श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के स्थान पर स्वरात्मक रूपों का प्रयोग

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सुयश सुप्रभ

unread,
Nov 7, 2010, 2:56:40 PM11/7/10
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के संदर्भ में
निम्नलिखित नियम निर्धारित किए हैं :

"5. श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के शब्द

(i) श्रुतिमूलक 'य' और 'व' का प्रयोग क्रिया रूपों में होता है। क्रिया
रूप इस तरह से बनेंगे -

आया आए, आई आईं

(हुवा...) हुआ हुए हुई हुईं

(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे छोड़े
नहीं जा सकते। जैसे -

पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"

केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने इससे पहले जो नियम निर्धारित किया था उसमें
श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के बदले 'ई' और 'ए' जैसे स्वरात्मक रूपों के
प्रयोग को केवल क्रिया रूपों तक सीमित नहीं रखा गया था। यह नियम नीचे
प्रस्तुत है :

"3.13.1 जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया
जाए, अर्थात् किए : किये, नई : नयी, हुआ : हुवा आदि में से पहले
(स्वरात्मक) रूपों का प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय
आदि सभी रूपों और स्थितियों में लागू माना जाए। जैसे :– दिखाए गए, राम के
लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली आदि।"

'ई' और 'ए' जैसे स्वरात्मक रूपों के प्रयोग को केवल क्रिया रूपों तक
सीमित करने पर आपकी क्या राय है? क्या आप नए, रुपए, दाएँ आदि वर्तनियों
को मानक नहीं मानते/मानती हैं?

सादर,

सुयश
9818711884

http://anuvaadkiduniya.blogspot.com


Vijay K. Malhotra

unread,
Nov 7, 2010, 11:12:51 PM11/7/10
to hindian...@googlegroups.com, सरोज दीक्षा, Jagan Nathan, Hindi Vimarsh, WORLD HINDI SECRETARIAT
भाई जगन्नाथन् जी,
सुयश ने निदेशालय के तत्वावधान में गठित वर्तनी सुधार समिति के अत्यंत महत्वपूर्ण नियम की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कुछ असंगतियों की ओर भी हमारा ध्यान खींचा है. आप इस समिति के माननीय सदस्य हैं. आपसे निवेदन है कि आप इस बारे में अपना मंतव्य रखें ताकि प्रबुद्ध हिंदी अनुवादक भी उस पर अपनी बेबाक राय आपके सामने रख सकें.
सादर
विजय

2010/11/8 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com>




--
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विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार
Vijay K Malhotra
Former Director (Hindi),
Ministry of Railways,
Govt. of India
आवास का पता / Residential Address:
Vijay K Malhotra
WW/67/SF,
MALIBU TOWNE,
SOHNA ROAD,
GURGAON- 122018
Mobile:91-9910029919
          91-9311170555
फोन: 0124-4104583

URL<www.vijaykmalhotra.mywebdunia.com>

Yogendra Joshi

unread,
Nov 8, 2010, 4:05:22 AM11/8/10
to hindian...@googlegroups.com
जब विशेषज्ञों ने नियम बना ही दिया तो मानना ही पड़ेगा । अन्यथा मेरी  समझ में ऐसा करने का औचित्य समझ में नहीं आता । जब ’गया’ को ’गआ’ कहना ठीक नहीं समझा गया तो ’गयी/गये’ को ’गई/गए’ लिखने की कौन-सी विवशता आ गई ? हो सकता है कि टाइपिंग मैं थोड़ा - बहुत थोड़ा - समय बच जाए। परंतु इतने भर के लिए वर्तनी बदलना मुझे उचित नहीं लगता । 
क्रियापदों से इतर के लिए स्थिति ठीक कही जाएगी, यदि रुपया का रुपये आदि यथावत्‌ प्रयुक्त होते रहें ।
मैं व्यक्तिगत तौर पर ’गयी’ पसंद करता हूं, फ़िर भी लिखता ’गई’ हूं । -योगेन्द्र जोशी

८ नवम्बर २०१० ९:४२ पूर्वाह्न को, Vijay K. Malhotra <malho...@gmail.com> ने लिखा:

सुयश सुप्रभ

unread,
Nov 22, 2010, 7:09:55 AM11/22/10
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
विजय जी,

