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भाषा मनुष्य की संप्रेषण - व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। भाषाविज्ञानी बताते हैं कि यह जहाँ एक ओर संप्रेषण की बहुमुखी व्यवस्था है तो दूसरी ओर सोचने-विचारने का माध्यम, तीसरी ओर भाषा ही साहित्यिक सर्जना का कलात्मक साधन है। चौथे, भाषा एक सामाजिक संस्था भी है | मनुष्य और मनुष्य को जोड़ने वाली ईकाइयों में बड़ा स्थान भाषा का भी है | यह भी रोचक है कि जितने भी कारक मनुष्य और मनुष्य को जोड़ने वाले हैं, वे ही सभी कारक दूराने/अलगाने वाले भी हैं ( यदि उनका प्रयोग सावधानीपूर्वक न किया जाए ) | भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा राजनैतिक विवाद का स्थाई मुद्दा रहती आई है - बावजूद इसके कि भाषा किसी भी राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है और व्यक्ति एवं राष्ट्र के विकास का माध्यम होती है। दुर्भाग्य रहता आया है कि भारतीयों में अपनी भाषाओं के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति ही बहुधा व्यवहार में प्रकट होती आई है | यह उदासीनता जहाँ हमारी अपनी भाषाओं के विकास और व्यवहार को अवरुद्ध करती है, वहीं ज्ञान-विज्ञान के द्वार बंद करके देश की उन्नति में भी बाधक बनती है | अपनी भाषा के प्रति सजगता, आग्रह और दृष्टि से हमारे पूरे भाषासमाज के विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसीलिए अपनी भाषा के प्रति सकारात्मक और व्यापक दृष्टिकोण अपनाए बिना न तो हमारा सामाजिक विकास संभव है न ही मानसिक। व्यक्ति अपनी भाषा के माध्यम से ही अपने समाज का निर्माण करता है और उसी के माध्यम से परम्परा से सम्बद्ध होकर अपना व अपने समाज का भविष्य तय करता है | यह सही है कि आततायियों ने भारत के साहित्य, कला, संस्कृति एवं पारंपरिक ज्ञान- विज्ञान को विनष्ट और ध्वस्त करके इसकी चिन्तन परम्परा को बाधित व खंडित किया किन्तु यह भी सही है कि स्वतन्त्र भारत को समृद्ध, सशक्त, गरिमामय, समर्थ और अग्रणी बनाने के लिए, स्वतंत्रता को स्थाई और सुनिश्चित बनाए रखने के लिए और आधुनिक विश्व बाजार में अपनी पकड़, पैठ व सामर्थ्य सिद्ध करने के लिए देश की अपनी भाषाओं के माध्यम से ही व्यक्ति - व्यक्ति की ऊर्जा की संतुलित और सम्पूर्ण भागीदारी संभव होगी | लगभग २० राष्ट्रीय भाषाओं वाले देश के लिए कार्य के स्तर पर इसे साध पाना कोई बड़ी चुनौती नहीं है किन्तु हमारी अपनी मानसिकता में बसी उदासीनता के चलते यह लगभग दुष्कर-सा प्रमाणित होता आया है | हम भाषा का प्रयोग अभिव्यक्ति, सम्प्रेषण अथवा उसके प्रति आग्रह की भावना से करने की अपेक्षा आवश्यकता ( और कभी कभी तो स्वार्थ ) से प्रेरित होकर करने लगे हैं | वह ज्ञान-विज्ञान की वाहिका न बनकर मात्र अर्थोपार्जन की बलि चढ़ गई | जब भाषाप्रयोग का उद्देश्य सम्प्रेषण व अभिव्यक्ति से इतर मात्र अर्थोपार्जन या प्रतिष्ठा का प्रश्न जैसा बन गया तो सहज ही था कि उस भाषासमाज में असंवाद की स्थितियाँ उत्पन्न हो गईं | मनुष्य के एकाकी होते चले जाने वाले आधुनिक समय में तकनीक का विकास मानो चरम पर है | इन सारी आधुनिक सुविधाओं व संसाधनों के मध्य, पारस्परिकता की सहज मानवीय अपेक्षा के चलते अपने अपने भाषासमाज के प्रयोक्ताओं से संवाद स्थापित करने की आवश्यकता स्वतः ही रेखांकित हो जाती है | दूसरे, वैश्वीकरण, ग्लोबलाईजेशन या विश्वग्राम की सभ्यता के इस युग में वही टिका रहेगा जो जितना समर्थ होगा .... सामर्थ्य को प्रमाणित करेगा | जो