सरकारी कामकाज में हिन्दी का प्रयोग

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Lingual Bridge

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Sep 16, 2011, 2:32:47 PM9/16/11
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
मित्रो,

कितने दुर्भाग्य की बात है कि स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी हम
कार्यालयों
में रोज़मर्रा के काम में धड़ल्ले से ऐसी विदेशी भाषा का उपयोग करते हैं
जिसके बोलने वालों ने हमें 200 वर्षों तक गुलाम बनाए रखा। हिन्दी में
काम करने वाले या काम करने के लिए कहने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता
है और ऐसा समझा जाता है कि इसे अंग्रेज़ी नहीं आती होगी, इसीलिए तो
हिन्दी में काम कर रहा है। अपनी मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा अर्थात
हिंदी के प्रति हम सभी के मन में अगर आदर, गरिमा और अस्मिता के भाव होते,
तो आज हमें कार्यालयों में हिन्दी अनुभाग और हिन्दी एकक न देखने पड़ते,
बल्कि सारा कामकाज हिन्दी में ही हो रहा होता। सरकार की यह मान्यता है कि
हिन्दी का प्रयोग प्रेरणा और प्रोत्साहन के माध्यम से किया जाए और सख्ती
न बरती जाए। इसी का ही परिणाम है कि आज लगभग हर दफ्तर में हिन्दी की
दुर्दशा है और इसे दोयम समझा जाता है।

स्वतन्त्रता के बाद आधी से अधिक शताब्दि व्यतीत हो जाने के उपरांत भी हम
हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा मनाते हैं। होना तो यह
चाहिए था कि हम पूरा वर्ष हिन्दी में काम करते और अंग्रेज़ी दिवस अथवा
अंग्रेज़ी सप्ताह मनाते।

आपके विचार में हिन्दी की इस दयनीय स्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है और
इसे कैसे कार्यालय की मुख्य भाषा बनाया जा सकता है, केवल सैद्धान्तिक रूप
में नहीं, अपितु व्यावहारिक रूप से भी?

शुभकामनाओं सहित,

चोपड़ा

Vinod Sharma

unread,
Sep 16, 2011, 2:40:59 PM9/16/11
to hindian...@googlegroups.com
बंधु रोग असाध्य है। जिस देश का प्रधानमंत्री हिंदी में एक भी शब्द
बोलना अपनी शान के खिलाफ समझता हो, उस देश के, उसी सरकार
के कार्यालयों का रोना किसलिए? ये हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह,
हिंदी पखवाड़े तो हिंदी का मातम मनाने के लिए मनाए जाते हैं
जैसे हुसैन की याद में ताजिए निकलते हैं।
विनोद

2011/9/17 Lingual Bridge <lingua...@gmail.com>

Yogendra Joshi

unread,
Sep 17, 2011, 1:47:54 AM9/17/11
to hindian...@googlegroups.com, hi...@googlegroups.com
माननीय चोपड़ा जी,

आपने पूछा  "कौन जिम्मेदार है?" उत्तर तो सीधा-सपाट है, आप-हम और हमारे मित्र-परिचित जिसमें परोक्ष रूप से समस्त देशवासी शामिल हैं। प्राय: हर व्यक्ति सरकार पर दोष मढ़ता  है, गोया कि यह अकेले सरकार का काम हो। हिंदी प्रयोग में लेने का काम कोई ऐसा कार्य नहीं है जो अकेले किसी व्यक्ति या संस्था का कहा जाए। जैसे न्यायाधीश का कार्य न्याय करना, जिसका दायित्व हम-आप नहीं निभा सकते, हम प्रक्रिया में सहयोग भर दे सकते हैं। लेकिन हिंदी प्रयोग में लेने का कार्य तो उसका है जो प्रयोग में लेना चाहे। अवश्य ही सरकारी दस्तावेज तैयार करने का काम उसका है, किंतु आपको-मुझे हिंदी इस्तेमाल करने से रोक किसने रखा है? कौन कहता है कि आप डाक-लिफ़ाफ़े पर पता देवनागरी में न लिखें, बैंक का कार्य हिंदी में न करें, अपने अधिकारियों/मातहतों को हिंदी में पत्र न लिखें। लेकिन आप ऐसा करना ही न चाहें तो कोई कर क्या सकता है? सरकार फ़रमान जारी करे कि हर नागरिक हिंदी प्रयोग में ले नहीं तो उसे जेल जाना होगा। जब कई अतिगंभीर मामलों में सरकार चुप रहती है तो ऐसे में उससे किसी कदम की उम्मीद भला कैसे करें?

