Re: {हिंदी अनुवादक} hindianuvaadak@googlegroups.com के लिए डाइजेस्ट - 1 विषय में 1 संदेश

3 views
Skip to first unread message

Dr Rajeev kumar Rawat

unread,
Aug 17, 2011, 2:00:22 AM8/17/11
to hindian...@googlegroups.com
मित्रो,

श्री हरि जोशी जी एवं सुयश जी के विचार पढ़ने को मिले 
श्री जोशी जी के विचार पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले मैं सादर जानना चाहूंगा कि 
श्री जोशी जी का परिचय क्या है और इनके आलेख मे दी गई सूचनाओं का स्रोत क्या है
आप के.हि.स. से कैसे परिचित एवं संबंधित हैं
हमें ऐसी कठोर प्रतिक्रिया को मात्र के हिं सं के लिए ही क्यों लेना चाहिए
नियुक्तियां तो कैसे होती हैं यह सारा देश जानता है इसलिए जानना
जरुरी है कि श्री जोशी जी किस तरह इस प्रकरण से संबंधित हैं
इससे कतई यह आशय नहीं हैं कि मैं उसकी दुर्दशा से व्यथित नहीं हूं
और जागरुक व्यक्ति ( विह्सिल व्लोअर ) के प्रति ही शंकित हूं ,
क्योंकि संस्थान के कुलसचिव महोदय मेरे वरिष्ठ मित्र हैं, प्रो. रामवीर सिहं जी के साथ
मैंने पांडिचेरी वि.वि. में एक व्याख्यान दिया है.अतः परिचितों के जुड़े होने से मेरी जिज्ञासा है।

रहा सुयश जी -- 
किसी हिंदी संस्थान में सोने की बात-- वो तो सब तरह के संस्थानों . कार्यालयों में सोते हैं आपकी नजर सिर्फ हिंदी संस्थानों पर ही गई है कुछ और संस्थानों में भी जाइए कमोवेश स्थिति एक सी है
( मैं फिर बुराई का वचाव करता नजर आ रहा होऊंगा, नहीं , मैं समस्या को हिंदी संस्थान की नहीं वल्कि सरकार की हिंदी और हिंदी कर्मचारियों के प्रति की जा रही उपेक्षा के क्षितिज तक लेजाने का प्रयास कर
रहा हूं- जिसमें हिंदी उनकी किसी भी वरीयता सूची मे नहीं है )

सरकारी कामकाज में कर्मचारी की दुर्गति अथवा सद् गति ऊपर वाले अधिकारियों
की कार्यशैली से जुड़ी होती है- हिंदी के कामों में किसी की सच्ची रुचि ही नहीं है इसलिए आपको
कर्मचारी सोते हुए ही मिलेंगे अथवा अन्य चमचागीरी के काम करते मिलेंगे जिनमें उन्हे सम्मान, पहचान
मशीनरी का उपभोग आदि अन्य रसीली अनुभूतियां मिलती हैं जो हिंदी के वीहड़ में अप्राप्य होती हैं । 
हैं और कहीं भी हिंदी का कर्मचारी मुख्य प्रशासन का अंग नहीं माना जाता है। उसे कार्यक्रम कराने, संचालन करने, कैंटीन आदि के काम दे दिए जाते हैं कि ये तुम कराओ तुम्हारे पास और कुछ खास काम तो है नहीं । इसलिए खाली बैठने पर अपने राष्ट्रीय चरित्र के अनुकूल वह सोएगा ही  

जिसका जो कार्यस्थल है वह उस जगह सोता है कि नहीं . देखिए- अफसरानों के फोटो आपने बैठकों मे सोते हुए देखे होंगे, महामहिमों के  विधान मंडलों में देखे होंगे, हमारे एक भू.पू.पंत प्रधान के सोते हुए फोटो तो सबने देखे हैं----पुलिस वालों के थाने में , बनिया अपनी गद्दी पर , रिक्शे वाला अपने रिक्शे में ----------

 हमारे देश में हिंदी अथवा राजभाषा का यही हाल रहेगा, यह सूरत बदले इसके लिए बह कर्मचारी कुछ नहीं कर सकता  और जो कर सकते हैं वो खुद सो रहे हैं अतः दुःखी होकर चिंतन समाधि लग जाती होगी । 

