एक सज्जन ने हिंदी में नुक्ते का प्रयोग करना बंद कर दिया। लोगों ने उनकी
भाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि नुक्ते के प्रयोग के बिना ज़लील और जलील
में अंतर करना कैसे संभव होगा।
लोगों के कहने पर उन्होंने दुबारा नुक्ते का प्रयोग करना शुरू किया। अब
मानक हिंदी वर्तनी के नियम बनाने वालों ने उनसे कहा कि हिंदी में 'क' और
'ग' में नुक्ता लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें यह बात तर्कसंगत
भी लगी कि किताब, किस्सा, किस्मत, गलत आदि शब्दों में नुक्ता लगाने के
लिए हमेशा एक उर्दू शब्दकोश अपने पास रखना हर किसी के लिए संभव नहीं
होगा। मानक वर्तनी के नियमों की पुस्तिका में यह लिखा है कि हिंदी में
केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता लगाना चाहिए। अब उस सज्जन ने केवल 'ज' और 'फ'
में नुक्ता लगाना शुरू कर दिया।
लेकिन नुक्ते पर होने वाली नुक्ताचीनी ने भी इस सज्जन का पीछा नहीं
छोड़ने की कसम खा ली थी। अब लोगों ने उन्हें यह कहना शुरू कर दिया कि
केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता नहीं लगाना चाहिए। उन लोगों ने कहा कि 'ख' और
'ग' से ऐसी क्या दुश्मनी है कि इनमें नुक्ता नहीं लगाया जाए। उन लोगों का
यह मानना था कि 'क' में नुक्ता लगाने की आवश्यकता भले न हो लेकिन 'ख' और
'ग' में तो नुक्ता लगाना चाहिए।
इस सज्जन की कहानी बड़ी लंबी है। उन्होंने नुक्ता लगाने या न लगाने के
सवाल से जूझते हुए ही इस दुनिया से विदा ले ली! अब यह स्पष्ट कर दूँ कि
नुक्ते के प्रयोग की जटिलता को स्पष्ट करने के लिए मुझे इस काल्पनिक
कहानी के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझा!
अधिकतर लोग हिंदी में या तो नुक्ता लगाते ही नहीं है या केवल 'फ' और 'ज'
में इसका प्रयोग करते हैं। लेकिन दोनों मामलों में उन्हें गलत ठहराने
वाले लोगों की कमी नहीं है। जो लोग केवल 'ज' और 'फ में नुक्ता लगाते हैं
उन्हें गजल जैसे शब्द में 'ग' में नुक्ता नहीं लगाने से पहले दस बार
सोचना पड़ता है। सारांश यह है कि आप कुछ भी कर लें, नुक्ते पर नुक्ताचीनी
से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है!
आशा है कि आप इस विषय पर हमें अपने विचार से अवगत कराएँगे। कृपया
निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें और यह बताएँ कि आप हिंदी में नुक्ते का
प्रयोग करते हैं या नहीं :
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
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हिंदी पूरी तरह से उच्चारण-केंद्रित भाषा है, हर अक्षर का एक अलग उच्चारण है। इसलिए
किताब (बिना नुक्ते के लिख कर) को बिना नुक्ते के उच्चारण करके हमने हिंदी में एक नया
शब्द उत्पन्न कर दिया जो हिंदी में पहले नहीं था। और यदि किताब (बिना नुक्ते के लिख
कर) को हम "नुक्ते के साथ" उच्चारण करते हैं, तो हम क को नुक्ते के साथ और बिना नुक्ते के
दो तरह से उच्चारण करेंगे जो कि हिंदी के मौलिक सिद्धांत के विरुद्ध होगा और फिर तो
भाषा चूँ चूँ का मुरब्बा बन जाएगी।
मैं जिस अक्षर के नुक्ते और बिना नुक्ते के स्वरूप में अंतर जानता हूँ उनके नुक्ते वाले उच्चारण
सदैव नुक्ते के साथ लिख कर प्रयोग करता हूँ। सच कहूँ तो मुझे इसको ऐसे लिखने और उच्चारण
करने में अच्छा लगता है।
फिर अगली समस्या आती है कि उर्दू अरबी में चार ज़ हैं जिनको उनकी लिपि में अलग अलग
संकेत से लिखा जाता है, परंतु मुझे उनके उच्चारणों में अंतर नहीं मालूम है, वैसे भी हम उन
सभी को एक ही नुक्ते वाले ज़ से लिखते हैं। यह भी तकनीकी रूप से ग़लत है क्योंकि यदि उर्दू
अरबी में अक्षर अलग है तो उसका उच्चारण भी अलग होगा और फिर तो उसके लिखने के लिए
हिंदी में भी चार तरह के नुक्तों वाले चार ज़ के अक्षर होने चाहिएँ। ऐसा भी किया जा
सकता है। जब यूनीकोड ने विश्व की सभी भाषाओं के अक्षरों का वृहद समुच्चय बना लिया है,
तो हम हिंदी और उर्दू का (और अरबी का) एक वृहद समुच्चय तो बना ही सकते हैं। कमी है
