विषयः -ताति, -ताई, -आई, -आ, -ई प्रत्यय
सुन्दर शब्द में -ता प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञा 'सुन्दरता' शब्द बनता है । परन्तु, 'सुन्दरताई'
शब्द भी हिन्दी साहित्य में, विशेष करके कविताओं में, प्राप्त होता है । कुछ लोग कह सकते हैं कि यह शब्द अशुद्ध है । पहले मेरा भी यही मन्तव्य था । इस सन्दर्भ में मैं डॉ० भोलानाथ तिवारी और पं० किशोरीदास वाजपेयी के विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
रूप-परिवर्तन के कुल नौ कारणों में से पाँचवाँ कारण डॉ० भोलानाथ तिवारी इस प्रकार देते हैं –
<उद्धरण>
(५) अज्ञान - कुछ अस्पष्टताएँ अज्ञान के कारण होती हैं, अतः ऐसी
अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए जो नये रूप आते हैं, उनके पीछे अज्ञान भी एक कारण के रूप में अवश्य काम करता है । ‘दरअसल’, ‘दर हकीकत’, ‘श्रेष्ठ’ जैसे रूप उन्हीं लोगों के लिए अस्पष्ट रहे होंगे, जिन्हें फ़ारसी और संस्कृत का ज्ञान न रहा होगा । अर्थात् ‘हम लोग’, ‘तुम लोग’, ‘ये लोग’ जैसे रूपों की बात छोड़ दें तो निश्चय ही अज्ञान एक कारण के रूप में अस्पष्टता के साथ-साथ रूप-परिवर्तन में काम
करता है । ज़ेवरात, जवाहरात, कागजात बहुवचन हैं, किंतु जिन्हें उनका पता नहीं है, वे बहुवचन में नये रूप ज़ेवरात, जवाहरात या ‘कागजातों’ का प्रयोग करते हैं । बेफ़जूल (‘फ़जूल’ के स्थान पर) का प्रयोग कुछ अशिक्षितों तक ही सीमित है । इसके पीछे भी ‘अज्ञान’ कारण हो सकता है । कुछ लोगों द्वारा प्रयुक्त, (मुख्यतः पिछली सदी में) कृपणताई, कोमलताई, पांडित्यता भी अज्ञान के कारण ही बने हैं
। इनका प्रयोग कृपणता, कोमलता तथा पांडित्य के स्थान पर हुआ है । आश्चर्य है कि तुलनात्मक ने ‘कोमलताई’ का प्रयोग किया है । भारत भाग्य प्रभु कोमलताई । (मानस ७-११-३) पूज्यनीय, सौंदर्यता अन्य उदाहरण हैं ।
<उद्धरण समाप्त>
लेकिन -ताई प्रत्यय के बारे में पं. किशोरीदास वाजपेयी कुछ और ही कहते हैं -
<उद्धरण>
ब्रज भाषा
में ‘सुन्दरताई’ जैसे प्रयोग बहुतायत से मिलते हैं । यहाँ ‘सुन्दरता’ भाववाचक संज्ञा से फिर भाववाचक (दूसरा) ‘आई’ या ‘ई’ प्रत्यय नहीं है; जैसा कि लोग समझा करते हैं । मैं स्वयं पहले समझता था कि ‘सुन्दरताई’ आदि प्रामादिक प्रयोग हैं--एक भाववाचक प्रत्यय (‘ता’) के आगे फिर (दूसरा) भाववाचक प्रत्यय लगाना ठीक नहीं है; गलत है और यह गलती ब्रजभाषा में तथा खड़ी बोली की पुरानी
कविता में मिलती है । ऐसा मेरा भी विचार था, जो कि ब्रजभाषा-व्याकरण में सन् १९४३ में, लिख भी दिया था ! इस के अनन्तर अन्य लोगों ने भी यही दुहरा दिया कि ‘सुन्दरताई’ आदि प्रयोग गलत हैं, क्योंकि किसी भाववाचक प्रत्यय के अनन्तर दूसरा भाववाचक प्रत्यय नहीं लग सकता । हेतु ठीक है - किसी भाववाचक प्रत्यय के आगे दूसरा भाववाचक प्रत्यय नहीं लग सकता; परन्तु 'सुन्दरताई' में वह बात नहीं है -- दो भाववाचक
प्रत्यय नहीं है; यह मुझे अभी कुछ दिन पहले जान पड़ा । 'सुन्दरताई' में 'सुन्दर' शब्द से ‘ताई’ भाववाचक प्रत्यय है । इस ‘ताई’ की विकास-कथा सुनिए ।