मैंने इस साल अप्रैल में मानक हिंदी वर्तनी से संबंधित कुछ सुझाव दिए थे।
आपने उस समय भी प्रो. जगन्नाथन् से इन सुझावों पर अपनी राय देने का
अनुरोध किया था। मैं महीनों से उनके संदेश की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। शायद
समयाभाव या किसी अन्य कारण से वे मानक वर्तनी से संबंधित चर्चा में भाग
नहीं ले पा रहे हैं।

हमें श्रुतिमूलक 'य' के संदर्भ में 'रुपए', 'जरिए' जैसी वर्तनियों पर
ध्यान देना होगा। इन दिनों 'नए', 'नई' आदि वर्तनियों का भी प्रयोग होता
है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 'रुपए', 'जरिए' आदि में 'ये' के बदले
'ए' का तो प्रयोग होता है लेकिन 'साए' को अधिकतर लेखक 'साये' ही लिखते
हैं। श्रुतिमूलक 'य' के बदले 'ए' का प्रयोग शायद अभी किसी ठोस नियम या
प्रवृत्ति का रूप नहीं ले पाया है। मैं वर्तनी की इस प्रवृत्ति के संदर्भ
में आपकी और अन्य सदस्यों की राय जानना चाहता हूँ।

अगर 'रुपए', 'जरिए' आदि वर्तनियों के प्रयोग को मान्यता मिल गई है तो
केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा निर्धारित निम्नलिखित नियम की
प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है :

"(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे
छोड़े
नहीं जा सकते। जैसे -
पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"

अगर 'रुपये', 'नये' आदि वर्तनियों को बहुत-से लोग सही मानते हैं तो
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपर्युक्त नियम का पालन करके प्रयोजनमूलक
हिंदी में एकरूपता सुनिश्चित करने में हमें बहुत मदद मिल सकती है। मैं
श्रुतिमूलक 'य' के संदर्भ में आपकी व अन्य सदस्यों की राय जानना चाहूँगा।

सादर,

सुयश
9811711884

ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com

On Nov 8, 9:12 am, "Vijay K. Malhotra" <malhotr...@gmail.com> wrote:
> भाई जगन्नाथन् जी,
> सुयश ने निदेशालय के तत्वावधान में गठित वर्तनी सुधार समिति के अत्यंत
> महत्वपूर्ण नियम की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कुछ असंगतियों की ओर भी हमारा
> ध्यान खींचा है. आप इस समिति के माननीय सदस्य हैं. आपसे निवेदन है कि आप इस
> बारे में अपना मंतव्य रखें ताकि प्रबुद्ध हिंदी अनुवादक भी उस पर अपनी बेबाक
> राय आपके सामने रख सकें.
> सादर
> विजय
>

> 2010/11/8 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>

vinodji sharma

unread,
Nov 22, 2010, 8:26:28 AM11/22/10
to hindian...@googlegroups.com
सभी गुणीजनों को इस अकिंचन का नमस्कार
एक बार पहले भी मैं अपनी राय इस विषय में प्रकट कर चुका हूँ.
आज पुनः संदेश प्राप्त होने पर कहना चाहूँगा कि, हालांकि य के
स्थान पर ए का उपयोग सुविधाजनक अवश्य है, कुछ समय से
या कहिये केंद्रीय हिंदी निदेशालय के प्रोत्साहन से इस का उपयोग
बढ़ा भी है. किंतु भाषा का जो सौंदर्य इन शब्दों के मूल अक्षर य
में शोभित होता है, वह इ, ए के उपयोग से कुछ कुम्हला सा जाता
है. किंतु अब जब इ/ए ने य को प्रतिस्थापित करना शुरू कर ही
दिया है तो सुविधानुसार इसका स्वागत करना चाहिये.
 
