भाषा में समाया ब्राह्मणवाद (लेखक : रामजी राय)

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Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

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May 29, 2013, 2:45:58 AM5/29/13
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संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

कबीर ने कहा ‘संसकीरत है कूप जल भाखा बहता नीर।’ अर्थात संस्कृत जीवित आदमियों की भाषा नहीं है। तुलसी इस झगड़े में पड़ना ही नहीं चाहे– ‘का भाखा का संसकिरत प्रेम चाहिए सांच।’ अर्थात बीच का रास्ता निकाला और सरक लिए। लिखा अवधी में, मंगलाचरण गाया संस्कृत में। हमारी सरकार ने इस बाबत सबसे न्यारा रास्ता अपनाया। जिन 15 जीवित भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिया उनमें से एक संस्कृत भी है। इसका तर्क क्या है यह अपन को आज तक समझ न आया। चलो माना कि यह एक पुरानी शास्त्रीय भाषा है, इसमें हमारी प्राचीन संस्कृति की बेशकीमती धरोहर दबा के रखी हुई है, इसे जाने बगैर हम अपनी जड़ों से कट जाएंगे। फिर तो इसे ढंग से पढ़ने-पढ़ाने का इंतजाम करने से काम नहीं चलेगा। जड़ों से जुड़े रहने के लिए ‘मरों’ से जुड़े रहना भर ही नहीं, उन्हें जीवित मान कर चलना भी जरूरी बना दिया जाएगा?

                लीजिए जनाब, अब संस्कृत में समाचार सुनिए। सुनिए अब आकाशवाणी से देववाणी में समाचार। यह भी अपन को किसी कदर पल्ले नहीं पड़ता कि इसकी क्या जरूरत? वे कौन लोग हैं भई जिनको संस्कृत में खबरें सुनाई जा रही हैं। शायद पितरों को। यहीं आकर निर्मल वर्मा का कहा साफ समझ आता है कि ‘अतीत हमारे यहां व्यतीत नहीं, वह हमेशा जीवित वर्तमान होता है।’

                बचपन से यही सुनते आए हैं कि संस्कृत को किसी ने नहीं जना। यह देवताओं की वाणी है। जिस पुस्तक से संस्कृत का परिचय कराया गया उस पाठ्य-पुस्तक का भी नाम था देववाणी परिचायिका। संस्कृत सीधे देवताओं के मुंह से निकली है जैसे ब्रा से ब्राह्मण। इसलिए इसे किसी ने नहीं जना। बल्कि यही सभी भाषाओं की जननी है। यह जुमला इतना सार्वभौमिक बना दिया गया है कि इसको लेकर दिमाग में कोई और ख्याल ही नहीं आता। हिंदी के परम भाषाविद किशोरी दास बाजपेयी कहते-कहते मर गए लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी कि भैया हिंदी संस्कृत से नहीं निकली है। उसका स्वतंत्र, भिन्न आधार है। नहीं तो संस्कृत में रामः गच्छति और सीता गच्छति अर्थात राम (पुलिंग और सीता (स्त्रीलिंग) दोनों के लिए गच्छति तो वह किस व्याकरण के किस नियम से हिंदी में राम जाता है और सीता जाती है हो जाता है यह कोई हमें बताए। उनको तो किसी ने नहीं बताया। हां उनके जीवन के अंतिम दिनों में एक बार इलाहाबाद में मैंने उनसे यह सवाल उठाया तो बकौल किशोरी दास बाजपेयी “जब कभी अपनी देशी सरकार (राष्ट्रीय सरकार) आएगी तो उसे हमारी बात जरूर समझ में आएगी।” तो क्या यह सरकार विदेशी है? रंग-रूप से भले न सही ढब-ढंग से तो विदेशी ही लगती है। ज्यादा नहीं तो कम से कम भारोपीय के वजन पर यूरोइंडियन तो लगती ही है, आपको शक है?

                भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं, बोलियों को फूलने-फैलने का अवसर मुहैया किया। संस्कृत के एकछल प्रभाव को तोड़ा, उसे कूप जल घोषित किया। यह कुआं कहिए तो ‘ठाकुर का कुआं’ रहा जहां से दूसरा कोई पानी नहीं ले सकता था। वह बंधा पानी था। सरब-सुलभ बहता नीर नहीं। एकनाथ ने कहा “भगवान भाषाओं में भेदभाव नहीं करता। किसी को कम किसी को ज्यादा मान्यता नहीं देता।” लेकिन हमारी सरकार ऐसा करती है, कहती भले नहीं, और यही करते थे अंग्रेज।

                आजाद भारत में जब सरकार के सामने भारतीय भाषाओं की विविधता, उनकी अलग-अलग स्वतंत्र सत्ता को स्वीकृत करने का सवाल आया तो उसने विविधता की जगह मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) पर बल दिया। विविधता को दरकिनार कर उनके एकता के पहलू खोजने के जरिए मानकीकरण करने पर बल देना दरअसल उनकी स्वतंत्र हैसियत को नकारना था। यह भेद-भाव की नीति की उपज थी। इसी नीति के तहत वह संस्कृत को भाषाओं की भाषा का दर्जा देती है। फिर तो आप मानकीकरण में समाए इस भाव के अपने-आप शिकार हो जाते हैं कि कुछ भाषाएं उच्च कुल की हैं, कुछ नीच कुल की और कुछ पिछड़े कुल की। और इस तरह भाषाओं के भीतर अगड़ा-पिछड़ा, दलित भाषाओं का भेद पैदा होने लगता है। और यह हुआ भी है।

                संस्कृत को न केवल जीवित भाषा का दर्जा दिया गया बल्कि अन्य भाषाओं को यह नसीहत भी दी गई कि वे ज्यादा से ज्यादा शब्द संस्कृत से लें। संस्कृत से लेकर अपना शब्द भंडार बढ़ाने को राष्ट्रीय एकता मजबूत बनाने का पर्याय बना दिया गया। और इस हिसाब से हिंदी को सबसे अग्रगणी घोषित किया गया क्योंकि यह माना गया कि हिंदी सीधे संस्कृत के पेट से निकली है। जैसे साझा संस्कृति या कहिए सांस्कृतिक एकता का भार संस्कृत ढोती थी उसी तरह आधुनिक भाषा में राष्ट्रीय एकता का भार हिंदी ढोएगी। इस समूचे चक्कर को बाकायदा संवैधानिक रूप दे दिया गया। इस निर्देश के साथ कि हिंदी अपने शब्द भंडार का विस्तार खास तौर पर संस्कृत के शब्द भंडार से शब्द लेकर करेगी।

                लेकिन हुआ क्या? संस्कृत से शब्द लेते-लेते, ‘संस्कृत के पेट से जनमी हिंदी’, संस्कृत के पेट में समाने लगी। कुछ और ज्यादे बदशक्ल होकर। शब्द भंडार संस्कृत का, वाक्य प्रकार अंग्रेजी का। रंग नारंगी का और ढंग फिरंगी का। मुस्टंडे को क्या चाहिए तो हाथ में एक डंडा। और राष्ट्रीय एकता का डंडा लेकर घूमने लगी हिंदी, अपनों से भी बेगानी बनकर। अब अगर डंडा मारकर आप लोगों को स्वर्ग में ही सही ले जाएं तो कौन जाएगा भला।

                कुछ लोगों को यह हिंदी की अपनी निजी प्रकृति लगती है। लेकिन यह हिंदी की अपनी प्रकृति नहीं है। यह पाई प्रकृति है जिसे हिंदी को ओढ़ा दिया गया है। याद रखिए आप किसी भाषा से सिर्फ शब्द भंडार नहीं ले सकते। उसके साथ आपको कमोबेश उसका समूचा संसार, उसकी संस्कृति, उसका संस्कार भी बरबस लेना पड़ता है। संस्कृत के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का बैठाया गया यह रिश्ता एक सोची-समझी नीति का परिणाम है। भाषा के भीतर समाया यह ब्राह्मणवाद है जिसका शिकार सबसे ज्यादा हिंदी हुई है, इससे निजात पाना भाषाओं के प्रति जनतांत्रिक रवैया अपनाने के लिए बेहद जरूरी है। प्रसंगवश यह भी कि इस ब्राह्मणवाद की दूसरी भुजा हिंदू सांप्रदायिकता भी है। इसका भाषाई प्रमाण भी आप देखें तो हिंदी न केवल अपनी बोलियों से दूर जा बैठी बल्कि उर्दू से बैर मोल लेने की हद तक जा पहुंची है। उसी उर्दू से जिसकी वह सहोदर है, जिन्हें कभी एक ही नाम से जाना जाता था। प्रतिक्रिया में उर्दू के भीतर मुल्लावाद ने सर उठाया। वह फारसी होने लगी। आखिर ब्राह्मणवाद, मुल्लावाद भी तो सहोदर हैं।

                जब हमारे शासक वर्ग को यह लगने लगा कि अपने इस रूप में हिंदी बोझ बनने लगी है तो उसमें सुधार के लिए चट उसने दूसरा नुस्खा थमाया। हिंदी को चाहिए कि वह अपना शब्द भंडार अंग्रेजी और अन्य दूसरी भारतीय भाषाओं से भी ले। अन्य भारतीय भाषाओं से भी …. करनी में होना है अंग्रेजी से लेना। और आजकल टीवी धारावाहिकों और अन्य कार्यक्रमों में जिस तरह की हिंदी अख्तियार की जा रही है, उसे लोग हिंगरेजी कहने लगे हैं। तो जनाब अब भी आपको यह मानने में शक है कि हमारा शासक वर्ग मिजाज से यूरोइंडियन है?