ऐसा न कर पाया, वह भाषासमाज पिछड़ जाएगा | जब तक देश के साधारण व्यक्ति तक उसकी अपनी भाषा में सूचनाक्रान्ति के लाभ न पहुँचेंगे तब तक उससे वाणिज्यिक, आर्थिक अथवा किसी अन्य सम्बद्ध क्षेत्र की उन्नति में भागीदारी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? कैसे वह स्वयं या अपने देश को इस वैश्वीकरण के काल में स्थिर टिकाए रख सकने में भागी बनेगा ? प्रौद्योगिकी के अधुनातन सन्दर्भों में हमारी भाषाएँ और लिपियाँ यद्यपि अपना अपना सामर्थ्य और सक्षमता प्रमाणित कर चुकी हैं पुनरपि इनके सक्षम स्वरूप को स्थापित करने का आग्रह और प्रयत्न भाषासमाज में न्यूनाधिक विचार व मीमांसा का प्रश्न है | इधर तकनीक और इंटरनेट के युग में हिन्दी का परिदृश्य कुछ कुछ निरंतर बलवती होती उस इच्छा जैसा ही है जो जितनी तीव्र होगी उतने ही अपने लिए पूर्ति के मार्ग संभव कर लेगी ; क्योंकि तकनीकी दृष्टि से अब इसमें कुछ भी असम्भाव्य जैसा नहीं रहा | समस्त तकनीकी प्रकल्प कैसे व कब संभव हुए, उनके उल्लेख को एक ओर करते हुए यदि आज का आकलन करें तो कंप्यूटर पर हिन्दी के अनुप्रयोग से जुड़ी लगभग समस्त बाधाएँ निरस्त हो चुकी हैं | कंप्यूटर निर्माण से जुड़ी विदेशी कंपनियों तक ने अब इस संसाधन को हिन्दी व भारतीय भाषाओं में कार्य करने में सहज, बोधगम्य व बिना किसी अतिरिक्त मूल्य के तैयार सौंपा है | ऐसे ऐसे उच्च तकनीक वाले समुन्नत सॉफ़्टवेयर ( यूनीकोड, मशीनी अनुवाद, ओपन ट्रू टाईप फ़ॉन्ट्स, ग्राफिक यूज़र इंटरफ़ेस, ओ सी आर, प्रेडिक्टिव टेक्स्ट इनपुट, ऑफिस सूट, टेक्स्ट टू स्पीच, सर्च इंजन, ट्रांसलेटड सर्च, लिप्यन्तरण, स्पेल चेकर, ब्राउजर व ऑपरेटिंग सिस्टम में भाषा-चयन की सुविधा, सोशल नेट्वर्किंग तक में भाषा चयन की सुविधा आदि ) नि:शुल्क संभव हो गए हैं कि बस कहीं भी कभी भी हाथ में लैपटॉप या कंप्यूटर आए और बस बच्चा भी तत्परता से झट हिन्दी में काम कर सकता है | किन्तु खेद का विषय है कि समस्त संसाधनों से युक्त, हिन्दी-भाषासमाज के प्रयोक्ता ही अभी अपने नेट के क्रियाकलापों में हिन्दी के प्रयोग से अचकचाते हैं | संसाधन की दृष्टि से भाषायी कम्प्यूटिंग को संभव व प्रचारित करने की मुख्य दो चुनौतियाँ थीं | पहली यह कि तकनीक सरल, सुबोध, सुग्राह्य और सुलभ हो ( जितने अधिक प्रयोक्ता होते उतना ही यह अधिक संभव होता ) तथा दूसरी यह कि अधिकाधिक लोग (अपितु समूचा भाषासमाज) उस तकनीक का प्रयोग सुनिश्चित करें | किसी भी प्रौद्योगिकी के बने रहने की अनिवार्यता उसके विस्तार में निहित रहती है | १९८३ में जब भारत में कंप्यूटर की आहट हुई तो स्वयं मैं उन दिनों पिलानी में ही थी, पतिदेव प्रिंस्टन वि.वि. में एक मैथेमैटिकल मॉडल ईस्वी सन १९७९ में ही कंप्यूटर के लिए बना कर ख्याति पा चुके थे | इस प्रकार बहुत पहले यह सुन-जान लिया था कि विशेषज्ञ देवनागरी को कंप्यूटर के सर्वाधिक अनुकूल बताते हैं | परन्तु सदा से यह जिज्ञासा मन में बनी रहती थी कि तब कोई इसे संभव करता क्यों नहीं | आज यह सब संभव हो चुका है | यह रेखांकित करना रोचक होगा कि आज यही सक्षम लिपि हमारी अपनी भाषाओं का निर्वहन-नियोजन इस प्रकार प्रखरता से कंप्यूटर की दुनिया में कर रही है कि मानो कोई क्षेत्र अब इस से अछूता नहीं है | आज हिन्दी में कंप्यूटर प्रयोग करने वालों के लिए अथवा हिंदी भाषासमाज के लिए कंप्यूटर के संसार में शब्दकोश, समांतर कोष, अनुवाद की सुविधा, पारिभाषिक शब्दावलियाँ, लिप्यन्तरण की सुविधा, यूनीकोड (इनस्क्रिप्ट/ फोनेटिक/ रेमिंगटन, ऑनलाईन / ऑफलाइन ), यूनीकोड से पूर्व के लगभग प्रत्येक फॉण्ट के लिए और उर्दू >देवनागरी>उर्दू अथवा बर्मी >देवनागरी>बर्मी इत्यादि जैसे भी) फॉण्ट परिवर्तक (कन्वर्टर), ब्लॉग संकलक (एग्रेगेटर), दृष्टिबाधितों के लिए देवनागरी में तकनीकी सुविधाएँ (यूनिकोड से ब्रेल > यूनीकोड रूपांतरण), हिन्दी के लगभग सभी समाचार पत्र, हिन्दी की लगभग सभी बड़ी पत्र-पत्रिकाएँ, चर्चा समूह/ डिस्कशन-फोरम, हिन्दी में विकीपीडिया, साहित्य का अद्भुत संग्रह ( महात्मा गाँधी अ.हि.वि.वि. द्वारा अकूत साहित्य तथा कविताकोश द्वारा अमीरखुसरो से अद्यतन लगभग ४० हजार कविताओं का संचयन, व्यक्तिगत प्रयासों व नेट पत्रिकाओं का इनसे अतिरिक्त), ट्रांसलेटड सर्च व ट्रांसलिट्रेटेड सर्च सुविधा, वाचांतर, वर्तनी शुद्धिकरण यन्त्र, ऑनलाइन पुस्तकालय, लगभग २० हजार स्वतन्त्र निश्शुल्क ब्लॉग ( जिनमें विज्ञान, साहित्य, गणित, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, भौतिकी, इतिहास, खगोलशास्त्र से लेकर बच्चों के विषय, पाककला व कामशास्त्र तक पर धड़ल्ले से खूब लिखा जा रहा है), मुहावराकोष तथा अत्यंत दुर्लभ पुस्तकों की पूरी की पूरी स्कैन प्रतियाँ, नए प्रकाशनों की जानकारी, देश विदेश में इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी पुस्तकों की खरीद की व्यवस्था, हिन्दी में विज्ञापन जैसी अनेक सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं | ... और आश्चर्य की बात यह भी है कि लगभग ये सभी नि:शुल्क हैं | मात्र स्पीच टू टेक्स्ट की सुविधा सशुल्क होने के अतिरिक्त सब खुला उपलब्ध है | प्रयोक्ता, क्षेत्र और परिवेश के अनुसार भाषाप्रयोग में भिन्नता के नए रोचक तथ्य संकलित करने हों तो किसी सोशल नेट्वर्किंग साईट ( यथा फेसबुक आदि ) पर हो रहे भाषा प्रयोगों पर दृष्टि दौड़ाई जा सकती है | द्विभाषिकता, बहुभाषिकता, कोड मिश्रण, कोड परिवर्तन, पिजिन, क्रियोल, भाषाद्वैत जैसी प्रक्रियाओं के उदाहरण दीखने लग सकते हैं | अर्थात् , अभिप्राय यह है कि आज किसी प्रकार की कोई बाधा, नेट के प्रयोक्ताओं को हिन्दी कम्प्यूटिंग के मार्ग में नहीं है | इस सारे खुले ख़जाने के होते हुए भी यदि अपनी भाषाओं में काम न करने या न कर सकने का राग अलापा जाए तो वह किसी छद्म से बढ़ कर नहीं है | भले अभिव्यक्ति के लिए, सरलता के लिए , वैचारिक आदान -प्रदान के लिए, आत्मप्रचार से लेकर व्यापक सैद्धांतिकी के प्रचार हेतु, संस्कृति, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान के प्रति सन्नद्धता वश, सामाजिकता / नेट्वर्किंग, बाजार के लाभ, भाषाई अस्मिता, आग्रह और प्रतिबद्धता / अपनी भाषाओं लिपियों को मान्यता देने दिलाने के संकल्पवश, साधारण सामान्य व्यक्ति के सशक्तीकरण / जनजागृति अथवा भारतीय अर्थव्यवस्था में भागीदारी के उद्देश्य आदि से ; किन्तु किसी भी प्रकार हो, अब भाषायी कम्प्यूटिंग की दिशा में, कर्तव्य समझ कर सभी को योगदान देना है | कम-से-कम और कुछ नहीं तो एक प्रयोक्ता की संख्या में अभिवृद्धि ही होगी, जिस से हिन्दी का बाजार बनता देख बड़ी कम्पनियाँ नए - नए संसाधन विकसित करने को प्रेरित होंगी, क्योंकि वैश्वीकरण के इस काल में भारत का जो बड़ा बाजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दृष्टि में है उस पर कब्जा करने के लिए उन्हें हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना अपरिहार्य है। ....... और हमारे लिए भाषा, साहित्य और संस्कृति के त्रिक की साधना | - (डॉ.) कविता वाचक्नवी |