हिन्दी का एक प्रामाणिक शैक्षिक व्याकरण
*Modern Hindi Grammar*
Omkar N. Koul
Hyattswile : Dunwoody Press, 2008, pp. x+318, US $ 45 (Indian
Reprint : Delhi : Indian Institute of Language Studies,2009, Rs 700.)
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में भारत के राजनीतिक और आर्थिक कद के बढने के
साथ हिन्दी का महत्व भी बढ गया है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी सीखने
की आवश्यकता के प्रति विदेशी और प्रवासी भारतीयों की विदेश में जन्मी
पीढी सजग और सक्रिय हो गये हैं. ऐसी स्थिति में अंग्रेज़ी माध्यम से
हिन्दी का अभ्यास करने में सहायक स्तरीय ग्रंथों -- शैक्षिक व्याकरण,
द्विभाषी शब्दकोश आदि --की विशेष उपादेयता है. ऐसे ग्रन्थों में चर्चाधीन
ग्रन्थ एक उल्लेखनीय कृति है जो प्रारम्भिक स्तर की हिंदी (यही विशेष है)
सीखने मे आने वाली समस्याओं को जन्म देने वाले अधिकाधिक प्रकरणों का एक
ही जिल्द में विवरण-समाधान प्रस्तुत करती है.
*मुख्य विशेषताएं*
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१) पुस्तक में पांच अनुभागों में हिन्दी भाषा की संरचना का व्यवस्थित
विवरण है.ये अनुभाग हैं -- भूमिका, स्वनिम विचार, रूपविचार, वाक्यविचार,
संक्षिप्त शब्दकोश..भूमिका में हिन्दी भाषा के विषय में अपेक्षित
जानकारी है -- हिन्दी का भौगोलिक क्षेत्र-हिन्दी की भूबोलियां-हिन्दीभाषी
समुदाय; उर्दू-हिन्दी सम्बन्ध; संविधान में हिन्दी सम्ब्न्धी प्रावधान और
उन का खरा मूल्यांकन.
२) स्वनिमविचार, रूपविचार, और वाक्यविचार इस ग्रंथ का केंद्रीय भाग हैं.
शब्दकोश में बारह उपवर्गों में उन शब्दों को सूचीबद्ध किया गया है जो
जीवन के विविध क्षेत्रों से सन्बन्धित हैं और जिनकी जानकारी आरंभिक
शिक्षार्थी के लिए आवश्यक है.
३) स्वनिमविचार में खंडीय स्वनिम (स्वर, व्यंजन), स्वीकार्य स्वर-अनुक्रम
और व्यंजन-गुच्छ, खंडेतर स्वनिम (दीर्घता, बलाघात, अनुतान,सन्धि,
अनुनासिकता), स्वनिम-सापेक्ष रूपविकार (स्वनिंमों का आगम-लोप-परिवर्तन)
का विवरण है. रूपविचार मॆं संज्ञा, सर्वनाम आदि आठों शब्दवर्गों की लगभग
सभी व्याकरणिक विशिष्टताओं का वर्णन है. वाक्यविचार में पदबन्धों-
उपवाक्यों-वाक्यों की रचना, वाक्यप्रकार, और अन्य संबंधित मुद्दों का
विवरण है. अंत में उपयोगी संदर्भिका है.
४) सब खंडों के प्रकरणों को प्रचुर उदाहरणों से,जो व्यवस्थित रूप से
वर्गीकृत हैं, समझाया गया है. सभी उदाहरण रोंमनीकृत हिन्दी के साथ
देवनागरी में भी दिए गए हैं.
५) विशेष रूपसे उल्लेखनीय विशेषता है सामग्री का शिक्षार्थी की अधिगम-
आवश्यकताओं के अनुसार विन्य़ास. दूसरे शब्दो में, हिन्दी संरचना के जिन
तथ्यों का वर्णन किया गया है उन्हें सीखना ही हिन्दी सीखना है. लेखक ने
शिक्षार्थी की कठिनाइयों का अनुमान लगाते हुए कुछ प्रकरणों को अधिक
प्रमुखता दी है -- जैसे, प्रश्न (3.4), निपात (3.6), वाक्यरचना के
मुद्दे (4.3.6 से 4.3.12) .
६) पुस्तक की दो अन्य विशेषताएं -- विषय निरूपण की भाषा का यथासंभव
बोधगम्य होना, और हिन्दी के सरल-सामान्य स्वरूप का सीखने की सामग्री के
रूप में चयन करना. इन सब विशेषताओं के कारण पुस्तक हिन्दी सीखने में
उपयोगी सहायक उपकरण बन गई है.
लेखक-परिचय : भारतीय भाषा संस्थान मैसूर के पूर्व निदेशक (1999-2000),
तथा भारत सरकार के अनेक भाषा संस्थानों के भारतीय भाषा विभागों के पूर्व
अध्यक्ष, कश्मीरी के अन्तरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ, हिन्दी, उर्दू,
पंजाबी पर भी शोध-कार्य. अनेक ग्रंथों के लेखक और सम्पादक, भाषा अध्ययन
क्षेत्र में एक सुपरिचित नाम,
प्रस्तुति : सुरेश कुमार
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Prof Suresh Kumar
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