                लेकिन जनजीवन के स्तर पर हिंदी ने दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रखा है। हिंदी का बिहारी रूप, बिहारी हिंदी के बतौर तो खासा परिचित है ही। इसी राह पर उसके और भी किसिम-किसिम के रूप आप देख सकते हैं। कहीं बंगाली हिंदी, कहीं मेघालयी और कहीं तमिल हिंदी आदि रूपों में। फिल्मी हिंदी से तो शायद ही कोई अपरिचित हो। अपने जन चरित्र को विकसित करने में हिंदी को किसी बनावटी शुद्ध रूप की चिंता नहीं है। यही उसका मूल स्वभाव रहा है। भक्ति आंदोलन से उपजा हिंदी-उर्दू का यह स्वभाव ही आजादी के दिनों में सबके दुलार का कारण बना था। इससे अलग होकर वह सबके हिकारत का पात्र बन रही है। खुद उनके हिकारत का भी जिनके बीच वह बोली जाती है। अपने इस जीवन-रूप के लिए ‘हिंदी अधिकारियों’, ‘हिंदी सेवकों’, ‘संवैधानिक व्यवस्थाओं’ की मुहताज नहीं है। इसका जीवन-रूप संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करके ही विकसित हुआ है। वरना हिंदी सेवकों ने इसे मार डालने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी है।

                भाषा में समाया ब्राह्मणवाद हिंदी तक ही नहीं सीमित है। इसका असर कमोबेश सभी प्रांतीय भाषाओं पर भी है। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक स्तर पर कमोबेश हुआ। लेकिन यह अंत नहीं है। हर प्रदेश की राज्य भाषा अपने प्रदेश की अन्य दूसरी भाषाओं, बोलियों के साथ भेदभाव बरतती दिखती है। इस प्रक्रिया में उनका भी विकास पथरा रहा है, लेकिन उनका भी जीवनगत रूप दूसरा ही रास्ता अख्तियार कर रहा है, वैसा ही जैसा हिंदी ने अपना रखा है। भारतीय भाषाओं के बीच यह रिश्ता ही भविष्य की एकता का नया आधार है।

                भाषाओं का जनतंत्र जनता के जनतंत्र से सीधे जुड़ा हुआ है। तत्सम के खिलाफ देशज का विद्रोह आज सभी भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी का जीवन-स्रोत है वरना वह राम-प्यारी हो जाएगी।

यह आलेख इस ब्लॉग पर उपलब्ध है।



narayan prasad

unread,
May 29, 2013, 3:07:09 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
कृपया रामजी राय की शैक्षणिक योग्यता के बारे में कुछ परिचय दें । हो सके तो आप अपनी टिप्पणी भी दें । फिर मैं अपनी टिप्पणी दूँगा ।
--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ) <translate...@gmail.com>

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

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May 29, 2013, 3:14:53 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
नारायण जी,

आज मैं समयाभाव के कारण आपको लेखक के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे पाऊँगा। जहाँ तक मुझे मालूम है, वे हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हैं। मैंने उनकी एक किताब हाल ही में किसी दुकान में देखी है। मैं कल इस चर्चा को आगे बढ़ाऊँगा। आप इस बीच अपनी राय दे सकते हैं।

सादर,

सुयश


29 मई 2013 12:37 pm को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:
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lalit sati

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May 29, 2013, 3:19:35 AM5/29/13
to ha
यदि वह प्रसिद्ध आचोलक हैं तो यह लेख देखने के बाद हिंदी आलोचना की वर्तमान स्थिति (किंवा दुर्दशा) को समझा जा सकता है।

narayan prasad

unread,
May 29, 2013, 3:26:14 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
<<जहाँ तक मुझे मालूम है, वे हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक हैं। मैंने उनकी एक किताब हाल ही में किसी दुकान में देखी है। मैं कल इस चर्चा को आगे बढ़ाऊँगा।>>

केवल इतना ही बताइए कि उनका तकनीकी विषयों का ज्ञान किस स्तर का है । यदि ज्ञान केवल सामान्य साहित्य तक ही सीमित है तो उनका यह विचार बकवास है ।

--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ) <translate...@gmail.com>
नारायण जी,

Vinod Sharma

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May 29, 2013, 3:31:54 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
भाषा को लेकर मतांतर कोई नई बात नहीं है। लेखक ने कुछ मुद्दे उठाए हैं लेकिन आरंभ से लेकर अंत तक उनका पूर्वाग्रह साफ झलकता है, वैसा ही जैसा मायावती के अनुयायियों या तथाकथित वामपंथियों में दिखाई देता है। 

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bestregards.gif
विनोद शर्मा


lalit sati

unread,
May 29, 2013, 4:17:16 AM5/29/13
to ha
मेरे विचार से "मायावती के अनुयायियों या तथाकथित वामपंथियों " जैसे सूत्रीकरण में लेख की आलोचना को समेट देना उचित न होगा। यह तो तथ्य है कि हमारे समाज में वर्गीय के साथ ही साथ जातीय स्तर पर गैर-बराबरी रही है, आज भी है। भाषा इससे अछूती कैसे रह सकती है, इसका प्रभाव भाषा पर भी पड़ा। राज-काज-समाज पर जिनका नियंत्रण रहता है, प्राय: उन्हीं की संस्कृति, उन्हीं की भाषा प्रभावी रहती है, यह भी सही है। लेकिन ये सही बातें भी इतनी सरल रूप में नहीं हैं कि इनको नारे के रूप में कह दिया जाए। जटिल अंतर्संबंधों का उल्लेख किए बिना या उनकी उपेक्षा कर यह कह देना कि शासक वर्ग की चाहत के अनुरूप ही भाषा का प्रवाह बना रहा, बहुत सरलीकरण है। लेकिन लेख से ऐसा ही ध्वनित होता है। इस लेख के लेखक से इसीलिए मेरी अपेक्षा यह है कि भाषा पर कोई भी दार्शनिक विमर्श बहुत यांत्रिक ढंग से न हो तो बेहतर रहे।

नारायण जी से अनुरोध है कि लेखक की जन्मपत्री देखने के बजाय लेख पर अपने विचार रखें तो हम सभी उससे लाभान्वित होंगे। लेखक की क्या शैक्षणिक योग्यता है इससे क्या तय होता है? हालांकि नारायण जी इस पर प्रकाश डालें तो हो सकता है इसके औचित्य को मैं भी समझ सकूं।


2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Anil Janvijay

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May 29, 2013, 4:20:24 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
नारायण जी,
मेरा ख़याल है कि यह लेख इतना गम्भीर नहीं है कि इस पर बहस करके समय ख़राब किया जाए। वैसे भी रामजी राय संस्कृत-हिन्दी के या भाषा के विद्वान नहीं हैं। सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध करने से विरोध नहीं होता है। अतार्किक बातों का कोई उत्तर नहीं हो सकता है। इसलिए हम इसे अगर यूँ ही छोड़ दें तो उचित रहेगा।
सादर
अनिल

2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



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anil janvijay
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narayan prasad

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May 29, 2013, 4:25:35 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
<<मेरा ख़याल है कि यह लेख इतना गम्भीर नहीं है कि इस पर बहस करके समय ख़राब किया जाए।>>

पूर्णतः सहमत ।

--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

Vinod Sharma

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May 29, 2013, 4:26:42 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
लेखक के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने की बात पर मैं अभी भी कायम हूँ। प्रथमतः लेखक ने एक शब्द ‘ब्राह्मणवाद’ को लक्षित करके अपने तर्कों को रखने का प्रयास किया है। दूसरे लेख बहुत ही सतही सामान्यीकरण का शिकार है। कहीं-कहीं लेखक भ्रमित-सा भी प्रतीत होता है। लेखक ने कुछ मुद्दों को उठाने का प्रयास अवश्य किया है, लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के चलते सही दिशा में बढ़ने की बजाय घूम-फिर कर वही ब्राह्मणवाद पर आ जाता है। लेखक के इस भटकाव से तो नहीं लगता कि वह कोई स्तरीय समालोचक हो सकता है।   
2013/5/29 lalit sati <lalit...@gmail.com>

narayan prasad

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May 29, 2013, 4:30:38 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
<<आरंभ से लेकर अंत तक उनका पूर्वाग्रह साफ झलकता है, वैसा ही जैसा मायावती के अनुयायियों या तथाकथित वामपंथियों में दिखाई देता है। >>

बिलकुल सही ।

--- नारायण प्रसाद
2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

अरुण कुमार

unread,
May 29, 2013, 4:39:07 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com



2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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<<भैया हिंदी संस्कृत से नहीं निकली है। उसका स्वतंत्र, भिन्न आधार है। नहीं तो संस्कृत में रामः गच्छति और सीता गच्छति अर्थात राम (पुलिंग और सीता (स्त्रीलिंग) दोनों के लिए गच्छति तो वह किस व्याकरण के किस नियम से हिंदी में राम जाता है और सीता जाती है हो जाता है यह कोई हमें बताए।>>

