मैं भी श्री सत्य गुलाटी जी की बात का समर्थन करता हूँ। हिंदी में नपुंसकलिंग के प्रयोग से उन लोगों को सहायता हो सकती है जो इसके प्रयोग से अनभिज्ञ हैं पर उनका क्या होगा जो बचपन से इसका प्रयोग कर रहे हैं।
वैसे हिन्दी की हुी तरह फ्रैंच में भी वस्तुओं के लिए लिंग निर्धारण किया जाता है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं है लेकिन प्रयोग से सीखा जाता है।
जैसे हाथ टूट गया ......................... लेकिन टांग टूट गई
साइकिल गिर गई, बस खराब हो गई ............ लेकिन ट्रक खराब हो गया, स्कूटर गिर गया
यही भाषा की विशेषता है और यहीं पर भाषा विज्ञान न होकर एक 'कला' बन जाती है, जो निरंतर प्रयोग से ही सीखी जा सकती है।
इसके बावजूद दुनिया भर में लोग फ्रेंच सीख रहे हैं । वैसे भी कोई भी भाषा अपने में पूर्ण नहीं है। कमी भाषा में नहीं है, मुझे लगता है हिंदी में किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं। जरूरत है अपनी भाषा को, राष्ट्र को एवं स्वयं को तकनीकी एवं वैज्ञानिक रूप से समृद्ध बनाने की। अभी स्थिति ये है कि हम तकनीक के गुलाम हैं जब कि होना चाहिए इसका उलट।
अगर ब्रिटेन की भाषा हिन्दी होती और भारत की राजभाषा अंग्रेजी तो हम लोग आज अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के लिए चिंतित होते और भारत में हिंदी के बढते प्रयोग की भर्त्सना करते या हमारी भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता तो दुनिया भर में लोग इसे सीखने को मजबूर होते। किसी भी भाषा की बुराई वही लोग करते हैं जो उसे जानते नहीं। क्या हमारे कहने से अंग्रेज अपनी अंग्रेजी में सुधार कर लेंगे? तो हम क्यों करें किसी के कहने पर, वो भी उनके जो उस भाषा से परिचित नहीं। यदि मुझे कुछ सीखना है तो मुझे उसके नियमों पर ही चलना पड़ेगा, न कि उस कला के नियम व्यक्ति विशेष के लिए परिवर्तित किये जाएंगे।
हाँ एक बात जरूर है कि भाषा का मानकीकरण करना अत्यंत आवश्यक है, और निश्चित अंतराल पर ऩये शब्दों का निर्माण, शब्द जोड़ना-घटाना, आदि कार्य करना जरूरी है।
प्रशान्त ध्यानी
यंत्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन
रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
देहरादून