उन संज्ञाओं के बहुवचन के संबोधन रूप में अनुस्वार का प्रयोग जिनके एकवचन के अंत में अनुस्वार होता है

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चाँदनी

unread,
Oct 21, 2013, 10:39:43 AM10/21/13
to hindian...@googlegroups.com

 

मैं ने जो बातें संज्ञाओं के बहुवचन के संबोधन रूप में अनुस्वार के प्रयोग के बारे में की गई थीं पढ़ीं। मैं विजय कुमार मल्होत्रा जी की इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ कि “हिंदी के संज्ञापदों के बहुवचन के संबोधन रूप में अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता। व्याकरण के इस नियम में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।”


अब इस विषय में एक और प्रश्न है---

कोई कृपया यह बताएगा कि हिंदी व्याकरण के नियमों के अनुसार जब किसी एकवचन संज्ञा के अंत में अनुस्वार होता है तो उसके बहुवचन के अंत में संबोधन के रूप में अनुस्वार बना रहता है कि नहीं?

उदाहरण के लिए कृपया इन संज्ञाओं का बहुवचन संबोधन के रूप में बता दीजिए---

(पुल्लिंग)--- मियाँ, कुआँ, माहूँ

(स्त्रीलिंग)--- माँ, भौं, जूँ, ख़िज़ाँ

 

(यह भी बता दूँ कि मैं हिंदी भाषी नहीं हूँ। मेरी मातृ-भाषा फ़ारसी है, पर मैं ने ख़ुद हिंदी सीखी है।)

 

सादर

 

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चाँदनी

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Oct 21, 2013, 11:32:44 AM10/21/13
to hindian...@googlegroups.com

सुयश जी,

काश आप अपनी बात कहने के साथ साथ मेरे प्रश्न के बारे में भी कुछ बता देते।

 

सादर



On Monday, October 21, 2013 6:32:43 PM UTC+3:30, सुयश सुप्रभ wrote:
मैं विजय कुमार मल्होत्रा जी की बात से सहमत नहीं हूँ। भाषा की बदलती प्रवृत्ति को देखते हुए व्याकरण के कुछ नियमों में वैकल्पिक प्रयोग को मान्यता दी जाती है। कोई नियम केवल इस आधार पर सर्वमान्य नहीं हो जाता है कि व्याकरण की किसी किताब में उसे सही घोषित किया है।

मैं पिछले एक दशक के अनुभव के आधार पर यह बात कह सकता हूँ कि अब अधिकतर लोग बहुवचन संबोधन में अनुस्वार का प्रयोग करने लगे हैं। इसके प्रयोग को अब शुद्धता-अशुद्धता के संदर्भ में न देखकर एकरूपता के दायरे में रखा जाता है। अनुवादक संघ के ब्लॉग पर इस नियम के बारे में निम्नलिखित बात कही गई है :

"संबोधन में अनुस्वार के प्रयोग में एकरूपता का ध्यान रखें। इन दिनों संबोधन में अनुस्वार के प्रयोग को मान्यता मिलती जा रही है। निम्नलिखित उदाहरणों में 'साथियों' और 'साथियो' दोनों सही हैं।

"साथियों, तैयार हो जाओ।"

"साथियो, तैयार हो जाओ।"

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि संबोधन के बहुवचन रूप में अनुस्वार का प्रयोग नहीं करना गलत है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि वर्तमान प्रयोग को देखते हुए इस नियम को एकरूपता के दायरे में रखा जाए। अंग्रेज़ी में ऐसे अनेक नियम हैं जिन्हें बदलते समय के साथ या तो अप्रासंगिक घोषित किया गया या वैकल्पिक प्रयोग को मान्यता दी गई। हिंदी में व्याकरण की प्रासंगिकता तभी बनी रहेगी जब इसमें वर्तमान प्रयोग को देखते हुए आवश्यक संशोधन किया जाए।

सादर,

सुयश
   

 


21 अक्तूबर 2013 8:09 pm को, चाँदनी <sapna.c...@gmail.com> ने लिखा:
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Satya Ghatia

unread,
Oct 21, 2013, 12:08:18 PM10/21/13
to hindian...@googlegroups.com
जब किसी एकवचन संज्ञा के अंत में अनुस्वार होता है तो उसके बहुवचन के अंत में संबोधन के रूप में अनुस्वार बना रहता है. 