हम भारतीयों की खासियत यह है कि हर काम की जिम्मेदारी सरकारी तन्त्र पर डाल देते हैं, जो आप-हम जैसे लोगों द्वारा ही चलाया जाता है, आसमान से कोई टपका नहीं होता है। हमारी मानसिकता ही खुद कुछ न करके दूसरों पर टालने की है। सड़क पर कूड़ा विखेरना हमारा अधिकार, सफाई कराना सरकार का काम, यातायात नियमों का उल्लंडन हमारा अधिकार, उसे रोकना सरकार की जिम्मेदारी, प्लास्टिक प्रयोग हम करें उसे रोकना सरकार करे। हर दायित्व सरकार का, योगदान न देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार। क्या-क्या गिनायें?

जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था तो अपना अधिकांश कार्य में हिंदी करता था, जब कि सर्वत्र अंग्रेजी ही इस्तेमाल होती थी, राजभाषा नियमों के नितांत विरुद्ध। यहां तक कि मैंने अपने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का निवेदन भी हिंदी में प्रस्तुत किया। मुझे मेरे हिंदी  प्रयोग पर प्रशंसा-शब्द भी सुनने को मिलते थे, लेकिन मेरे "आप क्यों नहीं हिंदी इस्तेमाल करते?" का जवाब कोई ठीक-से नहीं दे पाता था। मैंने कई प्रयास किये, जैसे अपने विभाग के अध्यापकों  की सूची हिंदी में बनवाई। मेरी सेवानिवृत्ति के साथ ही अगले  मौके पर अंग्रेजी में वह सूची बन गयी। मैंने हिंदी में सूची क्यों बनवायी इसको भी सुन लीजिए। कार्यालय का एक चपरासी मेरे पास अध्यापकों की सूची लेकर आया, जिसमें उन गिने-चुने अध्यापकों के नामों पर टिक किया गया था, जिन्हें किसी बैठक की सूचना दी जानी थी। मैं उसमें शामिल नहीं था। मैने उससे पूछा कि क्यों वह मेरे पास आया, तो उसने कहा कि ‘लिस्ट’ अंग्रेजी में होने के कारण वह किसे चुनूं किसे न इसे नहीं सोच पाया था। लिस्ट हिंदी में होती तो दिक्कत न होती। मैंने दूसरे ही दिन खुद हिंदी में सूची तैयार करके कार्यालय को सौंप दी। यह उन दिनों की बात है जब कंप्यूटरों का चलन शुरू ही हुआ था। तब फ़्लापी का जमाना था, और हिंदी में टाइप करना मैंने सीखा भर था।

सोचिए समाज की हर बिमारी का इलाज नहीं होता है, होता भी है तो बेहद कठिन। लोगों की सोच बदल पाना आसान नहीं!  - योगेन्द्र जोशी

१७ सितम्बर २०११ १२:०२ पूर्वाह्न को, Lingual Bridge <lingua...@gmail.com> ने लिखा:

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Mukesh Popli

unread,
Sep 17, 2011, 9:50:04 AM9/17/11
to hindian...@googlegroups.com
माननीय योगेंद्र जी,
 
आपने बिल्‍कुल सही लिखा है, इस संबंध में मैं भी इतना अवश्‍य कहना चाहूंगा कि हम अपने आपको तैयार करें और अगर आप अपने देश के एक जिम्‍मेदार नागरिक हैं तो आज ही हिंदी का प्रयोग प्रारंभ करें।  यह आवश्‍यक नहीं है कि आप क्लिष्‍ट शब्‍दों के प्रयोग से अपने आपको विद्वान घोषित करें, बेहतर होगा यदि आप सरल हिंदी में कार्य करें, चाहे सरकारी कार्यालय में और चाहे निजी जीवन में, जहां आप समझते हैं कि विद्वता आवश्‍यक है, वहां अच्‍छी हिंदी का भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
 
धन्‍यवाद।
 
 

2011/9/17 Yogendra Joshi <yogendr...@gmail.com>



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आपका दिन शुभ हो ।
 
 
मुकेश पोपली


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