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नारायण जी,
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<<भैया हिंदी संस्कृत से नहीं निकली है। उसका स्वतंत्र, भिन्न आधार है। नहीं तो संस्कृत में रामः गच्छति और सीता गच्छति अर्थात राम (पुलिंग और सीता (स्त्रीलिंग) दोनों के लिए गच्छति तो वह किस व्याकरण के किस नियम से हिंदी में राम जाता है और सीता जाती है हो जाता है यह कोई हमें बताए।>>
संस्कृत-हिन्दी के या भाषा के विद्वानों से अनुरोध है कृपया इस पर भी प्रकाश डालें।
किसी भी विषय पर लोगों के बीच मतैक्य हो यह असंभव-सा है। आम तौर पर लोग पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होते ही हैं जो कदाचित उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि, ग्रहण की गयी शिक्षा एवं संबंधित संस्थान, व्यवसाय आदि पर निर्भर करता है। अगर ऐसा कुछ न होता तो दुनिया में धर्मो की विविधता न होती, राजनैतिक सोच सर्वत्र एक होती, अलग-अलग समुदायों में नैतिकता की एक ही परिभाषा होती, और सभी लोग एक ही भाषा बोल रहे होते।
इस धरती पर डार्विन के विकासवाद को न मानने वाले मानने वालों से शायद बहुत अधिक होगे। लेकिन जो मानते है वह यही कहते हैं कि भिन्न-भिन्न जैविक प्रजातियां किसी न किसी मूल प्रजाति के वंशजों के रूप में परिस्थितियों के दबाव के तहत इस प्रकार विकसित हुईं कि आज वे परस्पर भिन्न नजर आती हैं। भाषाविज्ञानी भी भाषाओं के विकास को कुछ इसी प्रकार देखते हैं। जब मैं ऋग्वेद की ऋचाओं का अध्ययन करने बैठा तो पाया कि उसकी संस्कृत (वैदिक संस्कृत) लौकिक संस्कृत से इतनी अलग है कि उन्हें अपने सीमित संस्कृत ज्ञान से समझ नहीं सका। इतना अंतर मैंने यजुर्वेद में नहीं पाया। (ऋग्वेद का काल अधिक पुराना माना जाता है।) संस्कृत स्वयं भी विकास की ऐसी यात्रा से गुजरी कि वह कालांतर में प्राकृत के बदले ’संस्कारित’ कहलाने लगी। अत: भाषाओं का एक-दूसरे से जन्म लेने की व्याख्या उतनी सरल-सपाट नहीं है जितना मोटे तौर पर लोग सोचते होंगे।
मेरी अपनी बोली पूर्वी उत्तराखंड में प्रचलित ’कुमाऊंनी’ रही है। लेकिन जब पूर्व के नेपाल सीमा से पश्चिम में रानीखेत-द्वाराहाट के ओर चलता हूं तो बोली में तमाम फ़्रर्क दिखने लगते हैं। मैं एवं मी, पाणि एवं पानि, ’कि कूंणौछे’ एवं ’कि कुन मर्योछे’ (क्या कह रहे हो) जैसे अंतर दिखते हैं। कुमाउंनी को हिंदी की dialect माना जाता है, लेकिन उसमें ’है’ की जगह ’छ’ प्रयोग होता है। कभी-कभी वह गुजराती के निकट प्रतीत होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि भाषाई विविधता को सहजता से ग्रहण किया जाना चाहिए।
मुझे याद आता है जब वर्षों पहले डीएमके नेता करुणानिधि ने कहा था कि लोगों को तमिल से सभी संस्कृत शब्दों को हटा देना चाहिए। ऐसा उन्होंने शायद उत्तरभारतीय भाषाओं (हिंदी?) के प्रति अपनी घृणा के कारण कहा था। तब किसी ने टिप्पणी की थी कि क्या वे अपना नाम (संस्कृत शब्द) भी बद्ल डालेंगे।
आम प्रचलन की भाषाएं निस्संदेह सुविधाजनक होती हैं, लेकिन उनमें शब्द रचना के कारगर नियम नहीं होते हैं ऐसा मेरा मानना है। तब उन्हें अन्य भाषाओं पर निर्भर होना पड़ता है, खास तौर पर तथाकथित क्लैसिकल लैंग्वेजेज पर। जिस अंगरेजी की वकालत हम रातदिन करते है वह स्वयं लैटिन एवं ग्रीक का मुख ताकती है। एक वैज्ञानिक के नाते मैं जानता हूं कि विज्ञान के प्रायः सभी पारिभाषिक शब्द इन्हीं पर आधारित है। भारतीय भाषाओं के लिए यही भूमिका संस्कृत निभाती है। यह मेरी समझ से परे है कि संस्कृत से कुछ लोगों को इतना परहेज क्यों है? सवाल अधिक अहम हो जाता है जब अंगरेजी के शब्दों को हिंदी में ठूंसने का विरोध कोई नहीं करता। -योगेन्द्र जोशी
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थोड़ी सी इंटरनेट पर खोज की तो पाया कि स्वनामधन्य रामजी राय कम्यूनिस्ट पार्टी के जन संस्कृति मँच से जुड़े हैं, अर्थात साम्यवादी विचारधारा के व्यक्ति हैं- स्वाभाविक है प्रगतिशील हैं। एक ई-पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक हैं। खुद को बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध की धारा में शामिल मानते हैं। उनकी पत्रिका का “प्रधान वाक्य” है-प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका। व्यवस्था को गरियाना प्रगतिशीलता की निशानी होता है, संभवतः उसी धर्म का पालन करते हैं। अतः उनको प्रसिद्ध आलोचक सही ही कहा गया है, समालोचक नहीं।