तो बस लगन की, लोगों को कमियाँ निकालना पसंद आता है, कमियों को दूर करना नहीं।
वैसे ऐसा मराठी के लिए किया जा चुका है कि मराठी में केवल एक ळ अक्षर अलग होता था
बाकी सभी कुछ हिन्दी (देवनागरी) का ही है, इसलिए हिंदी में ळ जोड़ कर इसी समुच्चय
को हिंदी, मराठी और संस्कृत तीनों भाषाओं के लिए सभी प्रयोग कर रहे हैं और किसी को
शिक़ायत नहीं है (राज ठाकरों जैसों के अलावा)।
ऐसा ही सभी भारतीय भाषाओं के लिए किया जाना है जिससे सभी भारतीय भाषाओं के
अक्षरों में 1-1 तदनुसारी (correspondence) रहे।
और ऐसा करने के लिए सबसे पहले तो उर्दू में अनेकों अक्षर जोड़ने पड़ेंगे जिससे उर्दू में सभी
भारतीय भाषाओं के लिए एक एक अक्षर हो जाए, लेकिन फिर मुल्ला दुछत्ती पर चढ़ कर
चिल्लाएँगे कि हिंदू इस्लाम को बिगाड़ रहे हैं।
--
रावत
> सवाल यह भी है कि दूसरी भाषाओं से लिए गए शब्दों को हम किस रूप में स्वीकार करें. आपका
> दिया उदाहरण "जंगल" याद आता है, जिसका बहुवचन अंग्रेज़ी में जंगल्स किया जाता है, जंगलों
> नहीं. जब हम जरूरत, जोर और खासियत को हिंदी के शब्द मानने लगेंगें, हमें नुक्ताचीनी करने
> की आवश्यकता नहीं रहेगी. गूगल के लिए अनुवाद करते समय यह तर्क मैंने दिया था, लेकिन
> स्वीकार नहीं किया गया, फिर यह तय हुआ कि ज़ और फ़ की ध्वनियों के लिए नुक्ता लगेगा और
> क, ख, ग के साथ नहीं. बस तब से अपने दफ्तर के काम में इसी तरह नुक्ताचीनी कर रहा हूं.
उर्दू अरबी में चार ज हैं, जिनके यूनिक उच्चारण होने चाहिएँ। फिर तो हम उन चारों ज़ को
एक ही ज़ से लिख कर भी ग़लती ही कर रहे हैं।
रावत
>
> आपका,
> यशवंत
>
> 2010/3/25 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com
> <mailto:translate...@gmail.com>>
> <mailto:hindian...@googlegroups.com> को ईमेल भेजें.
> इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए,
> hindianuvaada...@googlegroups.com
> <mailto:hindianuvaadak%2Bunsu...@googlegroups.com> को ईमेल करें.
नुक्ते का सवाल सचमुच बहुत उलझा हुआ है। अखबारों में इसका अधकचरा प्रयोग
करने से बेहतर है कि इसे किसी शब्द में नहीं लगाया जाए। प्रसिद्ध पत्रकार
और लेखक राज किशोर भी इसके प्रयोग को अनावश्यक मानते हैं। लेकिन प्रो.
सूरजभान सिंह जैसे भाषाविद 'फ' और 'ज' में नुक्ता लगाते हैं। इस तरह हम
देखते हैं कि विद्वानों में भी इसके प्रयोग पर मतैक्य नहीं है। समस्या तो
यह है कि अभी तक केवल 'फ' और 'ज' में नुक्ते के प्रयोग को भी हिंदी
समुदाय ने स्वीकार नहीं किया है।
अगर आप नुक्ता नहीं लगाते हैं तो लोग नुक्ता लगाने को कहते हैं और अगर
लगाते हैं तो वे इसे हटाने को कहते हैं!
मुझे लगता है कि हमें संदर्भ को ध्यान में रखकर नुक्ते का प्रयोग करना
चाहिए। अगर हमें पहले से नुक्ता लगाने या नहीं लगाने का निर्देश मिल जाए
तो इससे हमारा काम आसान हो सकता है। लेकिन बाज़ार के काम करने का तरीका
कैसा है यह तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं। अधिकतर एजेंसियों को केवल
डेडलाइन की चिंता होती है, भले ही अनुवादक इस चक्कर में 'डेड' हो जाए!
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On 26 मार्च, 01:25, V S Rawat <vsra...@gmail.com> wrote:
> On 3/26/2010 12:37 AM India Time, _Yashwant Gehlot_ wrote:
>
> > सवाल यह भी है कि दूसरी भाषाओं से लिए गए शब्दों को हम किस रूप में स्वीकार करें. आपका
> > दिया उदाहरण "जंगल" याद आता है, जिसका बहुवचन अंग्रेज़ी में जंगल्स किया जाता है, जंगलों
> > नहीं. जब हम जरूरत, जोर और खासियत को हिंदी के शब्द मानने लगेंगें, हमें नुक्ताचीनी करने
> > की आवश्यकता नहीं रहेगी. गूगल के लिए अनुवाद करते समय यह तर्क मैंने दिया था, लेकिन
> > स्वीकार नहीं किया गया, फिर यह तय हुआ कि ज़ और फ़ की ध्वनियों के लिए नुक्ता लगेगा और
> > क, ख, ग के साथ नहीं. बस तब से अपने दफ्तर के काम में इसी तरह नुक्ताचीनी कर रहा हूं.
>
> उर्दू अरबी में चार ज हैं, जिनके यूनिक उच्चारण होने चाहिएँ। फिर तो हम उन चारों ज़ को
> एक ही ज़ से लिख कर भी ग़लती ही कर रहे हैं।
>
> रावत
>
>
>
>
>
> > आपका,
> > यशवंत
>
> > 2010/3/25 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com
> > <mailto:translatedbysuy...@gmail.com>>
> > और विकल्पों के लिए,http://groups.google.com/group/hindianuvaadak?hl=hi
> इस सवाल पर थोड़ा और चिंतन ज़रूरी है, ताकि किसी सहमति पर पहुँच सकें .
> पहला सवाल यह है कि हिंदी में नुकते का इस्तेमाल कब से शुरू हुआ ?
> दूसरा सवाल यह, कि यह कहाँ से शुरू हुआ ?
> मेरा मतलब है कि अरबी, फारसी, या कहीं और से, -शायद उर्दू, या दक्षिण भारतीय भाषाओं से ?
जब मुस्लिम भारत आए तो भारत के ह-अंत ध्वनि वाले अक्षरों (ख,घ, छ,झ आदि) के लिए
उनकी अरबी भाषा में कोई अक्षर नहीं था इसलिए उनको अरबी में भारतीय शब्दों, नामों
को लिखने में समस्या आई जिससे अमीर खुसरो ने उपरोक्त अक्षरों से पिछले वाले अक्षरो (क
ग, च, ज आदि) के अरबी अक्षर में एक अन्य अरबी अक्षर दोचश्मी अक्षर को लगा कर उसको
इन अक्षरों का उच्चारण दिया जिस भाषा को उर्दू कहा गया। इसलिए उर्दू का पूरा
प्रयोजन ही अरबी और भारतीय भाषाओं का समुच्चय बनाना था।
इसी तरह से अरबी के कुछ अक्षर भारतीय भाषाओं में नहीं थे, जिन अक्षरों पर एक बिंदु अलग
अलग स्थानों पर लगा रहता था, जिसे नुक्ता कहते थे, तो लगभग समान उच्चारण वाले
भारतीय अक्षरों के नीचे एक बिंदु (नुक्ता) लगा कर उन अरबी अक्षरों का उच्चारण दिया
गया। अब यह मुझे ज्ञात नहीं है कि क्या यह भी अमीर खुसरों ने उर्दू इजाद करने में ही
किया या किस अन्य ने कब किया।
> तीसरा सवाल यह है, कि हिन्दी (देवनागरी) लिपि के 'यथालिखित-तथापठित' स्वरूप के
> सन्दर्भ में यह कितना अपरिहार्य है?
> क्योंकि अगर हम उन लफ़्ज़ों को बोली जानेवाली हिन्दी में स्वीकार करें, जिनके साथ 'नुकता '
> लगाया जाता है, तो उक्त स्थिति
> के अंतर्गत उन्हें लिखित-हिंदी में स्थान दिया जाना ज़रूरी होगा,
यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। हिन्दी (देवनागरी) लिपि का 'यथालिखित-तथापठित' स्वरूप
है, इसलिए एक ही क को काल में बिना नुक्ते के और किताब में नुक्ते के साथ उच्चारण करना
भाषा के मौलित सिद्धांत को गड़बड़ कर देगा। सभी नुक्ते वाले अक्षरों को भारतीय भाषाओं
में लाया जाना चाहिए।
वैसे तो अरबी में अन्य अक्षर भी है जिनका मिलता जुलता उच्चारण है, जैसे अरबी में अलिफ़ के
अलावा एक और अ भी होता है जिसके लिए भी हिन्दी में एक नुक्ते वाला अ आना चाहिए।
> चौथा सवाल यह है कि क्या हिन्दी के ऐसे शब्दों का एक मानक शब्द-कोष नहीं बनाया जाना
> चाहिए, जिनमें नुकते के प्रयोग के बारे
> में दुविधा होती है ?
बिल्कुल बनाना चाहिए।
> पाँचवाँ सवाल जो आज की स्थिति में ज़्यादा प्रासंगिक है, वह यह है कि विभिन्न
> हिंदी-देवनागरी के फ़ॉन्ट्स पर इसका क्या प्रभाव पडेगा ?
प्रभाव यह पड़ेगा कि अक्षरों की संख्या बहुत बढ़ जाएगी, लेकिन यह करना तो पड़ेगा ही।
नए अक्षरों और उन अक्षरों वाले शब्दों को आने से भाषा समृद्ध ही होगी। और बच्चे जब
बचपन से उन अक्षरों का उच्चारण कर सकेंगे तो वो उनके प्रयोग में सरलता अनुभव करेंगे,
जबकि मैं खुद बताऊ कि मुझे मराठी के ळ का उच्चारण सीखने में ही सालोंसाल लग गए थे
क्योंकि बचपन से यह ध्वनि मेरी ज़बान पर चढ़ी हुई नहीं थी।
> यह सवाल तो और भी जटिल है, क्योंकि अभी तो इसमें भी कई दूसरे सवाल हमारे सामने हैं
> .इनके जवाब तो तकनीक के विशेषज्ञ ही दे सकेंगे .
> कुल मिलाकर, इस बारे में बहुत कुछ किया जाना बाकी है .
> सादर,
> विनय.
धन्यवाद
रावत
>
> 2010/3/26 सुयश सुप्रभ <translate...@gmail.com
> <mailto:translate...@gmail.com>>
>
> रेडियो और टीवी चैनलों के लिए काम करने वालों को 'ज्यादा' और 'ज़्यादा'
> जैसे शब्दों में अंतर करना होता है। उनके लिए नुक्ता लगभग अनिवार्य है।
> इसके बिना वे शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर सकते हैं।
>
> नुक्ते का सवाल सचमुच बहुत उलझा हुआ है। अखबारों में इसका अधकचरा प्रयोग
> करने से बेहतर है कि इसे किसी शब्द में नहीं लगाया जाए। प्रसिद्ध पत्रकार
> और लेखक राज किशोर भी इसके प्रयोग को अनावश्यक मानते हैं। लेकिन प्रो.
> सूरजभान सिंह जैसे भाषाविद 'फ' और 'ज' में नुक्ता लगाते हैं। इस तरह हम
> देखते हैं कि विद्वानों में भी इसके प्रयोग पर मतैक्य नहीं है। समस्या तो
> यह है कि अभी तक केवल 'फ' और 'ज' में नुक्ते के प्रयोग को भी हिंदी
> समुदाय ने स्वीकार नहीं किया है।
>
> अगर आप नुक्ता नहीं लगाते हैं तो लोग नुक्ता लगाने को कहते हैं और अगर
> लगाते हैं तो वे इसे हटाने को कहते हैं!
>
> मुझे लगता है कि हमें संदर्भ को ध्यान में रखकर नुक्ते का प्रयोग करना
> चाहिए। अगर हमें पहले से नुक्ता लगाने या नहीं लगाने का निर्देश मिल जाए
> तो इससे हमारा काम आसान हो सकता है। लेकिन बाज़ार के काम करने का तरीका
> कैसा है यह तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं। अधिकतर एजेंसियों को केवल
> डेडलाइन की चिंता होती है, भले ही अनुवादक इस चक्कर में 'डेड' हो जाए!
>
> सादर,
>
> सुयश
> 9811711884
>
> अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
>
>
> On 26 मार्च, 01:25, V S Rawat <vsra...@gmail.com
> <mailto:vsra...@gmail.com>> wrote:
> > On 3/26/2010 12:37 AM India Time, _Yashwant Gehlot_ wrote:
> >
> > > सवाल यह भी है कि दूसरी भाषाओं से लिए गए शब्दों को हम किस रूप में स्वीकार
> करें. आपका
> > > दिया उदाहरण "जंगल" याद आता है, जिसका बहुवचन अंग्रेज़ी में जंगल्स किया जाता
> है, जंगलों
> > > नहीं. जब हम जरूरत, जोर और खासियत को हिंदी के शब्द मानने लगेंगें, हमें
> नुक्ताचीनी करने
> > > की आवश्यकता नहीं रहेगी. गूगल के लिए अनुवाद करते समय यह तर्क मैंने दिया था,
> लेकिन
> > > स्वीकार नहीं किया गया, फिर यह तय हुआ कि ज़ और फ़ की ध्वनियों के लिए
> नुक्ता लगेगा और
> > > क, ख, ग के साथ नहीं. बस तब से अपने दफ्तर के काम में इसी तरह नुक्ताचीनी कर
> रहा हूं.
> >
> > उर्दू अरबी में चार ज हैं, जिनके यूनिक उच्चारण होने चाहिएँ। फिर तो हम उन चारों
> ज़ को
> > एक ही ज़ से लिख कर भी ग़लती ही कर रहे हैं।
> >
> > रावत
> >
> >
> >
> >
> >
> > > आपका,
> > > यशवंत
> >
> > > 2010/3/25 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com
> <mailto:translatedbysuy...@gmail.com>
> > > <mailto:translatedbysuy...@gmail.com
> > > <mailto:hindian...@googlegroups.com
> <mailto:hindian...@googlegroups.com>> को ईमेल भेजें.
> > > इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए,
> > > hindianuvaada...@googlegroups.com
> <mailto:hindianuvaadak%2Bunsu...@googlegroups.com>
> > > <mailto:hindianuvaadak%2Bunsu...@googlegroups.com
> <mailto:hindianuvaadak%252Buns...@googlegroups.com>> को ईमेल करें.
इस समूह में पोस्ट करने के लिए, hindian...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/hindianuvaadak?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.
इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, hindianuvaada...@googlegroups.com को ईमेल करें.
1. हिंदी में नुक्ते का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
2. केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ते का प्रयोग होना चाहिए।
3. 'ख', 'ग', 'ज' और 'फ' में नुक्ते का प्रयोग होना चाहिए।
4. 'क', 'ख', 'ग', 'ज' और 'फ' में नुक्ते का प्रयोग होना चाहिए।
आप केवल 'पहला विकल्प', 'दूसरा विकल्प', 'तीसरा विकल्प' या 'चौथा विकल्प'
लिखकर भी हमें अपने विचार से अवगत करा सकते हैं।
किसी भी नियम की सफलता उसकी स्वीकार्यता से निर्धारित होती है। उपर्युक्त
विकल्पों में से दूसरा विकल्प भी तभी सार्थक सिद्ध होगा जब हिंदी समुदाय
इसे स्वीकार करेगा। मानक हिंदी वर्तनी के नियमों की पुस्तिका में दूसरा
विकल्प चुना गया है। हमें केंद्रीय हिंदी संस्थान व अन्य संस्थाओं से यह
सवाल करना चाहिए कि उन्होंने आज तक मानक वर्तनी की जानकारी देने के लिए
कोई वेबसाइट क्यों नहीं बनाई है। जब लोग नियम ही नहीं जानेंगे तो वे उसका
पालन कैसे करेंगे। अगर हमें अपनी भाषा को जीवंत (जी हाँ, जीवित और जीवंत
में अंतर होता है) बनाना है तो इसके लिए सभी हिंदी प्रेमियों को भाषा के
क्षेत्र में यथास्थिति का विरोध करना होगा और अपने स्तर पर सक्रिय होना
होगा। मैंने इंटरनेट पर मानक हिंदी वर्तनी के कुछ नियम (http://
tinyurl.com/yzf2vqu) डाले हैं, लेकिन केवल व्यक्तिगत प्रयासों से भाषा
का भला नहीं होता है।
सादर,
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On 26 मार्च, 21:08, Vinay Vaidya <vinayvaidya...@gmail.com> wrote:
> रावत साहब,
> आपका उत्तर पढ़कर मुंह से बरबस '' वाह ! " निकल पड़ा .
> शुक्रिया.
>
> 2010/3/26 V S Rawat <vsra...@gmail.com>
>
>
>
> > On 3/26/2010 6:05 PM India Time, _Vinay Vaidya_ wrote:
>
> > इस सवाल पर थोड़ा और चिंतन ज़रूरी है, ताकि किसी सहमति पर पहुँच सकें .
>
> > पहला सवाल यह है कि हिंदी में नुकते का इस्तेमाल कब से शुरू हुआ ?
> >> दूसरा सवाल यह, कि यह कहाँ से शुरू हुआ ?
> >> मेरा मतलब है कि अरबी, फारसी, या कहीं और से, -शायद उर्दू, या दक्षिण भारतीय
> >> भाषाओं से ?
>
> > जब मुस्लिम भारत आए तो भारत के ह-अंत ध्वनि वाले अक्षरों (ख,घ, छ,झ आदि) के
> > लिए उनकी अरबी भाषा में कोई अक्षर नहीं था इसलिए उनको अरबी में भारतीय शब्दों,
> > नामों को लिखने में समस्या आई जिससे अमीर खुसरो ने उपरोक्त अक्षरों से पिछले
> > वाले अक्षरो (क ग, च, ज आदि) के अरबी अक्षर में एक अन्य अरबी अक्षर दोचश्मी
> > अक्षर को लगा कर उसको इन अक्षरों का उच्चारण दिया जिस भाषा को उर्दू कहा गया।
> > इसलिए उर्दू का पूरा प्रयोजन ही अरबी और भारतीय भाषाओं का समुच्चय बनाना था।
>
> > इसी तरह से अरबी के कुछ अक्षर भारतीय भाषाओं में नहीं थे, जिन अक्षरों पर एक
> > बिंदु अलग अलग स्थानों पर लगा रहता था, जिसे नुक्ता कहते थे, तो लगभग समान
> > उच्चारण वाले भारतीय अक्षरों के नीचे एक बिंदु (नुक्ता) लगा कर उन अरबी अक्षरों
> > का उच्चारण दिया गया। अब यह मुझे ज्ञात नहीं है कि क्या यह भी अमीर खुसरों ने
> > उर्दू इजाद करने में ही किया या किस अन्य ने कब किया।
>
> > तीसरा सवाल यह है, कि हिन्दी (देवनागरी) लिपि के 'यथालिखित-तथापठित' स्वरूप
> >> के
> >> सन्दर्भ में यह कितना अपरिहार्य है?
> >> क्योंकि अगर हम उन लफ़्ज़ों को बोली जानेवाली हिन्दी में स्वीकार करें, जिनके
> >> साथ 'नुकता '
> >> लगाया जाता है, तो उक्त स्थिति
> >> के अंतर्गत उन्हें लिखित-हिंदी में स्थान दिया जाना ज़रूरी होगा,
>
> > यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। हिन्दी (देवनागरी) लिपि का 'यथालिखित-तथापठित'
> > स्वरूप है, इसलिए एक ही क को काल में बिना नुक्ते के और किताब में नुक्ते के
> > साथ उच्चारण करना भाषा के मौलित सिद्धांत को गड़बड़ कर देगा। सभी नुक्ते वाले
> > अक्षरों को भारतीय भाषाओं में लाया जाना चाहिए।
>
> > वैसे तो अरबी में अन्य अक्षर भी है जिनका मिलता जुलता उच्चारण है, जैसे अरबी
> > में अलिफ़ के अलावा एक और अ भी होता है जिसके लिए भी हिन्दी में एक नुक्ते वाला
> > अ आना चाहिए।
>
> > चौथा सवाल यह है कि क्या हिन्दी के ऐसे शब्दों का एक मानक शब्द-कोष नहीं
> >> बनाया जाना
> >> चाहिए, जिनमें नुकते के प्रयोग के बारे
> >> में दुविधा होती है ?
>
> > बिल्कुल बनाना चाहिए।
>
> > पाँचवाँ सवाल जो आज की स्थिति में ज़्यादा प्रासंगिक है, वह यह है कि विभिन्न
> >> हिंदी-देवनागरी के फ़ॉन्ट्स पर इसका क्या प्रभाव पडेगा ?
>
> > प्रभाव यह पड़ेगा कि अक्षरों की संख्या बहुत बढ़ जाएगी, लेकिन यह करना तो पड़ेगा
> > ही। नए अक्षरों और उन अक्षरों वाले शब्दों को आने से भाषा समृद्ध ही होगी। और
> > बच्चे जब बचपन से उन अक्षरों का उच्चारण कर सकेंगे तो वो उनके प्रयोग में सरलता
> > अनुभव करेंगे, जबकि मैं खुद बताऊ कि मुझे मराठी के ळ का उच्चारण सीखने में ही
> > सालोंसाल लग गए थे क्योंकि बचपन से यह ध्वनि मेरी ज़बान पर चढ़ी हुई नहीं थी।
>
> > यह सवाल तो और भी जटिल है, क्योंकि अभी तो इसमें भी कई दूसरे सवाल हमारे
> >> सामने हैं
> >> .इनके जवाब तो तकनीक के विशेषज्ञ ही दे सकेंगे .
> >> कुल मिलाकर, इस बारे में बहुत कुछ किया जाना बाकी है .
> >> सादर,
> >> विनय.
>
> > धन्यवाद
> > रावत
>
> >> 2010/3/26 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com
> >> <mailto:translatedbysuy...@gmail.com>>
>
> >> रेडियो और टीवी चैनलों के लिए काम करने वालों को 'ज्यादा' और 'ज़्यादा'
> >> जैसे शब्दों में अंतर करना होता है। उनके लिए नुक्ता लगभग अनिवार्य है।
> >> इसके बिना वे शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर सकते हैं।
>
> >> नुक्ते का सवाल सचमुच बहुत उलझा हुआ है। अखबारों में इसका अधकचरा प्रयोग
> >> करने से बेहतर है कि इसे किसी शब्द में नहीं लगाया जाए। प्रसिद्ध पत्रकार
> >> और लेखक राज किशोर भी इसके प्रयोग को अनावश्यक मानते हैं। लेकिन प्रो.
> >> सूरजभान सिंह जैसे भाषाविद 'फ' और 'ज' में नुक्ता लगाते हैं। इस तरह हम
> >> देखते हैं कि विद्वानों में भी इसके प्रयोग पर मतैक्य नहीं है। समस्या तो
> >> यह है कि अभी तक केवल 'फ' और 'ज' में नुक्ते के प्रयोग को भी हिंदी
> >> समुदाय ने स्वीकार नहीं किया है।
>
> >> अगर आप नुक्ता नहीं लगाते हैं तो लोग नुक्ता लगाने को कहते हैं और अगर
> >> लगाते हैं तो वे इसे हटाने को कहते हैं!
>
> >> मुझे लगता है कि हमें संदर्भ को ध्यान में रखकर नुक्ते का प्रयोग करना
> >> चाहिए। अगर हमें पहले से नुक्ता लगाने या नहीं लगाने का निर्देश मिल जाए
> >> तो इससे हमारा काम आसान हो सकता है। लेकिन बाज़ार के काम करने का तरीका
> >> कैसा है यह तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं। अधिकतर एजेंसियों
>
> ...
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--
मुझे लगता है कि केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता लगाना अतर्कसंगत नहीं है।
हमें हिंदी में अनेक अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करना होता है और इन
शब्दों के सही उच्चारण के लिए 'फ' और 'ज' में नुक्ता लगाना आवश्यक होता
है। यही बात 'ज़्यादा' और 'ज़रूरत' जैसे शब्दों पर भी लागू होती है।
हिंदी में 'क' में नुक्ते का उच्चारण नहीं होता है। आधुनिक हिंदी लेखन
में 'ख' और 'ग' में नुक्ता नहीं लगाने की प्रवृत्ति देखी गई है।
कुछ अनुवादक केवल अंग्रेज़ी के शब्दों में नुक्ता लगाते हैं। उदाहरण के
लिए, वे 'फ़ाइल' में नुक्ता लगाते हैं लेकिन 'फ़ौरन' में नहीं। क्या आप
भी ऐसा करते हैं?
मैं अन्य अनुवादकों से भी अनुरोध करूँगा कि वे नुक्ते के प्रयोग पर अपने
विचार से हमें अवगत कराएँ।
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On 27 मार्च, 10:31, Vinay Vaidya <vinayvaidya...@gmail.com> wrote:
> मैं मानता हूँ कि हिन्दी में नुकते का इस्तेमाल बिलकुल नहीं होना चाहिए .
>
> 2010/3/27 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>
> ...
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मैं वर्तनी में विविधता के संदर्भ में आपके विचार से सहमत हूँ। समस्या तब
पैदा होती है जब विविधता अराजकता का रूप ले लेती है। अगर कोई नुक्ते का
प्रयोग नहीं करता है तो हम उसकी वर्तनी को गलत नहीं कह सकते हैं।
अनुवादकों, पत्रकारों आदि को वर्तनी में एकरूपता का ध्यान रखना चाहिए।
अगर हम 'ज़रूरत' में नुक्ता लगाते हैं तो हमें 'ज़्यादा' में भी नुक्ता
लगाना चाहिए।
मैंने यशवंत जी से जो प्रश्न किया है वह वर्तनी में एकरूपता से संबंधित
है। उन्होंने केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता लगाने की बात कही है। मैं जानना
चाहता हूँ कि वे अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाओं से हिंदी में आए शब्दों
में नुक्ता लगाते हैं या नहीं। इससे सभी अनुवादकों को नुक्ते के प्रयोग
से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी। हमारी भाषा में व्याकरण से
संबंधित विषयों की हमेशा उपेक्षा हुई है। जब तक विद्वानों और आम भाषा-
भाषियों के बीच संवाद नहीं होगा तब तक भाषा से जुड़े मसलों पर भ्रम बना
रहेगा।
मैं अन्य अनुवादकों व सदस्यों से अनुरोध करता हूँ कि वे हमें नुक्ते के
प्रयोग के बारे में बताएँ।
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On 8 अप्रै, 10:18, Vinay Vaidya <vinayvaidya...@gmail.com> wrote:
> यह जानकारी अवश्य ही रोचक है कि कुछ अंग्रेज़ी के शब्दों में भी नुकते का प्रयोग
> शायद ज़रूरी महसूस किया जाता है .
> मैंने अपनी पिछली प्रतिक्रया में कहा था कि हिन्दी में नुकते का इस्तेमाल
> बिलकुल नहीं होना चाहिए . लेकिन इस जानकारी
> के बाद लगता है कि दूसरी भाषाओं से आनेवाले शब्दों के उच्चारण के सन्दर्भ में
> शायद यह ज़रूरी हो सकता है .
> मेरे मन में एक सवाल यह उठा कि जैसे अंग्रेज़ी में अमेरिकन ऑस्ट्रेलियाई और
> इंग्लैंड की अंग्रेज़ी में स्पेलिंग्स का अंतर
> देखा जाता है, क्या वैसे ही हिन्दी में भी वेरिएशन्ज़ को स्वीकार करने में कोई
> हर्ज़ है ?
> क्या इससे हिन्दी समृद्ध ही नहीं होगी ?
> चूँकि उर्दू लिपि (अरबी) का ज्ञान मुझे नहीं है, इसलिए मैं हमेशा इस दुविधा को
> अनुभव करता रहता हूँ कि कहाँ नुकता
> लगाना ठीक है, और कहाँ गलत है . मैं शायद अभ्यास से इस दुविधा को मिटा सकता
> हूँ. लेकिन मैं दूसरों से तो ऐसी अपेक्षा
> नहीं कर सकता . अत: व्यावहारिक विकल्प यही है कि इस बारे में हर किसी की
> स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए, यथास्थिति
> को अपने-आप बदलने दिया जाए . काल-क्रम में कोई दस-बीस वर्षों बाद हिन्दी को कोई
> सुनिश्चित स्वरूप मिल सकता है .
> सादर,
> विनय.
>
> 2010/4/8 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>
> ...
>
> और पढ़ें »
> ...
>
> और पढ़ें »
--
आपको यह संदेश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि आपने Google समूह "हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)" समूह की सदस्यता ली है.
इस समूह में पोस्ट करने के लिए, hindian...@googlegroups.com को ईमेल भेजें.
इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, hindianuvaada...@googlegroups.com को ईमेल करें.
और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/hindianuvaadak?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.
आप जैसे सदस्यों की सक्रियता ही इस समूह को महत्वपूर्ण बना सकती है।
यह तय करना आसान नहीं है कि हिंदी में 'ज़रूरत' और 'ज़्यादा' जैसे शब्दों
में नुक्ते का उच्चारण होता है या नहीं। मैंने अधिकतर लोगों को इन शब्दों
में नुक्ते का उच्चारण करते सुना है। मैंने फ़ेसबुक पर भी नुक्ते के
प्रयोग पर चर्चा की है। रेडियो चैनल के लिए काम करने वाले एक सज्जन ने
मुझे यह जानकारी दी कि रेडियो पर नुक्ते के प्रयोग के बिना काम चल ही
नहीं सकता है। यह बात टीवी चैनलों पर भी लागू होती है। मैं अपवादों की
बात नहीं कर रहा हूँ।
अधिकतर अखबारों में नुक्ते का प्रयोग नहीं होता है। इसका एक कारण यह भी
हो सकता है कि हिंदी पत्रकार समयाभाव के कारण हर शब्द में नुक्ते का सही
प्रयोग करने के लिए शब्दकोश नहीं देख सकते हैं।
कुछ ऐतिहासिक कारणों से नुक्ते की स्वीकार्यता का प्रश्न इतना जटिल हो
चुका है कि इसके संदर्भ में अंतिम राय देना मुश्किल हो गया है। हमें
अनुवाद करते समय वर्तनी में एकरूपता सुनिश्चित करनी होती है। मैंने गूगल
के प्रोजेक्ट के संदर्भ में नुक्ते से संबंधित जो प्रश्न किया है वह इसी
एकरूपता से संबंधित है। कृपया यह स्पष्ट करें कि आपने इस प्रोजेक्ट में
केवल अंग्रेज़ी के शब्दों में नुक्ते का प्रयोग किया था या नहीं। इससे
हमें इंटरनेट पर नुक्ते के प्रयोग के संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी
मिलेगी।
इस समूह के कई सदस्य आप जैसे अनुवादकों के अनुभव से लाभान्वित हो सकते
हैं।
यह सचमुच शर्म की बात है कि पचास करोड़ से अधिक लोगों की भाषा होने के
बावजूद हिंदी में आज तक देशों और शहरों के नामों का मानकीकरण नहीं हो
पाया है। सरकारी संस्थाओं ने हिंदी के विकास के लिए समारोह आयोजित करने
में जितनी दिलचस्पी दिखाई है उससे आधी दिलचस्पी अगर मानकीकरण में दिखाई
गई होती तो हिंदी का यह हाल नहीं होता। मैंने मानक हिंदी वर्तनी के कुछ
नियमों को इंटरनेट पर डाला है, लेकिन भाषा से जुड़ा यह महत्वपूर्ण कार्य
केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं किया जा सकता है। अभी बहुत-से नियमों को
इंटरनेट पर डाला जाना बाकी है। अगर हम वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों तक अपनी
बात पहुँचा सकें तो शायद इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया जा सके।
आपसे एक अनुरोध है। अगर संभव हो सके तो देशों व शहरों के नाम मुझे भेज
दें। मैं उन नामों की सूची को इस समूह के पेज में डाल दूँगा। इससे उन
नामों को अंतिम रूप (अगर आवश्यक हो) देने में भी मदद मिलेगी।
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
> 2010/4/9 सुयश सुप्रभ <translatedbysuy...@gmail.com>
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ये दो वर्ण ऐसे हैं जिनमें नुक्ता अर्थभेद कारक तत्व होता है. जैसे,
जरा : ज़रा, कफ :कफ़ . शेष वर्णों से युक्त शब्दों में यह बात नहीं.
