हम हिंदी को एक नए स्वरूप में अपडेट करें। 

हम कुछ सरकारी सूचनाओं और सार्वजनिक संकेतों को रोमन लिपि में देकर शुरुआत कर सकते हैं और उसे मिल रहे लोगों के प्रतिसाद का आकलन कर सकते हैं। फिर इसमें व्यावसायिक अवसर भी मौजूद हैं। रोमन हिंदी प्रिंट मीडिया और किताबों का नया व्यवसाय निर्मित कर सकते हैं। लाखों लोग पहले से ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। सिर्फ अब तक इस संभावना का किसी ने दोहन नहीं किया है।
 
वैश्विक स्तर पर प्रचलित  और भाषा को समान स्तर पर पहुंचाने वाली लिपि को वैधता प्रदान करना हिंदी भाषा के लिए अच्छा ही होगा, अन्यथा उसके सामने अंग्रेजी के आक्रमण के आगे हाशिये पर जाने का जोखिम बना रहेगा। आइए, भाषा को शुद्धतावादी दृष्टिकोण से न देखें बल्कि इस तरह से देखें कि वह अपने समय के अनुकूल बनने के लिए गतिशील व रूपांतरित होने वाली विधा है। भाषाएं ऐसे ही जिंदा रहती हैं। Waqt ke saath badlna Zaroori hai. आपको यह वाक्य बिल्कुल ठीक से समझ में आ गया, नहीं?
 
 
चेतन भगत  अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा लेखक  chetan...@gmail.com


--
--
इस संदेश पर टिप्पणी करने के लिए 'Reply' या 'उत्तर' पर क्लिक करें।
 
नए विषय पर चर्चा शुरू करने के लिए निम्नलिखित पते पर ई-मेल भेजें :
 
hindian...@googlegroups.com
 
वेब पता : http://groups.google.co.in/group/hindianuvaadak

---
आपको यह संदश इसलिए मिला है क्योंकि आपने Google समूह के "हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)" समूह की सदस्यता ली है.
इस समूह की सदस्यता समाप्त करने और इससे ईमेल प्राप्त करना बंद करने के लिए, hindianuvaada...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
अधिक विकल्पों के लिए, https://groups.google.com/d/optout में जाएं.

rajneesh mangla

unread,
Jan 15, 2015, 7:24:37 PM1/15/15
to hindian...@googlegroups.com
देवनागरी में अंग्रेज़ी भी ग़लत है.

Vinod Sharma

unread,
Jan 16, 2015, 12:14:33 AM1/16/15
to hindian...@googlegroups.com
चेतन भगत की दलीलें निहायत ही लचर और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। एक मामूली सी बात है कि जिस देश में लोग हिंदी को देवनागरी में ही शुद्ध नहीं लिख सकते, वहाँ अगर उसे रोमन में लिखने का चलन शुरू कर दिया गया तो भाषा की क्या दुर्गति होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हाँ, आवश्यकता है देवनागरी के लिए पूरे देश में एक समान फॉंट के प्रयोग की। देवनागरी में मुद्रण हेतु ऐसे यूनीकोड फॉंट तैयार करने की जो डीटीपी प्रक्रिया में विरूपित न हों। हिंदी को रोमन में लिखना तो हिंदी की आत्मा को ही मार देने के समान होगा।

2015-01-16 5:54 GMT+05:30 rajneesh mangla <rajnees...@gmail.com>:
देवनागरी में अंग्रेज़ी भी ग़लत है.
--
--
इस संदेश पर टिप्पणी करने के लिए 'Reply' या 'उत्तर' पर क्लिक करें।

नए विषय पर चर्चा शुरू करने के लिए निम्नलिखित पते पर ई-मेल भेजें :

hindian...@googlegroups.com

वेब पता : http://groups.google.co.in/group/hindianuvaadak

---
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)" समूह की सदस्यता ली है.

इस समूह की सदस्यता समाप्त करने और इससे ईमेल प्राप्त करना बंद करने के लिए, hindianuvaada...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
अधिक विकल्‍पों के लिए, https://groups.google.com/d/optout पर जाएं.

Akhilesh Pathak

unread,
Jan 26, 2015, 11:42:15 PM1/26/15
to hindian...@googlegroups.com
कहा जाता है कि मुर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु ज्‍यादा अच्‍छा होता है। अगर चेतन भगत वाकई में हिंदी का मित्र होते हुए देवनागरी लिपि को त्‍यागने की बात कर रहे हैं, तो ये कहावत यहां पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है।


आपको यह संदश इसलिए मिला है क्योंकि आपने Google समूह के "हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)" समूह की सदस्यता ली है.

इस समूह की सदस्यता समाप्त करने और इससे ईमेल प्राप्त करना बंद करने के लिए, hindianuvaada...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
अधिक विकल्पों के लिए, https://groups.google.com/d/optout में जाएं.

