
समूह: http://groups.google.com/group/hindianuvaadak/topics
"Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)" <translate...@gmail.com> Aug 16 08:42PM +0530 ^
--
जय जी,
मैंने हरि जोशी जी की पोस्ट साझा की थी।
हिंदी से संबंधित सरकारी संस्थानों की दुर्गति का एक कारण यह भी है कि हिंदी
समाज अपनी भाषा को अंग्रेज़ी व अन्य विकसित भाषाओं से कमतर मानता है। वामपंथी
और दक्षिणपंथी दोनों इस आत्महीनता के शिकार हैं।
मैंने दिल्ली में एक सरकारी हिंदी संस्थान में एक कर्मचारी को ऑफ़िस में मेज पर
सोते देखा है। हिंदी बोलने वाली जनता को अपनी भाषा से जुड़े संस्थानों से कोई
लगाव नहीं है, इसलिए हमें दृश्य देखने को मिलते हैं। अगर जनता का दबाव हो तो
कोई कर्मचारी या अधिकारी ऐसी हरकत करने की हिम्मत नहीं दिखा सकता है। हमारे देश
में एक प्रगतिशील तबका ऐसा भी है जो क्रांति हो जाने के बाद ही भ्रष्टाचार,
सरकारी लापरवाही आदि मुद्दों पर ध्यान देना चाहता है। इस तबके की निष्क्रियता
के कारण सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को मनमानी करने की छूट मिल जाती है।
हमें सूचना के अधिकार का प्रयोग करके हिंदी संस्थानों के काम-काज के बारे में
जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।
सादर,
सुयश
2011/8/14 jai kaushal <jaikau...@gmail.com>
इस संदेश पर टिप्पणी करने के लिए 'Reply' या 'उत्तर' पर क्लिक करें।
नये विषय पर चर्चा शुरू करने के लिए निम्नलिखित पते पर ई-मेल भेजें :
hindian...@googlegroups.com
वेब पता : http://groups.google.co.in/group/hindianuvaadak
"Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)" <translate...@gmail.com> Aug 19 09:36PM +0530 ^
राजीव जी,
मैं हरि जोशी जी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूँ। हिंदी संस्थानों के बारे
में उनकी जानकारी का क्या स्रोत है, इसका जवाब वे ही दे सकेंगे।
हिंदी संस्थानों में नेताओं के अनावश्यक हस्तक्षेप को रोकने के लिए
बुद्धिजीवियों को सक्रिय होना पड़ेगा। अभी जी-हुजूरी करने को ही एकमात्र
योग्यता माना जाता है। यही वजह है कि सरकारी हिंदी संस्थानों में योग्य
व्यक्तियों की उपेक्षा होती है।
सरकारी हिंदी अनुवादकों को उपेक्षा के कारण हतोत्साहित नहीं होना चाहिए।
हिंदी और अनुवाद से संबंधित मसलों पर सरकारी अनुवादकों और स्वतंत्र अनुवादकों
को न केवल विचार-विमर्श करना चाहिए बल्कि कुछ ठोस कदम उठाने की योजना भी बनानी
चाहिए।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा प्रकाशित मानक हिंदी वर्तनी की
तक इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हो पाई है। भाषा के अनौपचारिक संदर्भों में
नियमों और संदर्भ ग्रंथों की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन प्रयोजनमूलक हिंदी
में इनके महत्व से शायद ही कोई इनकार करेगा। सरकारी अनुवादकों को मानक हिंदी
वर्तनी की पुस्तिका के अनुपलब्ध होने के कारण का पता लगाना चाहिए। मैं सालों से
इस पुस्तिका के इंटरनेट पर उपलब्ध होने का इंतज़ार कर रहा हूँ। बहुत-से लोगों
का मानना है कि अधिकतर सरकारी अनुवादक प्रोन्नति, वेतन आदि को ही महत्वपूर्ण
मानते हैं। यह बात हिंदी अनुवादक समूह के सजग सदस्यों पर नहीं लागू होती है।
मुझे लगता है कि सरकारी अनुवादकों को अपने अधिकारों की माँग करते हुए भाषा और
अनुवाद से जुड़े विषयों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बहुत-से लोगों का कहना है
कि सरकारी अनुवादक यथास्थितिवादी होते हैं। इस धारणा को बदलना बहुत ज़रूरी है।
सादर,
सुयश
2011/8/17 Dr Rajeev kumar Rawat <dr.raje...@gmail.com>
--