इसलिए देवनागरी फ़ॊण्ट में वे नुक्ता लगे रूप में नहीं रखे जाते. संकेत
करना चाहूंगा
ल्रेखक असगर वजाहत के आत्मकथ्य का, जहां वह कहते हैं, ’मेरे नाम असगर में
ग में नुक्ता लगाइए या न लगाइए, आपकी इच्छा’
सुरेश कुमार
> ...
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> और पढ़ें »
प्रिय सुयश जी,
हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुसार, हिन्दी में परम्परा से आगत (अर्थात्
संस्कृत मूल के ) शब्द और भाषा-सम्पर्क से आगत (अर्थात् विदेशी मूल के)
शब्द अपनी मूल वर्तनी को अधिकांशतः संरक्षित रखते हैं. इस प्रक्रिया में
जो थोडा-बहुत परिवर्तन होता है उसकी सकारणता भाषा में मिल जाती है. यह
सामान्य बात हुई.
अब विशेष बात. ’ज़’ और ’फ़’ युक्त सम्पर्कागत शब्दों को मूलवत् लिखा
जाए यह निर्णय , मेरी जानकारी में, हो चुका है.इसका अनुपालन होना उचित
है.
अच्छा हो, हिदीकर्मी आवश्यकता होने पर किसी स्तरीय हिन्दी-हिन्दी शब्दकोश
को देखने की आदत डालें. मेरी जानकारी और अनुभव में हिन्दी कोश आगत शब्दों
की मूल वर्तनी को प्रविष्ट करतॆ हैं. तदनुसार, क,ख,ग को भी नुक्ते के साथ
उन शब्दों में रखा गया है जिनमें ये वर्ण प्रयुक्त हुए हैं.
थोडी बहुत अस्पष्टता वर्तनी जैसी बातों में रहेगी. इसका व्यावहारिक समाधन
विकल्पों (प्रायः दो तक सीमित) को समाविष्ट करके किया जा सकता है. हिन्दी
कोश ऐसा करते हैं.
इस जानकारी को सबके साथ साझा करने के लिए मेरी सहमति है .
नुक्ते के इस विमर्श में पहली बार मुद्दे की बात रखी है प्रो. सुरेश
कुमार ने. भाषाविज्ञान के नियमानुसार दो वर्णों में अंतर तभी मान्य होता
है जब वे अर्थभेदक हों. केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अंतर्गत गठित
देवनागरी की वर्तनी सुधार समिति ने हिंदी की परिवर्धित वर्णमाला में ज और
फ के साथ- साथ ज़ और फ़ को भी स्थान दिया है. हिंदी में राज (like
British Raj) और राज़ (secret) में और फन (hood of the snake) और फ़न
(हरफ़नमौला) के अर्थ में अंतर है. इसलिए ये दोनों अर्थभेदक ध्वनियाँ
हैं.
इसी प्रकार अनुस्वार और अनुनासिक भी अर्थभेदक हैं. हंस (swan- a bird) और
हँस (laugh) में प्रयुक्त अं और अँ दोनों अर्थभेदक हैं. इसलिए इन्हें भी
परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला में शामिल किया गया है. इसी प्रकार सारी और
सॉरी तथा हाल और हॉल में आ और ऑ का प्रयोग अर्थभेदक ध्वनियों के रूप में
सामने आता है. इसलिए आ और औ के साथ-साथ ऑ को भी परिवर्धित देवनागरी
वर्णमाला में शामिल किया गया है.
वस्तुतः हिंदीतर भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं से आगत ध्वनियों और
शब्दों को हिंदी में अंगीकृत करने के लिए ही देवनागरी वर्णमाला को
परिवर्धित किया गया है और इसमें सभी अर्थभेदक ध्वनियों को स्थान दिया गया
है.
उपर्युक्त संदर्भों के आलोक में ही नुक्ते के प्रश्न पर वस्तुनिष्ठ
विमर्श किया जाना चाहिए.
विजय
विजय कुमार मल्होत्रा
पूर्व निदेशक (राजभाषा),
रेल मंत्रालय,भारत सरकार
Vijay K Malhotra
Former Director (Hindi),
Ministry of Railways,
Govt. of India
आवास का पता / Residential Address:
Vijay K Malhotra
WW/67/SF,
MALIBU TOWNE,
SOHNA ROAD,
GURGAON- 122018
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