सादर
( निजी विचार )



2011/8/16 <hindianuvaa...@googlegroups.com>

समूह: http://groups.google.com/group/hindianuvaadak/topics

    "Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)" <translate...@gmail.com> Aug 16 08:42PM +0530 ^
     
    जय जी,
     
    मैंने हरि जोशी जी की पोस्ट साझा की थी।
     
    हिंदी से संबंधित सरकारी संस्थानों की दुर्गति का एक कारण यह भी है कि हिंदी
    समाज अपनी भाषा को अंग्रेज़ी व अन्य विकसित भाषाओं से कमतर मानता है। वामपंथी
    और दक्षिणपंथी दोनों इस आत्महीनता के शिकार हैं।
     
    मैंने दिल्ली में एक सरकारी हिंदी संस्थान में एक कर्मचारी को ऑफ़िस में मेज पर
    सोते देखा है। हिंदी बोलने वाली जनता को अपनी भाषा से जुड़े संस्थानों से कोई
    लगाव नहीं है, इसलिए हमें दृश्य देखने को मिलते हैं। अगर जनता का दबाव हो तो
    कोई कर्मचारी या अधिकारी ऐसी हरकत करने की हिम्मत नहीं दिखा सकता है। हमारे देश
    में एक प्रगतिशील तबका ऐसा भी है जो क्रांति हो जाने के बाद ही भ्रष्टाचार,
    सरकारी लापरवाही आदि मुद्दों पर ध्यान देना चाहता है। इस तबके की निष्क्रियता
    के कारण सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को मनमानी करने की छूट मिल जाती है।
     
    हमें सूचना के अधिकार का प्रयोग करके हिंदी संस्थानों के काम-काज के बारे में
    जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।
     
    सादर,
     
    सुयश
     
    2011/8/14 jai kaushal <jaikau...@gmail.com>
     

     

--
इस संदेश पर टिप्पणी करने के लिए 'Reply' या 'उत्तर' पर क्लिक करें।
 
नये विषय पर चर्चा शुरू करने के लिए निम्नलिखित पते पर ई-मेल भेजें :
 
hindian...@googlegroups.com
 
वेब पता : http://groups.google.co.in/group/hindianuvaadak



--
डॉ. राजीव कुमार रावत


35D.gif
360.gif

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Aug 19, 2011, 12:06:33 PM8/19/11
to hindian...@googlegroups.com
राजीव जी,

मैं हरि जोशी जी को व्यक्‍तिगत रूप से नहीं जानता हूँ। हिंदी संस्थानों के बारे में उनकी जानकारी का क्या स्रोत है, इसका जवाब वे ही दे सकेंगे।

हिंदी संस्थानों में नेताओं के अनावश्‍यक हस्तक्षेप को रोकने के लिए बुद्धिजीवियों को सक्रिय होना पड़ेगा। अभी जी-हुजूरी करने को ही एकमात्र योग्यता माना जाता है। यही वजह है कि सरकारी हिंदी संस्थानों में योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा होती है। 

सरकारी हिंदी अनुवादकों को उपेक्षा के कारण हतोत्साहित नहीं होना चाहिए।  

हिंदी और अनुवाद से संबंधित मसलों पर सरकारी अनुवादकों और स्वतंत्र अनुवादकों को न केवल विचार-विमर्श करना चाहिए बल्कि कुछ ठोस कदम उठाने की योजना भी बनानी चाहिए। 

केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा प्रकाशित मानक हिंदी वर्तनी की पुस्तिका अभी तक इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हो पाई है। भाषा के अनौपचारिक संदर्भों में नियमों और संदर्भ ग्रंथों की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन प्रयोजनमूलक हिंदी में इनके महत्व से शायद ही कोई इनकार करेगा। सरकारी अनुवादकों को मानक हिंदी वर्तनी की पुस्तिका के अनुपलब्ध होने के कारण का पता लगाना चाहिए। मैं सालों से इस पुस्तिका के इंटरनेट पर उपलब्ध होने का इंतज़ार कर रहा हूँ। बहुत-से लोगों का मानना है कि अधिकतर सरकारी अनुवादक प्रोन्नति, वेतन आदि को ही महत्वपूर्ण मानते हैं। यह बात हिंदी अनुवादक समूह के सजग सदस्यों पर नहीं लागू होती है। मुझे लगता है कि सरकारी अनुवादकों को अपने अधिकारों की माँग करते हुए भाषा और अनुवाद से जुड़े विषयों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बहुत-से लोगों का कहना है कि सरकारी अनुवादक यथास्थितिवादी होते हैं। इस धारणा को बदलना बहुत ज़रूरी है।    