विनोद जी,मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ। मैं भी कम्युनिस्ट हूँ। मैं भी साम्यवादी हूँ। मैं प्रगतिशील भी हूँ और व्यवस्था को भी ख़ूब गरियाता हूँ। लेकिन फिर भी उस लेख के बारे में मेरी क्या राय है, मैं पहले लिख चुका हूँ। उस लेख के जन्म लेने में साम्यवाद, कम्युनिज्म और प्रगतिशीलता का कोई दोष नहीं है। वह लेख किस उद्देश्य से लिखा गया है, यह तो रामजी राय जानते होंगे, लेकिन वह बड़ा गड़बड़ और घटिया लेख है,इसमें कोई शक नहीं।'प्रसिद्ध आलोचक' होने का मतलब 'अच्छा आलोचक' होना नहीं होता है। ऐसे न जाने कितने 'प्रसिद्ध आलोचक' हिन्दी में अपना झण्डा गाड़कर बैठे हुए हैं। मैंने तो पहले ही कहा है कि इस लेख को लेकर अपना समय ख़राब करेंगे हम सब। हो सकता है कि इसी उद्देश्य से वह लेख लिखा गया है कि 'प्रसिद्धि' थोड़ी और मिल जाए। लेकिन प्रसिद्ध होने का मतलब 'सिद्ध' होना तो नहीं होता।
सादरअनिल2013/5/29 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>
थोड़ी सी इंटरनेट पर खोज की तो पाया कि स्वनामधन्य रामजी राय कम्यूनिस्ट पार्टी के जन संस्कृति मँच से जुड़े हैं, अर्थात साम्यवादी विचारधारा के व्यक्ति हैं- स्वाभाविक है प्रगतिशील हैं। एक ई-पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक हैं। खुद को बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध की धारा में शामिल मानते हैं। उनकी पत्रिका का “प्रधान वाक्य” है-प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक पत्रिका। व्यवस्था को गरियाना प्रगतिशीलता की निशानी होता है, संभवतः उसी धर्म का पालन करते हैं। अतः उनको प्रसिद्ध आलोचक सही ही कहा गया है, समालोचक नहीं।
2013/5/29 narayan prasad <hin...@gmail.com>
<<उनकी योग्यता पूछना तो जायज नहीं है>>
इस प्रश्न के पीछे छिपे व्यंग्य पर शायद आपने ध्यान नहीं दिया । लेखक की योग्यता तो अभिव्यक्त विचारों से ही स्पष्ट हो जाता है ।
--- नारायण प्रसाद
2013/5/29 Dr. Paritosh Malviya <malviya...@gmail.com>
मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा है कि लेखक आखिर सिद्ध क्या करना चाहते हैं। उनकी योग्यता पूछना तो जायज नहीं है परंतु इतना अवश्य है कि यह लेख पूर्वाग्रह ग्रस्त दिखता है। ब्राहाणवाद को गरियाना भी प्रगतिशीलता मानी जाती है इन दिनों। हिंदी के विकासक्रम पर इतना व्यापक शोध हुआ है कि इसके उद्गम के बारे में कुछ नया सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। क्या हम सभी सांप गुजर जाने के बाद लकीर नहीं पीट रहे हैं।
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विस्तृत विवेचन के लिए देखें - पं॰ किशोरीदास वाजपेयी (1998): “हिन्दी शब्दानुशासन”, पंचम संस्करण, संवत् 2055 वि॰; नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; कुल - 12+4+40+8+6+608 पृष्ठ । पुनर्मुद्रण - विष्णुदत्त राकेश द्वारा सम्पादित “आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली", वाणी प्रकाशन, 2-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली; 2008 ई॰ ।
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यशवंत जी मुझे उनका "चुटकुला" अच्छा लगा। उनके तत्संबंधी विचार विस्तार में दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं। लेकिन यह बात तो है कि हिंदी में हमारी स्थानीय भाषाओं या बोलियों से शब्द लेकर उनको प्रचलित करने के सचेत सांस्थानिक प्रयास निरंतर किए जाते तो हिंदी कहीं अधिक समृद्ध होती। निरंतर इसलिए कि नित नए शब्द पैदा होते रहते हैं और उसके अनुरूप हिंदी के शब्दकोशों के अद्यतन का कार्य हो नहीं पाता। मैं वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार के शब्द-संग्रहों, शब्दावलियों को देखता हूं तो वे बरसों पुराने नज़र आते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में हर वर्ष नए-नए शब्द जुड़ते जाते हैं।
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