2013/10/21 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>
--

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Oct 21, 2013, 1:14:37 PM10/21/13
to hindian...@googlegroups.com
मैं विजय कुमार मल्होत्रा जी की बात से सहमत नहीं हूँ। भाषा की बदलती प्रवृत्ति को देखते हुए व्याकरण के कुछ नियमों में वैकल्पिक प्रयोग को मान्यता दी जाती है। कोई नियम केवल इस आधार पर सर्वमान्य नहीं हो जाता है कि व्याकरण की किसी किताब में उसे सही घोषित किया गया है।

मैं पिछले एक दशक के अनुभव के आधार पर यह बात कह सकता हूँ कि अब अधिकतर लोग  अनुस्वार का प्रयोग करने लगे हैं। इसके प्रयोग को अब शुद्धता-अशुद्धता के संदर्भ में न देखकर एकरूपता के दायरे में रखा जाता है। अनुवादक संघ के ब्लॉग पर इस नियम के बारे में निम्नलिखित बात कही गई है :


"संबोधन में अनुस्वार के प्रयोग में एकरूपता का ध्यान रखें। इन दिनों संबोधन में अनुस्वार के प्रयोग को मान्यता मिलती जा रही है। निम्नलिखित उदाहरणों में 'साथियों' और 'साथियो' दोनों सही हैं।

"साथियों, तैयार हो जाओ।"

"साथियो, तैयार हो जाओ।"

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि बहुवचन संबोधन में अनुस्वार का प्रयोग नहीं करना गलत है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि वर्तमान प्रयोग को देखते हुए इस नियम को एकरूपता के दायरे में रखा जाए। अंग्रेज़ी में ऐसे अनेक नियम हैं जिन्हें बदलते समय के साथ या तो अप्रासंगिक घोषित किया गया या वैकल्पिक प्रयोग को मान्यता दी गई। हिंदी में व्याकरण की प्रासंगिकता तभी बनी रहेगी जब इसमें वर्तमान प्रयोग को देखते हुए आवश्यक संशोधन किया जाए।

सादर,

सुयश


21 अक्तूबर 2013 9:02 pm को, चाँदनी <sapna.c...@gmail.com> ने लिखा:

Vijay K. Malhotra

unread,
Oct 22, 2013, 3:57:55 AM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com, Hindi Vimarsh, WORLD HINDI SECRETARIAT, Hindishikshakbandu googlegroup, Ashok Chakradhar, Akshey Kumar, ajit gupta, ANAND KUMAR, mkv1@york.ac.uk Verma, Bansal, Manju, Sandhya Bhagat, Virendra Bhavsar, Bumroong Kham-Ek, capt raghuvanshi, ajai, SAHITYA AAMRIT, Chandra Khusial, Aditya Chaudhary, Divik Ramesh, Dr ved partap Vaidik, dar...@cdac.in, amit pandey, anurag lal, Girish Nath Jha, gaurav dave, Dr. Padmesh Gupta, Oliver Hellwig, Puneet Raheja (Team Lease), American Institute of Indian Studies, Hideaki Ishida, Shrish Jaswal, Anil Joshi, Priyanka Jain, Chirag Jain, Mahesh Kulkarni, Akhilesh Kumar, Anjani Kumar, 7. "Alok Mehta", Jagan Nathan, Om Thanvi, Omkar N. Koul, omv...@mit.gov.in, Pervin Malhotra, Pradeep Parappil, qurban, rajeev sachan

(स्त्रीलिंग)--- माँ, भौं, जूँ, ख़िज़ाँ

माँ (एकवचन), माएँ (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और  माँओं (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर)  सहित

भौं(एकवचन), भौंएँ (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और भौंओं (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर) सहित

लेकिन भौं का अधिक प्रचलित रूप है, भौंह (एकवचन), भौंहें (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और भौंहों (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर) सहित

जूँ (एकवचन) जुँएँ (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और जुँओं (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर) सहित

ख़िज़ाँ (एकवचन) ख़िज़ाँएँ (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और ख़िज़ाँओँ (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर) सहित

(पुल्लिंग)--- मियाँ, कुआँ, माहूँ

कुआँ (एकवचन)--- कुएँ (सामान्य बहुवचन – विभक्तिरहित) और कुओँ (तिर्यक् बहुवचन+ विभक्ति (का, ने, से, के लिए, से, में, पर) सहित

मुझे लगता है कि  मियाँ के दोनों बहुवचन के रूप मियाँ ही रहते हैं, लेकिन मैं इस संबंध में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूँ.

माहूँ शब्द की मुझे जानकारी नहीं है.