संस्कृत-हिन्दी के या भाषा के विद्वानों से अनुरोध है कृपया इस पर भी प्रकाश डालें। 

-- 
अरुण कुमार

Dr. Paritosh Malviya

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May 29, 2013, 5:15:32 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा है कि लेखक आखिर सिद्ध क्‍या करना चाहते हैं। उनकी योग्‍यता पूछना तो जायज नहीं है परंतु इतना अवश्‍य है कि यह लेख पूर्वाग्रह ग्रस्‍त दिखता है। ब्राहाणवाद को गरियाना भी प्रगतिशीलता मानी जाती है इन दिनों। हिंदी के विकासक्रम पर इतना व्‍यापक शोध हुआ है कि इसके उद्गम के बारे में कुछ नया सिद्ध करने की आवश्‍यकता नहीं है। क्‍या हम सभी सांप गुजर जाने के बाद लकीर नहीं पीट रहे हैं। 


2013/5/29 अरुण कुमार <akvi...@gmail.com>



--
Dr. Paritosh Malviya
Gwalior

narayan prasad

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May 29, 2013, 6:31:03 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
विस्तृत विवेचन के लिए देखें - पं॰ किशोरीदास वाजपेयी (1998): “हिन्दी शब्दानुशासन”, पंचम संस्करण, संवत् 2055 वि॰; नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; कुल - 12+4+40+8+6+608 पृष्ठ । पुनर्मुद्रण - विष्णुदत्त राकेश द्वारा सम्पादित “आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली", वाणी प्रकाशन, 2-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली; 2008 ई॰ ।

--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 अरुण कुमार <akvi...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
May 29, 2013, 6:53:55 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
<<उनकी योग्‍यता पूछना तो जायज नहीं है>>

इस प्रश्न के पीछे छिपे व्यंग्य पर शायद आपने ध्यान नहीं दिया । लेखक की योग्यता तो अभिव्यक्त विचारों से ही स्पष्ट हो जाता है ।

--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 Dr. Paritosh Malviya <malviya...@gmail.com>

डॉ एम एल गुप्ता (Dr. M.L. Gupta)

unread,
May 29, 2013, 7:01:11 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
यह सही है कि कुछ लोग हर मामले में अपने पूर्वाग्रह  ढूँढ़ ही लेते हैं।
अनुरोध है कि मेहरबानी करके हम सभी को  भाषा को जाति - घर्म के संकीर्ण दायरे से दूर रखना चाहिए। 
ध्यान रहे भाषा  और ज्ञान का चोली-दामन  का साथ है। 



2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Yogendra Joshi

unread,
May 29, 2013, 8:02:48 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com

किसी भी विषय पर लोगों के बीच मतैक्य हो यह असंभव-सा है। आम तौर पर लोग पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होते ही हैं जो कदाचित उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि, ग्रहण की गयी शिक्षा एवं संबंधित संस्थान, व्यवसाय आदि पर निर्भर करता है। अगर ऐसा कुछ न होता तो दुनिया में धर्मो की विविधता न होती, राजनैतिक सोच सर्वत्र एक होती, अलग-अलग समुदायों में नैतिकता की एक ही परिभाषा होती, और सभी लोग एक ही भाषा बोल रहे होते।

इस धरती पर डार्विन के विकासवाद को न मानने वाले मानने वालों से शायद बहुत अधिक होगे। लेकिन जो मानते है वह यही कहते हैं कि भिन्न-भिन्न जैविक प्रजातियां किसी न किसी मूल प्रजाति के वंशजों के रूप में  परिस्थितियों के दबाव के तहत इस प्रकार विकसित हुईं कि आज वे परस्पर भिन्न नजर आती हैं। भाषाविज्ञानी भी भाषाओं के विकास को कुछ इसी प्रकार देखते हैं। जब मैं ऋग्वेद की ऋचाओं का अध्ययन करने बैठा तो पाया कि उसकी संस्कृत (वैदिक संस्कृत) लौकिक संस्कृत से इतनी अलग है कि उन्हें अपने सीमित संस्कृत ज्ञान से समझ नहीं सका। इतना अंतर मैंने यजुर्वेद में नहीं पाया। (ऋग्वेद का काल अधिक पुराना माना जाता है।) संस्कृत स्वयं भी विकास की ऐसी यात्रा से गुजरी कि वह कालांतर में प्राकृत के बदले ‍’‍संस्कारित’ कहलाने लगी। अत: भाषाओं का एक-दूसरे से जन्म लेने की व्याख्या उतनी सरल-सपाट नहीं है जितना मोटे तौर पर लोग सोचते होंगे।

मेरी अपनी बोली पूर्वी उत्तराखंड में प्रचलित ’कुमाऊंनी’ रही है। लेकिन जब पूर्व के नेपाल सीमा से पश्चिम में रानीखेत-द्वाराहाट के ओर चलता हूं तो बोली में तमाम फ़्रर्क दिखने लगते हैं। मैं एवं मी, पाणि एवं पानि, ’कि कूंणौछे’ एवं ’कि कुन मर्योछे’ (क्या कह रहे हो) जैसे अंतर दिखते हैं। कुमाउंनी को हिंदी की dialect माना जाता है, लेकिन उसमें ’है’ की जगह ’छ’ प्रयोग होता है। कभी-कभी वह गुजराती के निकट प्रतीत होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि भाषाई विविधता को सहजता से ग्रहण किया जाना चाहिए।

मुझे याद आता है जब वर्षों पहले डीएमके नेता करुणानिधि ने कहा था कि लोगों को तमिल से सभी संस्कृत शब्दों को हटा देना चाहिए। ऐसा उन्होंने शायद उत्तरभारतीय भाषाओं (हिंदी?) के प्रति अपनी घृणा के कारण कहा था। तब किसी ने टिप्पणी की थी कि क्या वे अपना नाम (संस्कृत शब्द) भी बद्ल डालेंगे।

आम प्रचलन की भाषाएं निस्संदेह सुविधाजनक होती हैं, लेकिन उनमें शब्द रचना के कारगर नियम नहीं होते हैं ऐसा मेरा मानना है। तब उन्हें अन्य भाषाओं पर निर्भर होना पड़ता है, खास तौर पर तथाकथित क्लैसिकल लैंग्वेजेज पर। जिस अंगरेजी की वकालत हम रातदिन करते है वह स्वयं लैटिन एवं ग्रीक का मुख ताकती है। एक वैज्ञानिक के नाते मैं जानता हूं कि विज्ञान के प्रायः सभी पारिभाषिक शब्द इन्हीं पर आधारित है। भारतीय भाषाओं के लिए यही भूमिका संस्कृत निभाती है। यह मेरी समझ से परे है कि संस्कृत से कुछ लोगों को इतना परहेज क्यों है? सवाल अधिक अहम हो जाता है जब अंगरेजी के शब्दों को हिंदी में ठूंसने का विरोध कोई नहीं करता। -योगेन्द्र जोशी



29 मई 2013 4:31 pm को, डॉ एम एल गुप्ता (Dr. M.L. Gupta) <mlgd...@gmail.com> ने लिखा:

Vinod Sharma

unread,
May 29, 2013, 9:51:27 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
थोड़ी सी इंटरनेट पर खोज की तो पाया कि स्वनामधन्य रामजी राय कम्यूनिस्ट पार्टी के  जन संस्कृति मँच से जुड़े हैं, अर्थात साम्यवादी विचारधारा के व्यक्ति हैं- स्वाभाविक है प्रगतिशील हैं। एक ई-पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक हैं। खुद को बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध की धारा में शामिल मानते हैं। उनकी पत्रिका का “प्रधान वाक्य” है-प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका। व्यवस्था को गरियाना प्रगतिशीलता की निशानी होता है, संभवतः उसी धर्म का पालन करते हैं। अतः उनको प्रसिद्ध आलोचक सही ही कहा गया है, समालोचक नहीं।



2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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Anil Janvijay

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May 29, 2013, 10:26:43 AM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
विनोद जी, 
मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ। मैं भी कम्युनिस्ट हूँ। मैं भी साम्यवादी हूँ। मैं प्रगतिशील भी हूँ और व्यवस्था को भी ख़ूब गरियाता हूँ। लेकिन फिर भी उस लेख के बारे में मेरी क्या राय है, मैं पहले  लिख चुका हूँ। उस लेख के जन्म लेने में साम्यवाद, कम्युनिज्म और प्रगतिशीलता का कोई दोष नहीं है। वह लेख किस उद्देश्य से लिखा गया है, यह तो रामजी राय जानते होंगे, लेकिन वह बड़ा गड़बड़ और घटिया लेख है,इसमें कोई शक नहीं।
'प्रसिद्ध आलोचक' होने का मतलब 'अच्छा आलोचक' होना नहीं होता है। ऐसे न जाने कितने 'प्रसिद्ध आलोचक' हिन्दी में अपना झण्डा गाड़कर बैठे हुए हैं। मैंने तो पहले ही कहा है कि इस लेख को लेकर अपना समय ख़राब करेंगे हम सब। हो सकता है कि इसी उद्देश्य से वह लेख लिखा गया है कि 'प्रसिद्धि' थोड़ी और मिल जाए। लेकिन प्रसिद्ध होने का मतलब 'सिद्ध' होना तो नहीं होता।
सादर
अनिल
2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>
थोड़ी सी इंटरनेट पर खोज की तो पाया कि स्वनामधन्य रामजी राय कम्यूनिस्ट पार्टी के  जन संस्कृति मँच से जुड़े हैं, अर्थात साम्यवादी विचारधारा के व्यक्ति हैं- स्वाभाविक है प्रगतिशील हैं। एक ई-पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक हैं। खुद को बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध की धारा में शामिल मानते हैं। उनकी पत्रिका का “प्रधान वाक्य” है-प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका। व्यवस्था को गरियाना प्रगतिशीलता की निशानी होता है, संभवतः उसी धर्म का पालन करते हैं। अतः उनको प्रसिद्ध आलोचक सही ही कहा गया है, समालोचक नहीं।



