हिंदी अनुवादक समूह की वेबसाइट से संबंधित सूचना (पेज - अनुवाद आलेख)

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Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

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Mar 20, 2011, 9:12:01 AM3/20/11
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मैंने अनुवाद आलेख नाम के पेज की सूची में अमेरिकी अनुवादकों के संगठन की वेबसाइट पर उपलब्ध आलेखों का (की) लिंक जोड़ा (जोड़ी) है। आप इसे यहाँ देख सकते हैं :

https://sites.google.com/site/hindianuvadaka/anuvada-alekha (इस पेज पर लिंक संख्या 6 देखें)

अगर संभव हो तो 'लिंक' का लिंग निर्धारित करने में मेरी मदद करें। क्या आप किसी ऐसे शब्दकोश के बारे में जानते हैं जिसमें हिंदी के विदेशज शब्दों के लिंग की जानकारी दी गई है?

सादर,

सुयश
9811711884

ब्लॉग
http://anuvaadkiduniya.blogspot.com



 


ePandit | ई-पण्डित

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Mar 20, 2011, 9:04:57 PM3/20/11
to hindian...@googlegroups.com
मेरे ख्याल से संस्कृत व्याकरण में इस प्रकार की चीजों का नपुंसक लिंग होता है। वैसे "लिंक" के लिये आम तौर पर पुल्लिंग का ही प्रयोग होता है, उसी के हिन्दी शब्द "कड़ी" के लिये स्त्रीलिंग का।

२० मार्च २०११ ६:४२ अपराह्न को, Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ) <translate...@gmail.com> ने लिखा:


 


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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
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Hariraam

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Mar 22, 2011, 11:53:28 AM3/22/11
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इस सन्दर्भ में कृपया यहाँ अपना चूहा चटकाएँ जरा...

<http://hariraama.blogspot.com/2007/02/blog-post_24.html>

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हिन्दी तथा अन्य कुछ भारतीय भाषाओं के व्याकरण संस्कृत के आधार पर विकसित हुए हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में नपुसंक लिंग का प्रावधान है। हिन्दी में नहीं....

क्या हिन्दी में नपुंसक लिंग नहीं जोड़ा जा सकता...
क्या हमें भावी पीढ़ी के लिए कुछ सुधार नहीं करना चाहिए...
क्या हमें हिन्दी के लिंग को इतना कड़ा बनाए रखना चाहिए..
क्या अन्य भारतीय भाषाओं को हिन्दी के लिंग पर यों भद्दी टिप्पणियाँ करने का मौका देते रहना चाहिए...????

--- हरिराम

Vinod Sharma

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Mar 22, 2011, 12:40:59 PM3/22/11
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हरिरामजी प्रस्तावित नपुंसक लिंग के एक दो क्रियारूपों का उदाहरण भी प्रस्तुत करते तो विद्वद्जनों को विचार करने में सुविधा होती. हम जैसे ज्ञान सरोवर के किनारे बैठे दर्शकों की जिज्ञासा का भी कुछ समाधान हो पाता. आपके सुझाव पर मेरा दिमाग घूम गया पुल्लिंग में जाता है, खाता है, पढ़ता है, लिखता है, तथा स्त्रीलिंग में जाती है, खाती है, पढ़ती है, लिखती है.....
तो इस नये नपुंसक लिंग में इन क्रियाओं को कैसे लिखेंगे? जिज्ञासा और उत्सुकता दोनों जाग उठी हैं. 

2011/3/22 Hariraam <hari...@gmail.com>

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Satya Ghatia

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Mar 23, 2011, 8:52:34 AM3/23/11
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हिंदी में नपुंसक लिंग जोड़ने से भावी पीढी के लिए सुधार की बात गले नहीं उतर रही है.
हर भाषा की अपनी विशेषताएं होती हैं. यदि हिंदी में नपुंसक लिंग नहीं है तो इससे कौन सी आफत आ रही है. 
वैसे भी, मूल रूप से  सृष्टि में दो ही लिंग होते हैं प्रकृति और पुरुष जिनका प्रतिनिधित्व हिंदी भाषा के लिंग विधान में यथोचित रूप से हो रहा है.    

2011/3/22 Hariraam <hari...@gmail.com>

prashant dhyani

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Mar 23, 2011, 2:18:43 PM3/23/11
to hindian...@googlegroups.com
मैं भी श्री सत्य गुलाटी जी की बात का समर्थन करता हूँ। हिंदी में नपुंसकलिंग के प्रयोग से उन लोगों को सहायता हो सकती है जो इसके प्रयोग से अनभिज्ञ हैं पर उनका क्या होगा जो बचपन से इसका प्रयोग कर रहे हैं।

वैसे हिन्दी की हुी तरह फ्रैंच में भी वस्तुओं के लिए लिंग निर्धारण किया जाता है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं है लेकिन प्रयोग से सीखा जाता है। 
जैसे हाथ टूट गया ......................... लेकिन टांग टूट गई 
साइकिल गिर गई, बस खराब हो गई ............ लेकिन ट्रक खराब हो गया, स्कूटर गिर गया 


यही भाषा की विशेषता है और यहीं पर भाषा विज्ञान न होकर एक 'कला' बन जाती है, जो निरंतर प्रयोग से ही सीखी जा सकती है।   

इसके बावजूद दुनिया भर में लोग फ्रेंच सीख रहे हैं । वैसे भी कोई भी भाषा अपने में पूर्ण नहीं है। कमी भाषा में नहीं है, मुझे लगता है हिंदी में किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं। जरूरत है अपनी भाषा को, राष्ट्र को एवं स्वयं को तकनीकी एवं वैज्ञानिक रूप से समृद्ध बनाने की। अभी स्थिति ये है कि हम तकनीक के गुलाम हैं जब कि होना चाहिए इसका उलट। 

अगर  ब्रिटेन की भाषा हिन्दी होती और भारत की राजभाषा अंग्रेजी तो हम लोग आज अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के लिए चिंतित होते और भारत में हिंदी के बढते प्रयोग की भर्त्सना करते या हमारी भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता तो दुनिया भर में लोग इसे सीखने को मजबूर होते। किसी भी भाषा की बुराई वही लोग करते हैं जो उसे जानते नहीं। क्या हमारे कहने से अंग्रेज अपनी अंग्रेजी में सुधार कर लेंगे? तो हम क्यों करें किसी के कहने पर, वो भी उनके जो उस भाषा से परिचित नहीं। यदि मुझे कुछ सीखना है तो मुझे उसके नियमों पर ही चलना पड़ेगा, न कि उस कला के नियम व्यक्ति विशेष के लिए परिवर्तित किये जाएंगे।
हाँ एक बात जरूर है कि भाषा का मानकीकरण करना अत्यंत आवश्यक है, और निश्चित अंतराल पर ऩये शब्दों का निर्माण, शब्द जोड़ना-घटाना, आदि कार्य करना जरूरी है।



प्रशान्त ध्यानी
यंत्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन
रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
देहरादून


2011/3/23 Satya Ghatia <satya...@gmail.com>
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