Yogendra Joshi

unread,
Jan 29, 2015, 4:02:26 AM1/29/15
to hindian...@googlegroups.com
चेतन भगत अंगरेजी के लेखक हैं। वे उन मुट्ठी भर भारतीय लोगों के लिए लिखते हैं जो अंगरेजी से ही प्यार करते हैं और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को वे मजबूरी में ही बोलते हैं क्योंकि अधिकांश भारतीयों के साथ उनकी बोलचाल अंगरेजी में संभव नहीं हो सकती। वे इतने सुविधाभोगी एवं स्वार्थी हैं कि उनका बस चले तो भारतीय भाषाओं को दफ़ना दें। वे नहीं चाहेंगे कि उन्हें भारतीय लिपियां भी सीखनी पड़े। वे यह चाहेंगे कि अन्य जन उनकी अंगरेजी एवं उसकी लिपि अपना लें लेकिन वे स्वयं वैसी मेहनत भारतीय भाषा-लिपियों के लिए नहीं करना चाहते। उनके अपने विचार ही सर्वश्रेष्ठ हैं इस अहंकार से उन सरीखों भारतीय ग्रस्त हैं। दुर्भाग्य से इस देश के नीति-निर्धारकों में ऐसे ही लोगों का बोलबाला है, और हीनभावना से ग्रसित अधिसंख्य भारतीय उनकी नकल करके स्वयं को धन्य समझते हैं। अगर उनकी दलीलें मान लें तो दुनिया भर की भाषाओं की लिपि रोमन होनी चाहिए, चीनी, जापानी, रूसे, अरबी, हेब्रू, आदि सब की। इस देश का बंटाधार ऐसे भी बौद्द्धिकतावादी करने पर तुले हैं।  


27 जनवरी 2015 को 10:12 am को, Akhilesh Pathak <akhileshp...@gmail.com> ने लिखा:

डॉ एम एल गुप्ता (Dr. M.L. Gupta)

unread,
Jan 29, 2015, 12:56:56 PM1/29/15
to hindian...@googlegroups.com
बगुला भगतों का देवनागरी छोड़ रोमन लिपि में हिंदी लिखने का शिगूफा अचेतनता का प्रतीक है।
 
देवनागरी छोड़ रोमन लिपि में हिंदी लिखने का शिगूफा और एक बड़े समाचार ग्रुप का खुला समर्थन, भारतीय भाषाओं की हत्या का सुनियोजित प्रयास लगता है, वह भी विदेशी इशारे पर भारतीय मिट्टी में जन्मे 'सुपूतो' द्वारा।इससे यह समझ में आता है कि हम हजार वर्ष से ज्यादा गुलाम क्यों रहे। जो भी मार कर गया हम उसीके हो लिए । हम ऐसे क्यों है ? हिदी के ज्यादातर शब्दों को रोमन में लिखना संभव ही नहीं है। क्या इतनी सी बात भी इनकी समझ में नहीं आती। क्या हजारों वर्ष से विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि- देवनागरी में लिखे गए ज्ञान-विज्ञान, साहित्य -पुराण और धार्मिक साहित्य आदि को कूएँ में धकेल कर और अपनी संस्कृति को कचरे में डाल अंग्रेजों की अवैज्ञानिक रोमन लिपि की पूंछ पकड़ कर चलेंगे?

डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य
अध्यक्ष.'
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
गूगल समूह - hindi...@googlegroups.com
वैबसाइट -  www.vhindi.in

29 जनवरी 2015 को 2:32 pm को, Yogendra Joshi <yogendr...@gmail.com> ने लिखा:

Hariraam

unread,
Feb 3, 2015, 8:19:15 AM2/3/15
to hindian...@googlegroups.com
बन्धुओ,

देवनागरी के समर्थन में आप सभी के विचार बहुत ही अच्छे और प्रशंसनीय हैं।

परन्तु कुछ कटु सत्य स्वीकार करना ही होगा:

1. युनिकोड में तथाकथित 26 मूल वर्णों की रोमन लिपि का नाम 'बेसिक लेटन' है।

2. लेटिन लिपि युनिकोड में कई एक्सटेंडेड समूहों में एनकोडेड हुई है,

Basic Latin (ASCII)

Latin-1 Supplement

Latin Extended-A

Latin Extended-B

Latin Extended-C

Latin Extended-D

Latin Extended-E

Latin Extended Additional

Latin Ligatures

Fullwidth Latin Letters

इसमें कुल वर्णों की संख्या 500 से अधिक हो जाती है। अनेक फोनेटिक व डायाक्रिटिक मार्क सहित अनेक भाषाओं के शब्दों को लिखने पढ़ने की सुविधा मिलती है।


3. युनिकोड में बेसिक लेटन या ASCII मूल स्थान में अर्थात् 0000-007F में स्थित है। अर्थात् सभी कम्प्यूटरों में (चाहे वह बाबा आदम जमाने का पुराना हो) मूल रूप से उपलब्ध रहती है। सभी इलेक्ट्रानिक उपकरणों, मोबाईल फोन आदि में भी मूल रूप से उपलब्ध रहती है।