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Dr. Alok Kumar Srivastava

unread,
May 29, 2013, 10:44:02 PM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
बहुत अजीब लग रहा है आज की चर्चा देखकर। सुयश जी द्वारा पेश किए गए लेख की शैली व्यंग्य की है, तथापि उसकी स्थापना स्पष्ट है कि संस्कृत का जबरन थोपा जाना ठीक नहीं। आज की तारीख में यह न केवल अप्रासंगिक बल्कि अव्यावहारिक भी है । यह बात भी याद रखनी होगी कि संस्कृत हमारी हिन्दी की एकमात्र जननी नहीं है। हम यह भी जानते हैं की संस्कृत कभी लोक की भाषा नहीं रही है। वह ज्यादातर शोषकों और पोंगापंथियों की भाषा रही है। इसे भारत के राजनीतिक और धार्मिक क्रान्ति के इतिहास से समझा जा सकता है।  
लेख के विषय पर वस्तुनिष्ठ तरीके से बात करने के बजाय लेखक-परिचय पर यह आग्रह क्यों? मेरी जानकारी के मुताबिक़ श्री रामजी राय समकालीन जनमत के प्रधान सम्पादक हैं; और समकालीन जनमत कोइ ई-पत्रिका नहीं है, वह मासिक रूप में प्रकाशित होती है और मैं इस पत्रिका के लिए कई बार अनुवाद कार्य भी कर चुका हूँ ।  

lalit sati

unread,
May 29, 2013, 11:00:34 PM5/29/13
to ha
आलोक जी. आपने सही कहा। आपकी अधिकांश बातों से सहमत। लेख पर मेरी भी अपनी कुछ आपत्तियां हैं, लेकिन लेख की आलोचना के अपने तर्क प्रस्तुत न करना और उसे बकवास, कूड़ा, अपठनीय कहते हुए तिरस्कृत कर देना मुझे उचित नहीं जान पड़ता। ऊपर से "कितना पढ़े हो" वाले अंदाज़ में जन्मपत्री पता लगाना तो कतई ठीक नहीं है। ऐसा तो व्यंग्य में भी नहीं किया जाना चाहिए।



From: Dr. Alok Kumar Srivastava <trans...@gmail.com>
Date: 2013/5/30
Subject: {हिंदी अनुवादक} Re: भाषा में समाया ब्राह्मणवाद (लेखक : रामजी राय)
To: hindian...@googlegroups.com


बहुत अजीब लग रहा है आज की चर्चा देखकर। सुयश जी द्वारा पेश किए गए लेख की शैली व्यंग्य की है, तथापि उसकी स्थापना स्पष्ट है कि संस्कृत का जबरन थोपा जाना ठीक नहीं। आज की तारीख में यह न केवल अप्रासंगिक बल्कि अव्यावहारिक भी है । यह बात भी याद रखनी होगी कि संस्कृत हमारी हिन्दी की एकमात्र जननी नहीं है। हम यह भी जानते हैं की संस्कृत कभी लोक की भाषा नहीं रही है। वह ज्यादातर शोषकों और पोंगापंथियों की भाषा रही है। इसे भारत के राजनीतिक और धार्मिक क्रान्ति के इतिहास से समझा जा सकता है।  
लेख के विषय पर वस्तुनिष्ठ तरीके से बात करने के बजाय लेखक-परिचय पर यह आग्रह क्यों? मेरी जानकारी के मुताबिक़ श्री रामजी राय समकालीन जनमत के प्रधान सम्पादक हैं; और समकालीन जनमत कोइ ई-पत्रिका नहीं है, वह मासिक रूप में प्रकाशित होती है और मैं इस पत्रिका के लिए कई बार अनुवाद कार्य भी कर चुका हूँ ।  


2013/5/29 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>
विनोद जी, 
मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ। मैं भी कम्युनिस्ट हूँ। मैं भी साम्यवादी हूँ। मैं प्रगतिशील भी हूँ और व्यवस्था को भी ख़ूब गरियाता हूँ। लेकिन फिर भी उस लेख के बारे में मेरी क्या राय है, मैं पहले  लिख चुका हूँ। उस लेख के जन्म लेने में साम्यवाद, कम्युनिज्म और प्रगतिशीलता का कोई दोष नहीं है। वह लेख किस उद्देश्य से लिखा गया है, यह तो रामजी राय जानते होंगे, लेकिन वह बड़ा गड़बड़ और घटिया लेख है,इसमें कोई शक नहीं।
'प्रसिद्ध आलोचक' होने का मतलब 'अच्छा आलोचक' होना नहीं होता है। ऐसे न जाने कितने 'प्रसिद्ध आलोचक' हिन्दी में अपना झण्डा गाड़कर बैठे हुए हैं। मैंने तो पहले ही कहा है कि इस लेख को लेकर अपना समय ख़राब करेंगे हम सब। हो सकता है कि इसी उद्देश्य से वह लेख लिखा गया है कि 'प्रसिद्धि' थोड़ी और मिल जाए। लेकिन प्रसिद्ध होने का मतलब 'सिद्ध' होना तो नहीं होता।
सादर
अनिल
2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>
थोड़ी सी इंटरनेट पर खोज की तो पाया कि स्वनामधन्य रामजी राय कम्यूनिस्ट पार्टी के  जन संस्कृति मँच से जुड़े हैं, अर्थात साम्यवादी विचारधारा के व्यक्ति हैं- स्वाभाविक है प्रगतिशील हैं। एक ई-पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक हैं। खुद को बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध की धारा में शामिल मानते हैं। उनकी पत्रिका का “प्रधान वाक्य” है-प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका। व्यवस्था को गरियाना प्रगतिशीलता की निशानी होता है, संभवतः उसी धर्म का पालन करते हैं। अतः उनको प्रसिद्ध आलोचक सही ही कहा गया है, समालोचक नहीं।



2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>
<<उनकी योग्‍यता पूछना तो जायज नहीं है>>

इस प्रश्न के पीछे छिपे व्यंग्य पर शायद आपने ध्यान नहीं दिया । लेखक की योग्यता तो अभिव्यक्त विचारों से ही स्पष्ट हो जाता है ।
--- नारायण प्रसाद

2013/5/29 Dr. Paritosh Malviya <malviya...@gmail.com>
मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा है कि लेखक आखिर सिद्ध क्‍या करना चाहते हैं। उनकी योग्‍यता पूछना तो जायज नहीं है परंतु इतना अवश्‍य है कि यह लेख पूर्वाग्रह ग्रस्‍त दिखता है। ब्राहाणवाद को गरियाना भी प्रगतिशीलता मानी जाती है इन दिनों। हिंदी के विकासक्रम पर इतना व्‍यापक शोध हुआ है कि इसके उद्गम के बारे में कुछ नया सिद्ध करने की आवश्‍यकता नहीं है। क्‍या हम सभी सांप गुजर जाने के बाद लकीर नहीं पीट रहे हैं।

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Dr. Paritosh Malviya

unread,
May 29, 2013, 11:57:52 PM5/29/13
to hindian...@googlegroups.com
योगेन्‍द्र जी के विचारों से सहमत हूं। 

लेखक से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि संस्‍कृत ब्राहाणवाद की प्रतीक है, उर्दू-फारसी कठमुल्‍लावाद की तो अंग्रेजी को किस वाद में रखना चाहेंगे। भले ही संस्‍कृत हिंदी की जननी नहीं रही हो परंतु संस्‍कृत ने हिंदी की प्रकृति पर कभी कुठाराघात नहीं किया। और जिस तरह इनदिनों अंग्रेजी, हिंदी का सत्‍यानाश कर रही है, वह ज्‍यादा चिंताजनक है। इस समूह के सम्‍माननीय सदस्‍य योगेन्‍द्र जोशी जी के 'मेट्रो हिंदी' विचारक लेख में जो प्रासंगिकता थी, वह इनके लेख में कहा है। पुरातन विचार, ईश्‍वर, आस्‍था, ब्राहाण, भारतीयता, राष्‍ट्रप्रेम इत्‍यादि को सिरे से खारिज कर देना ही प्रगतिशीलता नहीं है। वह कुछ और भी है। 


2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>
विस्तृत विवेचन के लिए देखें - पं॰ किशोरीदास वाजपेयी (1998): “हिन्दी शब्दानुशासन”, पंचम संस्करण, संवत् 2055 वि॰; नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; कुल - 12+4+40+8+6+608 पृष्ठ । पुनर्मुद्रण - विष्णुदत्त राकेश द्वारा सम्पादित “आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली", वाणी प्रकाशन, 2-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली; 2008 ई॰ ।
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Pushpendra Dubey

unread,
May 30, 2013, 1:15:34 AM5/30/13
to hindian...@googlegroups.com
इस आलेख में जितने शब्द प्रयुक्त किये गए है, वे सब लेखक द्वारा स्वयं ही बनाए गए है. उन्हें यदि हम संस्कृत में ढूँढने जायेंगे तो वहां ये शब्द नहीं मिलेङ्गे. नए ज्ञान के 'आलोक' में यदि हम अपनी हस्ती को मिटा कर ही दम लेंगे तो शून्यवाद तक जरूर पहुँच जायेंगे क्योंकि शून्य कभी भी आधा नहीं बनाया जता, वह तो पूर्ण ही होता है. अब पूर्ण कहो कि शून्य कहो। क्या फर्क पड़ता है.