सादर,
 
विनोद शर्मा

2010/11/22 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com>



--
Vinod Sharma
gtalk: vinodjisharma
skype:vinodjisharma

Vijay K. Malhotra

unread,
Nov 22, 2010, 10:42:15 AM11/22/10
to hindian...@googlegroups.com
प्रिय सुयश,
हो सके तो प्रो. जगन्नाथन् से 9871824742 पर बात कर लो.
विजय

2010/11/22 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com>

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Nov 22, 2010, 1:03:11 PM11/22/10
to hindian...@googlegroups.com
विनोद जी, 

केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के संदर्भ में इस साल अपनी दो पुस्तिकाओं में जिन नियमों का उल्लेख किया है उन्हें मैं कालक्रमानुसार नीचे उद्धृत कर रहा हूँ :

(I) "2.13 श्रुतिमूलक 'य', 'व' (पहली पुस्तिका से)

2.13.1 जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया जाए, अर्थात् किए : किये, नई : नयी, हुआ : हुवा आदि में से पहले (स्वरात्मक) रूपों का प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय आदि सभी रूपों और स्थितियों में लागू माना जाए। जैसे :– दिखाए गए, राम के लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली आदि।

2.13.2 जहाँ 'य' श्रुतिमूलक व्याकरणिक परिवर्तन न होकर शब्द का ही मूल तत्व हो वहाँ वैकल्पिक श्रुतिमूलक स्वरात्मक परिवर्तन करने की आवश्‍यकता नहीं है। जैसे :– स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि (अर्थात् यहाँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीं लिखा जाएगा)।"


(II) "5. श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के शब्द (दूसरी पुस्तिका से)


(i) श्रुतिमूलक 'य' और 'व' का प्रयोग क्रिया रूपों में होता है। क्रिया
रूप इस तरह से बनेंगे -

आया आए, आई आईं

(हुवा...) हुआ हुए हुई हुईं

(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे छोड़े
नहीं जा सकते। जैसे -

पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"

'रुपए' और 'जरिए' जैसी वर्तनियों में सुविधा का तर्क अपनी जगह सही है, लेकिन इस प्रयोग को नियम का आधार देना आसान नहीं है। अगर 'रुपए' मान्य है तो 'साए' को अमान्य कैसे माना जा सकता है? हममें से कई लोग 'नए', 'रुपए' आदि वर्तनियों का प्रयोग करते हैं। अगर हम केंद्रीय हिंदी निदेशालय के नये (या नए?)नियम का पालन करें तो हमें 'नये', 'रुपये' आदि वर्तनियों का प्रयोग करना होगा। मुझे इस प्रयोग पर आपत्ति नहीं है। अगर किसी पाठ में 'जरिए' और 'साये' दोनों वर्तनियों का प्रयोग होता है तो हमें इनमें से किसी एक को सही मानना होगा। हिंदी अनुवादक समूह में इस प्रयोग पर चर्चा करने का मेरा एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम अपनी भाषा से संबंधित महत्वपूर्ण नियमों का आधे-अधूरे ढंग से पालन नहीं करें। 

किसी पाठ का संपादन करते समय हमें यह तय करना होगा कि 'रुपये (रुपए)', 'जरिये (जरिए)' आदि वर्तनियों के संदर्भ में मूल वर्तनी के 'य' और 'व' को बनाए रखना हमारे लिए आवश्यक है या नहीं। 

सादर,

सुयश
9811711884

ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com



 
2010/11/22 vinodji sharma <vinodj...@gmail.com>

सुयश सुप्रभ

unread,
Nov 22, 2010, 1:27:46 PM11/22/10
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
विजय जी,

मैं प्रो. जगन्नाथन् से अवश्य बात करूँगा। उनका मोबाइल नंबर देने के लिए
बहुत-बहुत धन्यवाद।

मुझे लगता है कि वर्तनी, व्याकरण आदि विषयों पर सामूहिक चर्चा का विशेष
महत्व होता है। इससे भाषा से संबंधित कई भ्रम दूर किए जा सकते हैं। अगर
मानकीकरण समिति के कुछ सदस्य भाषा से संबंधित मसलों पर इस समूह व अन्य
समूहों के सदस्यों से विचार-विमर्श करें तो इससे प्रयोजनमूलक हिंदी को
सुव्यवस्थित रूप देने में बहुत मदद मिलेगी।

सादर,

सुयश
9811711884


On Nov 22, 8:42 pm, "Vijay K. Malhotra" <malhotr...@gmail.com> wrote:
> प्रिय सुयश,
> हो सके तो प्रो. जगन्नाथन् से 9871824742 पर बात कर लो.
> विजय
>

> 2010/11/22 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>

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