4. युनिकोड में देवनागरी लिपि तीन समूहों में एनकोडेड है:

Devanagari

Devanagari Extended

Vedic Extensions


प्रथम समूह U0900-097F कोड-स्थान में अवस्थित है।


5. देवनागरी सभी कम्प्यूटरों में (पुराने), सभी इलेक्ट्रानिक उपकरणों में, सभी मोबाईल फोन में देवनागरी लिपि की सुविधा मूल रूप से उपलब्ध नहीं होती।

6. अतः यदि किसी को Mass SMS भेजना है, और यदि वह देवनागरी में भेजे तो, सन्देश उन लोगों तक नहीं पहुँचेगा, जिनके मोबाईल में देवनागरी की सुविधा नहीं है। अतः वह इससे बचने के लिए मजबूरन् बेसिक लेटिन या एस्की या रोमन में ही सन्देश भेजता है।

7. कुछ आपरेटिंग सीस्टम्स, कुछ मोबाईल से फर्मवेयर, रोम चिप आदि में देवनागरी की सुविधा होने पर यदि रेण्डरिंग इंजन सही नहीं है तो वह ठीक प्रकट नहीं होगा। क्योंकि देवनागरी तकनीकी दृष्टि से COMLEX SCRIPTS के समूह में आती है।

8. इंटरनेट एवं मोबाईल में 16 बिट (2 बाईट वाला) का युनिकोड वर्ण UTF8 (8 बिट ट्रांसफोर्मेशन ऑफ युनिकोड युनिवर्सल केरेक्टर सेट) एनकोडिंग में बदलकर सम्प्रेषित होता है। जिससे एक अक्षर तीन वर्णों में और कभी कभी चार वर्णों में बदलकर सम्प्रेषित होता है।

9. अतः देवनागरी में यदि किसी ने 150 वर्णों (Characters) का एक SMS भेजा तो वह कम से कम 450 वर्णों में बदलकर सम्प्रेषित होगा। SMS की दर विभिन्न मोबाईल सेवा प्रदाता कम्पनियों की अलग अलग होती है। कोई 200 वर्णों का 40 पैसे लेता है तो कोई 240 वर्णों का 50 पैसे लेता है तो कोई 160 वर्णों का एक एसएमएस मानकर 70 पैसे चार्ज करता है। अतः 450 वर्णों का एक एसएमएस, तीन एसएमएस में बदलकर सम्प्रेषित होगा और तीन गुणा शुल्क लगेगा। अतः इस प्रकार तो देवनागरी रोमन की तुलना में तीन गुना महंगी हो जाती है।

10. देवनागरी के इनपुट सीस्टम्स, फोंट्स, रेण्डरिंग इंजन आदि सभी सुविधाएँ विश्व के सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों मूलतः उपलब्ध कराई जाए और देवनागरी में कार्य करने का प्रशिक्षण सभी को अनिवार्य (compulsory) रूप से उपलब्ध कराया जाए तो आगामी कुछ वर्षों में देवनागरी लिपि का व्यावहारिक प्रयोग हो पाएगा।

11. अतः अनेक बच्चे, शिक्षार्थी, विद्यार्थी, नागरिक, आम जनता हिन्दी आदि भाषाओं के शब्द भी लेटिन (रोमन) में टाइप करके येन-केन-प्रकारेण काम चलाती है।







हरिराम
प्रगत भारत <http://hariraama.blogspot.in>

डॉ एम एल गुप्ता (Dr. M.L. Gupta)

unread,
Feb 4, 2015, 2:14:58 AM2/4/15
to hindian...@googlegroups.com
बंधुवर हरिरामजी,
कुछ कठिनाइयाँ अभी भी हैं  जिसके लिए पर्याप्त माँग  और थोड़े से प्रयासों से सुलझाया जा सकता है। हम आई.टी. के नाम पर इतने दावे करते है तो क्या इतना सा भी कुछ नहीं कर सकते।विंडोज XP और बाद के सभी कंप्यूटरों पर भारतीय-भाषाओं में यूनीकोड की सुविधा  व मानक इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड है और नए एंड्रॉयड मोबाइलों पर भी  ये सुविधाएं है। इसके अलावा भी कई सॉफ्यवेयर हैं जो काम आसान कर देते हैं । पर जब स्कूलों में मानक इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड सिखाया ही नहीं जाएगा और ये  जानकारियाँ जनता तक पहुंचेंगी ही नहीं और हम आत्मसमर्पण की मुद्रा में खड़े होंगे तो क्या हो सकता है।
पूरी शक्ति से ईमानदार प्रयास और अपनी भाषा -लिपि के प्रति भावनात्मक लगाव से कुछ भी कठिन नहीं है।

डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'
वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

3 फ़रवरी 2015 को 6:49 pm को, Hariraam <hari...@gmail.com> ने लिखा:
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages