"5. श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के शब्द
(i) श्रुतिमूलक 'य' और 'व' का प्रयोग क्रिया रूपों में होता है। क्रिया
रूप इस तरह से बनेंगे -
आया आए, आई आईं
(हुवा...) हुआ हुए हुई हुईं
(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे छोड़े
नहीं जा सकते। जैसे -
पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"
केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने इससे पहले जो नियम निर्धारित किया था उसमें
श्रुतिमूलक 'य' और 'व' के बदले 'ई' और 'ए' जैसे स्वरात्मक रूपों के
प्रयोग को केवल क्रिया रूपों तक सीमित नहीं रखा गया था। यह नियम नीचे
प्रस्तुत है :
"3.13.1 जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया
जाए, अर्थात् किए : किये, नई : नयी, हुआ : हुवा आदि में से पहले
(स्वरात्मक) रूपों का प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय
आदि सभी रूपों और स्थितियों में लागू माना जाए। जैसे :– दिखाए गए, राम के
लिए, पुस्तक लिए हुए, नई दिल्ली आदि।"
'ई' और 'ए' जैसे स्वरात्मक रूपों के प्रयोग को केवल क्रिया रूपों तक
सीमित करने पर आपकी क्या राय है? क्या आप नए, रुपए, दाएँ आदि वर्तनियों
को मानक नहीं मानते/मानती हैं?
सादर,
सुयश
9818711884
http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
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मैंने इस साल अप्रैल में मानक हिंदी वर्तनी से संबंधित कुछ सुझाव दिए थे।
आपने उस समय भी प्रो. जगन्नाथन् से इन सुझावों पर अपनी राय देने का
अनुरोध किया था। मैं महीनों से उनके संदेश की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। शायद
समयाभाव या किसी अन्य कारण से वे मानक वर्तनी से संबंधित चर्चा में भाग
नहीं ले पा रहे हैं।
हमें श्रुतिमूलक 'य' के संदर्भ में 'रुपए', 'जरिए' जैसी वर्तनियों पर
ध्यान देना होगा। इन दिनों 'नए', 'नई' आदि वर्तनियों का भी प्रयोग होता
है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 'रुपए', 'जरिए' आदि में 'ये' के बदले
'ए' का तो प्रयोग होता है लेकिन 'साए' को अधिकतर लेखक 'साये' ही लिखते
हैं। श्रुतिमूलक 'य' के बदले 'ए' का प्रयोग शायद अभी किसी ठोस नियम या
प्रवृत्ति का रूप नहीं ले पाया है। मैं वर्तनी की इस प्रवृत्ति के संदर्भ
में आपकी और अन्य सदस्यों की राय जानना चाहता हूँ।
अगर 'रुपए', 'जरिए' आदि वर्तनियों के प्रयोग को मान्यता मिल गई है तो
केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा निर्धारित निम्नलिखित नियम की
प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है :
"(ii) जिन शब्दों में मूल रूप से 'य' और 'व' शब्द के अंग हों, तो वे
छोड़े
नहीं जा सकते। जैसे -
पराया - पराये
पहिया - पहिये
रुपया - रुपये
दायाँ - दायें
करुणामय - करुणामयी
स्थायी, अव्ययीभाव आदि"
अगर 'रुपये', 'नये' आदि वर्तनियों को बहुत-से लोग सही मानते हैं तो
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपर्युक्त नियम का पालन करके प्रयोजनमूलक
हिंदी में एकरूपता सुनिश्चित करने में हमें बहुत मदद मिल सकती है। मैं
श्रुतिमूलक 'य' के संदर्भ में आपकी व अन्य सदस्यों की राय जानना चाहूँगा।
सादर,
सुयश
9811711884
ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On Nov 8, 9:12 am, "Vijay K. Malhotra" <malhotr...@gmail.com> wrote:
> भाई जगन्नाथन् जी,
> सुयश ने निदेशालय के तत्वावधान में गठित वर्तनी सुधार समिति के अत्यंत
> महत्वपूर्ण नियम की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कुछ असंगतियों की ओर भी हमारा
> ध्यान खींचा है. आप इस समिति के माननीय सदस्य हैं. आपसे निवेदन है कि आप इस
> बारे में अपना मंतव्य रखें ताकि प्रबुद्ध हिंदी अनुवादक भी उस पर अपनी बेबाक
> राय आपके सामने रख सकें.
> सादर
> विजय
>
> 2010/11/8 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>
मैं प्रो. जगन्नाथन् से अवश्य बात करूँगा। उनका मोबाइल नंबर देने के लिए
बहुत-बहुत धन्यवाद।
मुझे लगता है कि वर्तनी, व्याकरण आदि विषयों पर सामूहिक चर्चा का विशेष
महत्व होता है। इससे भाषा से संबंधित कई भ्रम दूर किए जा सकते हैं। अगर
मानकीकरण समिति के कुछ सदस्य भाषा से संबंधित मसलों पर इस समूह व अन्य
समूहों के सदस्यों से विचार-विमर्श करें तो इससे प्रयोजनमूलक हिंदी को
सुव्यवस्थित रूप देने में बहुत मदद मिलेगी।
सादर,
सुयश
9811711884
On Nov 22, 8:42 pm, "Vijay K. Malhotra" <malhotr...@gmail.com> wrote:
> प्रिय सुयश,
> हो सके तो प्रो. जगन्नाथन् से 9871824742 पर बात कर लो.
> विजय
>
> 2010/11/22 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>
> SOHNA ...
>
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