30 मई 2013 8:14 am को, Dr. Alok Kumar Srivastava <trans...@gmail.com> ने लिखा:
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डॉ पुष्पेन्द्र दुबे
संपादक और शोध सलाहकार 
भारतीय भाषाओँ में अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका www.shabd-braham.com ISSN 2320-0871


Yogendra Joshi

unread,
May 30, 2013, 2:17:56 AM5/30/13
to hindian...@googlegroups.com
भाषा मेरा विषय नहीं, लेकिन भाषाओं के बारे में जानने में रुचि रखता हूं। एक विज्ञानी एवं डंजीमउंजपबंस स्वहपब का उपयोक्ता होने के कारण बहसों में भाग लेने का मन हो जाता है (सेवानिवृत्त होने के कारण समय भी मिल जाता है), यह जानते हुए कि इन बहसों से ऐसे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाएगा जिससे शिक्षा, प्रशासन, राजनीति एवं आम आदमी के व्यवहार में कोई अंतर नहीं आ जाए। तदनुसार बहसों का प्रमुख उद्येश्य बौद्धिक विलासिता और यदाकदा ज्ञानवृद्धि तक सिमट जाता है । अस्तु, यह तो रहे आरंभिक दो शब्द।

आगे लेख के बारे में। मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि लेखक एवं अन्य दो-एक जन संस्कृत थोपे जाने की बात कैसे और क्यों कर रहे हैं। यह संस्कृत कहां प्रयोग हो रही है और कौन कहता है उसे या उसके शब्दों को प्रयोग में लें? पारिभाषिक शब्दावली आयोग जरूर संस्कृत को आधार मानकर शब्द गढ़ता है, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करता ही कौन है? शिक्षा, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, सर्वत्र तो अंगरेजी ही प्रयोग में ली जा रही है? संस्कृत को पूरी तरह नजरअंदाज करने पर किसी का कुछ बिगड़ेगा का क्या? थोपी तो हिंदी भी नहीं जा रही है। आप चाहें तो उसे भी भूल जाएं। राजभाषा की उपाधि के बावजूद उसे तो सरकारी तंत्र भी प्रयोग में नहीं ले रहा है। आपसे कौन कहता है कि हिंदी को और वह भी संस्कृत शब्दों के साथ प्रयोग में लें। यदि आप अंगरेजी में दक्षता हासिल नहीं कर पाएं तो संस्कृत/हिंदी का क्या दोष? रिक्शा वाले, सब्जी वाले, घरेलू नौकरानी आदि से वार्ता के लिए हिंदी के गिनेचुने शब्द चाहिए, शेष कार्य के लिए तो आपकी अंगरेजी जरूरत से अधिक है। दरअसल थोपी तो अंगरेजी जा रही है जिसके बिना किसी का काम नहीं चलने का। क्या सरकारी, क्या गैरसरकारी, सभी क्षेत्रों में तो अंगरेजी छाई है। लेकिन अंगरेजी थोपी जा रही है यह कहने से सभी तो बचते आ रहे हैं, राजनेता, प्रशासनिक कर्मी, व्यवसायी, शिक्षाविद, सभी। जब सर्वत्र अंगरेजीभक्तों का वर्चस्व हो तो थोपने वाला बचता कौन है? और यदि शिकायत यह हो कि धार्मिक अनुष्ठानों में संस्कृत क्यों इस्तेमाल होती है तो उससे भी सभी को छूट है। 

बस इतना जरूर याद रखें कि अंगरेजी से आप बच नहीं सकते इस देश में। आम आदमी की भाषा न होते हुए भी अंगरेजी से वह बच नहीं सकता।


30 मई 2013 10:45 am को, Pushpendra Dubey <prof.pu...@gmail.com> ने लिखा:

Vinod Sharma

unread,
May 30, 2013, 3:46:08 AM5/30/13
to hindian...@googlegroups.com
इस समूह में यदि किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा कोई रचना प्रस्तुत की जाती है तो निश्चय ही उसका प्रयोजन उस पर खुल कर चर्चा करना होता है। जब चर्चा होगी तो मतांतर भी सामने आएँगे। एक दो सदस्यों को छोड़ कर सभी ने यह माना है कि कि प्रश्नांतर्गत लेख की भाषा, उसमें प्रयुक्त शब्द और प्रयोजन तीनों ही लेखक के पूर्वाग्रह को प्रकट करते हैं। जैसा कि श्रद्धेय जोशीजी ने कहा है न तो संस्कृत और न ही हिंदी किसी पर लादी जा रही है। संस्कृत और हिंदी को शोषण का प्रतीक बताते हुए लेखक अपना व्यवस्था के प्रति विरोध का धर्म निभा रहा प्रतीत होता है। क्योंकि आजकी छद्म प्रगतिशीलता की प्रमुख पहचान है, जो कुछ भी आज है, जैसा भी है उसका विरोध किया जाए, स्वयं को सर्वहारा के निकट साबित करने के लिए शेष सब को बुर्जुआ साबित किया जाए। आखिर भाषा का किसी जाति से क्या संबंध–
लेकिन शीर्षक को सुर्खियों में लाने के लिए ब्राह्मणवाद शब्द का प्रयोग किया गया। ब्राह्मणवाद क्या है, कहाँ है, कैसा है– इससे कोई मतलब नहीं। एक शिगूफा छोड़ दिया –भाषा में ब्राह्मणवाद। तो क्या हिंदी केवल ब्राह्मणों की भाषा है या कभी रही है। यदि हिंदी के उद्गम के आधुनिक सिद्धांत को ही मानें तो हिंदी का जन्म तो बाजार में तिजारतियों के बीच लेन–देन की भाषा के रूप में हुआ था। इसमें ब्राह्मण को केवल इस लिए घसीटा जा रहा है ताकि उसके नाम पर आलोचना की जा सके। हाँ, संस्कृतवाद, शुद्धतावाद आदि शब्दों का इस्तेमाल किया गया होता तो उनका कोई अर्थ भी होता। आँचलिक या कबीलाई भाषाओं का अस्तित्व यदि खत्म हो रहा है तो इसके लिए संस्कृत या हिंदी जिम्मेदार नहीं है। यह तो सारी दुनिया में हो रहा है। इस लेख के लेखक को इस समूह में एक–दो सदस्यों से अधिक जानते भी नहीं थे, इसलिए उनके प्रति किसी के मन में कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है। आपत्ति केवल शीर्षक, शब्दावली और प्रयोजन को ले कर प्रकट की गई है। इसमें यह आवश्यक नहीं है कि सभी सदस्य का मत हों ही। जितने व्यक्ति होंगे उतने ही विचार होंगे। विचार भिन्न हो सकते हैं, सही या गलत नहीं। नारायणजी के प्रश्न को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि वे जानना चाहते थे कि क्या लेखक भाषाशास्त्री है या भाषा के क्षेत्र का कोई शोधकर्ता है जो इतने अधिकारपूर्वक सिद्धांत प्रतिपादित कर रहा है।   
2013/5/30 Yogendra Joshi <yogendr...@gmail.com>



--

kartik Saini

unread,
May 31, 2013, 7:04:05 AM5/31/13
to hindian...@googlegroups.com
aap ki broad minded vicharon ko salaam


2013/5/29 Yogendra Joshi <yogendr...@gmail.com>

lalit sati

unread,
Jun 2, 2013, 3:10:30 AM6/2/13
to ha
अभी-अभी फ़ेसबुक पर कवि उदयप्रकाश की एक पोस्ट पढ़ी। पोस्ट रोचक जान पढ़ी, इसलिए सोचा यहां साझा कर लूं (हालांकि यहां कोई यह पूछे कि वह कौन हैं और उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है तो शायद मैं यही कह पाऊं कि वह एक जाने-माने कवि-कथाकार हैं।)