विचारार्थ

विजय

 

 

 

 

 

 

 

 

 



2013/10/21 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>
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विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार

Vijay K Malhotra
Former Director (OL),
Ministry of Railways,
Govt. of India
Mobile:91-9910029919
     


URL<www.vijaykmalhotra.mywebdunia.com>

Anil Janvijay

unread,
Oct 22, 2013, 5:11:11 AM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com
चाँदनी जी,
यहाँ मियाँ का बहुवचन रूप मियाँओं होगा और कुआँ का बहुवचन रूप कुओं होगा।
अनिल


2013/10/22 Vijay K. Malhotra <malho...@gmail.com>



--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
www.rachnakosh.com

Moscow, Russia
+7 916 611 48 64 ( mobile)

चाँदनी

unread,
Oct 22, 2013, 9:57:55 AM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com

सब से पहले मैं सब को उत्तर देने के लिए धन्यवाद कहती हूँ, पर मुझे अभी तक मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला है।

देखिए, यह जो मैं ने पूछा, इसका उत्तर मैं हिंदी व्याकरण के नियमों के अनुसार चाहती हूँ, यानी जिस तरह मानक हिंदी में होता है ठीक उसी तरह। यह मेरे काम में नहीं आता है कि कुछ हिंदी भाषी मानक हिंदी के ढंग से नहीं कुछ और ढंग से बोलते हैं। मैं केवल उसी प्रयोग को जानना चाहती हूँ जो मानक हिंदी के अनुसार हो। मुझे इस बहस से भी कोई मतलब नहीं है कि कोई इस बात को साबित करना चाहता है कि अब मानक हिंदी के अलावा कोई और प्रयोग भी लोगों के बीच मिलने लगा है। फिर से कहती हूँ कि मुझे केवल मानक हिंदी के अनुसार उत्तर चाहिए।

मुझे इतना पता है कि मानक हिंदी के अनुसार ऐसा होता है---

एकवचन

बहुवचन

एकवचन + विभकति

बहुवचन + विभकति

संबोधित एकवचन

संबोधित

बहुवचन

माँ

माएँ

माँ ने

माओं ने

हे माँ

?

जूँ

जुएँ

जूँ ने

जुओं ने

ऐ जूँ

?

ख़िज़ाँ

ख़िज़ाएँ

ख़िज़ाँ में

ख़िज़ाओं में

ऐ ख़िज़ाँ

?

कुआँ

कुएँ

कुएँ में

कुओं में

ऐ कुएँ

?

माहूँ

माहूँ

माहूँ ने

माहुओं ने

ऐ माहूँ

?

मियाँ

?

?

?

?

?

 

जाहाँ मैं ने “?” लगाया है मुझे पता नहीं है कि हिंदी व्याकरण और मानक हिंदी के अनुसार संज्ञा का रूप कैसा होगा। यह भी इस लिए मुझे पता नहीं है कि इन संज्ञाओं के एकवचन में अंतिम स्वर “सानुनासिक” है (अगर एकवचन में अंतिम स्वर “सानुनासिक” न हो तो मुझे ठीक तरह से पता है कि संज्ञा के वचन और कारकों के रूप कैसे होंगे)।

 

कोई कृपया बताएगा कि जहाँ मैं ने “?” लगाया है वहाँ हिंदी व्याकरण और मानक हिंदी के अनुसार क्या होना चाहिए?

वैसे “माहूँ” का अर्थ है--- Aphid

 

सादर

Anil Janvijay

unread,
Oct 22, 2013, 10:09:12 AM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com
चाँदनी जी,
सम्बोधित बहुवचन होंगे -- हे माँओ, ऐ जुओ, ऐ खिजाओ, ऐ कुओ, ऐ माहुओ, ऐ मियाओ।
मियाँ का बहुवचन भी मियाँ ही होगा। एक्वचन+विभक्ति मियाँ ने और बहुवचन विभक्ति मियाओं ने होंगी। सम्बोधित एक वचन में ऐ मियाँ और सम्बोधित बहुवचन में ऐ मियाओ कहा जाएगा।
सादर
अनिल 


2013/10/22 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>
--
--
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Jagannathan Ramaswami

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Oct 22, 2013, 4:27:59 PM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com
मित्रगण
ख़ुशी की बात है कि चाँदनी ने एक अनछुए प्रसंग पर प्रकाश डाला है और लोगों को व्याकरण पर चर्चा के लिए प्रेरित किया है। 
हिंदी में भौं और भौंह दो रूप हैं - क्रम से इनका बहुवचन रूप होंगे - भँवें और भौंहें। बहुवचन तिर्यक रूप हैं - भँवों और भौंहों. यही बात (कान की) 'लौ' पर भी लागू होती है। इनके संबोधनकारक का सवाल नहीं है।
मियाँ अपने में संबोधन का शब्द है, जैसे हिंदी 'अजी'। इसके बहुवचन का कोई रूप नहीं बनता। 
चाँदनी यह मानकर चल रही हैं कि 'माँ' का बहुवचन 'माएँ' बनेगा। /एँ/ के कारण मूल शब्द के अनुनासिक उच्चारण के लोप का कोई आधार नहीं है। मेरे हिसाब से 'माँएँ' ही बनना चाहिए। संदेह हो तो प्रयोग की आवृत्ति का अध्ययन किया जाना चाहिए। 'जूँ' के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। कोई आधार न हो तो जुँएँ ही मानना चाहिए। वे शायद सोच रही हैं कि शब्द में दो अनुनासिक स्वरों का आना संभव या सही नहीं है। इसके विरोध में मेरे पास कोई उदाहरण नहीं है।बीच में व्यंजन के साथ  'गेंदों' आदि शब्द मिलते हैं। 'धूँ' से नामधातु  'धुँधुआना' इसकी विपरीत प्रक्रिया है। लेकिन इससे बहुवचन संबोधनकारक पर कोई प्रकाश नहीं पड़ सकता।
'माहूँ' 'जूँ' आदि कीड़े हैं, बहवचन में इनके संबोधन की आवश्यकता ही नहीं होती। इसलिए प्रयोग के आधार पर इनका रूप निर्धारित करना बेमानी होगा। कामताप्रसाद गुरु ने  'रासों' के लिए  'हे रासो' और  'कोदों' के लिए  'हे कोदों' दिया हैँ। इस विसंगति का कारण प्रूफ़ की गलती है क्योंकि और किसी शब्द में बहुवचन संबोधनकारक में उन्होंने अनुनासिकता का उल्लेख नहीं किया है। मुद्दा यही है कि क्या वैयाकरण को अव्यावहारिक तरीके से रूप गढ़ने चाहिए। निर्जीव वस्तुओं के बहुवचन में संबोधन की बात गले नहीं उतरती।
एक जगह है जहाँ  'संभावित लोक' के संदर्भ में लेखक को शब्द गढ़ने पड़ते हैं। अगर मैं परी कथा लिखता और जुँएँ मेरे पात्र होतीं तो मैं संबोधन के लिए  'मेरी प्यारी जुँओ' लिखता। अगर चाँदनी  के सुझाव के अनुसार मैं   'जुएँ' लेता तो मुझे  'जुँओ' के लिए फिर से /जु/ पर चंद्रबिंदु को लाने के लिए नियम बनाना पड़ता, क्योंकि हिंदी के सभी वैयाकरण इस बात पर एकमत हैं कि संबोधनकारक /ओ/ निरनुनासिक है। 
जगन्नाथन





2013/10/22 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

चाँदनी

unread,
Oct 22, 2013, 5:48:57 PM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com


सब को एक और बार उत्तर देने के लिए धन्यवाद कहती हूँ।

 

जगन्नाथन जी,

<हिंदी में भौं और भौंह दो रूप हैं... इनके संबोधनकारक का सवाल नहीं है।>

कवि अपने कविता में भौं या भौंह को भी संबोधित रूप में ला सकता है।

 

<मियाँ अपने में संबोधन का शब्द है, जैसे हिंदी 'अजी'। इसके बहुवचन का कोई रूप नहीं बनता।> 

कोई मियाँ-बीवी नहीं कहेगा क्या? जब मियाँ “पति” के अर्थ में आए तो संबोधन का शब्द नहीं है।

 

सादर



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

चाँदनी

unread,
Oct 22, 2013, 7:38:11 PM10/22/13
to hindian...@googlegroups.com

सब को एक और बार उत्तर देने के लिए धन्यवाद कहती हूँ।

 

जगन्नाथन जी,

 

<हिंदी में भौं और भौंह दो रूप हैं... इनके संबोधनकारक का सवाल नहीं है।>

कवि अपनी कविता में भौं या भौंह को भी संबोधित रूप में ला सकता है।

 

<मियाँ अपने में संबोधन का शब्द है, जैसे हिंदी 'अजी'। इसके बहुवचन का कोई रूप नहीं बनता।> 

कोई मियाँ-बीवी नहीं कहेगा क्या? जब मियाँ “पति” के अर्थ में आए तो संबोधन का शब्द नहीं है।

 

सादर



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

Jagannathan Ramaswami

unread,
Oct 24, 2013, 9:35:42 AM10/24/13
to hindian...@googlegroups.com
संदर्भ भौंह का - मैं  'संभावित लोक' की बात कर चुका हूँ। नियमानुसार बहुवचन संबोधन होगा भँवो या भौंहो। अगर भारतीय संदर्भ में सोचें तो किसी स्त्री के सामने मेरे मियाँओ कहने की स्थिति शायद ही आती हो। 
जगन्नाथन 


2013/10/23 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>
--

चाँदनी

unread,
Oct 24, 2013, 10:40:56 AM10/24/13
to hindian...@googlegroups.com

जगन्नाथन जी,

उत्तर देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

कृपया यह व्याख्या करेंगे कि “भौं” से, जो औकारांत है, जब “भँवें”, “भँवों”, “भँवो” बनाए जाते हैं तो नियम क्या है कि इन शब्दों में “औ” नहीं रहता है और “व” शामिल हो जाता है?

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

Jagannathan Ramaswami

unread,
Oct 25, 2013, 2:10:19 AM10/25/13
to hindian...@googlegroups.com
चाँदनी जी,
यह ह्रस्वीकरण की प्रक्रिया है जो हिंदी के तमाम शब्दों में दिखाई देता है। घोड़ा से घुड़दौड़, खेलना से खिलवाड़। औ का अव इसी प्रक्रिया का एक रूप है। जैसे नौ से नवाँ, नवीं (सौ से सवाँ नहीं)। कुछ लोगों के लिए यह ऐच्छिक है। इसलिए नौवाँ भी संभव है। कान की लवें के बारे में मौं आश्वस्त हूँ, दीये की लौ के बहुवचन रूप के बारे में खोज की ज़रूरत है.
जगन्नाथन


2013/10/24 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>

--

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Oct 25, 2013, 3:43:59 AM10/25/13
to hindian...@googlegroups.com
चाँदनी जी,

हिंदी व्याकरण पुराने नियमों को ढोने के कारण अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। बहुवचन संबोधन में अनुस्वार के प्रयोग को मान्यता मिल चुकी है। अगर वैयाकरणों ने इस तथ्य को अभी तक किताबों में स्वीकार नहीं किया है तो यह हम जैसे लोगों के लिए चिंता और निराशा का विषय है। हिंदी व्याकरण अभी दशकों पीछे चल रहा है।

भाषा का स्वरूप भी समय के साथ बदलता रहता है। हिंदी व्याकरण के दर्जनों नियम अप्रासंगिक हो गए हैं।

मैं अपना अनुभव साझा करना चाहूँगा। मुझे दस में से औसतन सात-आठ बार संबोधन में अनुस्वार का प्रयोग देखने को मिलता है। मैंने इस संदर्भ में संपादकों, पत्रकारों, प्राध्यापकों आदि से भी बात की है। अधिकतर लोगों की यही राय थी कि जिन नियमों का पालन करने के चक्कर में अनावश्यक रूप से समय बर्बाद होता है उनमें परिवर्तन करना ही सबसे बेहतर विकल्प है। हिंदी में दशकों पुरानी किताबों का हवाला देने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। इसे हिंदी व्याकरण का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इसमें आवश्यक संशोधन करने की परंपरा नहीं रही है। यही बात शब्दकोशों पर लागू होती है। भाषा के वर्तमान स्वरूप को अपनाने वाले लोगों के लिए तथाकथित मानक हिंदी के नियमों की कोई प्रासंगिकता नहीं होती है। ऐसा इसलिए होता है कि ये नियम भाषा की वर्तमान प्रवृत्ति की अनदेखी करके 50-60 साल पुरानी व्याकरण की किताबों के आधार पर सही घोषित किए जाते हैं। जब तथाकथित मानक भाषा और व्यवहार की भाषा में ज़मीन-आसमान का अंतर हो जाता है तब उस तथाकथित मानक भाषा की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है। आप व्याकरण की किताबों में हिंदी के जिस मानक स्वरूप के बारे में पढ़ती हैं वह असल ज़िंदगी में महत्वहीन हो गई है क्योंकि उसमें महत्वपूर्ण बने रहने की क्षमता ही नहीं है। यथार्थ से कटा हर नियम अप्रासंगिक हो जाता है। मैंने हाल ही में व्याकरण के नियमों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ी है :

"Some people seem to think love for language means memorising the longest possible list of grammar rules and style shibboleths. This is too often coupled with smug self-congratulation. But a real understanding of language acknowledges which rules are truly ironclad, which ones are in dispute and which ones are mere style choices."

अब मैं आपके सवाल पर बात करना चाहूँगा। आपने जिन शब्दों के बारे में पूछा है उनके बहुवचन संबोधन रूपों को लेकर भी कोई अंतिम बात नहीं कही जा सकती है। अभी हिंदी अपने विकास के जिस चरण में है उसमें बहुत-से मामलों में वैकल्पिक प्रयोगों को मान्यता देना समय की माँग है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित रूपों को मान्यता दी जा सकती है :

एकवचन

बहुवचन

एकवचन + परसर्ग

बहुवचन + परसर्ग

एकवचन संबोधन

बहुवचन संबोधन

माँ

माँएँ/माएँ

माँ ने

माँओं ने

हे माँ

हे माँओं/माँओ

जूँ

जुँएँ/जुएँ

जूँ ने

जुँओं ने

ऐ जूँ

ऐ जुँओं/जुँओ

ख़िज़ाँ

ख़िज़ाँएँ/ख़िज़ाएँ

ख़िज़ाँ में

ख़िज़ाँओं में

ऐ ख़िज़ाँ

ऐ ख़िजाँओं/ ख़िज़ाँओ

कुआँ

कुएँ

कुएँ में

कुओं में

ऐ कुएँ

ऐ कुओं/कुओ

माहूँ

माहूँ

माहूँ ने

माहुँओं ने

ऐ माहूँ

ऐ माहुँओं/माहुँओ

मियाँ

मियाँ

मियाँ ने

मियाँओं ने

ऐ मियाँ

ऐ मियाँओं/ मियाँओ

भौं

भौंएँ/भँवें

भौं ने

भौंओं/भँवों ने

ऐ भौं

ऐ भौंओं/भौंओ/भँवों/भँवो


सादर,

सुयश


22 अक्तूबर 2013 7:27 pm को, चाँदनी <sapna.c...@gmail.com> ने लिखा:
--

चाँदनी

unread,
Oct 25, 2013, 3:21:39 PM10/25/13
to hindian...@googlegroups.com

सुयश जी और जगन्नाथन जी,

बहुत बहुत धन्यवाद।

 

वैसे सुयश जी,

आपकी बातें और व्याख्या बहुत लाभदायक थीं।

 

<<जब तथाकथित मानक भाषा और व्यवहार की भाषा में ज़मीन-आसमान का अंतर हो जाता है तब उस तथाकथित मानक भाषा की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है।>>

सुयश जी, आपकी बात सही है पर अंतर इतना बड़ा नहीं है कि कहा जाए “ज़मीन-आसमान का अंतर”। मुझे तो यह छोटा सा अंतर लगता है।

 

मेरी मातृभाषा फ़ारसी है। मैं ईरान में रहती है। ईरान से कभी बाहर नहीं गई हूँ। मैंने अधिकतर हिंदी फ़िल्मों से हिंदी सीखी। मैंने न कभी व्याकरण के नियमों की list बना दी न कभी नियमों को memorize करने की कोशिश की। अगर ऐसा करती तो हिंदी में न बोल पाती न लिख सकती। मैंने अधिकतर हिंदी फ़िल्मों से हिंदी सीखी, यानी ज़्यादातर सुनकर सीख सकी। सीखने के दौरान में कुछ-कुछ व्याकरण के बारे में जानकारियाँ मिलीं, पर ज़्यादातर सुनकर सीखी। हिंदी फ़िल्में देखते देखते और इंटरनेट पर पूछते पूछते सीख गई। एक साल लग गया सीखने में। यह आठ साल पहले की बात है। सीखने के बाद, क्यों कि व्याकरण मुझे बहुत पसंद है, जब कभी समय मिला यह जानने की कोशिश की कि हिंदी व्याकरण में क्या-क्या नियम बनाए गए हैं। हिंदी व्याकरण के बारे में मुझे दो पुस्तकें मिलीं, पर ये मुझे तब मिलीं जब मैं हिंदी सीख गई थी, हिंदी नहीं आती तो उनको न पढ़ सकती न समझ सकती।

 

मैंने इस लिए यह प्रश्न किया कि जब संज्ञाओं का बहुवचन बनाने के नियम बताए जाते हैं तो केवल वे उदाहरण दिए जाते हैं जिनका अंतिम स्वर निरनुनासिक है, पर हिंदी में ऐसी संज्ञाएँ भी मिलती हैं जिनका अंतिम स्वर सानुनासिक हो।  

यह तो पता है कि संज्ञा का अंतिम स्वर निरनुनासिक हो या सानुनासिक, संज्ञा का बहुवचन बनाने के नियम नहीं बदलेंगे, पर यह जानना चाहती थी कि जब संज्ञा का अंतिम स्वर सानुनासिक हो तो क्या इन नियमों के प्रयोग में कोई अंतर आएगा कि नहीं। जिस तरह कि उत्तरों से मालूम हुआ है, कोई अंतर नहीं आएगा।

 

पर उन आकारंत पुंलिंग संज्ञाओं के बारे में कुछ कहना है जिनका अंतिम स्वर सानुनासिक है, उदाहरण के लिए वही “कुआँ”। मुझे लगता है कि इस लिए कि “कुआँ” आकारंत पुंलिंग संज्ञा है और इसका अंतिम स्वर सानुनासिक है तो जब इसके बहुवचन का संबोधित रूप बनाना पड़े तब केवल “ऐ कुओं” सही होगा क्यों कि “ऐ कुओ” में अंतिम स्वर निरनुसिक हो गया है हालाँकि “कुआँ” का अंतिम स्वर सानुनासिक है। जिस तरह कि जब “कुआँ” का बहुवचन बनेगा तब यह अंतिम स्वर सानुनासिक रहेगा (कुएँ) इसी तरह जब इसके बहुवचन का संबोधित रूप बनाना पड़े तब भी अंतिम स्वर को सानुनासिक रहना चाहिए---“ऐ कुओं”, और मुझे लगता है कि यहाँ “ऐ कुओ” नहीं बनाया जा सकता। कोई कृपया इसके बारे व्याख्या करेगा और कहेगा कि मेरी व्याख्या सही है या ग़लत?

 

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

Satya Ghatia

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Oct 26, 2013, 4:56:50 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com
व्याकरण के नियमों की जटिलताओं में न जाते हुए, स्वाभाविक रूप से मैं "ऐ कुओं" ही बोलूंगा। अतः यह बहुवचन सानुनासिक ही सही लगता है। 


2013/10/26 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>

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चाँदनी

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Oct 26, 2013, 5:06:35 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com

सत्य जी,

उत्तर देने के लिए धन्यवाद, पर मैं पहले भी कह चुकी हूँ--- मैं अपने प्रश्नों का उत्तर हिंदी व्याकरण के नियमों के अनुसार चाहती हूँ। वैसे व्याकरण के नियम जटिलता नहीं हैं।

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

चाँदनी

unread,
Oct 26, 2013, 5:23:56 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com

सत्य जी,

उत्तर देने के लिए धन्यवाद, पर मैं पहले भी कह चुकी हूँ--- मैं अपने प्रश्नों का उत्तर हिंदी व्याकरण के नियमों के अनुसार चाहती हूँ। वैसे व्याकरण के नियमओं में जटिलता नहीं हैं।

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

चाँदनी

unread,
Oct 26, 2013, 5:39:45 AM10/26/13
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* व्याकरण के नियमों में जटिलता नहीं है।/ व्याकरण के नियम जटिल नहीं हैं।



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

Satya Ghatia

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Oct 26, 2013, 5:59:20 AM10/26/13
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यदि व्याकरण के नियम स्वाभाविकता/नैसर्गिकता के अनुरूप होते हैं तो जटिल नही होते हैं.किंतु जैसे ही उनमें कृत्रिमता और बनावट प्रवेश करती है वे जटिल होने लग जाते हैं. व्याकरण-शास्त्र में भी यदि हम कानून की तरह Natural Justice की अवधारणा को स्वीकार कर लें तो ये सब दुविधाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी. शास्त्रीय दृष्टि से व्याकरण को वेद का मुख माना गया है, किंतु वहां भी मुख सौकर्य के सिद्धांत को सभी भाषा-भाषियों की सरलता के लिए स्वीकार किया गया है.   


2013/10/26 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>

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चाँदनी

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Oct 26, 2013, 8:51:52 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com

<<यदि व्याकरण के नियम स्वाभाविकता/नैसर्गिकता के अनुरूप होते हैं तो जटिल नही होते हैं.किंतु जैसे ही उनमें कृत्रिमता और बनावट प्रवेश करती है वे जटिल होने लग जाते हैं>>

सत्य जी,

नियम तब नियम होता है जब सभी शब्दों पर लागू हो। अगर कुछ ऐसे शब्द मिलें जिनपर नियम लागू न हो तो उनके बारे में भी व्याख्या करनी चाहिए ताकि नियम में कमी न रहे।

 

व्याकरण के नियमों के अनुसार आकारांत पुंलिंग संज्ञाओं के अंतिम स्वर के स्थान पर “ए”/ “ओं”/ “ओ”(संबोधित रूप) लगाया जाता है, जैसे लड़का--- लड़के, लड़कों ने, ऐ लड़को (और अगर माना जाए कि संबोधित रूप में लगाया हुआ “ओ” सानुनासिक हो सकता है तो “ऐ लड़कों”)

लेकिन ऐसे नियम के लिए केवल ऐसी आकारांत पुंलिंग संज्ञाएँ उदाहरण के लिए दी जाती हैं जिनका अंतिम स्वर निरनुनासिक हो जैसे “लड़का”, यदि आकारांत पुंलिंग संज्ञा का अंतिम स्वर सानुनासिक हो (जैसे “कुआँ”) तो नियम न बदलते हुए उसकी व्याख्या में कुछ तो अंतर आएगा---

(1)या तो कहना पड़ेगा कि अनुनासिक अपने स्थान पर रहेगा और केवल अंतिम आ के स्थान पर “ए”/ “ओं”/ “ओ”(संबोधित रूप) लगाया जाएगा, जो कि अजीब लगेगा क्यों कि अनुनासिक कोई अलग वर्ण नहीं है कि अपने स्थान पर रह सके, अनुनासिक स्वरों के साथ आता है और स्वर या सानुनासिक होते हैं या निरनुनासिक।

(2)या तो कहना पड़ेगा कि जब आकारांत पुंलिंग संज्ञा का अंतिम स्वर सानुनासिक हो तो अंतिम स्वर के स्थान ऐसा “ए”/ “ओं”/ “ओ”(संबोधित रूप) लगाया जाना चाहिए जो सानुनासिक हो, यहाँ “ओं” ख़ुद सानुनासिक है, तो फिर “ए”/ “ओ”(संबोधित रूप) को सानुनासिक करके उस अंतिम आ के स्थान पर लगा देना चाहिए जो सानुनासिक हो, जैसे--- “कुआँ”(अंतिम “आ” सानुनासिक है)--- “कुएँ”(सानुनासिक “ए” को सानुनासिक “आ” के स्थान पर लगाया गया है)