किसी समय, इस देश की ‘मूल-भाषा’ में भाववाचक ‘ताति’ प्रत्यय का चलन था । कालान्तर में इस
का प्रयोग कम होने लगा । वेदभाषा में ‘शिव’ ‘अरिष्ट’ आदि कुछ ही शब्दों में इस के दर्शन होते हैं । ‘शिवतातिः’ वैदिक पद का अर्थ है – ‘शिवत्व’ ‘शिवता’ ।
आगे चलते-चलते ‘ताति’ प्रत्यय लुप्त ही हो गया; परन्तु अपनी सन्तति ‘ता’ छोड़
गया । लौकिक या आधुनिक संस्कृत में ‘ताति’ का ‘ता’ मात्र अंश भाववाचक तद्धित-प्रत्यय के रूप में चलता है और यही हिन्दी में तथा अन्य भारतीय भाषाओं में गृहीत है । ‘ताति’ का कहीं पता नहीं ! ‘शिवता’ ‘सुन्दरता’ आदि में ‘ता’ उसी ‘ताति’ का आद्य अंश है ।
परन्तु ‘मूल-भाषा’ की उस अनवच्छिन्न और नैसर्गिक धारा में बहता-लुढ़कता ‘ताति’ प्रत्यय बढ़ता गया । आगे बढ़ते-बढ़ते वह घिस कर कुछ ऐसा बन गया, जैसे हिमालय के बड़े पत्थर गंगा की तेज धारा में बहते-लुढ़कते छोटे-छोटे गोल-मटोल ‘महादेव’ बन जाते हैं । ये छोटी-छोटी बटियां कितनी मोहक होती हैं । इन्हें देखकर कौन सहसा कह देगा कि बड़ी-बड़ी शिलाएँ ही ये इन रूपों में हैं !
परन्तु हैं । अन्यथा कहाँ से आ गईं ? सो ‘मूलभाषा’ का ‘ताति’ (जो कि आधुनिक संस्कृत में ‘ता’ के रूप में है) प्राकृत-धाराओं में न जाने कहाँ कैसा बनता-बनता हिन्दी में ‘ताई’ रूप से आ गया । ‘ताति’ के ‘ति’ का व्यंञ्जनांश उड़ गया । स्वर प्रबल होता है; सो बना रहा । ठीक उसी तरह, जैसे कि ‘भवति’ – ‘होति’ – ‘होदि’ से ‘होइ’ रह गया । हिन्दी की नैसर्गिक प्रवृत्ति शब्दों को प्रायः दीर्घान्त कर देने की
है । सो ‘ताइ’ बन गया – ‘ताई’ । यही ‘ताई’ है ‘सुन्दरताई’ आदि में । ‘कासों कहौं निज मूरखताई’ ।
परन्तु लोग यह भूल गए कि ‘ताई’ एक स्वतन्त्र प्रत्यय है । सब लोग उपर्युक्त ढंग से ‘सुन्दरताई’ आदि को प्रामादिक प्रयोग समझने लगे ! फलतः
आज राष्ट्रभाषा में इस ‘ताई’ का चलन नहीं है । किसी अप्रचलित शब्द को व्याकरण जबर्दस्ती भाषा में चलाए; यह हो नहीं सकता । हमारा भी वैसा कोई विचार नहीं है । राष्ट्रभाषा में ‘ताई’ को फिर से हम चलाना नहीं चाहते । प्रत्यय-विकास का क्रम भर दिखाने के लिए यह सब लिखा गया है ।
राष्ट्रभाषा में ‘ताई’ तो नहीं परन्तु इस की सन्तति ‘आई’ आप बराबर देखते है – ‘चतुराई’ ‘निठुराई’ आदि । यानी ‘ताई’ का अवशिष्ट व्यंजन भी घिस गया और ‘आई’ मात्र रह गया । आगे और भी संक्षेप हुआ । ‘आई’ का ‘आ’ भी घिस गया और ‘ई’ मात्र भाववाचक प्रत्यय रह गया—‘सावधानी’ ‘होशियारी’ ‘बेवकूफी’ आदि । यानी ‘आई’ तथा ‘ई’ ये दोनों ही रूप हिन्दी में चल रहें हैं
।
इस तरह हिन्दी में प्रचलित कौन-सा शब्द या शब्दांश 'मूलभाषा' से किस तरह घिसता-मँजता किस-किस पड़ाव पर रुकता-ठहरता आया है; यह सब देखना-भालना भाषा-विज्ञान का काम है, निरुक्त का काम है और कठिन काम है । व्याकरण-शास्त्र को अपना ही बहुत
काम है । यहाँ प्रसंगप्राप्त एक चर्चा कर दी गई है ।
<उद्धरण समाप्त>
सन्दर्भः
(१) भोलानाथ तिवारी (१९९२): "भाषाविज्ञान", अनुच्छेद (५), पृ० २४२
(२) पं. किशोरीदास वाजपेयी (१९९८): "हिंदी शब्दानुशासन", तद्धित प्रकरण, पृ० २८४-२८६
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