उस पोस्ट का लिंक यह है


इसमें उन्होंने एक चुटकुला भी सुनाया है। उन्हीं के शब्दों में सुनिए

"एक दिन क्या हुआ कि स्कूल के एक 'हिंदी' अध्यापक की छुट्टी की अर्ज़ी प्रिंसपल साहेब की मेज़ तक पहुंची. उस अर्जी में लेखा हुआ था - 
''मान्यवर पूजनीय प्रिंसपल महोदय,
सविनय नम्र निवेदन है कि मेरा घींच कई दिन से बहुत पिरा रहा है इसलिए कृपा करके मुझे चार दिवस की छुट्टी दे कर अनुग्रहीत करें.
विनीत
राधेलाल तमेर,
साहित्य शिरोमणि."
प्रिंसपल ने अर्जी देखी. लिपि तो निस्संदेह 'देव-नागरी' थी, कुछ शब्द तत्सम भी थे, लेकिन कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा था. इसलिए उन्होंने स्कूल के एक दूसरे 'हिंदी' अध्यापक को बुलाया और पूछा ये 'घींच' क्या होता है ? कौन-सा अंग? 
स्कूल अध्यापक ने आश्चर्य से कहा - 'सर जी, आप 'घींच' नहीं जानते? अरे , सर घींच माने 'घोंघा' !'
'घोंघा' ? -यूपी के प्रिंसपल साहेब फिर चौंके - 'घोंघा' ? आपका आशय क्या है, बंधु ?'
'सर..सर...! 'घोंघा' माने 'नटई' !
'नटई' ? -प्रिंसपल.
'नटई' का अर्थ हुआ ''घुटकी'' !
'घुटकी' ? -प्रिंसपल.
'ओह ..सरजी, आप 'हिंदी' नहीं जानते ? 'घुटकी' मतलब 'गटई' ...!
खैर, बनारस-इलाहाबाद के 'हिंदी' आचार्य को सिर्फ़ 'गर्दन' और 'गले' तक पहुंचने के लिए १३ से अधिक 'हिंदी' शब्दों की सुरंग से गुजरना पड़ा."

इसे सुनाने के बाद वह लिखते हैं, "यह चुट्कुला इसीलिए महज एक चुटकुला नहीं रह जाता बल्कि 'हिंदी' के मानकीकरण के विराट संगठित, सांस्थानिक उद्यमों के सामने उसके विपुल शब्द भंडार को नेस्तनाबूद करने वाली एक बड़ी जातीय-पूंजीजीवी सत्ता-प्रणाली का उपनिवेश बनने के विरुद्ध किसी बहुजन-प्रतिरोध के रूप में खड़ी होती है."
 


2013/5/31 kartik Saini <karti...@gmail.com>

pushya mitra

unread,
Jun 2, 2013, 3:14:29 AM6/2/13
to hindian...@googlegroups.com
आपने इस उद्धरण के जरिये एक अच्छा सवाल उठाया है. कई पोस्ट यह इशारा कर रहे हैं की हम हिंदी के अनुवादक कई बार हिंदी के बड़े लेखकों को भी नहीं पहचानते है। उदय प्रकाश कौन हैं अगर कोई पूछ लेता है तो ... सचमुच चिंतनीय मामला होगा 


2013/6/2 lalit sati <lalit...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
Jun 2, 2013, 4:22:46 AM6/2/13
to hindian...@googlegroups.com
बहुत सुन्दर लेख ।

मगही में 'घींच' के स्थान पर 'घेंची' शब्द प्रचलित है । "पिराना" (अर्थात् दुखना, पीड़ा देना, दर्द होना) शब्द भी । इसमें 'घींच' का अर्थ होता है 'खींच'  (घींचना = खींचना)। 'घींचना' अर्थ में 'तीरना' भी प्रचलन में है । यह यूरोपीय भाषाओं में भी प्रयोग में है । जैसे - इतालवी में tirire  (= to draw) । अंग्रेज़ी के attract में भी यह अंश देखा जा सकता है ।

मानक हिन्दी में ऐसे सभी क्षेत्रीय शब्द ले लेने चाहिए जिनके लिए संगत (corresponding) हिन्दी शब्द नहीं हैं, विशेष रूप से कृषि शब्दावली । अन्य वे समानार्थी या पर्यायवाची शब्द भी लिए जा सकते हैं, जिनके कारण प्रचलित हिन्दी में किसी भ्रम की गुंजाइश न हो ।
--- नारायण प्रसाद

2013/6/2 lalit sati <lalit...@gmail.com>

lalit sati

unread,
Jun 2, 2013, 4:39:32 AM6/2/13
to ha
"मानक हिन्दी में ऐसे सभी क्षेत्रीय शब्द ले लेने चाहिए जिनके लिए संगत (corresponding) हिन्दी शब्द नहीं हैं, विशेष रूप से कृषि शब्दावली ।"

नारायण जी के उक्त कथन से पूरी तरह सहमत। मैं तो सोचता हूं कि कृषि शब्दावली बनाने में अलग-अलग कृषि विज्ञान केंद्रों के साथ समन्वय करते हुए इस प्रक्रिया में स्थानीय किसानों को शामिल किया जाना चाहिए। इसी तरह मिस्त्रियों को, कारीगरों को, दस्तकारों को शब्दावली निर्माण प्रक्रिया से जोड़ना चाहिए। समानार्थी ढूंढ़ने के लिए नए शब्द गढ़ने के लिए  तृणमूल स्तर पर प्रतियोगिताएं होनी चाहिए। इस तरह यदि अकादमिक जगत आम जन से जुड़ेगा तो हिंदी की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन यह होगा कैसे?

2013/6/2 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Jun 2, 2013, 4:55:51 AM6/2/13
to hindian...@googlegroups.com
केवल हमारे चाहने से क्या होगा?
एक बार चर्म-उद्योग और जूता-निर्माण से संबंधित एक अनुवाद के सिलसिले में
जब मुझे कहीं कोई शब्दावली नहीं मिली तो मैं कई जूता-निर्माताओं से व्यक्तिगत रूप से मिला। उम्रदराज लोगों ने कुछ शब्द बताए, नई उम्र के लोगों ने अंग्रेजी नामों का उपयोग शुरू कर दिया है। देश की क्षेत्रीय भाषाओं में विशाल शब्द भंडार है, लेकिन इसे सर्वसुलभ कराया जाना चाहिए। फिर वही ‘चाहिए’...ऐसा करेगा कौन?  
2013/6/2 lalit sati <lalit...@gmail.com>
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Yashwant Gehlot

unread,
Jun 2, 2013, 8:54:38 AM6/2/13
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
ललित जी, आपके ई-मेल में से मुझे उदय प्रकाश जी का यह वाक्य बड़ा कठिन और जटिल लगा-

 "यह चुट्कुला इसीलिए महज एक चुटकुला नहीं रह जाता बल्कि 'हिंदी' के मानकीकरण के विराट संगठित, सांस्थानिक उद्यमों के सामने उसके विपुल शब्द भंडार को नेस्तनाबूद करने वाली एक बड़ी जातीय-पूंजीजीवी सत्ता-प्रणाली का उपनिवेश बनने के विरुद्ध किसी बहुजन-प्रतिरोध के रूप में खड़ी होती है."

मानक भाषा और स्थानीय भाषा, दोनों का अपना महत्व है. दक्षिण भारत में रहते हुए मैं कई बार जीवंत हिंदी में बातचीत के लिए तरसता हूँ. कहावतें-मुहावरे अगर बोलने हैं, तो उनकी सप्रसंग व्याख्या भी साथ करनी पड़ती है. लेकिन लिखते समय इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जो हिंदी मैं लिखूँ, उसे समझने के लिए हिंदी की सामान्य समझ पर्याप्त हो.

यशवंत


lalit sati

unread,
Jun 2, 2013, 9:31:51 AM6/2/13
to ha
यशवंत जी मुझे उनका "चुटकुला" अच्छा लगा। उनके तत्संबंधी विचार विस्तार में दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं। लेकिन यह बात तो है कि हिंदी में हमारी स्थानीय भाषाओं या बोलियों से शब्द लेकर उनको प्रचलित करने के सचेत सांस्थानिक प्रयास निरंतर किए जाते तो हिंदी कहीं अधिक समृद्ध होती। निरंतर इसलिए कि नित नए शब्द पैदा होते रहते हैं और उसके अनुरूप हिंदी के शब्दकोशों के अद्यतन का कार्य हो नहीं पाता। मैं वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार के शब्द-संग्रहों, शब्दावलियों को देखता हूं तो वे बरसों पुराने नज़र आते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में हर वर्ष नए-नए शब्द जुड़ते जाते हैं।


2013/6/2 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Jun 2, 2013, 10:11:57 AM6/2/13
to hindian...@googlegroups.com
रामजी राय के लेख में मेरी आपत्ति ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द को लेकर थी।
इस लेख में भी ‘जातीय-पूँजीजीवी सत्ता प्रणाली’ में जातीय से उनका क्या अभिप्राय है  यह समझ में नहीं आया। मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि जाति का भाषा से क्या संबंध है?क्या कोई जाति विशेष हिंदी को समृद्ध बनाने में बाधक बनी हुई है? या क्या हर जाति की अलग-अलग भाषा या बोलियाँ हैं? कई बार अपनी बात को वजन देने के लिए अनजाने में किसी शब्द का बढ़-चढ़ कर प्रयोग कर दिया जाता है, चाहे वह प्रासंगिक हो या नहीं। प्रगतिशीलता के साथ यही दिक्कत है कि उनको विरोध करते हुए दिखना भी चाहिए। यदि सुर विरोधी नहीं हुए तो उनकी प्रगतिशीलता के स्तर में कहीं कुछ कमी आ सकती है। इसी क्रम में  जाति को अनावश्यक रूप से भाषा के साथ जोड़ा जाता है।
2013/6/2 lalit sati <lalit...@gmail.com>
यशवंत जी मुझे उनका "चुटकुला" अच्छा लगा। उनके तत्संबंधी विचार विस्तार में दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं। लेकिन यह बात तो है कि हिंदी में हमारी स्थानीय भाषाओं या बोलियों से शब्द लेकर उनको प्रचलित करने के सचेत सांस्थानिक प्रयास निरंतर किए जाते तो हिंदी कहीं अधिक समृद्ध होती। निरंतर इसलिए कि नित नए शब्द पैदा होते रहते हैं और उसके अनुरूप हिंदी के शब्दकोशों के अद्यतन का कार्य हो नहीं पाता। मैं वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार के शब्द-संग्रहों, शब्दावलियों को देखता हूं तो वे बरसों पुराने नज़र आते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में हर वर्ष नए-नए शब्द जुड़ते जाते हैं।

