कितने दुर्भाग्य की बात है कि स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी हम
कार्यालयों
में रोज़मर्रा के काम में धड़ल्ले से ऐसी विदेशी भाषा का उपयोग करते हैं
जिसके बोलने वालों ने हमें 200 वर्षों तक गुलाम बनाए रखा। हिन्दी में
काम करने वाले या काम करने के लिए कहने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता
है और ऐसा समझा जाता है कि इसे अंग्रेज़ी नहीं आती होगी, इसीलिए तो
हिन्दी में काम कर रहा है। अपनी मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा अर्थात
हिंदी के प्रति हम सभी के मन में अगर आदर, गरिमा और अस्मिता के भाव होते,
तो आज हमें कार्यालयों में हिन्दी अनुभाग और हिन्दी एकक न देखने पड़ते,
बल्कि सारा कामकाज हिन्दी में ही हो रहा होता। सरकार की यह मान्यता है कि
हिन्दी का प्रयोग प्रेरणा और प्रोत्साहन के माध्यम से किया जाए और सख्ती
न बरती जाए। इसी का ही परिणाम है कि आज लगभग हर दफ्तर में हिन्दी की
दुर्दशा है और इसे दोयम समझा जाता है।
स्वतन्त्रता के बाद आधी से अधिक शताब्दि व्यतीत हो जाने के उपरांत भी हम
हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा मनाते हैं। होना तो यह
चाहिए था कि हम पूरा वर्ष हिन्दी में काम करते और अंग्रेज़ी दिवस अथवा
अंग्रेज़ी सप्ताह मनाते।
आपके विचार में हिन्दी की इस दयनीय स्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है और
इसे कैसे कार्यालय की मुख्य भाषा बनाया जा सकता है, केवल सैद्धान्तिक रूप
में नहीं, अपितु व्यावहारिक रूप से भी?
शुभकामनाओं सहित,
चोपड़ा
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