सादर,

सुयश   



2011/8/17 Dr Rajeev kumar Rawat <dr.raje...@gmail.com>
35D.gif
360.gif

bhoopendra singh

unread,
Aug 21, 2011, 4:35:48 AM8/21/11
to hindian...@googlegroups.com
मित्रों,कृपया एवं परंपरा काअंतर स्पष्ट करने  का कष्ट करें /
सादर,
Dr.Bhoopendra Singh
T.R.S.College,REWA 486001
Madhya Pradesh INDIA




     
    राजीव जी,
     
    मैं हरि जोशी जी को व्यक्‍तिगत रूप से नहीं जानता हूँ। हिंदी संस्थानों के बारे
    में उनकी जानकारी का क्या स्रोत है, इसका जवाब वे ही दे सकेंगे।
     
    हिंदी संस्थानों में नेताओं के अनावश्‍यक हस्तक्षेप को रोकने के लिए
    बुद्धिजीवियों को सक्रिय होना पड़ेगा। अभी जी-हुजूरी करने को ही एकमात्र
    योग्यता माना जाता है। यही वजह है कि सरकारी हिंदी संस्थानों में योग्य
    व्यक्तियों की उपेक्षा होती है।
     
    सरकारी हिंदी अनुवादकों को उपेक्षा के कारण हतोत्साहित नहीं होना चाहिए।
     
    हिंदी और अनुवाद से संबंधित मसलों पर सरकारी अनुवादकों और स्वतंत्र अनुवादकों
    को न केवल विचार-विमर्श करना चाहिए बल्कि कुछ ठोस कदम उठाने की योजना भी बनानी
    चाहिए।
     
    केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा प्रकाशित मानक हिंदी वर्तनी की

    तक इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हो पाई है। भाषा के अनौपचारिक संदर्भों में
    नियमों और संदर्भ ग्रंथों की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन प्रयोजनमूलक हिंदी
    में इनके महत्व से शायद ही कोई इनकार करेगा। सरकारी अनुवादकों को मानक हिंदी
    वर्तनी की पुस्तिका के अनुपलब्ध होने के कारण का पता लगाना चाहिए। मैं सालों से
    इस पुस्तिका के इंटरनेट पर उपलब्ध होने का इंतज़ार कर रहा हूँ। बहुत-से लोगों
    का मानना है कि अधिकतर सरकारी अनुवादक प्रोन्नति, वेतन आदि को ही महत्वपूर्ण
    मानते हैं। यह बात हिंदी अनुवादक समूह के सजग सदस्यों पर नहीं लागू होती है।
    मुझे लगता है कि सरकारी अनुवादकों को अपने अधिकारों की माँग करते हुए भाषा और
    अनुवाद से जुड़े विषयों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बहुत-से लोगों का कहना है
    कि सरकारी अनुवादक यथास्थितिवादी होते हैं। इस धारणा को बदलना बहुत ज़रूरी है।
     
     
    सादर,
     
    सुयश
     
     
     
    2011/8/17 Dr Rajeev kumar Rawat <dr.raje...@gmail.com>
     

     

    --

    Vinod Sharma

    unread,
    Aug 21, 2011, 4:40:10 AM8/21/11
    to hindian...@googlegroups.com
    बंधु संभवतः आप कृपया के बाद एक शब्द लिखना भूल गए लगते हैं
    कृपया और  परंपरा में संबंध प्रतीत नहीं होता
    सादर
    विनोद
    2011/8/21 bhoopendra singh <bks...@gmail.com>



    --
    Best Regards,
    Vinod Sharma
    gtalk: vinodjisharma
    skype:vinodjisharma
    Services Provided:
    Translation, Proofreading, Editing, Reviewing, Transcripting, Voice-Over.

    Reply all
    Reply to author
    Forward
    0 new messages