Yogendra Joshi

unread,
Jun 2, 2013, 11:03:58 AM6/2/13
to hindian...@googlegroups.com
 "यह चुट्कुला इसीलिए महज एक चुटकुला नहीं रह जाता बल्कि 'हिंदी' के मानकीकरण के विराट संगठित, सांस्थानिक उद्यमों के सामने उसके विपुल शब्द भंडार को नेस्तनाबूद करने वाली एक बड़ी जातीय-पूंजीजीवी सत्ता-प्रणाली का उपनिवेश बनने के विरुद्ध किसी बहुजन-प्रतिरोध के रूप में खड़ी होती है."
उपर्युक्त वाक्य मेरे जैसे सामान्य हिंदी के उपयोक्ताओं/जानकारों की समझ से परे है। यहां पर सवाल यह उठता है कि अभिव्यक्ति यथासंभव सरल एवं सुबोध होनी चाहिए अथवा उसे लेखक की शाब्दिक क्षमता एवं भाषाई विद्वता का द्योतक होना चाहिए? हम संस्कृत शब्दों के विपक्ष में इसलिए बोलते हैं, क्योंकि वे बहुतों को अपरिचित-से लगते हैं। परंतु मौके-बेमौके क्लिष्ट रचनाओं का भी पक्ष लेते दिखते हैं।

जहां तक आंचलिक अथवा अन्य प्रकार के शब्दों को भाषा (हिंदी) में शामिल करने का सवाल है उन्हें शब्दकोशों में जगह मिल सकती है। किंतु आम भाषाभाषी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि उसकी शब्द-संपदा बहुत सशक्त हो। बहुत-से लोग भाषा सीखते हैं और उनकी शब्द-सम्पदा अच्छी लेकिन विशाल नहीं होती। वे चुने हुए शब्दों से ही परिचित होते हैं और इन्हीं शब्दों के मामले में मानकीकरण का प्रश्न उठता है।

उठाए गये मुद्दे के संदर्भ में यह मानना पड़ेगा कि अंगरेजी की स्थिति हिंदी से बेहतर है। वहां बहुत-से भौतिक शब्दों के पर्याय ही नहीं हैं। सूरज, चांद, हवा, पानी आदि के लिए कितने शब्द सुने हैं आपने? आंख, कान, नाक, गर्दन, प्रत्येक के लिए कितने शब्द हैं? अंगरेजी में आवश्यकतानुसार ग्रीक/लैटिन भाषाओं पर निर्भर होना पड़ता है।


2 जून 2013 7:41 pm को, Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com> ने लिखा:

Yashwant Gehlot

unread,
Jun 3, 2013, 1:56:41 AM6/3/13
to हिंदी अनुवादक (Hindi Translators)
ललित जी, आपकी चिंता वाजिब है कि स्थानीय भाषाओं और बोलियों के शब्दों को शब्दकोशों में स्थान मिलना चाहिए. लेकिन शब्दकोशों में स्थान मिल जाने से उनका प्रचलन आरंभ हो जाएगा, इसमें मुझे संदेह है. भाषा का जाति से तो नहीं, संस्कृति से ज़रूर गहरा रिश्ता है. हम जो काम करते हैं, जिस माहौल में रहते हैं, जिसे हम आदर्श मानते हैं, उन्हीं से हमारा शब्द भंडार बनता है. 

मुझे लगता है कि हमारे चारों ओर बाहर से ली गई प्रणालियाँ हैं- शिक्षा, न्याय, प्रशासन, बैंक.... और अब बाज़ार भी (जैसे शॉपिंग मॉल), तो ये प्रणालियाँ अपने साथ वहाँ के शब्द लेकर आएंगी ही. हमारे आंचलिक शब्द वहीं तक साथ चलेंगे जहाँ तक हम अपनी परंपराओं और संस्कृति को साथ लेकर चलेंगे. मुझे अपने पाँच वर्षीय पुत्र को 'घट्टी' (अनाज पीसने की हाथ से चलाई जाने वाली चक्की) का अर्थ समझाना था. अब घर में पैकेट बंद आटा आता है तो घट्टी और चक्की जैसे शब्द उसके शब्द भंडार में कैसे जुड़ेंगे?

वैसे, मेरा मानना है कि जहाँ कहीं भाषा कठिन नज़र आती है, उसे कठिन बनाने में वाक्य विन्यास का योगदान ज़्यादा रहता है, विभिन्न शब्दों के प्रयोग का नहीं. वाक्य सरल हों तो कई बार शब्द अपना अर्थ स्वयं व्यक्त कर देते हैं. आचार्य द्विवेदी का यह वाक्य देखिए- जिसका मन अपने वश में नही है, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है...  मैं चाहता ही नहीं कि छंदावर्तन की जगह कोई 'सरल' शब्द काम में लिया जाए. जो अर्थ छंदावर्तन से निकल रहा है, शायद कोई सरल शब्द उसकी छटा के आस-पास भी न पहुँच पाए.
मेरा मानना है कि पाठक/श्रोता वर्ग को ध्यान में रखते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग भी करना चाहिए. वरना शब्द भंडार के मामले में हम और गरीब होते जाएंगे.
यशवंत 


2013/6/2 lalit sati <lalit...@gmail.com>

Suyash Suprabh (सुयश सुप्रभ)

unread,
Jun 4, 2013, 2:54:45 AM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
यह देखकर अच्छा लग रहा है कि रामजी राय के आलेख से निकली बात अब हिंदी में क्षेत्रीय शब्दों के महत्व को स्वीकार करने तक पहुँच गई है। 

तकनीकी शब्दों के मामले में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में हम सभी जानते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब हिंदी में कुछ लोग अभिव्यक्‍ति के तमाम संदर्भों में संस्कृत से आए शब्दों का प्रयोग करने की बात करने लगते हैं। जनता से संपर्क करते समय सरकारी अधिकारियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तमाम संदर्भों में तत्सम शब्दों से काम नहीं चलता है। अंग्रेज़ी में प्रसंग के हिसाब से शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान दिया जाता है, लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता है। संस्कृत से शब्द लेने और संस्कृत पर निर्भर हो जाने में अंतर होता है। जब तक इस अंतर पर बात नहीं होगी, तब तक हिंदी में संस्कृत से आए शब्दों के प्रयोग पर सार्थक चर्चा नहीं हो पाएगी।  

सादर,

सुयश


2 जून 2013 12:44 pm को, pushya mitra <push...@gmail.com> ने लिखा:

narayan prasad

unread,
Jun 4, 2013, 5:40:13 AM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
<<आपकी चिंता वाजिब है कि स्थानीय भाषाओं और बोलियों के शब्दों को शब्दकोशों में स्थान मिलना चाहिए. लेकिन शब्दकोशों में स्थान मिल जाने से उनका प्रचलन आरंभ हो जाएगा, इसमें मुझे संदेह है.>>

फिर भी हिन्दी कोश में इनको शामिल करना तो हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए आवश्यक है । पर्यायवाची शब्दों को शामिल करने की अपेक्षा वैसे शब्दों को लेना विशेष हितकर होगा जो हिन्दी में तत्तद् अर्थों में अभी तक कोई शब्द नहीं हैं । कृषि शब्दावली में क्षेत्रीय भाषाओं में साधारणतः ऐसे शब्द होते हैं जो हिन्दी कोशों में उपलब्ध नहीं ।

क्षेत्रीय भाषाओं के कुछ शब्द पर्यायवाची प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु वस्तुतः कई मामलों में ऐसा नहीं होते । जैसे - कच्चे और पके फल के कई स्टेज के शब्द मगही में हैं - बतिया, फुलबतिया, कोहड़ी, डम्भक, पक्कल, जुआल, पोकठाल । उसी तरह 'लाठी' या 'डंडा' के भी कई स्टेज होते हैं - गाभा, लाठी, चाभा, छड़ी, छकुनी, डंटा, पइना, अरउआ, सट्टी । उबहन (या 'उगहन') 'रस्सी' का पर्यायवाची नहीं है, जैसे 'भौं', 'दाढ़ी', 'मूँछ' आदि सभी केश ही हैं, परन्तु समानार्थी नहीं हैं ।