 

इन बातों के अनुसार मुझे लगता है कि इस लिए कि “कुआँ” आकारंत पुंलिंग संज्ञा है और इसका अंतिम स्वर सानुनासिक है तो जब इसके बहुवचन का संबोधित रूप बनाना पड़े तब केवल “ऐ कुओं” सही होगा क्यों कि “ऐ कुओ” में अंतिम स्वर निरनुसिक हो गया है हालाँकि “कुआँ” का अंतिम स्वर सानुनासिक है। जिस तरह कि जब “कुआँ” का बहुवचन बनेगा तब यह अंतिम स्वर सानुनासिक रहेगा (कुएँ) इसी तरह जब इसके बहुवचन का संबोधित रूप बनाना पड़े तब भी अंतिम स्वर को सानुनासिक रहना चाहिए---“ऐ कुओं”, और मुझे लगता है कि यहाँ “ऐ कुओ” नहीं बनाया जा सकता। कोई कृपया इसके बारे व्याख्या करेगा और कहेगा कि मेरी व्याख्या सही है या ग़लत?

 

मैंने कौन सी अजीब बात बता दी है? मेरी इस बात में कौन सी जटिलता मिलती है? क्या इस विषय में हिंदी व्याकरण में कोई व्याख्या नहीं की गई है कि यह बात जटिल लगती है?

अगर व्याख्या की गई है तो कोई कृपया बताएगा कि वह व्याख्या कैसी है और मेरी व्याख्या में क्या कमी है?

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:

Satya Ghatia

unread,
Oct 26, 2013, 10:20:01 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com
मैं आपके इस कथन से सहमत नहीं हूं कि "नियम तब नियम होता है जब सभी शब्दों पर लागू हो", क्योंकि नियम की स्थापना के लिए भी एक सार्वभौमिक नियम यह है कि Exception proves the rule. 
 
जहां तक "ए कुओं" का प्रश्न है आपकी व्याख्या बिल्कुल सही है. अंतर सिर्फ इतना है कि मैं इस बात को सरल शब्दों में कहने का प्रयास कर रहा था और आपका आग्रह व्याकरण के नियमों के लिए है. 
 
अहिन्दी भाषी होने और हिंदी में औपचारिक शिक्षा  के बिना भी व्याकरण के नियमों के प्रति  आपकी प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है.
 
शुभकामनाओं सहित,
 
सत्य घाटिया
 

 

 


2013/10/26 चाँदनी <sapna.c...@gmail.com>

--

चाँदनी

unread,
Oct 26, 2013, 11:19:53 AM10/26/13
to hindian...@googlegroups.com

सत्य जी,

उत्तर देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

प्रशंसा के लिए आभार।

 

<<मैं आपके इस कथन से सहमत नहीं हूं कि "नियम तब नियम होता है जब सभी शब्दों पर लागू हो", क्योंकि नियम की स्थापना के लिए भी एक सार्वभौमिक नियम यह है कि Exception proves the rule.>>

मैं ने जहाँ लिखा है “नियम तब नियम होता है जब सभी शब्दों पर लागू हो।”, इसके बाद यह भी लिखा है कि “अगर कुछ ऐसे शब्द मिलें जिनपर नियम लागू न हो तो उनके बारे में भी व्याख्या करनी चाहिए ताकि नियम में कमी न रहे।”। मेरा मतलब यही है कि अगर कोई Exception हो तो उसके बारे में भी व्याख्या करनी चाहिए ताकि नियम में कमी न रहे। मसलन कहा जाए कि यह नियम ऐसे शब्दों पर लागू है और वैसे शब्दों पर नहीं, या ऐसे शब्दों पर इस तरह लागू है और वैसे शब्दों पर उस तरह। यही तो होगी व्याख्या किसी नियम के प्रयोग के बारे में।

वैसे हिंदी में ऐसी संज्ञाएँ जिनका अंतिम स्वर सानुनासिक हो, कम ही सही पर मिलती तो हैं। लेकिन हिंदी व्याकरण में उनके बारे में बात नहीं की जाती या शायद कम की जाती है।

 

<<अंतर सिर्फ इतना है कि मैं इस बात को सरल शब्दों में कहने का प्रयास कर रहा था और आपका आग्रह व्याकरण के नियमों के लिए है>>

इसकी वजह यह है कि मैं केवल ऐसा उत्तर चाहती हूँ जो व्याकरण के अनुसार हो।

फिर भी सत्य जी, उत्तर देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

 

सादर

 



On Monday, October 21, 2013 6:09:43 PM UTC+3:30, चाँदनी wrote:
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