कोशों में क्षेत्रीय शब्दों को जगह देने से उनका प्रचलन आरंभ नहीं हो जाएगा तो क्या उन्हें शामिल करना ठीक नहीं होगा ? सन् 1989 में प्रकाशित ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के द्वितीय संस्करण में पाँच लाख से भी अधिक शब्द हैं, जिसमें किसी भी शब्द का परित्याग नहीं किया गया, चाहे वह कितना ही गँवारू या रूक्ष या उच्च तकनीकी स्तर का क्यों न हो । (संलग्न उद्धरण देखें) । लेकिन कितने लोगों को बीस हजार से अधिक शब्द ज्ञात होंगे ? लेखकों को अपने विचार व्यक्त करने के लिए शब्दों की कमी महसूस नहीं होनी चाहिए । अतः बृहत् कोश की आवश्यकता तो होती ही है ।

--- नारायण प्रसाद
************************************   
"The Second Edition, published in 1989, is the culmination of the latest stage in the development of the Oxford English Dictionary – a 132 year process which produced twenty magnificent volumes, 22000 pages defining over half a million words.”  and “I have taken this book .....  and pored over great many pages; booking for omissions. Nothing is omitted, nothing however slangy or scabrous or high-tech".
************************************   


2013/6/3 Yashwant Gehlot <yge...@gmail.com>

lalit sati

unread,
Jun 4, 2013, 7:51:37 AM6/4/13
to ha
अभी प्रभु जोशी का एक लेख पढ़ा। उसके कुछ अंश

"...भाषा मनुष्य द्वारा शताब्दियाँ खपा देने के बाद हासिल किया जाने वाला सर्वाधिक विराट सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। किसी भी समाज को सभ्य और सम्पन्न होने का प्रमाण, उस समाज की भाषा की उस शक्ति से प्रमाणित होता है कि उसमें ‘सम्प्रेषण’ के साथ ‘चिंतन करने’  की कितनी सामर्थ्य है? उसके पास कितना बड़ा शब्द-भण्डार है। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्दी के पास दुनिया की किसी भी भाषा से बड़ी शब्द-सम्पदा है। क्योंकि, उसके पास भाषाओं की भाषा संस्कृत ही नहीं, बल्कि सैकड़ों बोलियों और उपभाषाओं की भी अथाह शब्द-पूँजी है। उसका अपनी इन सहोदराओं से जो गहरा रक्त-संबंध है, उसी ने उसको यह शक्ति दी है।........व्याकरण भाषा की माँस-पेशियाँ होती हैं। उनके टूटने पर भाषा अपाहिज होने लगती है। उन्होंने कहा कि व्याकरण की रिजिडनेस हिन्दी को व्यापक बनने में बाधा पैदा कर रही है। उसे हटाया जाना जरूरी है। इससे हिन्दी को एक फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ मिलेगी।
कुल मिलाकर हिन्दी को फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ देने के नाम पर उसे केवल बोलचाल भर की भाषा बनाने का सुनियोजित अभियान शुरू हो गया। इस तरह की हिन्दी को बोलचाल की भाषा कहकर विज्ञापनों और फिल्मों में इस कदर प्रचारित और प्रचलित बनाया कि एक ठीकठाक सी तमीजदार हिन्दी बोलने वाला व्यक्ति युवाओं के लिये मसखरा लगने लगा।"

इस लेख का संदर्भ यद्यपि भिन्न है, किंतु फिलहाल हम जो चर्चा कर रहे हैं उस सिलसिले में इस लेख की कुल बातें प्रासंगिक जान पड़ती हैं।

पूरा लेख यहां पढ़ें -


2013/6/4 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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Vinod Sharma

unread,
Jun 4, 2013, 8:11:39 AM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
“कुल मिलाकर हिन्दी को फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ देने के नाम पर उसे केवल बोलचाल भर की भाषा बनाने का सुनियोजित अभियान शुरू हो गया। इस तरह की हिन्दी को बोलचाल की भाषा कहकर विज्ञापनों और फिल्मों में इस कदर प्रचारित और प्रचलित बनाया कि एक ठीकठाक सी तमीजदार हिन्दी बोलने वाला व्यक्ति युवाओं के लिये मसखरा लगने लगा।"
यही वास्तविकता है।
2013/6/4 lalit sati <lalit...@gmail.com>
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Anil Janvijay

unread,
Jun 4, 2013, 8:30:02 AM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
मैं प्रभु जोशी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ।  व्याकरणहीन  होते ही हिन्दी श्रीहीन हो जाएगी। यही हो रहा है। अन्य भाषाओं (यानी बोलियों) से शब्द तो हम अक्सर लेते ही हैं। 

2013/6/4 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



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Dhananjay Chaube

unread,
Jun 4, 2013, 8:55:23 AM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
हिंदी को कठिन कहने वाली बात मेरी समझ में नहीं आती। हमारे देश में जो बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हैं, क्या वह अंग्रेजी सरल होती है। क्या यह वास्तविकता नहीं कि पाठ्यपुस्तकों की, स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं की भाषा अंग्रेजी की सामान्य जानकारी रखने वाले व्यक्ति के लिए सहज बोधगम्य नहीं होती।

परिष्कृत अंग्रेजी से जिस समाज को कोई समस्या नहीं है, उसे परिष्कृत और सुसंस्कृत हिंदी से क्यों दिक्कत हो रही है। कारण यह है कि ऐसे अंग्रेजीभक्त लोग अंग्रेजी को तो खूब परिश्रम और मनोयोग से सीखते हैं लेकिन हिंदी को वे एक तरह की बोली मानकर उसे ठीक से सीखने के लिए समय का कोई निवेश नहीं करना चाहते और इसके परिणामस्वरूप जब उनमें हिंदी की अल्पज्ञता दिखती है, तो इसे अपनी कमी मानकर सुधारने की बजाय वे चाहते हैं कि हिंदी विशाल नदी न होकर एक छिछला नाला हो जाय, जिसे वह बिना किसी मेहनत के बड़ी आसानी से पार कर लें।

मैंने अंग्रेजी माध्यम के तमाम बच्चों से व्यक्तिगत रूप से बात की है। स्वयं मेरी शिक्षा -दीक्षा नौवीं के बाद अंग्रेजी माध्यम से ही हुई है। किसी बच्चे ने यह नहीं कहा कि हिंदी की तुलना में उसे अंग्रेजी सरल लगती है। हाँ जो लोग अंग्रेजी की मानसिक दासता स्वीकार कर चुके हैं या ऐसे दासों से प्रभावित हैं, वे दिखावे के लिए जरूर ऐसे वक्तव्य देते हैं कि मुझे तो अंग्रेजी ही सरल लगती है।

सविनय
धनंयज


4 जून 2013 6:00 pm को, Anil Janvijay <anilja...@gmail.com> ने लिखा:

Yogendra Joshi

unread,
Jun 4, 2013, 1:01:26 PM6/4/13
to hindian...@googlegroups.com
दुनिया कि कौन-सी भाषा सरल और कौन-सी कठिन है? जवाब कोई नहीं दे सकता। एक चीनी (आइ मीन चाइनीज़) के लिए हिंदी, अंगरेजी कठिन होती हैं। दरअसल सरल/कठिन इस पर निर्भर करता है कोई किस तरीके से पला-बढ़ा है, किस माहौल में रहा है, किस व्यवसाय में कार्यरत रहा है, और उसकी अभिरुचियां क्या रही हैं। अपने देश की स्थिति यह है यहां अंगरेजी सर्वत्र छाई हुई है। हर व्यवसाय अंगरेजी पर टिका है। लोग सामान्य बातचीत भले ही हिंदी में करते हों, वे विशेषज्ञता के स्तर पर और "इंटेलेक्चुअल डिस्कोर्सेज़" में अंगरेजी ही प्रयोग करते हैं। हिंदी "न्यूज़ चैनलों" में तक हिंदी वाक्य-विन्यास के साथ अंगरेजी शब्द ही सुनने को मिलते हैं। क्या यह सच नहीं कि ये चैनल सुरक्षा तत्र के स्थान पर "सिक्योरिटी सिस्टम", सर्वोच्च न्यायालय के स्थान पर "सुप्रीम कोर्ट", राजनैतिक दलों के स्थान पर "पॉलिटिकल पार्टीज़", आदि शब्द इस्तेमाल करते है?। जब कानों में हर समय अंगरेजी शब्द ही पड़ें तो वे सुपरिचित लगेंगे ही। इसलिए जो अंगरेजी के आदी हो चुके हों वे अंगरेजी को आसान कहेंगे ही। हम जब विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर (फ़िज़िक्स) छात्रों को अपना "प्रेज़ेन्टेशन" पेश करने को कहते थे तो उन्हें यह छूट भी देते थे कि वे हिंदी में बोलें भले ही तमाम अंगरेजी के शब्द प्रयोग में लें। तात्पर्य यह है कि सभी छात्र अंगरेजी में स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर सकते थे। भाषा संबंधी वास्तविकता बहुत पेचीदी है।


4 जून 2013 6:25 pm को, Dhananjay Chaube <anan...@gmail.com> ने लिखा:

kartik Saini

unread,
Jul 19, 2013, 7:20:09 AM7/19/13
to hindian...@googlegroups.com
वैसे अक्सर देखा है कि जो जितनी क्लिष्ट अंग्रेजी लिखता है उसे उतना ही विद्वान माना जाता है तो थोड़ी संस्कृतमय हिंदी हो तो उसे क्लिष्ट कहकर ख़ारिज क्यूँ किया जाए.  


2013/6/2 Yogendra Joshi <yogendr...@gmail.com>
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